रविवार, 29 सितंबर 2019

तेरे हिस्से का झूला, बिटिया।

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बड़े शहर के अनेकों रेलवे स्टेशनों में यह एक कम व्यस्त स्टेशन है, मेरी ट्रेन अल सुबह 12.45 की प्लेटफॉर्म पाँच से है, पर मैं पूरे सवा घण्टे पहले पहुँच गया हूँ, पूरब जाना है, देखता हूँ कि सवा घण्टे पहले भी प्लेटफॉर्म की सारी बेंचें लोग कब्ज़ा लिये हैं, मुझे एक नम्बर एकदम खाली दिखता है, सुबह छह बजे से बस भाग ही रहा हूँ, कुछ देर कमर सीधा करने की चाह मुझे एक नम्बर ले जाती है।

बेंच पर बैग रखता हूँ और पैर सीधे कर पसर जाता हूँ, मुझे नींद के आगोश में चले जाने का डर है, पसरे हुए ही पास के स्टॉल वाले से चाय माँगता हूँ, आजकल दुर्लभ मुस्कराहट के साथ स्टॉल वाला लड़का एक कागज के ग्लास में टी-बैग वाली चाय मुझे दे दस रुपये ले जाता है, अब चाय पीने के लिये पूर्ण पसरी अवस्था से कुहनी टेक लगभग क्षीरसागर के भगवान विष्णु सी अर्धपसरी अवस्था में आ घूँट घूँट चाय पीने लगता हूँ मैं।

तभी नंगे पैर, पर पैरों में गिलट की मोटी पायल पहने एक तेरह-चौदह साल की लड़की आती है, कुछ दूर लगे स्टेनलेस स्टील के डस्टबिन्स के जोड़े की ओर मूक इशारा करती है और मुझसे थोड़ी दूर एक बैंच मे
पर बैठ जाती है। उसी के थोड़ा पीछे एक छह-सात साल की लड़की एक कई बोरों को जोड़ बनाये सफेद बोरे को खींच घसीट कर ला रही है, यह छोटी लड़की दोनों डस्टबिन्स को टिल्ट कर उसमें से पानी और सॉफ्टड्रिंक की बोतलें निकालती है, जिस भी बोतल में कुछ द्रव्य बचा है उसे खोल डस्टबिन में खाली करती है और अपने बोरे में भरती जाती है, कुछ ही देर में उसका काम पूरा हो जाता है।

न जाने क्यों प्लेटफॉर्म के दो पिलर्स के बीच कुछ ऊँचाई पर पीले रँग की नायलॉन की रस्सी बंधी है, काम पूरा करते ही बच्ची उस रस्सी को देखती है, उसकी आँखें चमक रही हैं, उस रस्सी के पास जा, उस पर बैठ वह बच्ची झूला सा झूलने का प्रयास करती है, कभी रस्सी पर बैठ, कभी रस्सी पर लटक रात के सवा बारह बजे मेट्रो शहर के प्लेटफार्म पर झूलती वह बच्ची बहुत प्रसन्न है-मस्त है, उसे दुनिया में किसी से भी कोई शिकायत नहीं है।

इधर बैंच पर बैठा मैं लज्जित हूँ, मेरी नींद गायब है, यह कुछ उन मौकों में से है, जब मुझे खुद के भी आदमी होने पर शर्म आती है... तेरे हिस्से का झूला, तुझे, आखिर, हम कब तक दे पायेंगे, मेरी बिटिया ?



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