बुधवार, 16 अगस्त 2017

'मृत्युगंध'

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ऑटो से उतरते ही ICU की ओर भागी सिस्टर मथाई, एक साल पहले रिटायर भले ही हो गयीं हों वे, पर आज भी अस्पताल का हर कोई उनको जानता है... क्यूबिकल 4 के बाहर पहुँचते ही ठिठकीं वो, अंदर डॉ सत्येन कप्पू अविजित को देख अपने नोट्स लिख रहे थे, बेड पर दाहिना घुटना टिकाये अपने चिरपरिचित अंदाज में... दरवाजे के शीशे से उन्होंने सिस्टर को देख लिया, और अपनी रौबदार आवाज में गरजे "अंदर आ जाइये सिस्टर मथाई, बाहर क्यों खड़ी हैं?"...

वह अंदर गयीं और जाते ही अनुभव की, वह तेज मृत्युगंध... डॉ की प्रश्नवाचक निगाहों के जवाब में बोली "अविजित बिटिया का बॉयफ्रेंड है, पूना में अकेले ही रहता है, बेटी ने फोन किया कि अस्पताल देखने जाओ जल्दी"... "अरे कुछ नहीं है, मैंने सारी रिपोर्ट्स देख ली हैं और जाँच भी कर ली है, लग रहा साहबजादे ने कुछ ज्यादा ही पार्टी वार्टी की है, एसिडिटी हो गयी ज्यादा, जब चाहे घर जा सकता है।"... पर वह गंध सिस्टर को इतना असहज कर रही थी कि वह वहाँ रुकी नहीं, अविजित के सर पर हाथ फेर और डॉ साहब को विश कर लगभग भागते हुए क्यूबिकल से बाहर निकलते बोली "घर में गैस जलती छोड़ आई हूँ।"... डॉ कप्पू के ठहाके पूरे कॉरिडोर में उनका पीछा करते रहे...

रास्ते से ही बेटी को फोन लगाया सिस्टर मथाई ने...

"हाँ, क्या हुआ मम्मी?"
"कुछ नहीं, देख आई।"
"मेरी बात कराओ अविजित से!"
"पर मैं तो निकल आई।"
"ओह मम्मी, मैंने कहा था न अकेला फील कर रहा है अविजित, घण्टे-दो घण्टे तो रुकती वहाँ, कैसा है वो?"
"डॉ कप्पू कह रहे थे, एसिडिटी है केवल, जब चाहे घर जा सकता है।"
"फिर लगे हाथ डिसचार्ज करा लेतीं।"
"पर बेटा, मेरा रुकना नामुमकिन था वहाँ"
"क्यों मम्मी?"
"वहाँ वही मृत्युगंध पसरी थी।"
"ओह शटअप मम्मी!"... और रोते हुए बेटी ने फोन काट दिया था...

कुल चालीस साल नौकरी की थी सिस्टर मथाई ने, उस बड़े अस्पताल के ICU में, शुरु में तो सब ठीक था पर तीस साल की नौकरी के बाद वो Psychic (अतींद्रिय क्षमता युक्त) हो गयी थीं, कुछ मरीजों से उनको एक खास तरह की गंध आने लगती थी, और अपवादरहित रूप से वो सब मरीज अगले आठ घण्टे के भीतर मर जाते थे, चाहे रिपोर्ट्स या डॉ कुछ भी कह रहे हों... सिस्टर मथाई इस गंध को मृत्युगंध कहतीं थी।

बहुत दुखी थीं सिस्टर, अनेकों बार बेटी को फिर फोन लगाया, पर बेटी ने उठाया ही नहीं... अंत में सिसकते-सिसकते ही सो गयीं सिस्टर...

सुबह सुबह छह बजे फोन की घण्टी ने ही जगाया सिस्टर को... बेटी थी दूसरी ओर...
"सॉरी मम्मी, तुम गलत नहीं थी।" पर बेटी चहक रही थी।
"क्या हुआ?" आशंकित सिस्टर का कलेजा मुँह को आने लगा था।
"टी वी में न्यूज देखी क्या?"... बेटी ने पूछा
"नहीं, क्या है?... हैरान-परेशान थीं सिस्टर
"डॉ सत्येन कप्पू रात नींद में चल बसे!"

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बुधवार, 9 अगस्त 2017

क्या बेटियों को भी याद रहता है ?

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छुट्टी का दिन था आज
लंच के बाद जमकर अलसाये सब
उठने के बाद उसने होमवर्क किया
बोर्नविटा धीरे धीरे पीते हुए
फिर माँ के मोबाइल को हथियाया
और खोल लिया फेवरेट यूट्यूब
वौइस् सर्च कर घंटों देखे उसने
पॉमपॉम, टॉम एंड जेरी, ब्रूस ली
और भालू-माशा के अनगिनत वीडियो

देखती रही तब तक, जब तक कि
मम्मी ने मोबाइल छीना नहीं हाथ से

सोने का फरमान सुन कर अब
वह आ गयी है तुरंत मेरे पास
उसे सुलाना केवल मेरा काम है
वह बस यही जानती मानती है

अधिकार जता फेंक दिया चश्मा
मेरे शरीर को बना अपना बिस्तरा
पाँच बरस की मेरी छुटकी सोना
अपना रोज का हुकुम सुनाती है
पापा मुझे जल्दी सुला दो ना

और मैं देने लगता हूँ उसे थपकियाँ
उसका दिमाग अब भी दौड़ रहा है
यूट्यूब वीडिओज़ की मायावी दुनिया में
फरमाइश होती है कुछ सुनाने की

पता है आज नहीं सोयेगी आसानी से
इसलिये नहीं सुनाता चिरपरिचित लोरियाँ
और थपकियों के साथ साथ शुरु होता है
उसका और मेरा पसंदीदा दिमागी खेल

सोना बहुत गंदी है
नहीं सोना बहुत अच्छी है
पापा की बात नहीं मानती
नहीं हमेशा मानती है

स्कूल का टिफिन नहीं खाती
नहीं रोज खाके आती है
होमवर्क गलत गलत करती है
नहीं एक्सीलेंट वाला करती है

क्लास में पीछे बैठती है
नहीं आगे बैठती है
हरी सब्जी नहीं ये खाती है
नहीं मैं तो सब्ज़ी खाती हूँ

पापा को किस्सी नहीं करती
नहीं रोज किस्सी करती है
कभी नहीं ये तो नहाती है
नहीं रोज मैं तो नहाती हूँ

डाँस क्लास ये तो जाती नहीं
नहीं मैं रोज रोज जाती हूँ

और थपकियाँ अनवरत चालू हैं
धीरे धीरे उसके जवाब मन्द होते हैं
आखिर आ जाती है वह स्थिति भी
नहीं उत्तर आता उस मासूम की ओर से

नींद के आगोश में चली गयी है बिटिया

अपने आप से बेहद संतुष्ट हूँ मैं
मेरा सबसे अहम काम जो है ये
मुझे तो इतना अच्छा लगता है यह
कि आपको तक बतला रहा हूँ यहाँ

अपनी स्मृतियों के खजाने में यह पिता
सहेजे रखेगा इन पलों को जीवन भर

पर क्या बेटियों को भी याद रहता है
कि किस तरह सुलाते थे उनको पिता ?

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शनिवार, 5 अगस्त 2017

'चोटी कटवा,' एक रहस्य कथा!

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टीवी पर लगातार चोटी कटवा की खबरें आ रहीं हैं, न्यूज एंकर बता रहा है कि राजस्थान के नोखा कस्बे में पहली चोटी कटने के बाद से पिछले दो हफ्तों में यह 1800वां मामला है... डॉ अनुपम मानव इन सब खबरों को देखते हुए अपनी पत्नी अनुपमा और इकलौती बेटी अनुपम ज्योति के साथ डिनर ले रहे हैं... अनुपमा सशंकित भी हैं और आतंकित भी, उन्हें लम्बे बालों से बहुत प्यार है, इतना कि विवाह के बाद डॉ साहब के अनेकों बार बॉब कट अथवा शोल्डर लेंग्थ हेयर करने के रोमान्टिक अनुरोध को उन्होंने साफ मना कर दिया, बिटिया के बाल भी उन्होंने उसके तमाम अनुरोधों-जिद के बावजूद कभी भी कटवाने नहीं दिये...

मनोविज्ञान के प्रोफेसर डॉ साहब पत्नी को आश्वस्त करने के लिये उनको मनोविज्ञान और मानव मस्तिष्क के बारे में बताते हैं "दरअसल यह सब एक तरह का मास हिस्टीरिया है कुछ मामलों में, तो कुछ मामलों में यह अपने को आकर्षण का केंद्र बनाने के लिये किया जा रहा है, कुछ मामलों में यह दबी हुई इच्छा पूरी करने का प्रयास है... कुल मिलाकर मानव मस्तिष्क बहुत ही जटिल है, और कई बार उसके किसी ख़ास काम को करने के बारे में आप न तो कोई अनुमान लगा सकते हैं और न ही पूर्ण निश्चितता से कुछ कह ही सकते हैं।"

पर अनुपमा का भय कम नहीं हुआ, अनुपम ज्योति भी डरी हुईं थी, बोली "पापा मैं तो आज आप लोगों के साथ ही सोऊँगी!" तीनों डिनर के बाद छोटे वॉक पर जाते हैं और रात करीब ग्यारह बजे सो जाते हैं।

दूसरे दिन की सुबह की शुरुआत अनुपमा और अनुपम ज्योति के बिलखने से होती है, दोनों के बाल कंधों से नीचे बाल कटवा ने काट दिये हैं, डॉ साहब सन्न हैं, उनके मुख से निकलता है "कुछ बातें विज्ञान कभी नहीं समझ सकता!" फिर पत्नी और बेटी को ढाढस दे वो सैलून ले जाते हैं, बालों को तरतीब से कटवाने के लिये।

तीन दिनों के बाद रविवार पड़ा, डॉ साहब स्टडी में बैठे हैं, तभी सोलह साल की अनुपम ज्योति उनके पास जाती है, उसका सर झुका हुआ है "सॉरी पापा, अपने बाल मैंने खुद ही काटे" डॉ साहब उसकी पीठ सहलाते हैं... "दरअसल जब आप मम्मी की चोटी काट रहे थे, तब मैं जगी हुई थी!"...

कुल मिलाकर मानव मस्तिष्क बहुत ही जटिल है, और कई बार उसके किसी ख़ास काम को करने के बारे में आप न तो कोई अनुमान लगा सकते हैं और न ही पूर्ण निश्चितता से कुछ कह ही सकते हैं।

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मंगलवार, 1 अगस्त 2017

ब्लॉगिंग या फ़ेसबुक, फैसले का सस्पेंस।

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दुविधा में था काफी दिनों से, इन दोनों में से एक ही को चुनना होगा आखिरकार... कल जी कड़ा करके फैसला करने की सोची... पहला प्यार ब्लॉगिंग हेड और फ़ेसबुक टेल... जो भी आयेगा, आगे बस उसी को समय दिया जायेगा... और खुली छत में जाकर उछाल ही दिया सिक्का...

उछले सिक्के को लपक कर हथेलियों में समेटा... साँसें रुकी हुई थी और हिम्मत लापता भी, फिर भी, फैसला तो करना ही था... और जिंदगी फैसलों के एक अनवरत सिलसिले का ही तो नाम है...

तो दोस्तों हथेली खोली... और..और... यह क्या यार... बेख़याली में सिक्के की बजाय कैरम की काली गोट उछाल दिये थे अपन...

 😜



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