शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

सड़क का बच्चा !

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पिता ने उसे दूर से ही देख लिया, उसने गेट खोला और दौड़ कर पास गये दोनों कुत्तों को प्यार से सहलाने लगा।

"जाओ बिटिया, कल के तीनों अख़बार महावीर को दे दो जाकर, तैयारी कर रहा है वह इम्तिहान की"...

"हुं, जाये मेरी जूती, क्या जरूरत है इस तरह के सड़क के बच्चों को इतने ऊँचे ख़्वाब देखने की?"...

पिता कुछ बोला नहीं, झटपट स्टडी से नीचे उतरा, अखबारों की गड्डी उठाई और दरवाजा खोल बोला "तैयारी अच्छी चल रही है न बेटे, कोई भी जरूरत हो तो बेझिझक बताना मुझे" यह कहते हुए उसने अपार स्नेह से महावीर के सिर पर हाथ फेरा।

'पच्चीस साल पहले तेरा यह बाप भी एक सड़क का बच्चा ही था' मन ही मन सोचा पिता ने, आँखों के कोनों में उतर आई नमी को चश्मा उतार आस्तीन से पोछा और मुस्कुराते हुए बिटिया से पूछा "तेरी 'जी एस' की तैयारी कैसी है, बिटिया।"

और दुनिया यथावत चलती रही...





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2 टिप्‍पणियां:

  1. मार्मिक.ज़रूरी है कि बच्चों को सुविधाएं उपलब्ध करने के साथ साथ ज़मीनी हक़ीक़त से भी परिचित करवाया जाए। अच्छा होता यदि पिता मन में सोची हुई बात अपने बच्चे पर प्रकट करते और उसके इस प्रकार के व्यवहार के लिए उसे थोड़ा डांट भी लगाते.

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