शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

सड़क का बच्चा !

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पिता ने उसे दूर से ही देख लिया, उसने गेट खोला और दौड़ कर पास गये दोनों कुत्तों को प्यार से सहलाने लगा।

"जाओ बिटिया, कल के तीनों अख़बार महावीर को दे दो जाकर, तैयारी कर रहा है वह इम्तिहान की"...

"हुं, जाये मेरी जूती, क्या जरूरत है इस तरह के सड़क के बच्चों को इतने ऊँचे ख़्वाब देखने की?"...

पिता कुछ बोला नहीं, झटपट स्टडी से नीचे उतरा, अखबारों की गड्डी उठाई और दरवाजा खोल बोला "तैयारी अच्छी चल रही है न बेटे, कोई भी जरूरत हो तो बेझिझक बताना मुझे" यह कहते हुए उसने अपार स्नेह से महावीर के सिर पर हाथ फेरा।

'पच्चीस साल पहले तेरा यह बाप भी एक सड़क का बच्चा ही था' मन ही मन सोचा पिता ने, आँखों के कोनों में उतर आई नमी को चश्मा उतार आस्तीन से पोछा और मुस्कुराते हुए बिटिया से पूछा "तेरी 'जी एस' की तैयारी कैसी है, बिटिया।"

और दुनिया यथावत चलती रही...





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रविवार, 19 अक्तूबर 2014

'शीर्षक विहीन'

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असल आपत्ति थी
और विरोध भी तो
इस बात का ही था
कि आखिर क्यों किसकर
किसी पुरानी लड़ाई
में जीतने वाले को
बना दिया गया है
सर्वगुण सम्पन्न देवता
उसे पूजते हैं लोग
भव्य मंदिर बनाकर

उसी पुरानी लड़ाई में
हारने वाले योद्धा को
कह दिया जाता है असुर
हर बुराई से लदा-भरा
और उसकी उस मौत का
होता है सार्वजनिक उत्सव
लोग त्यौहार मनाते हैं

तुम जो अपने को कहते हो
इन्सान एक नई सोच का

तुम्हें विरोध करना था
दो महान योद्धाओं में
एक को महान-भगवान
बनाकर मन्दिर में पूजने
दूसरे को तुच्छ-अवगुण खान
बोल हिकारत से उपहास बनाने
की इस आदिम-जाहिल प्रवृत्ति का

पर तुम कर क्या रहे हो दोस्त
तुम हारे को देवता बना रहे हो
कल तुम उसी हारे का बनाओगे
अपने साधन जुटाकर मन्दिर भी
फिर तुम भी एक दिन आखिर
अपने देवता को पूजने लगोगे
और उसे हराने वाले को
कहोगे दुष्ट-भ्रष्ट, व्यभिचारी
इस बात को पुष्ट करने को
गढ़ोगे तुम भी मिथक नये
तुम भी प्रार्थनाएं रचोगे
तुम भी शीश नवाओगे
तुम भी भक्त बन जाओगे

और इन्सान के जिन कदमों को
आगे और आगे बढ़ना था
जो बढ़ने के लिये ही बने थे
वो एक तरह से ठहर जायेंगे
गोल घेरा है पुराना बना हुआ
वो कदम वहीं चक्कर लगायेंगे

दोस्त, मुझे अफ़सोस केवल इतना है
कि गोल घेरे में घूमते यह कदम
तुम्हारे हैं, तुम जो, अपने को कहते हो
इन्सान एक एकदम नई सोच का
तुम, जिस पर सबकी उम्मीदें थी
कि इस गोल घेरे को तोड़ डालोगे

दिल पर हाथ रख बोलो दोस्त
क्या इसे ही आगे बढ़ना कहते हैं?



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शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

गालियाँ

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मैं नहीं
सचमुच नहीं
डरता हूँ
गालियों से

ठीक है
कि आज तुम
बिना मुझे
जाने समझे
बूझे गुने
दे जाते हो
बेशुमार गालियाँ

फिर भी
मेरे अजीज़ दोस्त
बहुत खुश हूँ
मैं तुम्हारी
उन गालियों से

देते रहो
रोजाना उनको
नियम से
लगातार

फिर आयेगा
एक दिन
वह दिन भी
जब आख़िरकार
तुम्हारे शब्दकोष में
नहीं बचेंगी
कोई भी गाली

और तुम्हारा 
मन भी, दोस्त
हो चुका होगा
निर्मल, कलुशहीन

फिर उस दिन
बैठेंगे हम
साथ साथ
चाय की प्याली ले
नमकीन चबाते हुए

करेंगे ढेर सी बातें
मैं तुम्हें समझूँगा
और भले ही
बहुत देर से ही सही
पर आख़िरकार
तुम भी मित्र
मुझे जानने लगोगे

मेरे दोस्त
मैं बहुत खुश हूँ
तुम्हारी इन
गालियों से

मेरे लिये तो
यह सारी की सारी
शुरुआत जो हैं न
भविष्य में होने वाले
एक सार्थक 
संवाद की... 







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