बुधवार, 3 सितंबर 2014

'कैसे कुकवि हो तुम ? यार !'

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जब मैं
कविता 
को ही
खाता
पीता
बरतता
रगड़ता
ओढ़ता
बिछाता
हूँ सारे दिन

मैं तो
कविता 
को ही
जीता हूँ
और 
उसमें ही
हूँ
मरता भी

पूरा दिन
कविता 
से ही
हूँ मैं
बोलता
बतियाता
बहस करता
गपियाता

कविता ही
है मेरी 
मुस्कान
हँसी
और 
ठहाका भी
दुखी होता
रोता भी
हूँ मैं
कविता में ही

और तो और
नहाते वक्त
साबुन लगाने
से पहले
अक्सर
बदन से
झाड़ देता हूँ
एकाध छटांक
कविता ही

फिर भी
यह
बार बार
तुम जो
कहते हो
कि मुझे है
कविता की
एकदम 
रत्ती भर भी
समझ नहीं

कैसे
कुकवि 
हो तुम ?
यार !


क्या
यही 
तुम्हारा
कवि कर्म है ?





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