रविवार, 2 फ़रवरी 2014

हमारी दिल्ली, हमारी शान...??? आक्क थू sss

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अच्छा तो तुम्हारा 
एक नाम भी था
नीडो तानिया

हमें तो पता तक नहीं
कि तुम लोगों के भी
बाकायदा नाम होते हैं

हमारे लिए तो तुम
मिची मिची आँखों वाले
पहाड़ी शक्लोसूरत लिए
वो चिंकी लोग हो

जो पहनते हो
ढीले ढाले, अजीब कपड़े
बोलते हो कुछ
अलग तरह से


तुम्हारी लड़कियां
बहुत फ़ास्ट हैं
हमारी नजरों में


कुछ अलग सा है
तुम्हारा रहन सहन
उड़ाना जिसका मजाक
हक़ है हमारा


हम रोज कसते हैं
अनेकों फब्तियां
तुम लोगों पर और
तुम्हारे जैसे ही
कई दूसरों पर भी


जो दिखते हैं जुदा
अलग है जिनका रंग
या फिर जुबानें ही
या जिंदगी जीने का
लहज़ा और अंदाज


इस महानगर में
लगभग रोजाना ही
कहीं न कहीं
पीटे भी जाते हो तुम
और बदल लेते हो
अपना रहने का मकान


ये तुम्हारा कसूर था
नीडो तानिया
कि तुम मर गये


हद्द हो गयी यार
इतनी सी मार भी
नहीं झेल पाए तुम

तुम जैसों के लिए
दिल्ली के पास नहीं हैं
मार्च करने का वक़्त
या जलाने के लिए
चन्द मोमबत्तियां ही


तुम हमारी गिनती में
दिल्ली के नागरिक नहीं

तुम नागरिक ही नहीं

और तुम्हारी यह मौत
महज़ एक आँकड़ा है
हम दिल वालों की
दिलदार दिल्ली के लिए

नीडो तानिया
तुम्हें पता तो था न कि
हमारी दिल्ली, हमारी शान...




...

8 टिप्‍पणियां:


  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन टेलीमार्केटिंग का ब्लैक-होल - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. ना जाने किधर जा रहे है ..दुखद है सब

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  3. दिल्ली ने दिल चकनाचूर कर दिया, अब किसकी दिल्ली बची यह जब अपनों की न हो सकी।

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  4. जब बोये पेड़ बबुल के तो आम कहा से होये
    जब बच्चो को सिखाते है नफ़रत करना धर्म जाति के आधार पर खुद जैसा न होने के आधार पर तो वो नफ़रत वही नहीं रुकती है वो अपना ही रूप लेती है और , और बड़ी होती जाती है , हर उससे नफ़रत होती है जो खुद जैसा नहीं है , जो खुद जैसा नहीं दिखता है , जो खुद के जैसा खाता पीता नहीं है , जो खुद के जैसा सोचता नहीं है , तो इस नफ़रत का और हर किसी को खुद जैसा ही होने की जिद्द का अंत ऐसे ही दुखद होगा :(

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