शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

दौड़ ?

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तुम चाहे
दौड़ो कितना ही 
तेज, हांफते हुए

या धकेलो
अनगिनतों को
कोहनी मार पीछे

और गिरा दो
बहुतों को
लंगड़ी मारकर

पर जब भी
थोड़ा रुककर
देखोगे आगे-पीछे

पाओगे केवल
एक नतीजा
हरदम, हमेशा

कि हर बार
उतने ही आगे हैं
औ उतने ही पीछे भी

एक बहुत बड़े
गोल घेरे में
दौड़ रही है दुनिया

अगर अब भी
बेदम, बिन सुस्ताये
दौड़ना चाहते हो

तो यह तुम्हारा
अपना फैसला
और तुम्हारी दौड़ भी

तुमको मुबारक !
तुमको मुबारक !
तुमको मुबारक !

मैं तो थोड़ा
सुस्ताना चाहूँगा
बगिया में, छाँव में...




...

7 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन 7 फरवरी वर्षगांठ और वैवाहिक वर्षगांठ सब एक साथ मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. आज आपाधापी में स्वयं के लिए समय मिलेगा नहीं निकालना होगा ..... सटीक अभिव्यक्ति

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  3. जो औरों में उलझते हैं, अपनी गति कम कर बैठते हैं।

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  4. अभी कहाँ आराम मुझे यह मूक निमंत्रण छलना है
    और अभी तो मीलों मुझको मीलों मुझको चलना है
    वैसे कविता सकूं भरी है अच्छी है !

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  5. बहुत सुन्दर और सार्थक रचना....

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  6. मैने भी कभी ऐसा ही कुछ लिखा था--

    जब मैं चला
    पूरब दिशा की ओर
    पश्चिम ने कहा
    आ मेरी ओर
    जब मैं चला
    पश्चिम दिशा की ओर
    पूरब ने कहा
    आ मेरी ओर
    जीवन भर
    चलता रहा
    जब मील के पत्थर पर निगाह गई
    तो खयाल आया
    मैं वहीं खड़ा हूँ
    जहाँ से मैने
    चलना शुरू किया था!
    ..............
    .......यह एहसास तो और भी कष्ट दायक है। अब न दौड़ने की इच्छा शक्ति रहती है न रूकने की । :(

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