सोमवार, 4 नवंबर 2013

कुकुरमुत्तों की तरह उगते जीनियस, झाँसा देते निराशाराम, मरा हुआ चूहा, दीपावली के मंत्र और लॉर्ड मैकाले के नाम का दीया ...

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हमारे हिन्दी के खबरिया चैनल उस बच्चे (और उस जैसे और भी कई बच्चों को भी) बार बार दिखा रहे हैं... जीनियस बता कर... जीनियस का लाईव टैस्ट लिया जा रहा है... पाँच छह साल के उस बच्चे को चाणक्य का दूसरा नाम दिया गया है... बाल भयंकर तरीके से बिल्कुल टीवी सीरियल वाले चाणक्य की तरह काटे गये हैं... बृह्मान्ड के संबंध में कुछ जानकारियाँ उसके अति महत्वाकाँक्षी पिता ने उसे रटवाई हैं... मुझे बेचारे का हाल देख न जाने क्यों तथागत अवतार तुलसी (लिंक) की याद आने लगती है... सौ बात की एक बात यह है कि जीनियस भले ही छह साल का ही हो... अपनी बेहूदी नुमायश के लिये कभी तैयार नहीं होता...




निराशाराम नाम का वह तथाकथित संत जीवन भर सबको झांसा देता रहा... पर पके बुढ़ापे में फंस ही गया एक नाबालिग के यौन शोषण के अपराध में, और फंसा भी ऐसा, कि कानून से तो उसे जल्दी ही कोई राहत मिलती नहीं दिखती... कानून अब बेटे की फिराक में भी है... और बेटा शहर शहर-प्रदेश प्रदेश भाग रहा है संतई दिखाते-जताते... पर मुझे बाप बेटे का बचाव करते, उनमें ईश्वरत्व बताते-ढूंढते उनके साधक-भक्त हैरान करते हैं... आस्था भी एक चीज है भाई, पर आँखों और दिमाग को इस कदर बंद रखने वाले भक्तों को देख कभी कभी यह लगता है कि झाँसाराम ने उल्टे उस्तरे से इनको मूंड कुछ गलत नहीं किया... यह इसी लायक लोग थे...



यहाँ भी एक तथाकथित महान संत हैं जो कभी कैमरे के सामने नहीं आते... पर उनके चेला नंबर वन को कैमरों से परहेज नहीं... गुरू चेले दोनों मिलकर सपने देखते हैं... छोटे मोटे नहीं... कई कई जगहों पर हजारों टन खालिस सोने के खजानों के दबे होने के सपने... फिलहाल उनके सपनों में देखे सबसे छोटे यानी हजार टन सोने के खजाने की खुदाई जारी है सरकारी खर्चे पर... यह भी लगभग पक्का है कि मरा चूहा तक नहीं निकलना इस खुदाई में... पर उन पर विश्वास करने वाले भक्तों की तादाद और दबाव इतना है कि इस अंधविश्वास की आलोचना करने के अगले ही दिन नरेन्द्र मोदी को संत को नमन करना पड़ गया... खोदो और खोदो भाई, फिर जब कुछ न मिले तो यह कहना कि खजाने का रक्षक सरकार की गलत नीयत भाँप खजाने को जमीन के भीतर कहीं और ले गया...




कोई भी त्यौहार हो... खास तौर से हिन्दुओं का... सारे खबरिया चैनल उतावले-बावरे से हो जाते हैं... दीपावली पर भी यही हुआ... एक आध ने तो बाकायदा खम ठोक यह बताया भी कि केवल अपना टीवी हमारे चैनल पर खोले रखो... पूरे विधि विधान से पूजा करायेंगे आपकी, वह भी एकदम सही मुहुर्त पर... क्या खाओ-पकाओ-पहनो, सब बताया गया...गजब के भगवान हैं, पूजा के लिये भी खास वर्दी और मुहूर्त चाहते हैं... एक मिनट पहले या एक मिनट बाद पूजा किये तो फिर अगले साल तक अर्जी मुलतवी... मैं सोचता हूँ कि यह मामला कहाँ तक अभी आगे और बढ़ेगा... क्या दूसरे धर्मों को भी शामिल करेंगे यह चैनल वाले...






ऊपरी तौर पर देखें तो चारों मामले अलग अलग ही दिखते हैं... पर जरा गंभीरता से सोचें तो आप पायेंगे कि यह सब एक योजनाबद्ध तरीके से हो रहा है... कुछ ताकते हैं जो हमें दोबारा से पीछे ले जाना चाहती हैं... इन लोगों को पहचानिये... यह वही लोग हैं जो हमारी तथाकथित महान व प्राचीन भारतीय संस्कृति, पुरातन धर्म, अध्यात्म, आस्था-समर्पण, आँचल-पर्दा-पायल-घूंघट, वर्ण व्यवस्था, दंड विधान आदि आदि का गुणगान करते है... जो फिर उसी जालिम जमाने की ओर लौटना चाहते हैं... हाशिये पर फेंक दी गयी यह ताकतें आज फिर मुख्यधारा पर काबिज होने का जुगाड़ लगा रही हैं... यह वो लोग हैं जो दोबारा से उन्ही अंधेरों की ओर हमें ठेलना चाहते हैं... 




इस दीवाली पर मैंने भी एक दीया जलाया... लॉर्ड मैकाले के नाम का... मुझे कोई जरूरत नहीं पड़ी कहने की 'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय'... क्योंकि मैं यह जानता हूँ कि यह दीया असंख्यों के दिलो दिमाग को रोशन कर रहा है और करेगा भी... इंसान का आज तक का सफर हमेशा ही अंधेरे से उजाले का रहा है... और अब भी ऐसा ही होगा... मनुवाद को तो दफन होना ही होगा... इतना गहरा कि कोई कभी भी उसको खोद बाहर निकाल उसे हवा-पानी देने का सपना तक न देख सके....





आभार आपका...









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11 टिप्‍पणियां:

  1. badhiya abhivyakti .khabariya chenalon yah n karen to dukaan kaise chalegi .

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  2. याददास्त तेज होना जीनियस होना नहीं होता बच्चे को लगता है एटलस रटा दी गई है।नाबालिग बच्चों से रेप के कानून को कुछ समय पहले कडा किया था जिसमें जमानत बहुत मुश्किल से मिलती है दिल्ली पुलिस ने ये बहुत अच्छा काम किया कि इन्ही धाराओं के तहत आसाराम को गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया।मैकाले से पहले हमारे यहाँ बहुत से समाज सुधारक रहे हैं उन्होंने समाज को बदलने व एकजुट करने के बहुत से प्रयत्न किए जिनका फायदा भी हुआ।मैकाले नहीं होते तो भी पश्चिमीकरण की बयार भारत में लाई ही जानी थी।अंग्रेज तो ये भी कहते थे कि भारत आजाद होने के बाद बर्बाद हो जाएगा।आजादी को संभाल नहीं पाएगा।लेकिन ऐसा हुआ क्या?

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    1. एक तरफ यदि मैकाले के अंधविरोधी हैं तो दुसरी तरफ उनके अंधभक्त हैं।जिनके लिए मैकाले भगवान है।आत्मविश्वास को तोडना किसीको भी गुलाम बनाए रखने की सबसे कारगर चाल है।मैकाले का ही उद्देश्य है।

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  3. इस ब्लॉग ओ पढ़ कर एक ही बात समझ में आती हे यंहा अंग्रेजों के कुछ वन्सज काम कर रहे हें और इस ब्लॉग का लेखक हिन्दू विरोधी हे

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  4. बहुत कुछ गड्ड मड्ड हो गया है व्यावसायिक दबावों,न्यस्त हितों के चलते -मगर मैकाले के नाम पर दिया जलाने को मैं सहमत नहीं हूँ -क्योंकि ब्राह्मण तो हूँ ही और यह भी जानता हूँ कि उसने लाख सुधार किये मगर हैम लोगों को अंग्रेजी का गुलाम तो बना ही गया !हमारी मौलिकता हमसे छीनी -चिंतन छीना!

    कहीं न कहीं एक सामंजस्य का रास्ता ढूंढना होगा -जो कुछ भी हमारा पुराना है सभी त्याज्य नहीं है और मैकाले का दिया सब कुछ ग्राह्य नहीं !
    हाँ आज के कितने पोंगे पंडितों को दुर्दराने का वक्त है -ये शोभन सरकार और उनके चंट चेले अदि को तो शूली पर चढ़ा देना चाहिए !
    व्याख्याएं अगर गलत हो रही हैं तो किसका दोष है? बहुत कुछ सही परिप्रेक्ष्य में लाने की जरुरत है। और हमें ऐसे लोगों को ढूंढना होगा और प्रश्रय देना होगा !

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  5. आपका लेख पढ़ कर आज ही पढ़ा चिपलूनकर जी का ये लेख ध्यान में आ गया

    http://blog.sureshchiplunkar.com/2013/11/hindu-saints-on-target-conspiracy-of.html

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  6. @इस दीवाली पर मैंने भी एक दीया जलाया... लॉर्ड मैकाले के नाम का... मुझे कोई जरूरत नहीं पड़ी कहने की 'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय'…… मनुवाद को तो दफन होना ही होगा... इतना गहरा कि कोई कभी भी उसको खोद बाहर निकाल उसे हवा-पानी देने का सपना तक न देख सके....

    मित्र प्रवीण , आपके इस एकांगी दृष्टिकोण पर चकित हूँ , रवैया तो आपका भी रूढ़िवादी , कट्टर ब्राम्हणों जैसा ही है।

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      प्रिय मित्र गौरव,

      यह आलेख चार अलग अलग वाकयों और उन पर हमारे समाज के एक तबके की प्रतिक्रिया पर है... मैकाले की याद मुझे इसलिये आई क्योंकि उन्होंने ही 1837 में तैयार किया गया भारत दंड संहिता (आईपीसी) के मसौदे और आईपीसी के साथ ही तैयार ‘शिक्षा का कार्यवृत्त' (1835) के जरिये सभी के लिये एक से कानून, नियम, पैमाने और अवसर देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया था... वरना झांसाराम को उनके तमाम कुकर्मों की सजा के रूप में महज एक काला टीका ही लगा पहले की तरह कीर्तन करते रहने दिया जाता... आप इस सब पर भी कुछ कहें...

      रही बात एकाँगी दृष्टिकोण की, तो इसका मैं अल्पमति इसका निर्णय स्वयं न लेते हुऐ अपने प्रबुद्ध पाठक पर ही छोड़ना उचित मानता हूँ... :)


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    2. @आप इस सब पर भी कुछ कहें.

      अवश्य मित्र, लेकिन पहले आप एक अनुरोध स्वीकारिये.... कभी समाज के उस तबके पर भी लिखिए जो फेसबुक पर विराटो कि तस्वीर देख कर आसाराम पर गालियों और भद्दे कमेंट्स कि बौछार करने लगता है यही तबका अपुष्ट ख़बरों का प्रयोग सन्दर्भ में करता है यही तबका एक विशेष धर्म या वाद में सिर्फ कमियां ढूंढने के मिशन पर लगा है। इस तबके के लिए व्याभिचारी या व्याभिचार के आरोपी ही धर्म या वाद विशेष के प्रतिनिधि हैं

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