सोमवार, 25 नवंबर 2013

शान्तिपूर्वक विश्राम करो हेमराज, और आरूषि तुम भी... और प्लीज, बंद करो अब यह कांव कांव फिर से...

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कभी कभी घटनायें कुछ इस तरह घटती हैं कि आप उम्मीद खो देते हैं, आपको लगने लगता है कि चारों तरफ सिवा अंधेरे के और कुछ नहीं है, आपको लगता है कि शायद अब कभी रोशनी होगी ही नहीं... फिर भी मन की गहराइयों से एक धीमी सी आवाज उठती है आपके, कि नहीं, सब कुछ नहीं खत्म हुआ अभी... एक किरण कहीं चमकेगी, उम्मीदें फिर से जवां होंगी और हमारी दुनिया फिर से रोशन होगी... कुछ ऐसी ही मन:स्थिति में मैंने अपनी पोस्ट लिखी थी सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट लगने के बाद ३१ दिसम्बर २०१० को, पोस्ट थी आखिर क्यों मारा गया बेचारा हेमराज... क्या इस मामले में कोई कुसूरवार था ही नहीं, या बड़े लोगों के लिये खून माफ है ?  (लिंक)

मैंने इस पोस्ट के अंत में एक सवाल किया था, अपने पाठक से...

केस आज भले ही बन्द हो जाये...पर मैं उम्मीद का दामन नहीं छोड़ूंगा... हर एक हत्यारा कभी न कभी अपने करमों के बारे में 'गाता' जरूर है...
देर से ही सही यह केस सोल्व होगा जरूर, मेरे जीवनकाल में ही...
क्या आप भी मेरी ही तरह आशावान हैं ?
बताईये अवश्य...



तो आप खुद ही जान सकते हैं कि यह फैसला कितना सुकून देने वाला है मेरे लिये, और हम सबके लिये भी... यह एक विश्वास जगाने वाला फैसला है, यह फैसला साबित करता है कि अभी भी हमारी न्याय व्यवस्था और जाँच एजेंसियों में नीर-क्षीर विवेकी लोगों की कमी नहीं है...

पाँच साल से भी ज्यादा लंबे चले इस मामले के अंत में मैं यही कहूँगा कि 'अंत भला तो सब भला'...अब शान्तिपूर्वक विश्राम करो हेमराज, और आरूषि तुम भी...

आज फैसला हो गया, कल सजा सुनायी जानी है और मैं देख रहा हूँ कि हमारे इलेक्ट्रानिक मीडिया के कई कई चैनलों पर दोषियों के नाते-रिश्तेदार व पीआरओ अपने साथ अन्याय होने की दुहाई देते व स्वयं को छोड़ बाकी पूरी दुनिया को मूढ़मति-मंदबुद्धि समझने की मानसिकता रखते हुऐ दोषियों का बेशर्म-बेहूदा बचाव कर रहे हैं तो मुझे फिर एक बार अपनी पिछली पोस्ट (लिंक) में उठाया अपना सवाल याद आता है, वह था...

क्या यह सच नहीं कि अगर इलेक्ट्रानिक मीडिया ने हर पल इतना दबाव न बनाया होता, टीआरपी की होड़ में इतनी कांव-कांव न की होती... तो न कातिलों का हौसला बढ़ता, और पुलिस सभी संदिग्धों से थाने में ले जाकर की 'सामान्य पूछताछ' करने को आजाद होती... तो कत्ल के सारे सबूत आसानी से मिल जाते... और कातिल भी आज सजा काट रहे होते...

यदि आप अपराध व आपराधिक जाँच के संबंध में कुछ अनुभव रखते हैं या आपका कोई परिचित रखता है तो उस से पूछने पर आप को वह यही कहेगा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य, परिवारजनों का व्यवहार व बयान, क्राईम सीन के साथ की गयी छेड़छाड़ एवम् उसके पीछे के इरादों व अन्य तथ्यों की जानकारी होने पर इस मामले को हल करना किसी भी अनुभवी पुलिस अधिकारी के लिये कोई मुश्किल नहीं था... हत्या करने के बाद दोषियों द्वारा यह पूरा प्रयत्न किया गया कि आरूषि का अंतिम संस्कार करने/ कानूनी खानापूरी होने के बाद जब भीड़ छंटे तो घर की छत पर छुपाई हेमराज की लाश ठिकाने लगा दी जाये... और यह मामला, 'नेपाली नौकर लूटपाट कर मालिक की बेटी की हत्या कर नेपाल भागा' की फाइनल रिपोर्ट के साथ फाइलों में दफन हो जाये... पर वे अपने मकसद में कामयाब नहीं रहे और इतने सारे परिस्थितिजन्य सबूत फिर भी बचे रह गये थे कि उन्हें/उनके झूठ को पकड़ने के लिये सीबीआई की कोई जरूरत ही नहीं थी... आपको अगर उस समय की कुछ याद हो तो उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस मामले को वारदात होने के चंद दिनों में ही सॉल्व कर लिया था और प्रदेश के शीर्ष राजनीतिक/पुलिस नेतृत्व ने अपनी प्रेस कान्फ्रेंस में इस आशय की घोषणा भी कर दी थी... पर फिर क्या हुआ, एक साथ कई कई चैनल कांव कांव कर हल्ला मचाने लगे कि 'उत्तर प्रदेश पुलिस का कारनामा देखिये, जिनकी बेटी मरी उन्हीं पर इल्जाम लगा रहे हैं'... नतीजा दोषियों को हौसला मिला और जबान भी, और उन्होंने मौके का फायदा उठा कुछ सबूत और मिटाये और मामले को उलझाने-लटकाने के लिये सीबीआई की जाँच की माँग भी कर दी... नतीजे में क्या क्या नहीं हुआ, हम सब के सामने है...

आज जब न्याय हुआ है तो एक बार फिर मीडिया के टीआरपी की चाह में दोषियों के नाते-रिश्तेदारों को अपने साथ अन्याय होने की दुहाई देते दोषियों का बेशर्म बचाव करने का मौका देते देख मेरा मन कर रहा है कि मीडिया के लंबरदारों से कहूँ "यार प्लीज, बंद करो अब यह कांव कांव फिर से"... और शान्तिपूर्व विश्राम करने दो हेमराज और आरूषि को भी...






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सोमवार, 4 नवंबर 2013

कुकुरमुत्तों की तरह उगते जीनियस, झाँसा देते निराशाराम, मरा हुआ चूहा, दीपावली के मंत्र और लॉर्ड मैकाले के नाम का दीया ...

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हमारे हिन्दी के खबरिया चैनल उस बच्चे (और उस जैसे और भी कई बच्चों को भी) बार बार दिखा रहे हैं... जीनियस बता कर... जीनियस का लाईव टैस्ट लिया जा रहा है... पाँच छह साल के उस बच्चे को चाणक्य का दूसरा नाम दिया गया है... बाल भयंकर तरीके से बिल्कुल टीवी सीरियल वाले चाणक्य की तरह काटे गये हैं... बृह्मान्ड के संबंध में कुछ जानकारियाँ उसके अति महत्वाकाँक्षी पिता ने उसे रटवाई हैं... मुझे बेचारे का हाल देख न जाने क्यों तथागत अवतार तुलसी (लिंक) की याद आने लगती है... सौ बात की एक बात यह है कि जीनियस भले ही छह साल का ही हो... अपनी बेहूदी नुमायश के लिये कभी तैयार नहीं होता...




निराशाराम नाम का वह तथाकथित संत जीवन भर सबको झांसा देता रहा... पर पके बुढ़ापे में फंस ही गया एक नाबालिग के यौन शोषण के अपराध में, और फंसा भी ऐसा, कि कानून से तो उसे जल्दी ही कोई राहत मिलती नहीं दिखती... कानून अब बेटे की फिराक में भी है... और बेटा शहर शहर-प्रदेश प्रदेश भाग रहा है संतई दिखाते-जताते... पर मुझे बाप बेटे का बचाव करते, उनमें ईश्वरत्व बताते-ढूंढते उनके साधक-भक्त हैरान करते हैं... आस्था भी एक चीज है भाई, पर आँखों और दिमाग को इस कदर बंद रखने वाले भक्तों को देख कभी कभी यह लगता है कि झाँसाराम ने उल्टे उस्तरे से इनको मूंड कुछ गलत नहीं किया... यह इसी लायक लोग थे...



यहाँ भी एक तथाकथित महान संत हैं जो कभी कैमरे के सामने नहीं आते... पर उनके चेला नंबर वन को कैमरों से परहेज नहीं... गुरू चेले दोनों मिलकर सपने देखते हैं... छोटे मोटे नहीं... कई कई जगहों पर हजारों टन खालिस सोने के खजानों के दबे होने के सपने... फिलहाल उनके सपनों में देखे सबसे छोटे यानी हजार टन सोने के खजाने की खुदाई जारी है सरकारी खर्चे पर... यह भी लगभग पक्का है कि मरा चूहा तक नहीं निकलना इस खुदाई में... पर उन पर विश्वास करने वाले भक्तों की तादाद और दबाव इतना है कि इस अंधविश्वास की आलोचना करने के अगले ही दिन नरेन्द्र मोदी को संत को नमन करना पड़ गया... खोदो और खोदो भाई, फिर जब कुछ न मिले तो यह कहना कि खजाने का रक्षक सरकार की गलत नीयत भाँप खजाने को जमीन के भीतर कहीं और ले गया...




कोई भी त्यौहार हो... खास तौर से हिन्दुओं का... सारे खबरिया चैनल उतावले-बावरे से हो जाते हैं... दीपावली पर भी यही हुआ... एक आध ने तो बाकायदा खम ठोक यह बताया भी कि केवल अपना टीवी हमारे चैनल पर खोले रखो... पूरे विधि विधान से पूजा करायेंगे आपकी, वह भी एकदम सही मुहुर्त पर... क्या खाओ-पकाओ-पहनो, सब बताया गया...गजब के भगवान हैं, पूजा के लिये भी खास वर्दी और मुहूर्त चाहते हैं... एक मिनट पहले या एक मिनट बाद पूजा किये तो फिर अगले साल तक अर्जी मुलतवी... मैं सोचता हूँ कि यह मामला कहाँ तक अभी आगे और बढ़ेगा... क्या दूसरे धर्मों को भी शामिल करेंगे यह चैनल वाले...






ऊपरी तौर पर देखें तो चारों मामले अलग अलग ही दिखते हैं... पर जरा गंभीरता से सोचें तो आप पायेंगे कि यह सब एक योजनाबद्ध तरीके से हो रहा है... कुछ ताकते हैं जो हमें दोबारा से पीछे ले जाना चाहती हैं... इन लोगों को पहचानिये... यह वही लोग हैं जो हमारी तथाकथित महान व प्राचीन भारतीय संस्कृति, पुरातन धर्म, अध्यात्म, आस्था-समर्पण, आँचल-पर्दा-पायल-घूंघट, वर्ण व्यवस्था, दंड विधान आदि आदि का गुणगान करते है... जो फिर उसी जालिम जमाने की ओर लौटना चाहते हैं... हाशिये पर फेंक दी गयी यह ताकतें आज फिर मुख्यधारा पर काबिज होने का जुगाड़ लगा रही हैं... यह वो लोग हैं जो दोबारा से उन्ही अंधेरों की ओर हमें ठेलना चाहते हैं... 




इस दीवाली पर मैंने भी एक दीया जलाया... लॉर्ड मैकाले के नाम का... मुझे कोई जरूरत नहीं पड़ी कहने की 'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय'... क्योंकि मैं यह जानता हूँ कि यह दीया असंख्यों के दिलो दिमाग को रोशन कर रहा है और करेगा भी... इंसान का आज तक का सफर हमेशा ही अंधेरे से उजाले का रहा है... और अब भी ऐसा ही होगा... मनुवाद को तो दफन होना ही होगा... इतना गहरा कि कोई कभी भी उसको खोद बाहर निकाल उसे हवा-पानी देने का सपना तक न देख सके....





आभार आपका...









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