रविवार, 25 अगस्त 2013

समय बदल रहा है दोस्तों !

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समय बदल रहा है दोस्तों
बहुत विचित्र समय है यह
और कुछ हद तक भयावह भी
दिन भर चलती खबरे हैं, बहसे हैं
उछलते नारे हैं और जुमले भी
पर उनके अर्थ भिन्न हो गये है
आदमी सब कुछ देखता है
सुनता और महसूसता भी
पर उसे अब सीखना पड़ेगा
कुछ नये निष्कर्ष निकालना
क्योंकि समय बदल गया है


भले ही कितना ही मुश्किल हो यह करना
आपको जबरन इस बात को पचाना होगा
महज पंद्रह सोलह बरस की एक मासूम
पहले बहाना बनाती है अपनी बीमारी का
फिर करती है जुगाड़ एकांत में मिलने का
वह भी घर विद्मालय से बहुत बहुत दूर
अनजाने प्रदेश-शहर की अनदेखी कुटिया में
ताकि चरित्रहनन कर सके एक संत का
वह जो उम्र में उसके पितामह से बड़ा है


आपको मान लेना होगा आखिरकार
कानून की नजरों में सब नहीं हैं बराबर
कैसा भी हो इल्जाम, हों कितने ही सबूत
पर कुछ नहीं होंगे कभी भी गिरफ्तार
उन्हें मिलेगा मनचाहा समय, सुविधा भी
ताकि तोड़ सकें मनोबल, कर सकें बदनाम
और फिर दे कर तरह तरह के प्रलोभन
आखिर खरीद लें अपने शिकार की खामोशी


तुम्हारी-मेरी, यानी जनता की एक खूबी है
हमारी याद्दाश्त बहुत बहुत कमजोर है यारों
कुछ दिनों में निपट जायेगा यह मामला भी
कुछ ऐसे ही अनेकों अन्य मामलों की तरह
फिर से जमने लगेंगे सत्संग के जमावड़े
और लीलायें भी दोबारा से प्रारंभ हो जायेंगी
अपने घर के किसी अंधेरे कोने में पड़ी हुई
गुमनाम जिंदगी गुजारेगी वह मासूम कली
खुदकुशी का विकल्प हरदम खुला रखते हुए


समय बदल रहा है दोस्तों
बहुत विचित्र समय है यह

और बहुत हद तक भयावह भी...






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