शनिवार, 8 जून 2013

क्या सचमुच ऐसी किसी दुनिया का अस्तित्व में आना संभव है कभी ?

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आप अपने चारों ओर की दुनिया को देखें कभी खुली आँखों से और उसके बारे में सोचने लगें तो सोचते सोचते दिमाग का रायता सा बन जाता है... कितनी असमानता है, भूख है, गरीबी है और है नाइन्साफी भी...

जिस रास्ते अपने आफिस जाता हूँ उसमें एक जगह रेलवे लाईन और सड़क के बीच की थोड़ी सी खाली जगह में कुछ समय से डेरा बनाया हुआ है कूड़ा बीनने वाले परिवारों ने... पूरा का पूरा परिवार दिन भर शहर के कूड़े में से कुछ भी कीमत रखने वाली चीजें बीनता है, घर के छोटे छोटे बच्चों से लेकर औरतें भी फिर उस सामान को अलग अलग करते हैं... इस हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी यह साफ लगता है कि यह परिवार भरपेट भोजन तक नहीं पाते... दूसरी तरफ अपने शहर के मॉल्स में मैं देखता हूँ एक और पीढ़ी को, जंक फूड खा खाकर जिसकी यह हालत है कि लगता है शरीर कभी किसी भी समय कपड़ों को फाड़ बाहर झाँकने लगेगा... एक तरफ गरीब मेहनतकशों के वह बच्चे जिनके पास रहने तक का कोई स्थाई ठिकाना नहीं, किसी जगह पर केवल तब तक ही वह रह पायेंग जब तक वहाँ से खदेड़ न दिये जायें और दूसरी तरफ वह भी जिनके पैदा होते ही उनके नाम के प्लॉट-फ्लैट खरीद लिये जाते हैं... एक तरफ वह बच्चा जिसके लिये शिक्षा एक सपना तक नहीं, इंसान होते हुऐ भी पशु से केवल थोड़ा सा ही बेहतर जीवन जीने को अभिशप्त और दूसरी तरफ वह भी जिनमें कुछ भी काबलियत न होते हुऐ भी उनके माँ बाप का रसूख और पैसा येन केन प्रकारेण उनको उद्मोगपति, इंजीनियर, जज, अभिनेता, डॉक्टर, अधिकारी आदि आदि बनाकर ही मानेगा...

कहाँ है इन्साफ इस दुनिया में ? कहाँ हैं हर किसी के लिये समान सुविधायें ? सबके लिये समान अवसर कहाँ हैं ? जो कर्णधार हैं, जो नीति निर्णायक हैं, जिनका यह काम है कि हमारी इस दुनिया में हरेक के लिये एक गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करें, उनको समझ की इतनी कमी है कि वह यह मानकर चलते हैं कि महीने में चंद किलो गेंहू दो रूपये किलो और चावल तीन रूपये किलो बाँटने वाला बिल लाकर ही उन्होंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया है...

एक पक्ष तो ऊपर लिखा है वहीं एक दूसरा पक्ष भी है... वह यह है कि वही नगण्य सुविधाओं वाला गाँव का सरकारी स्कूल... उसी में पढ़ने वाले दो बच्चे... एक ने कभी ध्यान दे पढ़ने की कोशिश नहीं की और आम तोड़ने और पास की नदी में मछली पकड़ने में ही पाँच साल गुजार दिये... आज वह अपने बीपीएल राशन कार्ड को एक तमगे की तरह दिखाता घूमता है... दूसरे ने हर अड़चन के बावजूद पढ़ा और जिंदगी का वह मुकाम हासिल किया जहाँ आज वह अपने बच्चों को एक गरिमापूर्ण जिंदगी दे सकता है... कूड़ा बीनने वाले एक ने अपने कमाये हर पैसे का सदुपयोग किया, अवसर की ताक में रहा, आज वह कबाड़ का थोक कारोबारी है और ठीकठाक जिंदगी जीता है ... और उसी के जैसे दूसरे ने जो कमाया, बीड़ी-तंबाकू-शराब में उड़ा दिया... जिस दिन थोड़ा ज्यादा कमा लिया तो तीन दिन तक लगातार नशे में पड़ा रहा... वह आज भी कूड़ा ही बीनता और कूड़े के बीच ही मरेगा भी...

अब यही सब देख देख कुछ सवाल उठते हैं मन में...

१- क्या ऐसी कोई दुनिया संभव है जिसमें हर किसी को एक गरिमापूर्ण जीवन जीने को मिले ?

२- क्या वर्ग-जाति-वर्ण-रंग आदि आदि के हर तरह के इंसान द्वारा बनाये भेदों को दरकिनार कर हम इंसान के हर बच्चे के लिये जीवन में आगे बढ़ने के लिये समान सुविधायें और समान अवसर प्रदान कर सकते हैं ?

३- यदि ऊपर लिखी बातें संभव हैं तो क्या उनको पाने के लिये हमें धन-संपत्ति के एक पीढ़ी द्वारा अगली पीढ़ी को उत्तराधिकार के रूप में दिये जाने के चलन को खत्म करना होगा ?

४- ऐसी किसी दुनिया में नाकारा, मानसिक या शारीरिक श्रम से कतराने वाले, अकर्मण्य, गलत लतों के शिकार और नशेड़ियों को कैसे एडजस्ट किया जायेगा ?

सवाल अभी और भी हैं... सोच सोच मैं तो कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं... क्या आपके पास कोई उत्तर है ?

क्या सचमुच ऐसी किसी दुनिया का अस्तित्व में आना संभव है कभी भी ?

या इंसान की नस्ल एक ऐसी दुनिया की कल्पना करते हुऐ एक मृगमरीचिका के पीछे ही भाग रही है... एक ऐसी खोज में, जिसका कोई अंत नहीं...



आभार आपका...











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11 टिप्‍पणियां:

  1. यह भूमिका एक अच्छी विज्ञान कथा लिखने की प्रेरक हो सकती हैं - बस अड़चन वही नकारे है ! किया जाय इनका ?
    मैंने अभी गोरखपुर स्टेशन पर ट्रेन के जाते ही उसके पीछे पीछे ट्रैक पर बिसलेरी की खाली बोतलें इकट्ठा करने के लिए फटेहाल औरतों बच्चों के झुण्ड को स्पर्धा करते देखा -देश की सच्ची तस्वीरों में से एक यह भी तस्वीर है - मन को गहरे क्षुब्ध कर देने वाली !
    यह राज्य अथवा केंद्र किसके जिम्मे है ? गरीबी भी अब राज्य और केंद्र के पाले में बटी है :-)

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      सर जी,

      समय मिलने पर थोड़ा सवालों पर भी गौर फरमाइयेगा... :)


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    2. १- क्या ऐसी कोई दुनिया संभव है जिसमें हर किसी को एक गरिमापूर्ण जीवन जीने को मिले ?
      उत्तर :नहीं ,यूटोपिया या रामराज्य एक अभिलाषित आदर्श स्थिति मात्र है -यथार्थ में संभव नहीं है !

      २- क्या वर्ग-जाति-वर्ण-रंग आदि आदि के हर तरह के इंसान द्वारा बनाये भेदों को दरकिनार कर हम इंसान के हर बच्चे के लिये जीवन में आगे बढ़ने के लिये समान सुविधायें और समान अवसर प्रदान कर सकते हैं ?
      उत्तर नहीं -संभव नहीं ,हर मनुष्य समान नहीं!
      ३- यदि ऊपर लिखी बातें संभव हैं तो क्या उनको पाने के लिये हमें धन-संपत्ति के एक पीढ़ी द्वारा अगली पीढ़ी को उत्तराधिकार के रूप में दिये जाने के चलन को खत्म करना होगा ?
      उत्तर -यह भी संभव नहीं हो पायेगा
      ४- ऐसी किसी दुनिया में नाकारा, मानसिक या शारीरिक श्रम से कतराने वाले, अकर्मण्य, गलत लतों के शिकार और नशेड़ियों को कैसे एडजस्ट किया जायेगा ?
      उत्तर - भले ही हो हल्ला मचे यह शायद एक दिन प्रत्यक्षतः संभव हो जाए परोक्ष रूप से तो यह हो रहा है!

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    3. (१)
      ज़रा गौर फरमाइयेगा पहला सवाल हरेक को "गरिमापूर्ण" जीवन अवसर मिलने से ताल्लुक रखता है सो मेरे अभिमत में यह संभव है !

      (२)
      वर्ग / वर्ण आदि आदि भेदभाव जन्मजात प्रस्थितियां नहीं है ! यह सब मनुष्य का अपना रचा हुआ संसार है , तो मेरा अभिमत यह है कि मनुष्य की सृजनशीलता और उसकी स्वरचित सामाजिक मनःस्थितियों में अगर भेदभाव संभव है , तो अभेद भी क्यों नहीं हो सकता !

      (३)
      जी ज़रूर , उपरोक्त हालात में पीढ़ी दर पीढ़ी उत्तराधिकार की दिशा और दशा / शक्ल-ओ-सूरत कुछ और ही हो जायेगी !

      (४)
      यदि मनुष्य नई तरह की दुनिया गढ़ेगा / गढ़ सकेगा तो चौथे सवाल के जबाब की ज़रूरत उपलब्ध व्यवस्था के अनुकूल समाजीकरण की कृपा से शेष नहीं रहेगी !

      यूं तो चारों सवालों के जबाब देते वक़्त मैंने अतिरिक्त आशावाद से काम लिया है परन्तु इसका आधार यही है कि मनुष्य अगर स्वयं के लिए भेद / विषमता गढ़ सकता है तो अभेद और समता क्यों नहीं ! यूं मानिये कि अपना आशावाद मनुष्य की सृजनशीलता और उसके सामर्थ्य पर विश्वास पर आधारित है ! हो सकता है कि आप शत प्रतिशत सकारात्मकता में यकीन ना भी रखें तो कम से कम यह ही मान लीजिए कि वर्तमान के नकारात्मक आधिक्य का उलट तो हो ही सकता है बिल्कुल उसी अनुपात में !

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      अली सैयद साहब,

      आभार आपका,
      कहा जाता है 'जब तक साँस, तब तक आस'... अगर ऐसी आस हमारी इस दुनिया के पचीस फीसदी भी करें पूरी शिद्दत से तो हमें ऐसी दुनिया मिल जायेगी...


      ...

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  2. दुनिया समतल हो गई तो प्रवाह भी रूक जाएगा और यह निश्चय ही सड़कर नष्ट हो जाएगी।इसके ऊँचा-नीचा होने से ही प्रवाह कायम है। हाँ हमें बस यह ध्यान देना है कि कहीं यह ऊँच-नीच ऊबड़-खाबड़ ना बनने पाए बल्कि सुंदर-खूबसूरत ढालान बने रहें ताकि प्रवाह सतत और एकसमान होता रहे और सडन पैदा ही ना हो..।

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  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा सोमवार (10-06-2013) के चर्चा मंच पर लिंक
    की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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    उत्तर
    1. .
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      आपका आभारी हूँ, सरिता जी...


      ...

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  4. जैसा मन है, वैसी दुनिया,
    कोई आकर मन भर जाये।

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  5. ऐसी दुनिया के लिये प्रयत्नशील रह सकते हैं और रहना भी चाहिये लेकिन ऐसा कभी हो पायेगा, मुझे नहीं लगता।

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