बुधवार, 5 जून 2013

तू कौन है, बे ???

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मैं कौन हूँ
जो हो जाता हूँ बहरा
नीरा राडिया के टेप सुन
जिसमें मेरे ही साथी
कर रहे हैं फिक्स
नीतियाँ, लाइसेंस
यहाँ तक कि मंत्रालय तक


मैं कौन हूँ
जिसको दिखते ही नहीं
अंधे हो जाने के कारण
कोयला घोटाले में
नाम काला न करने की
ऐवज में सौ करोड़
की रंगदारी माँगते हुऐ
अपने दो दो झंडाबरदार


मैं कौन हूँ
जुबान बन्द होती है जिसकी
जब लाखों गरीबों की
खूनपसीने की कमाई को
चिटफंड के जरिये कब्जा
कोई खोलता है दसियों चैनल
और इसी रसूख के चलते
हो जाता है मान्यवर


मैं कौन हूँ
गूंगा बन जो नहीं कुछ बोलता
जब बात खुलती है
कि कोयला खदानों की
उस नंगी लूट में
पूरी तरह से थे हिस्सेदार
कुछ मीडिया समूह भी
जो चलाते हैं कई कई
खूब बिकने वाले अखबार


मैं कौन हूँ
जिसे कभी सुनाई नहीं देती
अपना हक माँगने और
करने शिकायतें भी
राजधानी तक पहुँचे
लाखों की तादाद में
दलित, आदिवासी और
मेहनतकश मजदूरों की
कोई भी आवाज कभी
क्योंकि मेरे हिसाब से
यह कोई खबर नहीं


मैं कौन हूँ
जो स्टूडियो में बैठे बैठे ही
बना देता हूँ नायक
आजादी की दूसरी लड़ाई का
उस खद्दर-टोपी धारी को
जो केवल इसलिये
ऊंगली उठा, देख दूर क्षितिज को
देता है अपने पलटीमार बयान
ताकि दुनिया उसको भी
दूरदॄष्टि रखने वाला समझे


मैं कौन हूँ
जो भूल जाता हूँ
टीआरपी की होड़ में
कि मुल्क में अदालते हैं
जहाँ की जा सकती हैं शिकायतें
ऐसे में आखिर क्यों
कागज की सफेद टोपी पहने
यह लोग क्यों लगा रहे हैं
हर किसी पर आरोप
वह भी तिरंगा लहराते हुऐ


मैं कौन हूँ
जो आँख-कान बंद रखते हुऐ
घोषित कर देता हूँ
आटा-तेल-जूस-साबुन के
साथ दवाई और योग भी
अद्भुत लाभ की गारंटी के संग
दुनिया को बेचते हुऐ
धर्म और कारोबार के
गठजोड़ का दोहन करते
एक चतुर इंसान को
क्रांति वाहक,देश का कर्णधार


मैं कौन हूँ
जो बड़ी बेशर्मी से
मायानगरी की चकाचौंध में
खुद को असफल मान
जिंदगी से मुँह मोड़ गयी
महज पच्चीस साल की
उस प्रतिभाशाली लड़की की
मौत को बनाता हूँ
एक राष्ट्रीय अहम मुद्दा
उस बेचारी व उसके परिवार की
निजता को करते तार-तार


मैं कौन हूँ
जिसने कर बंद अपने दिमाग
बना दिया एकदम अचानक
श्रीनि का अपने पद से हटना
देश का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा
मैं लगाता हूँ उल्टे सीधे इल्जाम
एक कप्तान की पत्नी पर
क्योंकि कसूर उसका इतना है
वह खेल देखने गयी मैदान पर


मैं कौन हूँ
जिसकी याद्दाश्त गायब है
भूल गया हूँ सहजता से कि
वह अभी भी वही खिलाड़ी है
जिसकी कप्तानी में ही
खेल के तीनों फार्मेट में
टीम बनी थी नंबर वन
जीते गये थे दो विश्व कप
और आज मैं कह रहा हूँ
चीख-चीख, बिना आधार
कि वह है कप्तान और टीम में
किसी खास की कृपा-दया से


तू कौन है, बे !
मैं इस महान भारत देश का
इलेक्ट्रानिक-प्रिंट मीडिया हूँ
जिसके न नाखून हैं न दाँत ही
धनझोलाओं का मैं गुलाम हूँ
चैनल चलाने-विज्ञापन जुटाने
और पेट अपना पालने के लिये
ढूंढता केवल आसान शिकार हूँ


धिक्कार है तुझ पर, बे...
दूर हट जा आगे से मेरे
नहीं तो मुझे पूरा डर है
मैं शब्दों की मर्यादा तोड़ दूंगा
जा फिर से कर वही काम
जो आज तक करता आया है
तू केवल यही करना जानता है
तुझे पाला इसीलिये धनकुबेरों ने
रात दिन जमीर बेचते, झूठ परोसते
यही करने को तू है अभिशप्त भी !



Indian captain M S Dhoni receives the ICC ODI Shield from David Morgan at Cardiff




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डिस्क्लेमर- ब्लॉग लेखक क्रिकेट प्रेमी है, भारतीय क्रिकेट टीम का शुभचिंतक है और भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का प्रशंसक भी...


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10 टिप्‍पणियां:

  1. कभी कभी सचमुच एक अकथ असहायता पंगु कर देती है -कुछ ना बदलेगा :-(
    इस दिनों काव्य -मोड में हैं :-)

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  2. वह भी बेचारा क्या करे, जनता को भूल जाने की बीमारी जो है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी यह प्रस्तुति कल के चर्चा मंच पर है
    कृपया पधारें

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर सटीक चित्र खीचा है प्रिंट मीडिया की

    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post मंत्री बनू मैं
    LATEST POSTअनुभूति : विविधा ३

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  5. @ डिस्क्लेमर- ब्लॉग लेखक क्रिकेट प्रेमी है, भारतीय क्रिकेट टीम का शुभचिंतक है और भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का प्रशंसक भी...
    आज आप के वैचारिक विरोधियो की आत्मा तृप्त हो गई होगी आप की ये रचना पढ़ कर :)
    आज संशयवादी को कही कोई संशय नजर नहीं आ रहा है ,
    आज उसकी दुखती रग पर किसी ने हाथ रखा है
    आज किसीने उसके श्रध्येय पर उंगली उठाई है
    आज तो इसे भी दर्द हो रहा है
    आज अपने विश्वास पर उंगली उठती देख इसकी भी तर्क बुद्धि जवाब दे गई है
    आज इसे भी कोई तर्क नहीं भा रहा है अपने श्रध्येय के खिलाफ
    आज इसके आँखों पर भी पट्टी नजर आ रही है अपने विश्वास को लेकर
    आज ये भी अंध भक्ति कर रहा है
    आज वो भी अपने श्रध्येय के अच्छे कामो के बदले उसकी गलतियों को नजर अंदाज कर रहा है
    आज वो भी किसी की गलतियों के मुकाबले में अच्छे कामो को गिना रहा है
    आज खुश तो बहुत होंगे !! कुछ लोग आप की ये रचना पढ़ कर :)

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    उत्तर
    1. .
      .
      .
      अंशुमाला जी,

      ... :)

      बहुत अच्छा लगा आपका यह सवाल उठाना, यकीन जानिये यह आप ही कर सकती थी और आपने किया भी... यही बात आपको सबसे अलग करती है...

      अपनी ओर से तो मैं यही कहूँगा जो मैंने दाहिनी ओर अपनी फोटो के नीचे लिखा है...

      'मैं अपने इर्दगिर्द घट रहे मसलों,हालातों व किरदारों पर अपना नजरिया यहाँ लिखता हूँ पर मैं कभी भी अपने ही सही होने का कोई दावा नहीं करता, मैं सही हो भी सकता हूँ और नहीं भी, कभी मैं सही होते हुए भी गलत हो सकता हूँ और कभी गलत होते हुए सही भी, कभी पूरा का पूरा सही भी हो सकता हूँ और कभी पूरा का पूरा गलत भी, कभी आधा अधूरा सही होउंगा तो कभी आधा अधूरा गलत भी, यह सब आपके नजरिये के ऊपर भी निर्भर करता है, पर एक बात जो निश्चित रहेगी वह यह है कि मैं पूरी ईमानदारी से वही लिखूँगा जो मैं सोचता हूँ, पोलिटिकल करेक्टनेस और दुनियादारी कम से कम मेरी ब्लॉगिंग के लिये वजूद नहीं रखते।'

      मैं परफेक्ट बनने का न शौक रखता हूँ न गुमान ही... न ही आज तक कभी यह दावा किया मैंने... कुछ इसीलिये डिस्क्लेमर भी था... आशा है आप समझेंगी...


      ...

      हटाएं
    2. प्रवीण जी
      मैंने ये कहा ही नहीं की आप गलत है या सही, मै ऐसा कुछ कहना भी नहीं चाहती थी , असल में बात हर बार सही या गलत की नहीं होती है। आप के दिल में जो चल रहा है क्रिकेट के हाल को देख कर उसमे कुछ भी गलत नहीं है , अपना तो ये हाल था की श्रीशांत की गिरफतारी के बाद तो दो दिन जैसे डिप्रेशन में चले गए , लगा गिरफतारी उसकी नहीं मेरी हो गई हो , लगा बस अपने ही बच्चे का भविष्य बस अँधेरा ही अँधेरा हो गया हो , लेकिन दो दिन बाद दिमाग ठिकाने पर आ गया और हकीकत को स्वीकार करने लगा और गलत फिर गलत ही नजर आने लगा , अच्छे काम अपनी जगह है उससे किसी को गलत करने का लाइसेंस नहीं मील जाता है , मै भी गांगुली की बड़ी प्रसंसक थी ( हूँ ) किन्तु एक समय मैन उनके खिलाफ भी पोस्ट लिखी " घिसो जब तक घिसता है " । सभी को याद रखना चाहिए की देने वाले ने किसी खास कारण से दिल से ऊपर दिमाग बनाया है , इसलिए अपने विश्वास से ऊपर उठ कर सच्चाइयो को स्वीकार करना चाहिए । दुसरे मै अक्सर कहती हूँ की विद्वान समझदारो को यदि कोई समझा सकता है तो वो है वो खुद या परिस्थिति , अभी कुछ ही समय पहले जब कुछ लोग संजय दत्त के साथ सहानभूति दिखा रहे थे तो मुझे लगा रहा था की लोगो का दिमाग ख़राब है , एक मुजरिम से कैसी सहानभूति प्रसंसक होना अपनी जगह है , लीजिये आज समय ने मुझे भी वही खड़ा कर दिया , समय ने मुझे लोगो की भावनाओ को समझना भी सिखाया और अपनी भावनाओ पर काबू करना भी , हम सभी को अपने जीवन में आये इस तरह की सभी परिस्थितियों से ऐसे ही सिख ले लेना चाहिए , जो हम अक्सर दूसरो के कहने पर नहीं सिखते है । हो सकता है की हमने भी कभी दूसरो के श्रध्येय लोगो के प्रति सवाल करते समय कोई निर्ममता तो नहीं दिखाई है , सवाल उठाना गलत नहीं होता है , और कठोरता से उठाना भी नहीं किन्तु उसमे निर्ममता , अपमान नहीं होना चाहिए, बाकि आप खुद ही समझदार है ।
      @ यही बात आपको सबसे अलग करती है...
      ये तारीफ है या खिचाई :)

      हटाएं
    3. .
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      .
      @ ये तारीफ है या खिचाई :)

      निश्चित तौर पर तारीफ है जी, खिंचाई... ??? ब्लॉगवुड में रहना नहीं है क्या अपुन को... :)


      ...

      हटाएं
  6. आपकी बहुत दिनो बात सुनी..खूब सुनी।

    यह केविल प्रिंट मीडिया पर तमाचा नहीं है। इसमे हमारे जैसे बहुतेरे दर्शक भी शामिल हैं जो इन पर लट्टू हो जाते हैं या कहें नाचने लगते हैं सपेरे के बीन पर, सर्प बन!

    उत्तर देंहटाएं

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