शुक्रवार, 21 जून 2013

आइये यह सब रोना-कोसना-कलपना छोड़ फिर से अपना अपना धर्म निभायें ! ...

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पहाड़ का धर्म है
समय बीतने जाने के साथ साथ
धसक-टूट टूट कर बरसातों में करना कोशिशें
एक दिन खुद के भी सपाट मैदान बन जाने की
पहाड़ हमेशा यही कोशिश करता आया है
और वही कोशिशें उसने कीं इस बार भी

बादलों का धर्म है
समंदर से भर ले जा अथाह जलराशि
बरस कर उड़ेल देना उस को
प्यासे जंगल, मैदानों और पहाड़ों में
बादल कैसे अपने फर्ज से पीछे हट जाते
और धर्म निभाया गया घनघोर बरसकर

इंसान का धर्म है
अपनी सात पुश्तों के इंतजाम की खातिर
हर उस चीज को घेरना हड़पना कब्जाना
जो दिखती हो उसको आँखों के सामने
पहाड़ हो, जंगल या नदी का किनारा
और इन्हें रौंद धर्म निभाने में चूक नहीं की गयी

नदी का धर्म है
पहाड़ पर बरसे पानी की हर उस बूंद को
जिसे पहाड़ सोख नहीं पाया किसी कारण
सहेज कर ले जा सौंप देना समंदर को
चाहे रास्ता बनाने में उजड़ें इंसानी बस्तियाँ
और नदियाँ अपने मकसद में कामयाब हुई

ईश्वर का धर्म है
देखते रहना शाँत और निष्पक्ष रहकर
होने देना जो भी आखिरकार होना ही है
फिर भी दिखाना कृपायें किसी को बचाकर
और किसी को असमय अपने पास बुलाकर
और ईश्वर कब धर्म से अपने पीछे हटा है

हम सबका धर्म है
सबके अपने धर्म-पालन की वजह को जान
पहले भी हुऐ अन्य वाकयों की तरह ही
इस हादसे को भी जल्दी से जल्दी भूलकर
अगले नये हादसे का करते रहना इंतजार 
और धर्म पालन करना तो हमें आता ही है

आओ दोस्तों !
अब छोड़ो यह रोना-कोसना-कलपना
आओ एक बार हम फिर से लग जायें
वही करने में जो करते आये हैं आज तक
पहले की तरह अपना धर्म निबाहने में
और धर्म निभाना सबसे जरूरी तो है ही







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मंगलवार, 11 जून 2013

एक योद्धा के विकल्प... Walking into the Sunset...

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They admire you
only and only because 
you were a fierce warrior
who raised an army
out of nowhere


They acknowledge
that you developed
that rag tag army
into a fighting unit
having high aspirations


Everybody saw your guts
when at your prime
you used a new weapon
to storm the fort
and succeeded in occupying it


But you must accept
that in the last battle
you were the undisputed leader
and despite your best effort
your army could not win


Age is not on your side
and your army is impatient
they've found a new warrior
to lead them into the battle
to storm the fort again


It pains me to see
that people are saying
that you are sulking in private
refusing to accept the new reality
preferring to relive old glories


Oh, dear, fierce old warrior
accepted, your tribe doesn't retire
old warriors just fade away
but,they, just for the sake of it
don't fight with own disciples


Your place is secure in history
and your army still loves you
but they want to see you
walk into the Sunset
head held high, dignity personified



Now, It's your choice... 

Oh, Fierce, Old Warrior...







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सोमवार, 10 जून 2013

पाठक तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका ?

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पाठक माईबाप,

आदरणीय एस० एम० मासूम साहब की इच्छा का सम्मान करते हुऐ यह पोस्ट हटा दी गयी है... उनका व मेरा संवाद आप देख सकते हैं    उनकी पोस्ट- "लविंग जिहाद' और ऑनर किलिंग" पर (लिंक)

आपको हुई असुविधा के लिये क्षमा चाहता हूँ...

आभार...


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शनिवार, 8 जून 2013

क्या सचमुच ऐसी किसी दुनिया का अस्तित्व में आना संभव है कभी ?

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आप अपने चारों ओर की दुनिया को देखें कभी खुली आँखों से और उसके बारे में सोचने लगें तो सोचते सोचते दिमाग का रायता सा बन जाता है... कितनी असमानता है, भूख है, गरीबी है और है नाइन्साफी भी...

जिस रास्ते अपने आफिस जाता हूँ उसमें एक जगह रेलवे लाईन और सड़क के बीच की थोड़ी सी खाली जगह में कुछ समय से डेरा बनाया हुआ है कूड़ा बीनने वाले परिवारों ने... पूरा का पूरा परिवार दिन भर शहर के कूड़े में से कुछ भी कीमत रखने वाली चीजें बीनता है, घर के छोटे छोटे बच्चों से लेकर औरतें भी फिर उस सामान को अलग अलग करते हैं... इस हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी यह साफ लगता है कि यह परिवार भरपेट भोजन तक नहीं पाते... दूसरी तरफ अपने शहर के मॉल्स में मैं देखता हूँ एक और पीढ़ी को, जंक फूड खा खाकर जिसकी यह हालत है कि लगता है शरीर कभी किसी भी समय कपड़ों को फाड़ बाहर झाँकने लगेगा... एक तरफ गरीब मेहनतकशों के वह बच्चे जिनके पास रहने तक का कोई स्थाई ठिकाना नहीं, किसी जगह पर केवल तब तक ही वह रह पायेंग जब तक वहाँ से खदेड़ न दिये जायें और दूसरी तरफ वह भी जिनके पैदा होते ही उनके नाम के प्लॉट-फ्लैट खरीद लिये जाते हैं... एक तरफ वह बच्चा जिसके लिये शिक्षा एक सपना तक नहीं, इंसान होते हुऐ भी पशु से केवल थोड़ा सा ही बेहतर जीवन जीने को अभिशप्त और दूसरी तरफ वह भी जिनमें कुछ भी काबलियत न होते हुऐ भी उनके माँ बाप का रसूख और पैसा येन केन प्रकारेण उनको उद्मोगपति, इंजीनियर, जज, अभिनेता, डॉक्टर, अधिकारी आदि आदि बनाकर ही मानेगा...

कहाँ है इन्साफ इस दुनिया में ? कहाँ हैं हर किसी के लिये समान सुविधायें ? सबके लिये समान अवसर कहाँ हैं ? जो कर्णधार हैं, जो नीति निर्णायक हैं, जिनका यह काम है कि हमारी इस दुनिया में हरेक के लिये एक गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करें, उनको समझ की इतनी कमी है कि वह यह मानकर चलते हैं कि महीने में चंद किलो गेंहू दो रूपये किलो और चावल तीन रूपये किलो बाँटने वाला बिल लाकर ही उन्होंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया है...

एक पक्ष तो ऊपर लिखा है वहीं एक दूसरा पक्ष भी है... वह यह है कि वही नगण्य सुविधाओं वाला गाँव का सरकारी स्कूल... उसी में पढ़ने वाले दो बच्चे... एक ने कभी ध्यान दे पढ़ने की कोशिश नहीं की और आम तोड़ने और पास की नदी में मछली पकड़ने में ही पाँच साल गुजार दिये... आज वह अपने बीपीएल राशन कार्ड को एक तमगे की तरह दिखाता घूमता है... दूसरे ने हर अड़चन के बावजूद पढ़ा और जिंदगी का वह मुकाम हासिल किया जहाँ आज वह अपने बच्चों को एक गरिमापूर्ण जिंदगी दे सकता है... कूड़ा बीनने वाले एक ने अपने कमाये हर पैसे का सदुपयोग किया, अवसर की ताक में रहा, आज वह कबाड़ का थोक कारोबारी है और ठीकठाक जिंदगी जीता है ... और उसी के जैसे दूसरे ने जो कमाया, बीड़ी-तंबाकू-शराब में उड़ा दिया... जिस दिन थोड़ा ज्यादा कमा लिया तो तीन दिन तक लगातार नशे में पड़ा रहा... वह आज भी कूड़ा ही बीनता और कूड़े के बीच ही मरेगा भी...

अब यही सब देख देख कुछ सवाल उठते हैं मन में...

१- क्या ऐसी कोई दुनिया संभव है जिसमें हर किसी को एक गरिमापूर्ण जीवन जीने को मिले ?

२- क्या वर्ग-जाति-वर्ण-रंग आदि आदि के हर तरह के इंसान द्वारा बनाये भेदों को दरकिनार कर हम इंसान के हर बच्चे के लिये जीवन में आगे बढ़ने के लिये समान सुविधायें और समान अवसर प्रदान कर सकते हैं ?

३- यदि ऊपर लिखी बातें संभव हैं तो क्या उनको पाने के लिये हमें धन-संपत्ति के एक पीढ़ी द्वारा अगली पीढ़ी को उत्तराधिकार के रूप में दिये जाने के चलन को खत्म करना होगा ?

४- ऐसी किसी दुनिया में नाकारा, मानसिक या शारीरिक श्रम से कतराने वाले, अकर्मण्य, गलत लतों के शिकार और नशेड़ियों को कैसे एडजस्ट किया जायेगा ?

सवाल अभी और भी हैं... सोच सोच मैं तो कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं... क्या आपके पास कोई उत्तर है ?

क्या सचमुच ऐसी किसी दुनिया का अस्तित्व में आना संभव है कभी भी ?

या इंसान की नस्ल एक ऐसी दुनिया की कल्पना करते हुऐ एक मृगमरीचिका के पीछे ही भाग रही है... एक ऐसी खोज में, जिसका कोई अंत नहीं...



आभार आपका...











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बुधवार, 5 जून 2013

तू कौन है, बे ???

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मैं कौन हूँ
जो हो जाता हूँ बहरा
नीरा राडिया के टेप सुन
जिसमें मेरे ही साथी
कर रहे हैं फिक्स
नीतियाँ, लाइसेंस
यहाँ तक कि मंत्रालय तक


मैं कौन हूँ
जिसको दिखते ही नहीं
अंधे हो जाने के कारण
कोयला घोटाले में
नाम काला न करने की
ऐवज में सौ करोड़
की रंगदारी माँगते हुऐ
अपने दो दो झंडाबरदार


मैं कौन हूँ
जुबान बन्द होती है जिसकी
जब लाखों गरीबों की
खूनपसीने की कमाई को
चिटफंड के जरिये कब्जा
कोई खोलता है दसियों चैनल
और इसी रसूख के चलते
हो जाता है मान्यवर


मैं कौन हूँ
गूंगा बन जो नहीं कुछ बोलता
जब बात खुलती है
कि कोयला खदानों की
उस नंगी लूट में
पूरी तरह से थे हिस्सेदार
कुछ मीडिया समूह भी
जो चलाते हैं कई कई
खूब बिकने वाले अखबार


मैं कौन हूँ
जिसे कभी सुनाई नहीं देती
अपना हक माँगने और
करने शिकायतें भी
राजधानी तक पहुँचे
लाखों की तादाद में
दलित, आदिवासी और
मेहनतकश मजदूरों की
कोई भी आवाज कभी
क्योंकि मेरे हिसाब से
यह कोई खबर नहीं


मैं कौन हूँ
जो स्टूडियो में बैठे बैठे ही
बना देता हूँ नायक
आजादी की दूसरी लड़ाई का
उस खद्दर-टोपी धारी को
जो केवल इसलिये
ऊंगली उठा, देख दूर क्षितिज को
देता है अपने पलटीमार बयान
ताकि दुनिया उसको भी
दूरदॄष्टि रखने वाला समझे


मैं कौन हूँ
जो भूल जाता हूँ
टीआरपी की होड़ में
कि मुल्क में अदालते हैं
जहाँ की जा सकती हैं शिकायतें
ऐसे में आखिर क्यों
कागज की सफेद टोपी पहने
यह लोग क्यों लगा रहे हैं
हर किसी पर आरोप
वह भी तिरंगा लहराते हुऐ


मैं कौन हूँ
जो आँख-कान बंद रखते हुऐ
घोषित कर देता हूँ
आटा-तेल-जूस-साबुन के
साथ दवाई और योग भी
अद्भुत लाभ की गारंटी के संग
दुनिया को बेचते हुऐ
धर्म और कारोबार के
गठजोड़ का दोहन करते
एक चतुर इंसान को
क्रांति वाहक,देश का कर्णधार


मैं कौन हूँ
जो बड़ी बेशर्मी से
मायानगरी की चकाचौंध में
खुद को असफल मान
जिंदगी से मुँह मोड़ गयी
महज पच्चीस साल की
उस प्रतिभाशाली लड़की की
मौत को बनाता हूँ
एक राष्ट्रीय अहम मुद्दा
उस बेचारी व उसके परिवार की
निजता को करते तार-तार


मैं कौन हूँ
जिसने कर बंद अपने दिमाग
बना दिया एकदम अचानक
श्रीनि का अपने पद से हटना
देश का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा
मैं लगाता हूँ उल्टे सीधे इल्जाम
एक कप्तान की पत्नी पर
क्योंकि कसूर उसका इतना है
वह खेल देखने गयी मैदान पर


मैं कौन हूँ
जिसकी याद्दाश्त गायब है
भूल गया हूँ सहजता से कि
वह अभी भी वही खिलाड़ी है
जिसकी कप्तानी में ही
खेल के तीनों फार्मेट में
टीम बनी थी नंबर वन
जीते गये थे दो विश्व कप
और आज मैं कह रहा हूँ
चीख-चीख, बिना आधार
कि वह है कप्तान और टीम में
किसी खास की कृपा-दया से


तू कौन है, बे !
मैं इस महान भारत देश का
इलेक्ट्रानिक-प्रिंट मीडिया हूँ
जिसके न नाखून हैं न दाँत ही
धनझोलाओं का मैं गुलाम हूँ
चैनल चलाने-विज्ञापन जुटाने
और पेट अपना पालने के लिये
ढूंढता केवल आसान शिकार हूँ


धिक्कार है तुझ पर, बे...
दूर हट जा आगे से मेरे
नहीं तो मुझे पूरा डर है
मैं शब्दों की मर्यादा तोड़ दूंगा
जा फिर से कर वही काम
जो आज तक करता आया है
तू केवल यही करना जानता है
तुझे पाला इसीलिये धनकुबेरों ने
रात दिन जमीर बेचते, झूठ परोसते
यही करने को तू है अभिशप्त भी !



Indian captain M S Dhoni receives the ICC ODI Shield from David Morgan at Cardiff




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डिस्क्लेमर- ब्लॉग लेखक क्रिकेट प्रेमी है, भारतीय क्रिकेट टीम का शुभचिंतक है और भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का प्रशंसक भी...


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सोमवार, 3 जून 2013

मैं...

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मैं
मस्त हूँ
खुश 
और
संतुष्ट भी
अपने
मैं
ही 
रहने में


मैं
कभी
ख्यालों में
तक नहीं
होना चाहता
तुम 
या 
किसी 
और सा


मैं
जो
मैं 
बना
खुद ही
मेरा
मैं 
बनना
मेरा ही
जागृत
निर्णय था

मैं
ही हूँ
जिम्मेदार
अपने
मैं 
होने का
और
इस कारण हुई
हर जीत
और
हरेक हार का


मैं
नहीं चाहता
दौड़ना
तुम्हारे
या 
तुम जैसे
कई औरों के
साथ
किसी भी
दौड़ में


मैं
दौड़ता हूँ
खुद के साथ
स्वयं
चुनकर
अपनी दौड़
दौड़
का समय
और
दौड़ने का
मैदान भी


मैं
हमेशा
खुद को
नापता हूँ
खुद की ही
नजरों से
अपने
ही
पैमानों पर


मैं
मानता हूँ
कि
तुम्हारे 
या किसी और
के पास
मुझे नापने
का पैमाना
और 
नजर नहीं


मैं
अपने
मैं बनने 
के लिये
अपने 
परिवार
के सिवा
किसी का
कृतज्ञ या
कर्जदार नहीं


मैं
मानता हूँ
कि मेरा
मैं 
रहना
नहीं जुड़ा
किसी के
भी स्वीकार 
या
अस्वीकार से


मैं
मैं ही रहूँगा
तुम्हारे
मुझ को
कुछ कुछ
या
बहुत कुछ
कहने के
बाद भी 


मैं
जानता हूँ
कि 
फिर भी
तुम
आँकोगे मुझे
लगाओगे 
अनुमान
मेरी हैसियत
और वजूद का


मैं
हमेशा की
तरह ही
कर दूँगा
दरकिनार
तुम्हारी
इस 
अनधिकार
चेष्टा को


मैं
मैं
ही रहूँगा
पर यह
पूछंगा जरूर
कि क्या
तुम्हें वाकई
यकीन था
कि मेरे
मैं 
ही रहने
के अलावा
कोई दूसरा 
परिणाम
संभव था ?












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