बुधवार, 22 मई 2013

क्या आपको लगता है कि 'उस' को मानने वालों के पास कोई जवाब है वाकई !!!

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अब जब भी 'उस' की बात होगी, 'उस' के वजू़द पर सवाल होगा तो मानने वालों का सबसे पहला तर्क यही होता है कि जब तुम मानते नहीं तो तुम्हें क्या फर्क पड़ता है उसके होने या न होने से... क्यों तुम उसके पीछे पड़े हो भाई... ऐसे में मैं जवाब देना चाहूँगा कि चाहे अनचाहे दुनिया को फर्क तो पड़ता ही है 'उस' को माने जाते रहने के कारण... यथास्थिति बरकरार रहती है, जुल्म और शोषण की ताकतें बनी रहती हैं, मजलूम अपनी हालत को कर्मफल समझ आवाज नहीं उठाता, बहुत सा समय, खाद्म और संसाधन 'उस' के गुणगान में व्यर्थ होते हैं, एक बड़ा निकम्मा तबका केवल और केवल कुछ उलजलूल बेसिरपैर की बातों को फैलाकर समाज में प्रभुत्व बनाये रखता है, दुनिया बंटी रहती है, दंगे होते हैं, मुल्क युद्ध करते हैं, आतंक फैलता है, इंसान अपने ही जैसे दूसरे इंसान से नफरत करता है... और आप कहते हो, भाई तुम्हें क्या फर्क पड़ता है... फर्क पड़ता है भाई, क्योंकि मैं और मुझ जैसे कई इस खेल के आर-पार देख पा रहे हैं... मानने वाले भले ही हमें अपना न मानें, पर मुझ जैसे सभी मानते हैं कि 'सच को जानने का हक सभी को है !'

जब यह ब्लॉग शुरू किया तो बहुत सारे सवाल उठाये 'उस' और 'उस' की अवधारणा पर... अल्लम गल्लम बातें तो बहुत की लोगों ने पर तर्क की कसौटी पर खरा व विश्वसनीय जवाब कोई नहीं मिला... आप चाहें तो यह आलेख नीचे पढ़ सकते हैं... यह सभी लिंक हैं...

काहे को भूखा मारते हो अपने ही प्यारे बच्चों को... मेरे माई-बाप...हम सबके पालनहार ?

चित, पट और अंटा तीनों उसी का ???

वफादारी या ईमानदारी ?... फैसला आपका !

बिना साइकिल की मछली... और धर्म ।

अदॄश्य गुलाबी एकश्रंगी का धर्म...

जानिये होंगे कितने फैसले,और कितनी बार कयामत होगी ?

पड़ोसी की बीबी, बच्चा और धर्म की श्रेष्ठता...

ईश्वर है या नहीं, आओ दाँव लगायें...

क्या वह वाकई पूजा का हकदार है...

एक कुटिल(evil) ईश्वर को क्यों माना जाये...

यह कौन रचनाकार है ?...


और 

क्या होती है आत्मा ?

आज देखता हूँ कि संजय ग्रोवर जी की पोस्ट (लिंक) पर भी वही नजारा है... और मेरी उपरोक्त पोस्टें लिखे जाने के बाद ब्लॉगरों और फेसबुकियों की एक नयी पीढ़ी भी उतर आई है मैदान में... तो दोबारा वही सवाल पूछने का मन है... आपका मन हो तो जवाब दीजिये, नहीं हो तो पढ़कर अगली पोस्ट की ओर बढ़िये... पोस्ट का उद्देश्य केवल पाठक के दिमाग तक उन सवालों को पहुंचाना है... कईयों के दिमागों में वह और कई सवालों की तरह दफन हो जायेंगे हमेशा के लिये और कुछ के दिमागों में वह जिन्दा रहेंगे हमेशा और काम करेंगे इस पूरे प्रपंच को तोड़ने-उजागर-नंगा और खत्म करने का... आदमीयत अपने असली रूप में तभी जिन्दा होगी...

मोटामोटी तौर पर मैं और मुझ जैसे यह मानते हैं कि अपनी विकास अवस्था के दौरान जब मानव ने सामूहिक शिकार के प्रयोजन से झुंडों में रहना शुरू किया और शिकार, खाद्मान्न व फलादि का संग्रहण शुरू किया, भाषा विकसित हुई तो कुदरत की ताकतों जैसे वर्षा, बिजली, गर्मी, सूखा, बाढ़, बीमारी, जंगली जीव और सर्प आदि के द्वारा जान-माल की क्षति होने के कारण वह भयभीत सा हुआ... वह और कुछ करने की स्थिति में नहीं था तो भय के चलते उनको पूजने, खुश करने या मनाये रखने की परंपरा सी चल पड़ी, यद्मपि इन सबसे कुछ होता नहीं था... कालांतर में मानव समाज का एक तबका, जो इस सब प्रपंच को समझता था परंतु यह सब समझते हुऐ भी क्योंकि उस तबके को इन प्रपंचों के चलते समाज में प्रभुत्व व बैठे ठाले बिना शारीरिक श्रम किये रोजी रोटी का जुगाड़ मिलता था, उस तबके ने इस प्रपंच को और बढ़ाया, उसने ग्रंथ रचे, आकाशवाणियाँ सुनीं, देव दूत देखे, अवतार गढ़े, संदेशवाहकों से मिला और एक लंबा चौड़ा काल्पनिक मिथकों का मायाजाल रच दिया... पूर्ण आस्था जो कोई सवाल नहीं करती और समर्पण पर जोर दे उस तबके ने अपने को और इस सारे प्रपंच-मायाजाल को सवालों के दायरे से बाहर कर दिया... उसी तबके ने फलित ज्योतिष, वास्तु, फेंग शुई और तमाम तरीकों के अल्लम गल्लम गल्प विज्ञान रचे और मामले को इतना उलझा दिया कि आज का इंसान बमुश्किल उसके पार देख पाता है... शायद इसीलिये उनकी जिम्मेदारी अहम है जो इस सब के पार देख पा रहे हैं...

आज फिर इस पोस्ट के माध्यम से मेरे सवाल हैं ...


१- ईश्वर क्या है, उसका स्वरूप क्या है ?

२- क्या आज तक के मानव इतिहास में किसी ने उसको देखा, सुना या अनुभव किया है ?

३- वह क्या करता है ?

४- वह क्यों चाहता है कि उसे पूजा जाये, उसके सामने झुका जाये, उसे याद रखा जाये या उसका ध्यान किया जाये ?

५- आत्मा क्या चीज है ?

६- क्या होता है अध्यात्म ?

७- धर्म का उद्देश्य क्या है, अगर उद्देश्य गलत काम से बचाने का है तो क्या यही काम कानून बेहतर तरीके से नहीं करते, जिनमें इसी जन्म में गलत काम की सजा भी है ?

८- क्या यह सब जो खाद्म नदियों में बहाया जाता है, आग में फूंका जाता है या मूर्तियों पर च़ाया जाता है, सुगंधित धुउसके घर में किया जाता है मोमबत्ती-दिये जलाये जाते हैं, उसके नाम पर कुरबानियाँ-च़ावे होते हैं... क्या उसे इनकी जरूरत है ?

९- क्या वह चाहता हकि उसको याद/खुश करने के लिये कोखा रहे ?

१०- और सबसे खिरी सवाल, उसे किसी कार्य को करने में सक्षम कहा जाता है तो क्या वह एक इतना भारी पत्थर बना सकता है जिसे वह खुद ी न ठा सके ?... :) 
 









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51 टिप्‍पणियां:

  1. आज भी दुनिया में कई रहस्य है जिनको तर्कों के सहारे सिद्ध नहीं किया जा सकता है और ठीक वही बात ईश्वर पर भी लागू है क्योंकि ईश्वर की शक्ति भी तर्क की मोहताज नहीं होती है ! जिसकी इच्छा है वो माने और जिसकी इच्छा है वो नहीं मानें ! दूसरी बात आपनें अपने प्रश्नों में धर्म के जो ठेकेदार बने बैठे हैं और उनके द्वारा किये जा रहे पाखंड को ईश्वर के माथे पर मढने की कोशिश की है जिसका कोई अर्थ नहीं है ! जबकि आज का विज्ञान भी मानता है कि कोई अलौकिक अदृश्य शक्ति है जरुर !!

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  2. वाह !

    सवाल उत्तम उठे है (शरीर में या आत्मा मे… अब ये भी सवाल है!आपके तो शरीर में ही उठे होंगे वैसे… ), अब आपको चाहिए एक समर्थ गुरु, और इन सवालों जवाब को पाने की तीव्र प्यास जो उत्तर मिलने तक ना धीमी पड़े, ना बुझे !लेकिन समस्या ये भी है कि आप इन्तजार कैसे और कितना कर पायेंगे!अब इसके लिए तो ये वाली बात भी बोली जाएगी कि ..."न उम्र की सीमा हो…न जन्मो का हो बन्धन !" आप इस पर भी मुस्कुराएँगे!

    पर आपको जवाब तो जरूर मिलेंगे कभी ना कभी!

    आप संतुष्टि दिखाए या न दिखाए ये आपके अधिकारक्षेत्र की बात है!वैसे आपने सोचा है कभी कि आप भी इश्वर हो सकते है.....?

    हो सकता है मैंने टिपण्णी देते समय आपके द्वारा दिए गए दिशानिर्देशो का उल्लंघन कर दिया हो इसके लिए मै क्षमाप्रार्थी हु!

    कुँवर जी,

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  3. प्रवीण जी, झगडे-फसाद, नफरत, हत्याएं कभी भी धर्म के कारण नहीं होते हैं, बल्कि धर्म की दुकानदारी करने वालों के कारण होते हैं। आपने जो उपरोक्त इलज़ाम लगाए उनका कारण लोगो की अंध-भक्ति है ना कि धर्म।


    १- ईश्वर क्या है, उसका स्वरूप क्या है ?


    ईश्वर इस श्रृष्टि का रचियता है जो किसी चीज़ का मोहताज नहीं है, किसी स्वरुप का भी नहीं।



    २- क्या आज तक के मानव इतिहास में किसी ने उसको देखा, सुना या अनुभव किया है ?

    उसको सुनने वाले भी अनेक गुज़रे और उसको अनुभव करने वालें तो अनेकों हैं।

    ३- वह क्या करता है ?
    वह कुछ करने की आवश्यकता का भी मोहताज नहीं है।

    ४- वह क्यों चाहता है कि उसे पूजा जाये, उसके सामने झुका जाये, उसे याद रखा जाये या उसका ध्यान किया जाये ?

    ईश्वर को यह सब करवाने की आवश्यकता या इच्छा क्यों कर होगी भाल? हां यह ज़रूर है कि जिसे उससे से इश्क है वोह उसे सोते-जागते याद करने में लुत्फ़-अन्दोज़ होता ही है। और फिर अगर मुझसे जिसे इश्क हो, मैं उससे मिलन के आनंद में वशीभूत होकर उसके ध्यान में बैठता हूँ, तो क्या वह मुझसे राज़ी नहीं होगा???

    प्रवीण भाई, इश्क की अजीब ही लीला होती है,... किसी शायर ने कहा है कि "इश्क़ कीजे फिर समझिए आशिक़ी क्या चीज़ है".



    ५- आत्मा क्या चीज है ?

    सबसे पहले, हमें 'जीवन' और आत्मा का भेद पता करना पड़ेगा. जीवन एक शक्ति है जो प्राणी को रहने के विभिन्न भागों में कार्य करने के योग्य बनाता है. जब तक शरीर में ''जीवन" (अर्थात ऊर्जा है), विभिन्न भाग काम कर सकते हैं. जब शरीर, ऊर्जा (अर्थात जीवन) को खो देता है (एक बैटरी की शक्ति की तरह), उसके सभी भाग कार्य करना बंद कर देते हैं. और तब उसका शरीर मृत हो जाता है. मृत्यु का होना ऊर्जा का अभाव है, जिसके बिना शरीर कार्य नहीं कर सकता हैं. सभी प्राणियों (पशुओं और पौधों) को 'जीवन' या ऊर्जा प्राप्त है, जब तक कि उन में जीवन, ऊर्जा की अभिव्यक्ति के रूप में है. कुरआन 15:29, 38:72 और 32:9 में निर्दिष्ट है कि रूह जीवन से अलग है.

    आत्मा की विशेषता की वजह से फरिश्तो को हुक्म हुआ था कि वह आदम को सजदा करें. आदम के अलावा फ़रिश्ते सिर्फ अल्लाह को सजदा करते हैं [16:49]. इससे पता चलता है कि आत्मा, ईश्वर के गुण का सार है, जब मनुष्य में साँस है तो उसे फरिश्तो की श्रद्धा के योग्य बना दिया.


    यह 'रूह' एक सॉफ्टवेयर' की तरह है, इसके प्रदर्शन को देखा या अनुभव तो किया जा सकता लेकिन शरीर (अर्थात हार्डवेयर) की तरह छू नहीं सकते.



    ७- धर्म का उद्देश्य क्या है, अगर उद्देश्य गलत काम से बचाने का है तो क्या यही काम कानून बेहतर तरीके से नहीं करते, जिनमें इसी जन्म में गलत काम की सजा भी है ?

    धर्म का उद्देश्य मनुष्य से ईश्वर का मिलन है। गलत काम या गुनाह से बचने का गुण ईश्वर की पसंद है और यह मनुष्य को ईश्वर के मिलन में सहायक है।

    पढ़ें मेरी आज की यह पोस्ट "इश्क-ए-हक़ीकी और उसकी नाराजगी"



    ८- क्या यह सब जो खाद्म नदियों में बहाया जाता है, आग में फूंका जाता है या मूर्तियों पर चढ़ाया जाता है, सुगंधित धुआँ उसके घर में किया जाता है मोमबत्ती-दिये जलाये जाते हैं, उसके नाम पर कुरबानियाँ-चढ़ावे होते हैं... क्या उसे इनकी जरूरत है ?

    ईश्वर अपने बनाए हुए जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों के पालन-पोषण और उनकी मदद से खुश होता है। यह अवश्य है कि वह खाना पकाने जैसे भलाई के कामों लिए लकड़ियाँ जलाने जैसे कार्यों की अनुमति देता है।

    ९- क्या वह चाहता है कि उसको याद/खुश करने के लिये कोई भूखा रहे ?

    वह बिलकुल भी नहीं चाहता है कि उसको याद करने के लिए भूखा रहा जाए, ऐसा किसने कहा आपसे? बल्कि भूखा रहने के कई मकसद हो सकते हैं, जैसे कि भूख को महसूस करना ताकि भूखे-प्यासे लोगो की मदद का जज़्बा दिल में पैदा हो। अन्य कारण भी हो सकते हैं।

    १०- और सबसे आखिरी सवाल, उसे किसी भी कार्य को करने में सक्षम कहा जाता है तो क्या वह एक इतना भारी पत्थर बना सकता है जिसे वह खुद भी न उठा सके ?... :)

    जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि वह किसी भी चीज़ का मोहताज नहीं है मतलब हर एक "आवश्यकता" से परे है। मतलब वोह बड़े-से-बड़ी चीज़ भी बना लेने पर क़ादिर है।

    मगर उसकी इस कुव्वत से आपकी बात में विरोधाभास पैदा हो जाता है। क्योंकि वह किसी भी चीज़ का मोहताज नहीं है इसलिए ऐसा हो नहीं सकता कि वह किसी काम को करने में सक्षम ना हो। और उसके इसी गुण से यह साबित होता है कि मखलूक (उसकी बनाई हुई शय) उस खालिक (हर शय को बनाने वाला) से बेहतर नहीं हो सकती। मतलब कोई पत्थर दबाने में ईश्वर का मोहताज है।

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  4. कहो: "वह अल्लाह यकता है, अल्लाह निरपेक्ष (और सर्वाधार) है, न वह जनिता है और न जन्य (अर्थात न वह किसी का बाप है और न बेटा), और न कोई उसका समकक्ष है. [सूराह इखलास 112:1-4]

    सूराह इखलास पवित्र कुरान की एक बहुत ही महत्वपूर्ण है सूराह है क्योंकि यह दिव्य सार की अखंडता (Tawhid) और निरपेक्ष / असीमित प्रकृति की पहचान बताती है. इस अवधारणा को पहले श्लोक (आयत) में प्रस्तुत किया है. दूसरा श्लोक दर्शाता है कि अल्लाह शाश्वत (अर्थात अनन्त / सार्वकालिक / सनातन) है. अर्थात, वह समय और स्थान की सीमा से परे है. तीसरा श्लोक वर्णन करता है कि अल्लाह (एक मां की तरह बच्चे को) जन्म नहीं देता है और न ही उसे किसी ने जन्म दिया है. और आखिरी श्लोक बताता है कि अल्लाह किसी भी तुलना से परे है.

    सूराह इखलास सीधे तौर इस्लाम की पहली घोषणा (shahadah) को समर्थित है:

    "कोई इलाही नहीं है, सिवा अल्लाह के" अर्थात कुछ भी करने की शक्ति ईश्वर के सिवा किसी के पास नहीं है. अग्नि जलाने में, जल डुबाने में, भोजन पेट भरने अर्थात शक्ति देने में, इत्यादि. अर्थात ईश्वर के सिवा हर चीज़ कुछ भी करने में ईश्वर की मोहताज है. पेड़ का एक पत्ता भी बिना उसकी मर्ज़ी के नहीं हिल सकता है. और उसने हर कार्य के सुचारू रूप से चलाने के लिए एक नियम बनाया हुआ है. हालाँकि वह स्वयं, उस नियम को मानते हुए भी उसको मानने के लिए मोहताज नहीं है.

    "ईश्वर किसी भी तुलना से परे है" का मतलब है कि अगर कोई वस्तु ऐसी है जिसकी तुलना किसी और से की जा सकती है, तो वह परमेश्वर नहीं हो सकता है. अर्थात अगर कोई यह कहे कि किसी में, 800 या 8 करोड़ या कोई भी ऐसी संख्या (जिसे गिना जा सकता हो) जितने हाथियों की शक्ति है तो वह ईश्वर हो ही नहीं सकता है. अर्थात वह ऐसा है जिसकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती है.

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  5. मेरे ख्याल से शाहनवाज़ जी और कुँवर जी ने बहुत ही सारगर्भित उत्तर दे दिये हैं अब कहने को कुछ नहीं बचा।

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. @ क्या आपको लगता है कि 'उस' को मानने वालों के पास कोई जवाब है वाकई

    जवाब भी है और तर्कसंगत ज्ञान के संदर्भ भी। लेकिन क्या कहा जाय जब जडता पूर्वक पहले से ही निर्धारित कर दिया गया हो कि किसी जवाब किसी संदर्भ किसी किताब या किसी मिमांसा को मानना ही नहीं है, सभी जवाबों को सतही कुतर्कों से खारिज़ ही करना है तो जवाब पाने का असल मक़सद क्या है?

    यदि ईमानदारी से किसी निष्कर्ष पर पहूंचना और उसकी उपयोगिता को स्वीकार करना ध्येय हो तो विमर्श का तरीका ही बदल जाता है, उस विमर्श में प्रत्येक दृष्टिकोण पर सहानुभूति से गहन विचार किया जाता है, सभी तरह के ज्ञान पर विवेक पूर्वक चिंतन किया जाता है। और समीक्षा के समय समस्त पूर्वाग्रहों से अलिप्त रहना होता है। विमर्श में अपने तर्कों के निष्प्रभावी हो जाने पर भी अपने अहम् को सिर उठाने नहीं दिया जाता, धर्य रखना होता है, अक्रोधी स्वभाव होना जरूरी है। और सबसे जरूरी है मध्यस्त भाव (निष्पक्ष चिंतन)। इसलिए जब परिणाम पहले निर्धारित कर दिए जाएं और चर्चा उन परिणामों के खांचे बंद बैठती की जाय तो, जवाब कुछ भी हो सभी व्यर्थ ही जाएंगे……… अतः ईमानदार स्थिति और जो भी निराकरण आए उसके प्रति निष्ठा आवश्यक है।

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  8. @अब जब भी 'उस' की बात होगी, 'उस' के वजू़द पर सवाल होगा तो मानने वालों का सबसे पहला तर्क यही होता है कि जब तुम मानते नहीं तो तुम्हें क्या फर्क पड़ता है उसके होने या न होने से...

    यह तर्क वाजिब है। क्योंकि 'न मानने वालों' के लिए 'मानने' का करण जानना उद्देश्य हीन है। या इस सवाल के पिछे अन्य कोई छद्म मक़सद…(आज इस मक़सद पर भी विचार करेंगे)

    @ऐसे में मैं जवाब देना चाहूँगा कि चाहे अनचाहे दुनिया को फर्क तो पड़ता ही है 'उस' को माने जाते रहने के कारण... यथास्थिति बरकरार रहती है, जुल्म और शोषण की ताकतें बनी रहती हैं………कि 'सच को जानने का हक सभी को है !'

    मात्र आप और आपकी तरह से न मानने वाले दुनिया कैसे हो गए? क्या जो नहीं मानते उनका शोषण और उनपे अत्याचार बंद हो गए है? क्या नास्तिक बिरादरी ने पूरी दुनिया का ठेका ले रखा है, पहले तो पूरी दुनिया को सप्रमाण गारंटी से बताओ कि 'न मानते' ही शोषण, अत्याचार, स्वार्थ, अकर्मण्यता और आलस आदि पूरी तरह समाप्त हो जाता है। कोई भी नास्तिक आलसी, आतंकी, दंगाखोर, या युद्धप्रिय नहीं होता। ईश्वर या धर्म को न मानने से मन वचन काया से एक हो जाते है, और इन्सानी एकता स्थापित हो जाती है। उनमें नफरतें होती ही नहीं, अपने ही जैसे प्रत्येक दूसरे इंसान से प्रेम और करूणा का सागर उडेलते रहते है। बस ईमानदारी से कह दो कि ऐसा ही होता रहा है, और ऐसा ही होगा। मात्र नास्तिक बनने से सभी दुख दर्द समाप्त हो जाएंगे तो पूरी दुनिया के हित कारण आप सभी का ठेका अवश्य लें तब तो यह परम् कर्तव्य होगा। सभी को सुखी बनाने का यह गारंटीड उपाय, वह सवाल और 'उसे न मानने' का प्रसार उत्तम और सर्वश्रेष्ठ होगा।

    इसलिए जिस तरह धर्म के पाखण्डियों पर विश्वास नहीं किया जा सकता, ठीक उसी तरह 'धर्म और ईश्वर को न मानने वाले' सुख-कल्पना का प्रपंच रचने वाले पाखण्डियों पर कैसे भरोसा किया जा सकता है? क्योंकि धर्म-पाखण्डी भी दुख-दर्द मिटाने का विश्वास दिला कर ठगते है और ये लोग भी मजलूमों शोषितों के इसी तरह के उपाय बताकर दुख-दर्द मिटाने के दिवास्वप्न दिखाते है।

    फर्क यह भी पडता है, बहुत ही गम्भीर फर्क!! इसलिए पहले इस सच को जानने का हक सभी को है !'

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  9. @क्योंकि मैं और मुझ जैसे कई इस खेल के आर-पार देख पा रहे हैं...काल्पनिक मिथकों का मायाजाल रच दिया………शायद इसीलिये उनकी जिम्मेदारी अहम है जो इस सब के पार देख पा रहे हैं...

    उसी तरह हम 'न मानने और न मानने को मनवाने' के खेल को भी आर-पार देख पा रहे हैं। मुझे पता है "ईश्वर सर्वत्र है" इस दर्शन का आपके लिए अर्थ शाब्दिक और सतही ही होता है और मात्र शब्द के आधार पर उसके निम्न जगह पर उपस्थित होने का मजबूत तर्क गढ सकते हो, ऐसा ही उपदेशात्मक कथाओं के साथ है, वे है तो सार युक्त मोरल शिक्षा के लिए, उस मोरल को ग्रहण न करके उसमें रही विषय वस्तु का पोस्ट्मार्टम करते हो, फिर आज के संदर्भ में और और ऐसा कैसे कर दिया या ऐसा कैसे हो सकता है? करने लगते हो, कथा का उद्देश्य और सार पिछे छूट जाता है और सारा ध्यान छिद्रान्वेषण पर केन्द्रित करते हो। परिणाम स्वरूप जीवन के लिए सार्थक सार लुप्त हो जाता है और प्रचारित किया जाता है अपना ही विकृत किया गया अगडम-बगडम्। ऐसे बनता है "मिथकों का मायाजाल" जिन्हें जीवन को उत्कृष्ट बनाने वाले सार व उसके उपदेश से कोई सरोकार ही नहीं, उन्हें कैसे दिखेगी नैतिक शिक्षा? निश्चित ही सुक्ष्म चिंतन और नीर क्षीर विभाजन के विवेक वालों की बहुत अहम जिम्मेदारी है।

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  10. अब प्रश्नो के हल्…

    १- ईश्वर क्या है, उसका स्वरूप क्या है ?

    वह निराकार है, यह भ्रम है कि उसका स्वरूप इन्सान जैसा है। उस पर न जाएं जहां लोगों ने अपनी सुविधा के लिए कोई मूर्त स्वरूप दिया। उसकी विद्यमान किसी आकार से तुलना नहीं की जा सकती, इसलिए स्वरूप कथ्य नहीं है। वह कोई शक्ति भी हो सकती है, प्रकृति की शक्ति की तरह्…

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  11. २- क्या आज तक के मानव इतिहास में किसी ने उसको देखा, सुना या अनुभव किया है ?

    लगभग सभी अनुभव करते है उस शक्ति को, अज्ञानतावश या वक्रतावश स्वीकार नहीं कर पाते। वह देखने सुनने का विषय ही नहीं है, ज्ञेय का विषय है। अनुभव में आता है। इसीलिए उसे परम सत्य से उपमित किया जाता है।

    ३- वह क्या करता है ?

    वह एक परिपूर्ण सिस्टम है, सृष्टि की तरह, कोई व्यक्ति नहीं कि उसे कुछ करना पडे।

    ४- वह क्यों चाहता है कि उसे पूजा जाये, उसके सामने झुका जाये, उसे याद रखा जाये या उसका ध्यान किया जाये ?

    ५- आत्मा क्या चीज है ?

    आत्मा चेतन तत्व है, जड अणु-परमाणु के विपरित तत्व!!

    ६- क्या होता है अध्यात्म ?

    शान्ति के प्रयोजन से मन-आत्मा के शुद्ध सात्विक भाव!!

    ७- धर्म का उद्देश्य क्या है, अगर उद्देश्य गलत काम से बचाने का है तो क्या यही काम कानून बेहतर तरीके से नहीं करते, जिनमें इसी जन्म में गलत काम की सजा भी है ?

    धर्म का उद्देश्य मानव जन्म को सार्थक लक्ष्य देना है। कानून बेहतर है किन्तु उसका कार्य दुष्कृत्यों के बाद होता है। धर्म का काम दुर्विचार आने से पहले ही न आने को प्रेरित, सावधान, सचेत करना है, मन के स्तर पर ही शुद्धता उपार्जित करने का है वह वाणी आचार के स्तर पर भी अनुकरणीय संदेश देता है। धर्म के दस लक्षण का सूत्र पढते ही धर्म की उपयोगिता स्थापित हो जाती है। कानून अपराध के पूर्व संस्कारित बनाने नहीं जाता।

    ८- क्या यह सब जो खाद्म नदियों में बहाया जाता है, आग में फूंका जाता है या मूर्तियों पर चढ़ाया जाता है, सुगंधित धुआँ उसके घर में किया जाता है मोमबत्ती-दिये जलाये जाते हैं, उसके नाम पर कुरबानियाँ-चढ़ावे होते हैं... क्या उसे इनकी जरूरत है ?

    संसाधनों का व्यर्थ गलत बात है किन्तु क्या दुरूपयोग मात्र धर्म के नाम पर ही होता है। 90% संसाधनों का वेस्ट मनुष्य अपने अहंकार, माया करने के लिए, क्रोध के लिए अथवा लोभ के कारण करते है। (जिसे धर्म के लिए कहा जाता है वो भी हकिकत में मानव के खुद के इन्ही दुर्गुणों को पोषने का उपक्रम होता है।) ऐसे किसी प्रलोभन की उस को कोई जरूरत नहीं।

    ९- क्या वह चाहता है कि उसको याद/खुश करने के लिये कोई भूखा रहे ?
    व्रत उपवास पर शाहनवाज साहब नें सही कहा है। व्रत उपवास अभाव ग्रस्तों के दर्द को महसुस करने, अपनी काया को तृष्णा मुक्ति का अभ्यस्त करने, कायकष्ट समझने, त्याग का अभ्यास करने, संयमरत रहने, बचत करने आदि कईं कारणों से होता है। तप स्वयं को सुदृढ करने का उपाय है किसी को खुश करने का नहीं। तृष्णावान के लिए उपवास भी 'भूख' है लंघन है। जैसे भिखारी भोजन न मिलने के कारण भूख भूख चिल्लाता है।

    १०- और सबसे आखिरी सवाल, उसे किसी भी कार्य को करने में सक्षम कहा जाता है तो क्या वह एक इतना भारी पत्थर बना सकता है जिसे वह खुद भी न उठा सके ?... :)

    बालिश खेल उसके कार्यों में नहीं है, स्वय को साबित करने के लिए भी नहीं। वह शक्ति किसी भी तरह की इच्छाओं के अधीन नहीं है। माया, कपट, दंभ उसके समक्ष स्पष्ट है।

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    1. चौथे का उत्तर रह गया था.....

      ४- वह क्यों चाहता है कि उसे पूजा जाये, उसके सामने झुका जाये, उसे याद रखा जाये या उसका ध्यान किया जाये ?

      उसने कभी नहीं चाहा, उसे पूजा जाये, उसके सामने झुका जाये, स्मरण मनन ध्यान किया जाय. बल्कि लोगों के लिए अपने स्वयं के अहंकार के गलन का यही उपचार है, वे शरण में जाते है, समर्पित भाव रखते है, अपने से कईं गुना ईश्वर को शक्तिशाली सर्वज्ञ मानते है ताकि उनका अपना ईगो शांत रहे, इसीलिए उसकी महिमा वर्धन करते है, गुणगान करते है, कीर्तन-पूजन-अर्चन करते है. ऐसा करने में उसे तुष्ट करने का भाव नहीं बल्कि क्रोध,अहंकार,कपट,और लोभ को वश कर स्वयं को संतुष्ट करने का भाव है.

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    सबसे पहले तो अब तक के सभी टिप्पणीकारों का आभार...

    @ पूरण खन्डेलवाल जी,

    जब आप यह कह रहे हैं कि "जबकि आज का विज्ञान भी मानता है कि कोई अलौकिक अदृश्य शक्ति है जरुर !!"

    तो निश्चित तौर पर मैं आपसे प्रमाण चाहूँगा... अपनी जानकारी को अपडेट रखने के लिये... कहाँ और किस संदर्भ में किस वैज्ञानिक संस्था ने अलौकिक अदॄश्य शक्ति की उपस्थिति को स्वीकार किया है ?


    @ कुंवर जी,

    सवाल मस्तिष्क में उठे हैं, आपको उत्तम लगे, जान अच्छा लगा... गुरू अक्सर वही बताते हैं जो उन्होंने अपने गुरू से सुना होता है... यानी शब्दजाल और और शब्दजाल... हाँ, सुना है मैने भी कि कुछ लोगों को पगलाने पर "Delusions of grandeur" हो जाते हैं और वह स्वयं को ही ईश्वर सा समझने लगते हैं... पर वह स्थिति मेरी नहीं है अभी... हाँ आपको यह जानकर अवश्य हैरानी होगी कि "Delusions of grandeur" से पीढ़ित मानसिक रोगी अपने अपने दौर में आस्थावानों द्वारा पूजे जाते रहे हैं और रहेंगे भी... :)

    आपकी टिप्पणी में कुछ भी गलत नहीं है मेरे विचार से... मुझे मेरे ब्लॉग पर यदि कोई अपशब्द भी कह जाये तो चलता है... लगभग चार साल के इस सफर में मैंने केवल एक टिप्पणीकार की टिप्पणी हटाई है जिसने मेरे परिजनों को, जिनका मेरी ब्लॉगिंग से कोई संबंध नहीं, को अपशब्द कहे थे...


    ...

    उत्तर देंहटाएं
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    @ शाहनवाज जी,

    आप अपनी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर जवाब दे रहे हैं... जबकि मैं ईश्वर, धर्म और इनकी आधारभूत अवधारणाओं पर ही सवाल उठा रहा हूँ...

    @ वंदना गुप्ता जी,

    आपकी राय का आभार...



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    उत्तर देंहटाएं
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    @ सुज्ञ जी,

    सबसे पहले तो स्पष्ट कर दूँ कि यहाँ सवाल प्रवीण बनाम सुज्ञ नहीं है... हम सभी अपनी बात कहने की कोशिश कर रहे हैं, मेरे नतीजे मेरी समझ से हैं और आपके अपनी... जब धर्म, अध्यात्म, भक्ति, आस्था और समर्पण पर रोजाना आलेखों की बाढ़ आती हो तो उस बीच में इस सब पर सवाल उठाते इस जैसे आलेख पर कोई आवेशित क्यों हो... :)


    ...

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    1. आपको ऐसा क्यों लगा कि "यहाँ सवाल प्रवीण बनाम सुज्ञ जैसा प्रकट होता है" निश्चित ही हम अपने अपने विचार मात्र ही रख रहे है,जिसका आधार हमारी अपनी धारणाएँ हो सकती है. सम्वाद में सीधे सम्बोधन का आधार लिया जाता ही है. आपकी या मेरी विचारधारा को आपकी या मेरी कहना ही पडता है इस प्रकार प्रयोग किए गए 'आप' शब्द में उद्देश्य आप जैसी आम धारा से होता है.मेरे प्रत्युत्तर में आवेश जैसा प्रकट हो रहा है तो निश्चित ही उपयुक्त शब्द चयन की कमी है. मन में किंचित भी आवेश,व्यग्रता नहीं है. चर्चा है तो हर तर्क का प्रतितर्क लाजिमि है. न्यायसंगत प्रतितर्क को आवेश न माना जाय. जैसे रोमांटिक,मनोरंजक,हास्यास्पद व्यंग्य,पारिवारिक गौरव भरी बतियाँ, नित्यकर्म के निजि उल्लेख, दुष्कर्मों का संरक्षण महिमामण्डन, शोषण, अत्याचार की अतिरंजित राजनीति आदि आलेखों की भरमार होती है तो उस बीच धर्म, अध्यात्म, भक्ति, आस्था और समर्पण के आलेखों का अस्तित्व सामान्य भाव से लिया जाना चाहिए. उलट विषादों की तपिश में वे शीतल शांति प्रेरक सिद्ध होते है. आखिर इस विषय का अपने होने अधिकार है या नहीं? सवाल तो पूरे दम से ही उठने चाहिए, तलस्पर्शी ईमानदार सवाल!!! वे सवाल ही धारणाओं और मंथन की परीक्षा होते है, सवाल छन्नी का काम करते है, यथार्थ सघन बनता जाता है और निस्सार छन कर निकल जाता है.

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    यह भी कहा जाता है कि वह सृष्टि का रचयिता है... यहाँ यह सवाल उठना चाहिये कि क्यों सृष्टि का कोई रचयिता होना ही चाहिये... धर्म का तर्क देखिये...
    यदि आप कहें कि सृष्टि को किसी ने बनाया नहीं... न किसी ने यह सब पैदा किया... तो धर्म कहेगा कि यह तो असंभव है... हर चीज जिसका अस्तित्व है, स्वयमेव अस्तित्व में नहीं आ सकती... जिसने इन सब चीजों को बनाया वही ईश्वर है।

    उपरोक्त तर्क में दो बड़े छेद हैं...

    १- आप सवाल पूछो कि चलो आपकी बात मान ली कि ईश्वर ने बृह्मांड बनाया... अब जरा यह बता दीजिये कि ईश्वर को किसने बनाया या पैदा किया... धर्म कहेगा कि उसे तो किसी ने न बनाया न पैदा किया... वह हमेशा से ऐसा ही है... अजीब बात है भाई जब कहो कि किसी ने बृह्मांड को नहीं बनाया या पैदा किया... यह हमेशा से ऐसा ही है बस अपना रूप बदलता रहता है... तब तो आप मानते नहीं... जबकि आप तार्किक दॄष्टि से विचार कीजिये तो दोनों तर्क एक ही जगह पर तो आकर खत्म हो रहें हैं... यानी एक ऐसी चीज पर जिसके बारे में आज की तारीख में आदम-जात के पास जानकारी नहीं है कि उसको बनाया या पैदा किसने किया...

    २- दूसरी बात यह है कि हरेक चीज के बारे में यह पता करना कि उसे किसने बनाया या पैदा किया एक पूरी तरह से मानव मस्तिष्कीय गुण है, यदि मानव इतनी बुद्धि और ज्ञान अर्जित न करता या स्वयं कुछ रचना (create) करने की योग्यता न प्राप्त कर पाता तो क्या यह सवाल पूछा जाता... नहीं न !... फिर 'ईश्वर' कहाँ जाता?



    ...

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  16. शाह भैजी ! कोई नेक काम करने के बाद आपने कभी अपना अक्श आईने में देखा होगा, वही भगवान् है भैजी। और हाँ, कभी कोई गलत काम करने के बाद आपने कभी अपनी परछाई भी देखी होगी, वही भूत, पिचाश, राक्षश है भैजी। कभी ऐसा गौर न फरमाया हो तो कभी फरमा के देखना :) THERE IS A GOD, THERE IS A DEMON IN EVERY HEART.अब ये मत बोलना भैजी कि दक्षिणपंथी हो, इससे ज्यादा क्या सोच सकते हो !

    THERE MUST EXIST A GOD.

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    मैं निराकार हूँ, मेरा कोई स्वरूप नहीं, मैं अतुलनीय हूँ, मुझे कुछ करने/न करने की जरूरत नहीं, मुझे कुछ भी साबित नहीं करना, मैं सर्वव्यापी हूँ, मैं जनमता नहीं, मैं नियंता हूँ, मैं रचयिता हूँ, तुम मेरे ही अंश हो, मैं परिपूर्ण सिस्टम हूँ, मैं सब कुछ कर सकता हूँ... आदि आदि.. यह सब किसी भी दौर के आदमी ने सुना किससे... आदमी की ही जुबान से... तो यह क्यों न माना जाये कि वह आदमी के दिमाग की ही उपज है (एक पुराने दौर के आदमी की)...



    ...

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    1. यहाँ आप इन वाक्यों के साथ बिलकूल सही है. बस इस शब्दावली के मायावी प्रयोग को छोडकर "आदमी के दिमाग की ही उपज है" वस्तुतः कथन मनुष्य के ही है, उपज नहीं उपार्जित!! माना जाये कि वह "सर्वोच्छ ज्ञान के धारी, ज्ञानी मनुष्यों द्वारा प्ररूपित है" (प्राच्य सर्वश्रेष्ठ सभ्य दौर के महामानव की)

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      यहाँ आप इन वाक्यों के साथ बिलकूल सही है. बस इस शब्दावली के मायावी प्रयोग को छोडकर "आदमी के दिमाग की ही उपज है" वस्तुतः कथन मनुष्य के ही है, उपज नहीं उपार्जित!! माना जाये कि वह "सर्वोच्च ज्ञान के धारी, ज्ञानी मनुष्यों द्वारा प्ररूपित है" (प्राच्य सर्वश्रेष्ठ सभ्य दौर के महामानव की)

      सुज्ञ जी,

      यह हुई कुछ ठोस बात... पहली बार इस सारे मुद्दे पर किसी ने एक स्वीकारोक्ति की है, वह यह कि ईश्वर के संबंध में सारे कथन वस्तुतः मनुष्य के ही है, उपज नहीं उपार्जित!

      अब आपके इस कथन से जो सवाल उपजते हैं वह यह हैं...

      १- प्राच्य सर्वश्रेष्ठ सभ्य दौर का काल क्या है ?
      २- उस दौर के मानव महामानव क्यों कहे जा रहे हैं ?
      ३- सर्वोच्च ज्ञान के धारी उन महामानवों के बाद साधारण मानवों का दौर क्यों और कैसे आ गया ?
      ४- ईश्वर को लेकर जो ज्ञान उनके द्वारा उपार्जित किया गया उसकी वजह क्या थी ?
      ५- इस ज्ञानोपार्जन के लिये क्या साधन उनके पास थे और क्या तरीका अपनाया गया ?
      ६- इस उपार्जित ज्ञान की उपयोगिता क्या रही मानव जाति के लिये ?

      ज्ञानवर्धन कीजिये...


      ...

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    3. बिलकुल!!

      बस इसी तरह भिन्न दृष्टिकोण से भी कृपणता त्याग कर स्वीकारोक्ति की उम्मीद होती है. इन प्रश्नो के उत्तर भी ठोस है, क्योंकि हम ज्ञानियोँ के विषय में बात कर रहे है, सर्वोच्छ ज्ञान जो हमें अभी प्राप्य नहीं है,हमारे ज्ञान की सीमाएँ है.हम सीमित ज्ञान के उपलब्ध संसाधनो तक ही पहुँच पाते है,उन्ही संसाधनों से तुलना करते है,और हमें लगता है ऐसा कैसे हो सकता है,हम उसे ठोस नहीं कहते. पर सत्य होता है सत्य सत्य ही होता है.
      १- प्राच्य सर्वश्रेष्ठ सभ्य दौर का काल क्या है ?
      पुराणों में सतयुग,द्वापर और त्रेता, ज्ञान के सभ्य दौर में उतरोत्तर कम होते कालखण्ड है.और इन तीनों कालखण्डों में विशिष्ट प्रबुद्ध व्यक्तियों को सर्वश्रेष्ठ उपार्जित हो जाता था. उदाहरण के लिए हडप्पा मुईन-जो-दडो के काल में सभ्यता नें नगर व्यवस्था आदि उत्कृष्ट विकास कर लिया था किंतु फिर विकास के पतन का दौर आया और आगे चल कर अव्यवस्थित गांवो से पुन: विकास प्रारम्भ हुआ. यह उदाहरण इसलिए कि हम मान बैठे है कि पुराना जंगली आदि काल था, और पत्थर युग,धातुयुग से निरंतर उधर्वगामी विकास ही हुआ. किंतु ज्ञान के विषय में क्रमश अवनत ही हुआ. आप कह सकते है आज का इलैक्ट्रोनिक मशीनी साधनो उपकरणो का दौर पहले कब था? यही सर्वश्रेष्ठ युग है किंतु हमारे ज्ञान की सीमाएँ है,हमने इन्हें ही सब कुछ देखा परखा समझा है और तुलना इन्ही उपकरणो से करते है. कलयुग में हमारी निर्भरता कल(मशीनों)वाले ज्ञान पर केंदित हो गई है. अतः हम उसी परिपेक्ष्य के घेरे में देख पाते है,समझ पाते है, मान पाते है. केंदित होने के कारण ज्ञान के अनंत आयामो पर दृष्टि ही नहीं जाती

      २- उस दौर के मानव महामानव क्यों कहे जा रहे हैं ?

      जैसे आज विशिष्ट विद्या को प्राप्त कोई कोई महान वैज्ञानिक बनते है, उसी तरह सर्वोच्च ज्ञान को उपार्जित कर लेने से महामानव कहे है.

      ३- सर्वोच्च ज्ञान के धारी उन महामानवों के बाद साधारण मानवों का दौर क्यों और कैसे आ गया ?

      मैंने पहले उत्तर में कहा है'कल'के विशिष्ट ज्ञान पर एकांगी निर्भरता.

      ४- ईश्वर को लेकर जो ज्ञान उनके द्वारा उपार्जित किया गया उसकी वजह क्या थी ?

      सुख दुख के मायाजाल से निकलने के प्रयोजनार्थ, कभी क्षरित न हो ऐसे सुख की खोज या इसी परमसत्य, परमानंद की जीवट भरी तलाश.

      ५- इस ज्ञानोपार्जन के लिये क्या साधन उनके पास थे और क्या तरीका अपनाया गया ?

      ज्ञानोपार्जन के लिए आज के मशीनी साधनो उपकरणो की सीमा में ही कल्पना करना व्यर्थ है. अंतस को तप संयम से शुद्ध करना, अनियंत्रित विचारों और कार्यों से अलिप्त अकिंचन बनना ताकि सारा ध्यान दिशा केंदित रहे, चिंतन, मनन, स्वाध्याय और सारे जगत को समझने का प्रयास, स्वयं को जानने का प्रयास आदि कईं तरीके हो सकते है.

      ६- इस उपार्जित ज्ञान की उपयोगिता क्या रही मानव जाति के लिये ?

      बहुत बडी उपयोगिता रही है मानव जाति के लिए.... लाखों भ्रमणाओं और आभासी तुच्छ सुखों के अलावा भी शाश्वत सुख के अस्तित्व का भान हो गया, जीवन का परम लक्ष्य क्या है, उपलब्ध है या नहीं, कैसे पाया जाय,क्या तरीके हो सकते है.जीवन सुंदर कैसे बने, जीवन सात्विक कैसे बने, सदाचार क्यों जरूरी है, शांति क्या होती है, शांति जीवन में क्यों जरूरी है, शांति के उपाय क्या क्या है. दुख किन कारणो से आते है,सभी दुखों का अंत है भी या नहीं, है तो कैसे अंत किया जा सकता है. यह सभी चिंतन और उपार्जित निष्कर्ष उसी परम ज्ञान के अवदान है. मार्ग खोज निकाला है. जो उस पर चल पाए तो परम लक्ष्य को प्राप्त कर लेते है.कठिन तो है, हर श्रेष्ठ उपलब्धि कठिन ही होती है. छोटे छोटे सुखों की लुब्धता, लिप्तता और मोह ही कठिनाईयां पैदा करते है. सबसे व्यवहारिक अवदान तो यह है कि उस परम सत्य को पाने के संघर्ष में जीवन को शुद्ध सात्विक शांत संतुष्ट बनाना होता है, परम लक्ष्य सधे तब सधे, लेकिन तब तक जीवन में सद्विचार,सदाचार और शिष्टाचार तो सध ही जाते है.

      (प्रस्तुत विचारणा यथार्थ ज्ञानियों को लक्ष करके की गई है, धर्माभासियों, धर्म-आडम्बरियों या धर्म-पाखण्डियों के कृत्यों को बता कर यथार्थ ज्ञानियों पर आरोप जडने का कुकृत्य नहीं होना चाहिए)

      हटाएं
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      सुज्ञ जी,

      अब सही है, मुद्देवार बात करते हैं... भले ही इस सारी कसरत के बाद भी हम दोनों अपने रूख पर कायम रहें पर हमें कम से कम उन आधारों का पता चल जायेगा जिन पर विश्वास कर हमने अपने अपने (गलत या सही) निष्कर्ष निकाले हैं...

      १- पौराणिक युगों के कालखंड जो कई कई लाख सालों के बताये जाते हैं, मात्र कल्पना ही लगते हैं... आधुनिक मानव नस्ल (species)ही कुल दो लाख साल पुरानी है... संदर्भ :- http://humanorigins.si.edu/evidence/human-fossils/species/homo-sapiens

      २- और आदमी ने लिखना (लिपि) शुरू किया मात्र आठ हजार साल पहले... संदर्भ :- http://humanorigins.si.edu/human-characteristics/language

      ३- एक और चीज जो यहाँ कहना चाहूँगा कि किसी भी सभ्यता का विकास एक अनुपात में चलता है... यह नहीं हो सकता कि किसी सभ्यता को एक तरफ तो बृह्माँड के रहस्यों के बारे में तो ज्ञात हो पर दूसरी ओर जमीन से पानी निकालने का एक ही तरीका पता हो, कुआँ खोदना... वह सभ्यता आसमान में उड़ना तो जानती हो परंतु इसके लिये जरूरी उर्जा का स्रोत केवल पशु-शक्ति हो उसके पास...

      ४- स्थितियाँ कितनी भी विषम हों पर मान जाति या कोई भी जीव जाति अपने उपार्जित ज्ञान को एकदम भुला नहीं देती... यह कहना कतई सही नहीं है कि अचानक ज्ञान का लोप हो गया और एक विकसित सभ्यता फिर से पाषाण युग में पहुंच गयी...

      ५- जिन ग्रंथों के हवाले से आप अपनी बात कहते हैं उनमें सबसे पुराना तकरीबन सवा पाँच हजार साल पहले लिखा गया है संदर्भ :- http://www.ilovemyculture.com/veda.htm
      निश्चित तौर पर उनमें लाखों साल पहले की बातें नहीं कही जा रहीं, उनमें बहुत कुछ रचनाकार की कल्पना पर आधारित है...



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    5. आप भी विशाल हृदय से थोडी स्वीकारोक्ति कर लेते तो विमर्श को और भी साम्यता युक्त सौहार्द वाला बल मिल जाता. :)

      वैसे तो आपके इन प्रश्नों के आधार पूर्व टिप्पणी में दे चुका हूँ पर फिर एक बार प्रयास करता हूँ, बात स्पष्ट ग्रहणीय प्रस्तुत कर पाता हूँ या नहीं....!!

      १- मानव नस्ल का काल खोज पर आधारित है, जिस काल के मानव अवशेष प्राप्त हुए, वहां तक आज निर्धारित किया गया. कल यदि इससे भी प्राचीन फोसिल्स मिलते है तो यह कालखण्ड दो लाख से बढ जाएगा. खोज अंतिम नहीं है. मैं दावे से तो नहीं कहता कि प्राचीन फोसिल्स मिलेंगे ही. अणु-परमाणुओं के भी घटन-विधटन की आयु होती है.सम्भव है उससे प्राचीन पत्थर चट्टानों का भी विखण्डन हो गया हो जिसमें से फोसिल्स मिलने की सम्भावनाएँ हो. अरावली पर्वत माला वस्तुतः करोडों साल पहले का लावा है जो लाखों साल पहले भूगर्भ में चला गया, लाखों साल भूगर्भ में रहा और कुछेक लाख साल पहले भूगर्भ से उमड कर पुनः पर्वत के रूप में उभर आया. ऐसे कितने ही विशाल स्तर के भू-परिवर्तन होते है. अणुओं के विखण्डित होकर बदलने के पूर्व के साक्ष्य अब कहां से प्राप्त होंगे.हमारी काल गणना का आधार आज उपलब्ध कर्बन डेटिंग है, यह विधि अनुमान आधारित है हम उसी परिपेक्ष्य की सीमा से बंधे है कल को यदि डेटिंग की फुल प्रुफ विधि विकसित हो जाय तो परिणामों में भारी अंतर आ सकता है.इसलिए वे कालखण्ड मात्र कल्पनाएँ नहीं है हमारे ज्ञान के संदर्भ में ही कल्पनाएँ भासती है.

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    6. २- लिपि की उत्पत्ति की कडियाँ भी लुप्त हो सकती है, साक्ष्यों का न मिलना किसी भी तत्व की नास्ति नहीं है. उसी तरह उत्थान पतन में कईं कडियाँ अप्राप्त या सम्पूर्ण लुप्त हो सकती है.हर शोध संशोधन अंतिम नहीं होती, अन्य शोध परिणामों को बदलती रहती है. सिंधुघाटी सभ्यता की खोज नहीं हुई थी तब तक शायद इजिप्त को ही मूल प्राचीन सभ्यता माना जा रहा था, खोजे होती रही और प्राचीनताएँ बदलती रही. कैसे गजब के निष्कर्ष है कि खोज के आधार पर मानव की उत्पत्ति का मूल स्थान तय किया गया, मानव का प्राचीनतम फोसिल शोध में अफ्रिका से मिला तो अफ्रिका को पूरी मानव नस्ल का उत्पत्ति स्थल निर्धारित कर दिया गया, यह तो संयोग मात्र है, कल कहीं और से मिले तो मानव का उत्पति स्थल बदल जाएगा.समुद्र में गरकाव हुए भूमि के टुकडे तो अभी भी बाकि है. वैसे ही पत्थर पर लिखी लिपि मिली तो हमने लिपि का काल निर्धारित कर दिया, शीघ्र नष्ट होने वाले पदार्थों पर लिखी गई होगी उसका क्या प्रमाण बचा है?

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    8. ३- सभ्यता व विकास को एक अनुपात में तय करते हुए हम अक्सर अन्य दृष्टिकोण इग्नोर कर देते है। प्राचीन शास्त्रों आदि में बिखरे जीवन विकास क्रम को सुक्ष्मता से देखने पर एक बात पर अनायास दृष्टिगोचर होता है कि प्रकृति के दोहन से विकास साधने मार्ग तब नहीं अपनाया गया। उस काल में नहरों से पानी लाने की बजाय लोग स्वयं विस्थापित होकर नदी किनारे आ बसते थे। वन विनाश नहीं होता था, आवश्यक्ता अनुसार सूखे वृक्षों का उपयोग होता, खनन, जलशोषण में विकास के नाम अति नहीं थी। कहने का अर्थ यही है कि उस समय का विकास मॉडल आज से सर्वथा भिन्न था। शायद उस काल के ज्ञानियों ने दूरदृष्टि से प्रकृति शोषण के भयंकर परिणाम जान लिए हो और प्रकृति शोषण से द्रूत विकास के मार्ग की अवहेलना करते हुए आत्म शक्तियों से भौतिक नहीं आत्म विकास के मार्ग का संधान करने का तरीका अपनाया हो (संदेहात्मक भाषा का प्रयोग कर रहा हूं क्योंकि कोई प्रमाण न मांगे कि ऐसा ही था तो आपने कैसे जाना :))
      वस्तुतः साधन सुविधा जिसे वर्तमान में विकास कहा जाता है आखिर तो सुख पाने की ही महत्वकांक्षा है। ज्ञानियों ने इस मर्म को समझ लिया, साधन सामग्री के क्षणिक व क्षय योग्य सुख को पहचान लिया, साथ ही मानव की अदम्य सुख आकांक्षा को भी समझा। जब सुख अन्तर से, मन से ही महसुस करना है तो भौतिक भ्रमणा में क्यों समय व्यर्थ किया जाय और क्यों न आत्मिक शक्तियों को ही बढाया जाय कि वे सुख महसुस करे। आत्मविश्वास और आत्मबल से सफलता पाना आज प्रमाणित हो चुका है। तो आत्मबल से संतुष्ट होकर सुख अनुभव करना क्यों नहीं हो सकता? अर्थात विकास का यह अभिन्न मार्ग हो सकता है जिसके बारे में आज हम कल्पना तक नहीं कर सकते। इसी से सम्भव हो सका कि उस समय बडे बडे बांध आदि निर्माण करने का सोचा तक नहीं, कुएं तक सीमित रहे हो और बृह्माँड के रहस्यों पर ज्ञान अर्जित कर लिया हो, क्योंकि ज्ञान अर्जित करने में संसाधनो का व्यर्थ नहीं होता। यह तो साधन बढते गए इसीलिए बडी उर्जा की आज आवश्यकता है, अन्यथा नियंत्रित और आवश्यक उर्जा के लिए पशु-शक्ति ही पर्याप्त थी। साधन हम कितने भी बढा लें, बढाते जाएं पर वह स्थिति कभी नहीं आती कि अब हम सभी तरह सुख के साधन से सम्पन्न हो गए अब कुछ भी शेष नहीं रहा। यह मृगतृष्णा है। जब ऐसे प्रमाद प्रेरक साधन बढेंगे तो ईंधन की खपत बढेगी ही बढेगी। शायद इस दुष्चक्र को वे पहले ही जानते थे, अतः आजका यह विकास मार्ग अपनाया ही नहीं और इस तरीके को ओवर टेक करते हुए सीधे सुख के समर्थ कारणों तक पहुंच बना ली।

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    9. ४- लोप नहीं होता यदि सुविधा भोग ने प्राथमिकताएं न बदल दी होती। जैसे आज ग्रंथो के अवलोकन में आपकी कोई रूचि नहीं, उपरी उपरी मिथक पढकर ही उसे सर्वथा अमान्य कर देते है ऐसी स्थितियाँ प्राचीन समय से ही बनती आई है। सहज परिस्थिति में भी मानव जाति सदैव रूचिप्रद कार्य ही करती आयी है फिर कोई आश्चर्य नहीं कि उसने पूर्वज उपार्जित ज्ञान को भुला दिया। फिर से पाषाण युग में तो नहीं गई किन्तु एक दो राहे से अपना मार्ग अवश्य बदल दिया है और वह मार्ग उँचाई पर जाता दिखते हुए भी निचाई की और जा रहा है।

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    10. ५- ग्रंथों के बारे में स्पष्ट उल्लेख है कि वे पहले श्रुत परम्परा से चलते थे। बहुत बादमें वे पुस्तकारूढ हुए तो क्या आश्चर्य अगर सवा पाँच हजार साल पहले लिखे गए किन्तु उसमें वर्णन लाखों साल पहले का श्रुत परम्परा से आया हो, और उन लाखों वर्ष में भी ज्ञानी महापुरूष तो हुए ही है वे विकृतियों से उसका पुनः उद्धार करते रहे। तथापि मेरा यह कहना नहीं है कि आज के ग्रंथ पत्थर पर लकीर के समान परिशुद्ध है, उनमें प्रक्षेपण तो हुआ ही होगा, लेकिन प्रक्षेपण के कारण हम उन्हें समूल अयोग्य नहीं ठहरा सकते। सिद्धांत आज भी उनमें मौजूद है, विवेक बुद्धि से असल और प्रक्षेपण में नीर-क्षीर किया जा सकता है।
      एक आरोप नास्तिकों पर मढने दीजिए :) ग्रंथों में यह प्रक्षेपण नास्तिकों द्वारा किया गया है। ज्ञानियों की वाणी में अंश मात्र भी परिवर्तन करना कुफ्र, अवज्ञा या मिथ्यात्व है। कोई आस्तिक ज्ञानियों की ऐसी अवज्ञा कर नहीं सकता, अतः यह जोडने घटाने या विकृत करने का काम आस्तिक दिखते किसी धर्माभासी नास्तिक का ही हो सकता है जिसके मन में ज्ञानियों की वाणी के प्रति कोई आदर न हो। सभी धर्मों में इस अवज्ञा के कृत्य को पाप माना गया है। किसी धर्म-आडम्बरी ने धर्म के नाम पर हिंसा कर दी होगी। लोगों में उसकी निंदा फैल रही होगी, ऐसे में उसने शास्त्रों में लिख मारा होगा "वैदिक हिंसा हिंसा न भवति" और भोले लोगों को बता कर साफ बच गया होगा। परिणाम स्वरूप धर्म के नाम पर हिंसा की परम्परा बन गई होगी। ग्रंथो के मुख्य रचनाकार तो बडे सावधान रहे होंगे, विकृति को प्रशय नहीं दिया होगा लेकिन बाद के हस्तलिखित प्रतिलिपिकार असावधानी कर सकते है या जानबूझ कर अपनी मान्यता अनुसार रंग भर सकते है या फिर अपनी मानसिकता अनुसार अर्थ सापेक्ष समझ एक शब्द गलत प्रयोग से अर्थ का अनर्थ होना सम्भव है। किन्तु प्रखर बुद्धिमान उन त्रृटियों को जान लेते है। आप सोच रहे होंगे कि अब कोई विद्वान इन त्रृटियों निकाल कर शास्त्रों को परिशुद्ध क्यों नहीं कर देता। वस्तुतः विद्वान बडे विनम्र होते है, अभिमान वश सुधार नहीं करते, वे भविष्य के विद्वानो पर भरोसा करते है कि वे अपनी विद्वत्ता अनुसार सुधार कर पढ लेंगे, विकार तो विकार किन्तु उपलब्ध मौलिक की यथास्थिति बनाए रखना चाहते है। दूसरे ऐसे घुसेडे गए क्षेपण के कारण ही कईं नए पंथ अस्तित्व में आ गए, अब वे भी नहीं चाहते कि वह क्षेपण दूर हो, क्योंकि ऐसा करने से तो उनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा और उनके पूर्वज मूर्ख माने जाएंगे। अतः यथास्थिति ही एक मात्र उपाय है, और सही भी है जिसे जो ग्रहण करना है करे, सत्य तो कभी न कभी पुकारेगा ही।

      (लम्बी लम्बी टिप्पणीयों के कारण भाषा और वाक्य शुद्धता की असावधानी हो गई है। कृपया आशय अनुसार सुधार कर पढें)

      हटाएं
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    "ज्ञानोपार्जन के लिए आज के मशीनी साधनो उपकरणो की सीमा में ही कल्पना करना व्यर्थ है. अंतस को तप संयम से शुद्ध करना, अनियंत्रित विचारों और कार्यों से अलिप्त अकिंचन बनना ताकि सारा ध्यान दिशा केंदित रहे, चिंतन, मनन, स्वाध्याय और सारे जगत को समझने का प्रयास, स्वयं को जानने का प्रयास आदि कईं तरीके हो सकते है."

    सुज्ञ जी,

    १- यदि कोई ज्ञानोपार्जन के लिए आज के मशीनी साधनो उपकरणो की सीमा में व्यर्थ कल्पना न करे. अंतस को तप संयम से शुद्ध करे, अनियंत्रित विचारों और कार्यों से अलिप्त अकिंचन बन जाये ताकि सारा ध्यान दिशा केंदित रहे, चिंतन, मनन, स्वाध्याय और सारे जगत को समझने का प्रयास करे, स्वयं को जानने का प्रयास करे... तो क्या उसे ज्ञान प्राप्ति हो जायेगी ? नहीं, कोई भी ज्ञान अवलोकन, प्रयोग व परिष्कार से मिलता है... समस्त जगत से स्वयं को काट मात्र चि्तन मनन करने से कल्पनायें नये आयाम लेंगी और उस दौर में वही हुआ लगता है...

    २- तपस्या, समाधि, प्राणायाम आदि आदि के दौरान हाइपोग्लाईसीमिया, हाईपोक्सिया व हाईपरऑक्सिया होने के कारण मस्तिष्क कुछ अलग तरीके से रियेक्ट करता है... इन्हीं अनुभवों का चरमानन्द-परमानन्द, परम शक्ति से एकाकार होना आदि आदि कह गुणगान कर दिया गया...



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    1. प्रवीण जी,
      ज्ञान प्रयोगों का ही मोहताज नहीं है। जैसे कोई गणित की पहेली रखे और मन ही मन चिंतन से उस पहेली का हल सम्भव है, दूसरों के अनुभव को पढना और पढकर सोच कर ही उपयुक्त निष्कर्ष निकालना आम है। लेखक सोचते सोचते बहुत बडे लेख लिख जाते है, एक दम मौलिक विचार निकाल लाते है अवलोकन और परिष्कार चिंतन मनन के ही रूप है। अन्तर्मुख चिंतन मनन जगत से स्वयं को काटना नहीं है, बल्कि चिंतन से जगत के क्रिया क्लापो की वास्त्विकता समझना है। और ऐसा करने के लिए हिमालय की एकांत गुफाओं में जाना नहीं है।

      जारी………

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    2. कल्पनाएँ तो उछ्रँखल प्रवृति में और चंचल मन से उपजती है ध्यान मनन आदि से नहीं!! चरमानंद परमानंद विक्षिप्तों को नहीं हुआ करता. हमें लगता है इन विक्षिप्तों को कोई तनाव नहीं अतः आनंद में होंगे, किंतु वे किसी आनंद को महसुस नहीं करते.

      ध्यान और मेडिटेशन को अब मनोविज्ञान प्राथमिकता से मानने लगा है.इसे सफलता का मूल कारक माना जाने लगा है. विद्यार्थियों को अथक अध्ययन के लिए ध्यान की सलाह दी जाती है, एकाग्रता का महत्व सुस्थापित है. ध्यान विचारों के भट्काव को रोकने में समर्थ है अतः ध्यान मनन मनोमंथन मिथ्या कल्पनाओं को लगाम देने में समर्थ है.उलट चंचल मनके घोडों पर नियंत्रण स्थापित करती है.

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    @ सुज्ञ जी,

    अगाध आस्था के साथ यही दिक्कत है कि उसका आसरा लेने पर तर्क पीछे छूट जाता है या दरकिनार कर दिया जाता है...

    आप जो स्थापनायें कर रहे हैं, उनसे आज का कोई भी भाषाविद्, भारतविद्,मानवविज्ञानी, पुरातत्वविद्, जीवाश्मशास्त्री सहमत नहीं होगा... २६ लाख पहले के पुरापाषाण युग के मानव से आज के मानव तक की इस यात्रा को जानने के लिये हजारों खुदाईयाँ हो चुकी हैं ... http://humanorigins.si.edu/evidence/behavior/tools

    ७० लाख साल पहले के कपियों से आज के इस बुद्धिमान महाकपि की यात्रा के सारे पड़ाव ज्ञात हैं... http://humanorigins.si.edu/evidence/human-fossils/species

    किसी भी भाषाविद् से पूछें तो बतायेगा कि किसी भी भाषा के लिये कुछ सौ साल कितना बदलाव ले आते हैं... विक्टोरियन अंग्रेजी और आज की अंग्रेजी और भारतेन्दु हरिश्चंद्र की हिन्दी और आज की हिन्दी के बीच का फर्क ही देखिये... और आप स्थापना दे रहे हैं कि ग्रंथ लाखों करोड़ों वर्ष श्रुत परंपरा में जीवित रहे...

    हमें इतिहास व मिथकों के बीच के भेद को समझना होगा... मिथक और सभ्यताओं में भी हैं पर वे लोग अब अपने मिथकों को सीने से चिपटाये नहीं घूमते...

    क्या आप मानते हैं कि ग्रंथों में बताये तरीके से मंत्रोच्चार कर यज्ञ करने से आज भी यज्ञाग्नि से मानव, अस्त्र, विमान व अनेक चीजें उत्पन्न हो जायेंगी... या कोई तपस्वी हाथ में गंगाजल ले श्राप दे किसी को भी पत्थर, कुत्ता, राक्षस आदि आदि बना देगा...

    एक कल्पनालोक में रहने पर और हमारे आज के ज्ञान व उपलब्धियों को दरकिनार करने से हमें कुछ नहीं मिलना... दुनिया उस को मानती है जिसके पास आज सामर्थ्य व बल है, न कि उसको जो कहता फिरता है ' मेरी हथेली सूँघो, मेरे परदादा ने भरपेट घी खाया था'... :)



    ...

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    1. @ अगाध आस्था के साथ यही दिक्कत है कि उसका आसरा लेने पर तर्क पीछे छूट जाता है या दरकिनार कर दिया जाता है...

      प्रवीण जी,

      आपसे सौ प्रतिशत सहमत!! सहमत क्या मैं भी यही कहना चाहता था। वैज्ञानिको के अनवरत जारी संशोधनो के किसी एक पडाव पर पत्थर की लकीर की भांति अंध आस्था में आबद्ध हो जाने से दृष्टिकोण एकांगी हो जाता है। और फिर सारे तर्क भी एकांगी हो जाते है।

      मैं और मेरे जैसे अन्य जो भिन्न भिन्न दृष्टिकोण पर सम्यक विचार करते है, एक ही दृष्टिकोण से विचारों को जकड कर बंध नहीं रखते। देख लीजिए वैज्ञानिकों के आज तक के संशोधनों को, वर्तमान विकास को कहीं भी झूठलाया नहीं गया है। जो है सो है, जो घटा सो घटा, आधुनिक विकास आंखों के सामने है सो है। जो यथार्थ है उसे मात्र यथार्थ अस्तित्व की तरह माना जाता है। ज्ञान के वर्तमान मॉडल की उपलब्धियों को दरकिनार करने का सवाल ही नहीं उठता। भिन्न भिन्न दृष्टिकोण किसी न किसी अपेक्षा विशेष से सम्बद्ध होते है, एक दृष्टिकोण की भी अवहेलना करने से कथन असत्य हो जाता है।

      मैं कोई स्थापनाएं नहीं दे रहा, इसीलिए मैने अनिश्चयात्मक भाषा का प्रयोग किया है। क्योंकि कभी कभी बात कितनी भी सही हो, अंश रूप में भी अन्य सम्भावनाएं मौजूद रहती है। इसलिए निर्णायक निष्कर्ष नहीं उछाले जाते। इसीलिए यह कोई स्थापनाएं नहीं है, लेकिन आप स्थापना अवश्य दे रहे हैं कि हजारों खुदाईयाँ हो चुकी, अन्तिम खुदाई भी हो चुकी और अब इस विषय में आगे संशोधन की आवश्यकता नहीं है और यह अन्तिम निर्णय है। लेकिन कोई भी निष्ठावान विज्ञानी चाहे वह भाषाविद्, मानवविज्ञानी, पुरातत्वविद्, या जीवाश्मशास्त्री हो वह जारी संशोधनों में 'अबतक प्राप्य' तो कह सकता है किन्तु 'अन्तिम निर्णायक' बिलकुल नहीं कह सकता। भाषा में बदलाव अवश्यम्भावी है, ऐसा किसने कहा कि यही भाषा लाखों करोड़ों वर्ष से जारी रही? जैसे गीता के आज हिन्दी वर्जन प्रचलित है, उसी तरह युगान्तर या वर्षान्तर में श्रुत परंपरा में भी ज्ञानियों द्वारा लोकभोग्य भाषा में वर्जन निरंतर अनुवादित रीति से सम्भव है। आपने ही कहा था कि "कोई भी जीव जाति अपने उपार्जित ज्ञान को एकदम भुला नहीं देती" विकार आ सकते है स्वरूप बदल सकते है सुनाने का तरीका बदल सकता है लिकिन इसके अस्तित्व के बचे रहने में क्या आश्चर्य? और हम यह न भूलें कि इतने विशाल काल के मध्य विद्वानों का सर्वथा अकाल ही पड गया था, संत विद्वान ज्ञानी होते रहे हैं और ज्ञान का संरक्षण सम्वर्धन करते रहे है। और ऐसा होने में कोई अतिश्योक्ति भी नहीं।

      अन्य सभ्यताओं के भी मिथक थे किन्तु अल्प प्राचीन, उन सभ्यताओं ने अपने अपने मिथकों से गांव नगर के स्थल खोज निकाले, वे उन मिथकों की कल्पनाओं की बहस बाजी में पडे ही नहीं, वे बेहतर समझते थे वर्णन में अतिश्योक्ति होती ही है, बढती भी जाती है पर मूल बात सुरक्षित है तो बस, अपने को उसी से काम। धर्म व ज्ञान की हमेशा दो शाखाएं रही है, दर्शन व अध्यात्म और कथा साहित्य, जो विद्वान जिज्ञासु होते है वे सीधे दर्शन व अध्यात्म का सहारा लेते है, जो सरल सामान्य लोग है कथा साहित्य का अवलम्बन लेकर कर्तव्य समझते है। इसलिए मिथकों का मूल उद्देश्य कर्तव्यों और सदाचार की प्रेरणा देना है। बाकि की अतिश्योक्तियों, या आज के संदर्भ में उसे न समझ पाने, या वाकई कल्पना होने मात्र के लिए इन्हें सिरे से खारिज करना तो अविवेक है, उनमें जो आचार और जीवन मूल्यों व कर्तव्य पर उपदेश है उन्हे ग्रहण करना चाहिए। उनके सार्थक उद्देश्यों पर सीमित रहने में ही भलाई है। मिथकों की प्रेरणा को सीने से चिपटाये रखना संरक्षण है, यदि कल्पना के नाम व्यर्थ समझ नष्ट हो जाने दिया तो लुप्त ही होगा न? फिर नैतिक कर्तव्य को जानने समझने और उपयोग में लेने की आवश्यकता पडी तो कहां खोजेंगे?

      मानने वालों के तो आस्था का केन्द्र ईश्वर है। किन्तु न मानने वालों की एकांत अंधभक्ति के प्रभु वैज्ञानिक कैसे हो गए? उन पर हक कैसे जमा लिया? जबकि वैज्ञानिकों ने कहीं भी घोषणा नहीं की कि हम मात्र नास्तिकों के ही आस्था केन्द्र है :)

      दुनिया उस को मानती है जिसके पास आज सामर्थ्य व बल है, न कि उसको जो कहता फिरता है ' मेरी हथेली सूँघो, मेरे परदादा ने भरपेट घी खाया था'... :)

      प्रवीण जी,

      आपकी बात सही है, दुनिया उस को मानती है जिसके पास आज सामर्थ्य व बल है, मात्र कहते फिरने वाले प्रवंचक ही तो है, आविष्कार संशोधन वैज्ञानिकों ने किया, वे ही समर्थ और ज्ञानवान है उन सबल विद्वानो के किये धरे को कहते फिरना भी, 'भूखे ही मूंछ पर चावल चिपका कर खाते पीते महनतकश समुदाय का दिखाने का प्रपंच नहीं है?' :)

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    2. आपका यह प्रश्न रह गया था.....

      @क्या आप मानते हैं कि ग्रंथों में बताये तरीके से मंत्रोच्चार कर यज्ञ करने से आज भी यज्ञाग्नि से मानव, अस्त्र, विमान व अनेक चीजें उत्पन्न हो जायेंगी... या कोई तपस्वी हाथ में गंगाजल ले श्राप दे किसी को भी पत्थर, कुत्ता, राक्षस आदि आदि बना देगा...

      'आज भी' के संदर्भ में बिलकुल नहीं मानता. क्योंकि कुछ तो काल प्रभाव से और कुछ मिथ्यात्व की अधिकता के कारण व्यक्ति का अंतःकरण पूर्णतया परिशुद्ध,क्षमावंत, मार्दव, आर्जव, विमुक्त, तप, संयम, सत्य, निर्मलता,अकिंचनत्व, निष्काम आदि का अभाव है. आज के दौर में इंद्रिय विषयों में आकंठ डूबे व्यक्तियों की आत्मा शुद्ध रहना असम्भव है और अशुद्ध आत्मा से ऐसी महान विद्याएँ या लब्धि उपार्जित होना भी दुष्कर, दुर्लभ है.ऐसे में 'आज भी' कोई ऐसी विद्याओं के उत्पन्न होने का दावा कोई करता है तो या तो वह पाखण्डी है अथवा शीघ्र मतिभ्रम में चला जाने वाला होता है. मैँ बिलकुल नहीं मानता आज किसी को भी ऐसी प्राप्तियां सम्भव है.

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      @ सुज्ञ जी,

      'आज भी' के संदर्भ में बिलकुल नहीं मानता. क्योंकि कुछ तो काल प्रभाव से और कुछ मिथ्यात्व की अधिकता के कारण व्यक्ति का अंतःकरण पूर्णतया परिशुद्ध,क्षमावंत, मार्दव, आर्जव, विमुक्त, तप, संयम, सत्य, निर्मलता,अकिंचनत्व, निष्काम आदि का अभाव है. आज के दौर में इंद्रिय विषयों में आकंठ डूबे व्यक्तियों की आत्मा शुद्ध रहना असम्भव है और अशुद्ध आत्मा से ऐसी महान विद्याएँ या लब्धि उपार्जित होना भी दुष्कर, दुर्लभ है.ऐसे में 'आज भी' कोई ऐसी विद्याओं के उत्पन्न होने का दावा कोई करता है तो या तो वह पाखण्डी है अथवा शीघ्र मतिभ्रम में चला जाने वाला होता है. मैँ बिलकुल नहीं मानता आज किसी को भी ऐसी प्राप्तियां सम्भव है.

      इसका एक सीधा अर्थ यह निकलता है कि आप मानते हैं कि प्राचीन काल में जब व्यक्ति का अंतःकरण पूर्णतया परिशुद्ध,क्षमावंत, मार्दव, आर्जव, विमुक्त, तप, संयम, सत्य, निर्मलता,अकिंचनत्व, निष्काम आदि आदि रहता होगा तो मंत्रोच्चार कर यज्ञ में आहुतियाँ देने से तमाम तरह की चीजें जैसे अस्त्र-शस्त्र, विमान, मानव, महान विद्याएँ या लब्धि आदि आदि अग्नि से प्रकट हो जाते थे... आज हम कम से कम इतना तो जानते ही हैं कि यह असंभव है... आत्मा भले ही पूर्णत: शुद्ध हो, अग्नि आहुतियों को तो फूंक देगी पर कुछ बनाकर निकालना उसके बस का नहीं... :)



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    4. आपके दृष्टि केन्द्रित तर्क भी गजब के है :) आज के संदर्भ में नहीं मानते उसका अर्थ मात्र यही है कि प्राचीन काल में, मैं कहुं उसे आप मानते हैं। :)

      काला नहीं है तो उसका अर्थ सफेद ही है? :)ऐसा एकांगी दृष्टिकोण कैसे हो सकता है। बीच में अनेक रंगो और अनेक शेड की सम्भावनाएं है। और प्रथम दृष्टि सफेद लगता रंग भी सभी रंगो का संयोजन हो सकता है। आपके तर्क घोडे ठीक उस प्रकार दौडते है जिस प्रकार दाएं बाएं न देख पाने की पट्टी लगा घोडा दौडता है सीधे सरपट्… लेकिन तर्क तभी प्रभावी होते है जब दाएं बाएं सभी दृ्ष्टिकोण पर विचार करने के बाद प्रस्तुत किए जाय।

      प्राचीन वास्तविकताओं पर निश्चय से कहने के लिए इसलिए बचा जाता है कि जो अज्ञात है वह अज्ञात ही है, येन केन अनुमानों के आधार पर निर्णय दे देना, कल को मिथ्या साबित हो सकता है। और ऐसा करना उस ज्ञान के साथ खिलवाड का बहुत बडा अपराध होगा। और बिना साक्ष्य के खारिज करना भी महान ज्ञान की अवहेलना होगा। तीसरे अपने अर्थ निकालना भी ज्ञान के साथ अपकृत्य है। इसलिए अज्ञात पर जबरन ज्ञानवान बनना उचित नहीं है। ऐसे किसी अज्ञात पर विचारणा करते हुए, "ऐसा होता था" कि जगह "ऐसा हो सकता है" प्रयोग उपयुक्त है।

      हमारे लिए अज्ञात है कि 'यज्ञ' 'मंत्र' 'आहुतियाँ' 'अग्नी' भौतिक है या गूढ सांकेतिक। यह दुरूपयोग करने वालों से बचने के लिए कोडिग की तरह प्रस्तुत कार्यविधि तो नहीं है, क्या कोई ऐसा उल्लेख लुप्त तो नहीं है जो इन उल्लेखों का सहयोगी उल्लेख था, क्या ऐसे किसी उल्लेख को न समझ पाने से आगे जाकर किसी ने क्षेपण कर, विकार को जन्म दे दिया हो। ऐसा भी हो सकता है किसी अल्पज्ञानी ने क्रियाकाण्ड का रूप दे दिया हो। बहुत सी सम्भावनाएं है, अज्ञात पर तो प्रत्येक दृष्टि से विचार करना जरूरी है।

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    5. सुज्ञ जी आपकी इस बात से याद आई उपनिषद गंगा में कही गयी ये बात ...

      मनुष्य के खोजी मन ने, उस असीमित को, कभी शब्दों में वयक्त करने का प्रयत्न किया, कभी शिल्पों में, और कभी चित्रों में ! और वह अभिव्यक्ति, उसके गुणों की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति रही ! प्रतीकों और चित्रों में गुण अर्थ छिपे होते है ! जैसे शेष नाग की शैय्या में लेटे, भगवान विष्णु का क्या अर्थ है ?
      संस्कृत भाषा में, शेष का एक अर्थ होता है, जो सब कुछ समाप्त हो जाने के बाद भी शेष रहे ! जिसे हम दूसरे अर्थो में समय भी कह सकते हैं ! वह, जो सब कुछ समाप्त हो जाने के बाद भी शेष रहता है ! यानि समय की शय्या पर विष्णु विराजमान है ! इसका अर्थ ये हुआ, सब कुछ समाप्त हो जाने के बाद भी, जो शेष रह जाय, उसमे विष्णु अवस्थित हैं ! इसलिए प्रतीकों, चिन्हों, और चमत्कारी कथाओं का आशय समझो, न कि, उनके स्थूल रूप को ही सत्य मान बैठो ! और उन प्रतीकों को समझने के लिए आवश्यक है, पहले वेदांत को समझा जाए


      उपनिषद् गंगा-३८

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  20. Nastikon ke blog par huyi charcha se ek chintaajanak trend dekhne ko mila

    Logon me likhe huye ko samajh paane ki kshmata kam ho rahee hai

    Log savaal poochne ko aur proof maangne ko hi AKLMAND hone ki pehchaan maanane lage hain

    Charcha me tameej se pesh aanaa bhool gaye hain

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  21. ताज्जुब है वह है नहीं फिर भी आपको इतनी सारी पोस्टें यह कहने के लिए लिखनी :पडीं :-)

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  22. नास्तिकों के ब्लॉग पर तो मैं कहता कुछ और हूँ और लेखक मान कुछ और लेते हैं।फिर जवाब दिया है उम्मीद है इस बार कोई गहतफहमी नहीं होगी।खैर यहाँ वाले विषय पर बात करते हैं।ये जो हम बार बार कहते रहते हैं कि आस्था के मामले में तर्क पीछे छूट जाता है यह हमेशा सही नहीं है।तार्किक तो आस्तिक भी खूब होते हैं।प्रश्न(ईश्वर को लेकर) उनके भी मन में उठते हैं वे उनका जवाब भी जानते हैं।पर उसे स्वीकार नहीं करना चाहते।ऐसा करते हुए उन्हें दुख होता है कि ईश्वर जो हमारा नायक है जिसे हम अपना सहारा समझते रहे वह वास्तव में कहीं है ही नहीं।या कही 'इश्वर का अस्तित्व नहीं है' ये न मानने के पीछे यह कारण तो नहीं कि ऐसा मानते ही यह बात भी सत्य हो जाएगी कि ईश्वर के नाम पर हमें झाँसा दिया गया और हम झाँसे में आ भी गए।
    दरअसल नास्तिकों को ये मानने के लिए कुछ खास तर्क वर्क करने की जरूरत नहीं कि ईश्वर नहीं है उनके लिए यह बात सहज है यह मेहनत तो आस्तिकों को करनी पड़ती है।ये अलग बात है कि वो भी बस खुद के मन को समझाने के लिए होते है जैसे ये कहना कि गंध को किसीने देखा नहीं फिर भी इसका अस्तित्व सभी ने माना ही है।

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      @ तार्किक तो आस्तिक भी खूब होते हैं।प्रश्न(ईश्वर को लेकर) उनके भी मन में उठते हैं वे उनका जवाब भी जानते हैं।पर उसे स्वीकार नहीं करना चाहते।ऐसा करते हुए उन्हें दुख होता है कि ईश्वर जो हमारा नायक है जिसे हम अपना सहारा समझते रहे वह वास्तव में कहीं है ही नहीं।या कही 'इश्वर का अस्तित्व नहीं है' ये न मानने के पीछे यह कारण तो नहीं कि ऐसा मानते ही यह बात भी सत्य हो जाएगी कि ईश्वर के नाम पर हमें झाँसा दिया गया और हम झाँसे में आ भी गए।

      ... :)

      धन्यवाद मित्र ! दरअसल अब तक खुद के छले जाने की यह स्वीकारोक्ति ही सबसे बड़ी अड़चन है... इंसान स्वीकार ही नहीं करना चाहता कि यह अभी तक जो एक ही वाक्य का बार बार उच्चारण किया, उल्टी सीधी साँसे लीं/रोकी, घंटे बजाये, खाने को आग में फूंका, दिन के कई कई घंटे सदियों पहले लिखे कुछ को बार बार पढ़ने, कतारों में लगे दर्शन करने या उस के आगे झुकने, माँगने, गिड़गिड़ाने, उसकी पूजा करने, इगो मसाज करने में बरबाद कर दिये... वह सब एक छलावे के चलते किया गया... क्या किया जाये... हर इंसान बहादुर नहीं होता न... :)


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    2. @दरअसल अब तक खुद के छले जाने की यह स्वीकारोक्ति ही सबसे बड़ी अड़चन है

      अपनी अपनी सोच और निष्कर्ष है दोस्त । मुझे सच में अगर ऐसा लगता की इश्वर जैसा कुछ नहीं है तो इस बात को मानने और लोगों को बताने में मुझे कोई परेशानी नहीं होती ..

      वैसे अब तो लगने लगा है की आस्तिक होना सच में बहादुरी का ही काम है .. क्योंकि पिछले कुछ समय में रेशनलिस्ट ( अध्ययन से चिढने वाले ) मित्रों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है .. सबसे ख़ास बात ये है की ये सभी मित्र तार्किक होते हैं :)

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    3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    4. @कहीं 'इश्वर का अस्तित्व नहीं है' ये न मानने के पीछे यह कारण तो नहीं कि ऐसा मानते ही यह बात भी सत्य हो जाएगी कि ईश्वर के नाम पर हमें झाँसा दिया गया और हम झाँसे में आ भी गए।

      राजन जी,

      नहीं,नहीं, राजन जी ऐसा बचकाना कारण कैसे हो सकता है? मानलो कल को यह सिद्ध हो जाए कि ईश्वर नहीं है, तब भी मानने वाले तो उसके 'निराकार' स्वरूप और 'परम् सत्य' स्वरूप को मानते ही है। वह साकार सिद्ध न भी हुआ, सिद्ध कर लिया गया कि सब कुछ प्राकृतिक उर्जा व सिद्धांतो से नियमित चल रहा है तब भी सत्य तो मानने वालों के पक्ष में ही रहेगा। क्योंकि उन्होने 'निराकार' और उसे 'परम् सत्य' कहा ही है। अतः उन्हें कभी मलाल नहीं होगा कि वे झाँसे में आए या छले गए। और 'उसे' मानकर, जो 'उसके' उपदेश ग्रहण किए। जो मन वचन काया से सदाचार अपना लिए है वे तो उसके जीवन को उत्कृष्ट ही बानाएंगे, उसका जीवन शान्त सदाचारी सहिष्णु बनेगा। भला ऐसा जीवन पाकर कोई क्यों महसुस करेगा कि वह छला गया या झांसे में रहा।

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  23. अब गंध एक क्षेत्र विशेष में फैली है चाहे अच्छी हो या बुरी महसूस सभी को ही होगी उस एरिया में।पर ईश्वर के मामले में ऐसा नहीं है उसे आजतक किसीने महसूस नहीं किया ये अलग बात है कि कुछ ढोंगी खुद को ही ईश्वर बताते है।पर पता क्यों समझदार आस्तिक जिन तर्कों के खोखलेपन को जानते है उन्हें ही ईश्वर के बचाव में क्यों प्रयोग करते है।मैं तो कहूँगा कि मेरे प्यारे और अच्छे वाले तार्किक आस्तिक मित्रों आप जो मन ही मन जानते हैं उसे स्वीकार क्यों नहीं कर लेते।हमें पता है आपको ईश्वर की कोई जरूरत नहीं यदि उसका भ्रम नहीं भी होता तब भी आप उतने ही अच्छे और बहादुर होते जितने अभी हैं।

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  24. लम्बी बहस दिखती है, बिना पढ़े जा रहा हूँ..मौका मिला तो पढ़ूँगा कभी छुट्टियों में।

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  25. आस्तिक कर्म करते जाएं और फल को ईश्‍वर के भरोसे छोड दें ....
    नास्तिक कर्म करते जाएं और फल को अपने भरोसे रखें रहें .....
    दोनो को फल एक जैसे ही मिलेंगे, कुछ सफल कुछ असफल ...
    क्‍योंकि प्रकृति में संतुलन बनाए रखने की योग्‍यता है ...
    .
    बेकार में लडने की कोई आवश्‍यकता नहीं ....
    कर्म तो सबको करने ही होंगे ....

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