गुरुवार, 9 मई 2013

चला जाये क्या ?

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हमने अबतक
बहुत अपनी
बकवास की

मन भर के 
हर किसी से
झगड़  लिये

जो कहना था
किसी को भी
कह चुके

बेलाग बेखौफ
सुनाना था जो
सुना दिया

सुनाने वाले
सबकी हमने
दिल से सुनी

कहीं किसी को
फर्क तो कोई
पड़ता नहीं

दुनिया वही
पहले जैसी
चलती रही

अपनी बकबक
अब खुद ही को
चुभने लगी

कुछ रूककर
सुस्ताकर भी
देख लिया

इस डेरे में 
पहले सा मजा
आता नहीं

कई दूर ठिकाने
अन्देखे अन्जाने
बुला रहे

तामजाम अपना
फैलाया नहीं था
हमने कभी

समेटने में उसे
वक्त लगेगा
बिल्कुल नहीं

अब...
चला जाये क्या ?











...






29 टिप्‍पणियां:

  1. आपने लिखा....
    हमने पढ़ा....
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए शनिवार 11/05/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    पर लिंक की जाएगी.
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. अपने प्रयासों का दूसरों पर फ़र्क न पड़ने से निराश या खिन्न होकर जाने की सोची है तो हमारी नजर में यह पलायन है।
    और अगर यहाँ और वहाँ की प्राथमिकताओं के आधार पर रहने या जाने का चुनाव करना है तो फ़ैसला आपका। रुकिये, सोचिये और फ़ैसला ले लीजिये।

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    उत्तर
    1. .
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      .
      संजय जी,

      उत्तर नीचे दिये दे रहा हूँ...

      ...

      हटाएं
    2. आशानुरूप प्रवीण भाई, मालूम था आप निराश नहीं करेंगे।

      हटाएं
  3. फ़र्क़ पड़े तो उसका दिखना ज़रूरी नहीं है.

    नर हो न निराश करो मन को.

    न अपने मन को और न दुसरे के मन को.

    जाना चाहते हैं तो चुपचाप निकल लीजिये जनाब.
    पूछेंगे तो कौन भला एक कम होने देगा.

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    उत्तर
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      .
      प्रिय जमाल साहब,

      मेरा जवाब नीचे है...


      ...

      हटाएं
  4. धोखा ...
    अकेले अकेले कहाँ जा रहे हो ..??

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    उत्तर
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      कहीं नहीं...

      नीचे देखिये न...


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      हटाएं
  5. सर जी,
    जब यहाँ आने से पहले किसीसे पूछा नहीं तो जाते समय क्यों पूछ रहे हैं? वही कीजिए जो आपका मन करे ।आपकी वैसे आदत भी यही है।हाँ निजी रूप से मैं नहीं चाहूँगा कि आप यहाँ से जाएँ।आपको पढ़ना हमें अच्छा लगता है।और ये बात कई बार सुनी है कि यहाँ लिखते रहने से कुछ बदल नहीं जाता।पर सच ये है कि इस बदलाव को मापने का कोई पैमाना नहीं होता कि कितना और कैसा बदलाव आ रहा है पर आता जरूर है।सब बस इस टाईम और स्पेस में अपनी बात रख रहे हैं।यहाँ पर तो यही कहा जा सकता है कि कर्म किए जाओ फल की परवाह(इच्छा नहीं) मत करो।

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    उत्तर
    1. .
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      प्रिय राजन,

      आप भी नीचे देखिये...


      ...

      हटाएं
  6. अरे नहीं ! बिल्कुल भी नहीं !

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  7. अभी रुकिए ,अपरिहार्य ही हो गया गया तो साथ चलेगें -साथ मत छोडिये !

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    उत्तर
    1. .
      .
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      रूके हैं सर जी, नीचे देखिये न...


      ...

      हटाएं
  8. .
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    सभी से,

    पूरा मामला समझने के लिये आपको पृष्ठभूमि समझनी होगी... कॉलेज के दिनों का एक पक्का दोस्त आया मिलने कई बरस बाद... हम साथ बैठे कई घंटे, खाया पिया, खूब जम कर एक दूसरे को गरियाया, पुरानी बातें याद कीं, गिले-शिकवे-शिकायतें सुलझाये, किसी खास मौके पर हम में से किसी ने कुछ अलग सा क्यों बिहेव किया था इसका स्पष्टीकरण लिया... कुल मिलाकर खूब मजा लिया हमने... पर जो बात मुझे स्ट्राईक की वह यह कि कई कई बार वह बोला 'तुझसे मिलना था, मिल लिया, अब चला जाये क्या' या 'साले बहुत मन था तुझे गरियाने का, जी भर गरिया लिया, अब चला जाये क्या'... यानी आखिरी के दो तीन घंटों में उसने कई कई बार बोला 'अब चला जाये क्या'...

    यही 'अब, चला जाये क्या' कुछ इस तरह से मन-अवचेतन पर हावी हो गया कि कल ऑफिस जाने से पहले के चंद मिनटों में यह पोस्ट बन पड़ी... यह एक तरह का आत्मालाप सा है... पर मेरे लेखन की कमियों व सीमाओं के चलते पाठक को लग रहा है कि उससे पूछा जा रहा है... कुल मिला कर संप्रेषण में कमी रह गयी है मेरी ओर से... :(

    पर ब्लॉगिंग की ताकत भी यहाँ दिखती है...

    वाणी जी, संजय जी, अनवर जमाल जी, सतीश सक्सेना जी, अली सैयद जी और अरविन्द मिश्र जी आपके स्नेह का आभारी हूँ...

    प्रिय राजन, निश्चित तौर पर मैं किसी से पूछ यहाँ नहीं आया था, जब जाना होगा, तब भी वही करूंगा, फिलहाल तो ऐसा विचार नहीं है... तुकबंदी भले ही ऐसा आभास दे रही हो... :)

    Rachna ji,
    I wholeheartedly appreciate your feelings and thank you... But at present I am not ready to bid bye-bye to you or anybody else... tolerate me for some more time, like you have done till now... :)



    ...

    उत्तर देंहटाएं
  9. well well. nice that i read this now, along with ur comment.

    this IS a temporary world anyway :)

    welcome back :)

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  10. कल दिन में आपकी पोस्ट देखि सोचा शाम को घर से आराम से टिपण्णी करूँगा पर घर का नेट काम नहीं कर रहा था। अभी आपका उत्तर पढ़ कर राहत मिली। पर कल जो विचार मन में थे उन्हें भविष्य के सभी "चला जाय क्या ?" की घोषणा करने वाले ब्लॉगर मित्रों के लिए अभी यहीं लिख देना चाहता हूँ।
    मुझे लगता है की ब्लॉग्गिंग को कभी अलविदा कह देने की जरुरत ही नहीं है। ये हमें अलविदा कह दे तो अलग बात है। यह इतना सुविधाजनक मंच है। बिना किसी हिचक और लाग लपेट के हम चार लोगों से अपने मन की उलजलूल बातें बाट सकते हैं। दो चार टिप्पणिया प्राप्त कर अपनी बात सुने जाने का अहसास ले सकते हैं। सोचिये अपने मेरी पिछली पोस्ट पर जो टिपण्णी दी वो कहीं आप चार अनजान लोगों के बीच में इतनी आसानी से दे सकते थे। चलिए आप दे सकते थे पर क्या समलैंगिकता से जुड़े किसी मुद्दे पर हो रहे किसी विचार विमर्श में कोई महिला भाग ले सकती है और अगर हिस्सेदारी कर भी ले तो क्या खुल कर अपनी बात कह सकती है। मुझे नहीं लगता की वर्तमान में ये संभव है। तो मेरे हिसाब से ब्लॉग्गिंग ने इतनी सुविधा तो दी है। अभी कल बी बी सी पर पढ़ा था की बांग्लादेश में ब्लॉगर ने इस्लाम को टक्कर दी। सोचिये अब तो ब्लॉगर क्रांति भी कर रहे हैं। तो साहब इसे जारी रखें। ये अच्छी चीज है। हाँ इस सब से जब कभी मन उब जाय या अशांत हो या समय ना मिल रहा हो तो चुप चाप एक छोटा सा ब्रेक ले लें। फिर जब अच्छा लगे तो दुबारा शुरू कर दें। चल देने की घोषणा करके कुछ नहीं मिलना।

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  11. :-) अच्छा लगा यह संस्मरण -मेरा भी एक ऐसा ही कुछ संस्मरण है -मगर अभी ब्लाग्गिंग को आपकी जरुरत है !

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  12. जब तक मन में कुछ शेष है, कहने को,
    जब तक व्यापित क्लेश है, सहने को,
    जब तक छिद्रमयी विश्व, रह रह कर रिसता है,
    जब तक सत्य अकेला, विष पाटों में पिसता है,

    तब तक छोड़ एक भी पग नहीं जाना है,
    समक्ष, प्रस्तुत, होने का धर्म निभाना है,
    उद्धतमना, अवशेष यदि किञ्चित बलम्,
    गुञ्जित इदम्, न दैन्यं, न पलायनम्।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
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      जब तक मन में कुछ शेष है, कहने को,
      जब तक व्यापित क्लेश है, सहने को,
      जब तक छिद्रमयी विश्व, रह रह कर रिसता है,
      जब तक सत्य अकेला, विष पाटों में पिसता है,

      तब तक छोड़ एक भी पग नहीं जाना है,
      समक्ष, प्रस्तुत, होने का धर्म निभाना है,
      उद्धतमना, अवशेष यदि किञ्चित बलम्,
      गुञ्जित इदम्, न दैन्यं, न पलायनम्।


      प्रवीण पान्डेय जी,
      शानदार !
      आपने तो बहुत बहुत जोश से भर दिया... आभार आपका...


      ...

      हटाएं

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