मंगलवार, 7 मई 2013

किम आश्चर्यम् ?

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आजकल खबरें आपको परेशान नहीं करतीं... वे अपनी शॉक-वैल्यू खो चुकी हैं... यह एक ऐसा दौर है जिसमें हमारे पतन की कोई सीमा नहीं है... कहीं भी, किसी के द्वारा भी, कैसा भी और कुछ भी संभव है... लगभग हर चीज बिकाऊ है और बिकाऊ दिख भी रही है...

पवन बंसल जी यूपीए की सरकार में एक साफ और बेदाग छवि के भरोसेमंद और काबिल नेता के तौर पर जाने जाते रहे हैं... उनका भांजा रेल मंत्रालय से होने वाली नियुक्ति और प्रमोशन के बदले लंबी चौड़ी घूस लेते सीबीआई के हाथों पकड़ा गया है... पवन बंसल कसूरवार साबित हो सकते हैं और यह भी हो ही सकता है कि जाँच के बाद यह पता चले कि पवन बंसल इस मामले में शामिल नहीं थे और उनके रिश्तेदारों ने केवल उनकी सदाशयता का अनुचित लाभ उठाया है... पर फिर भी यह मामला एक बड़े सत्य को दोबारा सबके सामने उजागर तो करता ही है... रेलवे के बड़े पदों को भी पैसा देकर कब्जाया जा सकता है, यह धारणा और यह प्रचलन केवल और केवल पवन बंसल के भाँजे विजय सिंगला का पैदा किया हुआ नहीं है... अपनी सहज बुद्धि के जरिये भी आप इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि ऐसा पहले भी हुआ और होता रहा होगा, यह तो भला हो उस सीबीआई के अफसर का, जिसका ज़मीर अब तलक बिका नहीं और उसके चलते उसने यह कारवाई कर दी और हमें भी खबर हो गयी...

२०१० में अपने एक सर्वे के बाद ट्रान्सपेरेंसी इंटरनेशनल (लिंक) ने दुनिया को बताया कि भारत में 100 में 54 लोग भ्रष्ट हैं। जो अपना काम करवाने के लिए भ्रष्टाचार का सहारा लेते हैं। फिर चाहे इसके लिए वो घूस दें या घूस लें।(लिंक) ... वे अंतर्राष्ट्रीय संस्था है अभी भी हकीकत नहीं जानते... आँकड़ा इस से कहीं ज्यादा है... मैं प्रतिशत में बताने की माथापच्ची में नहीं पड़ता पर इतना जरूर कहूँगा कि ईमानदार शख्स का मिलना हमारे देश में एक 'अति दुर्लभ अपवाद' है...

एक मुल्क-एक समाज के तौर पर हम सदियों से चार अहम चीजों घूस-खुशामद-सिफारिश-बख्शीश के जरिये चलते समाज हैं... आप हमारे धार्मिक और अध्यात्मिक क्षेत्र को ही देखें... तप-प्रार्थना-आस्था और पूर्ण समर्पण के तो बड़े बड़े बखान मिलेंगे पर मन-वचन और कर्म से ईमानदार होने के लिये कोई नहीं कहेगा... मेरी बात पर यकीन न हो तो एक पूरा दिन आप धार्मिक-अध्यात्मिक चैनल देखें और कोई गुरु-बाबा ईमानदारी बरतने के लिये कहता मिल जाये तो बतायें...

आप अपने इर्द गिर्द हमारे किसी भी संस्था, संस्थान या विभाग को देखें... एकाध अपवाद को छोड़ अहम पदों पर जो भी बैठा है उसे या तो वह पद घूस-खुशामद-सिफारिश के जरिये मिला है या किसी सत्ता संपन्न ने वह पद उसे उसकी सेवा-चापलूसी-श्वानसम वफादारी की बख्शीश के तौर पर उसे इस पद से नवाजा है... प्रत्येक विभाग-संस्था या संस्थान में एक सत्ता केंद्र है और उस केंद्र के इर्दगिर्द मंडराने उसके हितों व अहम को साधने वाले पदों से नवाजे जाते हैं और जो अपने को इतना गिरा नहीं सकता वह बेनाम-गुमनाम जिंदगी गुजारने पर मजबूर है...

हमारे नेता हमारे इसी समाज से आते हैं... आप उनमें से किसी की भी बैठक में कुछ समय गुजारिये और देखिये... आपके और मेरे जैसे ही आम आदमी रोजाना वहाँ किसी न किसी गलत काम, किसी का हक छीनने या सरकारी पैसे/नीतियों का अनुचित फायदा उठाने के प्रयोजन से सिफारिशें करवाने के लिये ही जाते हैं... नेता भी आखिर आम आदमियों से ही हैं तो वह भी बहुत जल्दी ही मिलने वाले फायदे में अपना हिस्सा माँगना/लेना सीख जाते हैं...

सदियों से इसी व्यवस्था के चलते हम आज इस स्थिति में हैं कि अधिकाँश पार्टियों के सत्ता केन्द्र पर उन्हीं नेताओं का कब्जा है जो घूस-खुशामद-सिफारिश-बख्शीश के चलते वहाँ तक पहुँचे हैं... सत्ता इन्हीं को मिलती है कभी न कभी... नतीजा, हमारे अकादमिक जगत, हमारे सभी लोक सेवा आयोग, हमारे तमाम बड़े संस्थान, हमारी तमाम संस्थाओं, हमारी तमाम उन जगहों पर जहाँ अर्थलाभ होता है, वह लोग बैठे हैं जो वहाँ घूस-खुशामद-सिफारिश-बख्शीश के चलते पहुँचे/काबिज हैं... कोई संस्था, यहाँ तक कि हमारी सशस्त्र सेनायें भी, इस चलन से अछूती नहीं हैं... कई कई 'चीफ्स' के कारनामे आप देख ही चुके हैं...

एक अवाम और समाज के तौर पर हम सबको यही स्वीकार भी है... सदियों से हम इसे देख रहे हैं... यही हमारे लिये दस्तूर भी है और हमारे जैसे समाज की तकदीर भी...

इसलिये चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में आये... घोटाले-घूसखोरी होती रहेगी-बढ़ती रहेगी... इन्हें देख हैरान-परेशान मत होईये... जो सदियों से हमारे देश में होता आ रहा है उसे एक बड़े मंच और बड़े पैमान पर देखने पर यह किम आश्चर्यम् ?

मैंने समस्या तो गिना दी अब आपमें से कुछ पूछेंगे कि समाधान क्या है... मेरा मानना यह है कि यह खोखला और सड़ा गला तंत्र इस समस्या का समाधान नहीं निकाल सकता... यह अभी और गलेगा-सड़ेगा... इसका कोढ़, इसके खुले-सड़े-गंधाते-पीब बहाते घाव अभी और दिखेंगे और फिर एक दिन ऐसा जरूर आयेगा कि अपने पूरे तामझाम के साथ यह तंत्र भरभरा कर ढह जायेगा... यह पीड़ादायक होगा, इसमें बहुत विनाश-नुकसान होगा और कष्ट भी...  पर यदि एक मुल्क और समाज के तौर पर हमें बने रहना है तो यह लाज़िमी भी है...

फिर एक नये-बेहतर और आस जगाते तंत्र का उदय होगा...

काश यह सब मेरे जीवनकाल में ही हो जाये...

मुझे स्वयं को मुस्कुराते देखना बहुत अच्छा लगता है... :)








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15 टिप्‍पणियां:

  1. @ पवन बंसल जी यूपीए की सरकार में एक साफ और बेदाग छवि के भरोसेमंद और काबिल नेता के तौर पर जाने जाते रहे हैं.
    १-ये आप की निजी राय है आम आदमी किसी भी नेता के बारे में ऐसा नहीं सोचता है
    २- सभी जानते है की हर पद आज कल बिकाऊ है पुरे देश में
    ३- सी बी आई के जिस आफिसर की आप तारीफ कर रहे है उसने ये सब कितनी ईमानदारी से किया या बदला लेने के लिए किया पता नहीं , पकडे गए साहब ने उन्हें रेलवे के सी आर पी एफ के ऊँचे पद से हटवा दिया था , जब वो ममता के करीबी आधिकारी थे , :)
    ४- किन्तु इससे ये तथ्य नहीं बदल जाता है की घुस कांड हुआ और पकडे गए लोग गलत थे और उन्हें सजा मिलनी चाहिए |
    ५-कोई भी मंत्री नेता सीधे पैसा नहीं लेता है वो इस तरीके से ही लेता है ताकि कभी वो सीधे इन में न कपड़ा जाये
    ६- बाबा जी लोग जो कहते है उसी ही कौन मान लेता है जो उनकी ईमानदारी की बात को मानेगा
    @मेरा मानना यह है कि यह खोखला और सड़ा गला तंत्र इस समस्या का समाधान नहीं निकाल सकता... यह अभी और गलेगा-सड़ेगा... इसका कोड़, इसके खुले-सड़े-गंधाते-पीब बहाते घाव अभी और दिखेंगे और फिर एक दिन ऐसा जरूर आयेगा कि अपने पूरे तामझाम के साथ यह तंत्र भरभरा कर ढह जायेगा...
    लो जी यही बात जब कुछ दिनों पहले कुछ आन्दोलन करी कहा रहे थे अपने कार्टूनों से बता रहे थे तो आप उन्हें गलत कहा रहे थे आज आप खुद वही बात दोहरा रहे थे , नहीं गलत बात नहीं है अच्छी बात है की आप बात को समझा गए :)

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      अंशुमाला जी,

      @ सी बी आई के जिस आफिसर की आप तारीफ कर रहे है उसने ये सब कितनी ईमानदारी से किया या बदला लेने के लिए किया पता नहीं , पकडे गए साहब ने उन्हें रेलवे के सी आर पी एफ के ऊँचे पद से हटवा दिया था , जब वो ममता के करीबी आधिकारी थे , :)

      यह अपनी जानकारी में नहीं है न ही कोई चैनल या अखबार जिन्हें मैं पढ़ता हूँ यह बता रहे हैं... अगर सच है तो बड़ा ही तेज चैनल है मैंगोपीपुल... :)

      @ लो जी यही बात जब कुछ दिनों पहले कुछ आन्दोलन करी कहा रहे थे अपने कार्टूनों से बता रहे थे तो आप उन्हें गलत कहा रहे थे आज आप खुद वही बात दोहरा रहे थे , नहीं गलत बात नहीं है अच्छी बात है की आप बात को समझा गए :)

      हाँ अंशुमाला जी, मैं अदम्य आशावादी मानता हूँ अपने को... पर यह नंगई, यह पतन देख मेरा भरोसा भी टूट गया है... बदले हालात के साथ राय बदली है... यही सही भी है... :(


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    2. क्या बात करते है प्रवीण जी आप तो अंग्रेजी के अखबार पढ़ते है और आप को ये पुरानी खबर के बारे में मालूम नहीं , जरा दक्षिण तक जाइये, जिस दिन गिरफतारी हुई थी उसके तीसरे चौथे दिन ही ये खबर छप गई थी , टीवी वाले तो अंग्रेजी अखबारों की जूठन पर जीते है :)
      मैंने पहले भी कहा है की समझदारो की परेशानी या खासियत जो भी आप मानिये ये है की आप उन्हें कितना भी समझाइये वो नहीं समझते है , जब तक की उन्हें निजी अनुभव न हो और सही भी है दूसरो की बकबक के बजाये जब बात अपेन निजी अनुभव से समझ आती है तो ज्यादा सही तरीके से समझ आती है और हमेसा के लिए समझ आ जाती है :)

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    3. और हां अब तक ये खबर तो आप को मिल ही गई होगी की आप के ईमानदार बंसल साहब के बेटे पत्नी बहु की कंपनिया कैसे उनके राजनीतिक कद के साथ दिन दुनी रात चौगुनी बढ़त कर रहे थे और कर रहे है , ईमानदारी और राजनीति दोनों विलोम शब्द है , कल तक जो ईमानदारी से आन्दोलन कर रहे थे , वो जब आज राजनीती कर रहे है तो देखिये क्या हाल है उनका :(

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  2. मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि
    आप की ये रचना 10-05-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
    पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।

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  3. एक मित्र ने कहा कि यह हमारे डी एन ऐ में आ चुका है -सच है किम आश्चर्यम ?

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  4. इसका कोड़, इसके खुले-सड़े-गंधाते-पीब बहाते घाव अभी और दिखेंगे और फिर एक दिन ऐसा जरूर आयेगा कि अपने पूरे तामझाम के साथ यह तंत्र भरभरा कर ढह जायेगा... यह पीड़ादायक होगा, इसमें बहुत विनाश-नुकसान होगा और कष्ट भी... पर यदि एक मुल्क और समाज के तौर पर हमें बने रहना है तो यह लाज़िमी भी है..
    ...बने तो रहना ही पड़ेगा.....
    फिर एक नये-बेहतर और आस जगाते तंत्र का उदय होगा...
    काश यह सब मेरे जीवनकाल में ही हो जाये...
    ...ऐसा ही हम भी सोचते हैं अपने आँखों के सामने हो जाय तो अच्छा होता ..यह काश शब्द बहुत चुभन भरा है ...

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  5. चुनाव में ख़र्च पैसे की वापसी ईमानदारी से कैसे संभव है ?
    जनता में से कोई यह तो बता दे !

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  6. आज की ब्लॉग बुलेटिन ' जन गण मन ' के रचयिता को नमन - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  7. खबर चाहे जैसी हो ..... सोचना ही बंद कर दिया है हमने,

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  8. मामले की सही जांच हो तो इसमें पवन बंसल का पूरा परिवार शामिल पाया जाएगा, यहां तक की उनकी बहू भी। खैर.. रेल में हर पद पर तैनाती पैसे से ही होती है।

    वैसे सीबीआई निदेशक की जांच हो तो और भी हैरतअंगेज खुलासा होगा, इस आपरेशन में रेलवे के कौन कौन से अधिकारी शामिल थे, सब पता चल जाएगा।

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  9. is mahan desh me imandaari durlabh ho gayee hai ..किम आश्चर्यम ?

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  10. अरे भाई आप लोग इतना ही नहीं समझते कि जब तक जो लपेटे में न आये वो तब तक ईमानदार है और अपने देश के राजनेता तो स्वयम्भू भगवान है जो लपेटे में आ भी गए तो सफाई में ढेरों दलीले तैयार कर लेंगे ! अब यह अलग बात है कि वो दलीले किसी के गले उतरे या ना उतरे लेकिन नेताजी को इससे क्या फर्क पड़ता है और इससे भी बात नहीं बनी मेरी कमीज तेरी कमीज से सफ़ेद क्यों है वाली नीति तो इनके पास है ही !!

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