बुधवार, 29 मई 2013

उफ्फ गर्मी... आह गर्मी... वाह गर्मी... सूरज आग बरसाता, बाबा !

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लगता है जैसे कोई भठ्ठी सी हो
है दिन भर जो आग उगल रही
दिन को चैन है न रात को नींद
यह सूरज आग बरसाता, बाबा


बेगाने शहर में कहीं प्याउ नहीं
हाँ, पानी चौराहों पर बिकता है
इस तपती तेज दुपहरिया में
प्यासे ही दिन कट जाता, बाबा


खुद का खड़े हो पाना मुश्किल है
बार बार लगता, गिर जाउंगा मैं
ऐसे में सवारियों को पुकार रहा
कैसे वह है रिक्शा चलाता, बाबा 


लू से दिनभर लड़ता है बेपरवाह
मेहनतकश लगा है अपने कामों में
मौसम की आग क्या बिगाड़े उसका
वह जो पेट की आग बुझाता, बाबा


'ओह, यस अभी' लिखा चारों तरफ
फल रस,पना, शिकंजी को पछाड़ता
धड़ाधड़ गलियों चौराहों में बिक रहा
पेप्सी क्यों इतना ललचाता, बाबा  


है जीभ निकाले तड़पता डोल रहा
हर चौखट-ठिकाने से दुत्कारा जाता
वह आवारा कुत्ता भी यह सोच रहा
कहीं गज-दो-गज छाँव पाता, बाबा


तरह तरह के रंगीन सूती दुपट्टों से
ढंके चेहरा पूरा, पहने लंबे दस्ताने
उन लड़कियों का बाहर निकलना ही
एक हौसला सबको दे जाता, बाबा


किसी अच्छे-बुरे हर दौर की तरह 
जल्द कट जायेंगे ही यह दिन भी
आने वाली रिमझिम बरसातों का
मौसम यह विश्वास दिलाता, बाबा













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बुधवार, 22 मई 2013

क्या आपको लगता है कि 'उस' को मानने वालों के पास कोई जवाब है वाकई !!!

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अब जब भी 'उस' की बात होगी, 'उस' के वजू़द पर सवाल होगा तो मानने वालों का सबसे पहला तर्क यही होता है कि जब तुम मानते नहीं तो तुम्हें क्या फर्क पड़ता है उसके होने या न होने से... क्यों तुम उसके पीछे पड़े हो भाई... ऐसे में मैं जवाब देना चाहूँगा कि चाहे अनचाहे दुनिया को फर्क तो पड़ता ही है 'उस' को माने जाते रहने के कारण... यथास्थिति बरकरार रहती है, जुल्म और शोषण की ताकतें बनी रहती हैं, मजलूम अपनी हालत को कर्मफल समझ आवाज नहीं उठाता, बहुत सा समय, खाद्म और संसाधन 'उस' के गुणगान में व्यर्थ होते हैं, एक बड़ा निकम्मा तबका केवल और केवल कुछ उलजलूल बेसिरपैर की बातों को फैलाकर समाज में प्रभुत्व बनाये रखता है, दुनिया बंटी रहती है, दंगे होते हैं, मुल्क युद्ध करते हैं, आतंक फैलता है, इंसान अपने ही जैसे दूसरे इंसान से नफरत करता है... और आप कहते हो, भाई तुम्हें क्या फर्क पड़ता है... फर्क पड़ता है भाई, क्योंकि मैं और मुझ जैसे कई इस खेल के आर-पार देख पा रहे हैं... मानने वाले भले ही हमें अपना न मानें, पर मुझ जैसे सभी मानते हैं कि 'सच को जानने का हक सभी को है !'

जब यह ब्लॉग शुरू किया तो बहुत सारे सवाल उठाये 'उस' और 'उस' की अवधारणा पर... अल्लम गल्लम बातें तो बहुत की लोगों ने पर तर्क की कसौटी पर खरा व विश्वसनीय जवाब कोई नहीं मिला... आप चाहें तो यह आलेख नीचे पढ़ सकते हैं... यह सभी लिंक हैं...

काहे को भूखा मारते हो अपने ही प्यारे बच्चों को... मेरे माई-बाप...हम सबके पालनहार ?

चित, पट और अंटा तीनों उसी का ???

वफादारी या ईमानदारी ?... फैसला आपका !

बिना साइकिल की मछली... और धर्म ।

अदॄश्य गुलाबी एकश्रंगी का धर्म...

जानिये होंगे कितने फैसले,और कितनी बार कयामत होगी ?

पड़ोसी की बीबी, बच्चा और धर्म की श्रेष्ठता...

ईश्वर है या नहीं, आओ दाँव लगायें...

क्या वह वाकई पूजा का हकदार है...

एक कुटिल(evil) ईश्वर को क्यों माना जाये...

यह कौन रचनाकार है ?...


और 

क्या होती है आत्मा ?

आज देखता हूँ कि संजय ग्रोवर जी की पोस्ट (लिंक) पर भी वही नजारा है... और मेरी उपरोक्त पोस्टें लिखे जाने के बाद ब्लॉगरों और फेसबुकियों की एक नयी पीढ़ी भी उतर आई है मैदान में... तो दोबारा वही सवाल पूछने का मन है... आपका मन हो तो जवाब दीजिये, नहीं हो तो पढ़कर अगली पोस्ट की ओर बढ़िये... पोस्ट का उद्देश्य केवल पाठक के दिमाग तक उन सवालों को पहुंचाना है... कईयों के दिमागों में वह और कई सवालों की तरह दफन हो जायेंगे हमेशा के लिये और कुछ के दिमागों में वह जिन्दा रहेंगे हमेशा और काम करेंगे इस पूरे प्रपंच को तोड़ने-उजागर-नंगा और खत्म करने का... आदमीयत अपने असली रूप में तभी जिन्दा होगी...

मोटामोटी तौर पर मैं और मुझ जैसे यह मानते हैं कि अपनी विकास अवस्था के दौरान जब मानव ने सामूहिक शिकार के प्रयोजन से झुंडों में रहना शुरू किया और शिकार, खाद्मान्न व फलादि का संग्रहण शुरू किया, भाषा विकसित हुई तो कुदरत की ताकतों जैसे वर्षा, बिजली, गर्मी, सूखा, बाढ़, बीमारी, जंगली जीव और सर्प आदि के द्वारा जान-माल की क्षति होने के कारण वह भयभीत सा हुआ... वह और कुछ करने की स्थिति में नहीं था तो भय के चलते उनको पूजने, खुश करने या मनाये रखने की परंपरा सी चल पड़ी, यद्मपि इन सबसे कुछ होता नहीं था... कालांतर में मानव समाज का एक तबका, जो इस सब प्रपंच को समझता था परंतु यह सब समझते हुऐ भी क्योंकि उस तबके को इन प्रपंचों के चलते समाज में प्रभुत्व व बैठे ठाले बिना शारीरिक श्रम किये रोजी रोटी का जुगाड़ मिलता था, उस तबके ने इस प्रपंच को और बढ़ाया, उसने ग्रंथ रचे, आकाशवाणियाँ सुनीं, देव दूत देखे, अवतार गढ़े, संदेशवाहकों से मिला और एक लंबा चौड़ा काल्पनिक मिथकों का मायाजाल रच दिया... पूर्ण आस्था जो कोई सवाल नहीं करती और समर्पण पर जोर दे उस तबके ने अपने को और इस सारे प्रपंच-मायाजाल को सवालों के दायरे से बाहर कर दिया... उसी तबके ने फलित ज्योतिष, वास्तु, फेंग शुई और तमाम तरीकों के अल्लम गल्लम गल्प विज्ञान रचे और मामले को इतना उलझा दिया कि आज का इंसान बमुश्किल उसके पार देख पाता है... शायद इसीलिये उनकी जिम्मेदारी अहम है जो इस सब के पार देख पा रहे हैं...

आज फिर इस पोस्ट के माध्यम से मेरे सवाल हैं ...


१- ईश्वर क्या है, उसका स्वरूप क्या है ?

२- क्या आज तक के मानव इतिहास में किसी ने उसको देखा, सुना या अनुभव किया है ?

३- वह क्या करता है ?

४- वह क्यों चाहता है कि उसे पूजा जाये, उसके सामने झुका जाये, उसे याद रखा जाये या उसका ध्यान किया जाये ?

५- आत्मा क्या चीज है ?

६- क्या होता है अध्यात्म ?

७- धर्म का उद्देश्य क्या है, अगर उद्देश्य गलत काम से बचाने का है तो क्या यही काम कानून बेहतर तरीके से नहीं करते, जिनमें इसी जन्म में गलत काम की सजा भी है ?

८- क्या यह सब जो खाद्म नदियों में बहाया जाता है, आग में फूंका जाता है या मूर्तियों पर च़ाया जाता है, सुगंधित धुउसके घर में किया जाता है मोमबत्ती-दिये जलाये जाते हैं, उसके नाम पर कुरबानियाँ-च़ावे होते हैं... क्या उसे इनकी जरूरत है ?

९- क्या वह चाहता हकि उसको याद/खुश करने के लिये कोखा रहे ?

१०- और सबसे खिरी सवाल, उसे किसी कार्य को करने में सक्षम कहा जाता है तो क्या वह एक इतना भारी पत्थर बना सकता है जिसे वह खुद ी न ठा सके ?... :) 
 









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मंगलवार, 21 मई 2013

क्या आप देखना चाहेंगे कि क्या हो रहा है यहाँ पर ?...

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पिछले कुछ समय से एक अजीब सी मुर्दनी-वीरानगी सी छाई है ब्लॉगवुड में... कहीं कोई एक्शन ही नहीं ... :)

अब ऐसे माहौल में यहाँ पर (लिंक) मुझे एक अच्छी बहस के थोड़े आसार से दिख रहे हैं... तो फिर देर क्या है... समय है अगर आपके पास तो या तो कूद पड़िये बीच बहस, अपनी ओर से कुछ जोड़िये घटाईये... या फिर किनारे-किनारे खड़े ही आनंद लीजिये... :)

क्या सोच रहे हैं ? लिंक पर क्लिक करिये न... :)





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गुरुवार, 9 मई 2013

चला जाये क्या ?

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हमने अबतक
बहुत अपनी
बकवास की

मन भर के 
हर किसी से
झगड़  लिये

जो कहना था
किसी को भी
कह चुके

बेलाग बेखौफ
सुनाना था जो
सुना दिया

सुनाने वाले
सबकी हमने
दिल से सुनी

कहीं किसी को
फर्क तो कोई
पड़ता नहीं

दुनिया वही
पहले जैसी
चलती रही

अपनी बकबक
अब खुद ही को
चुभने लगी

कुछ रूककर
सुस्ताकर भी
देख लिया

इस डेरे में 
पहले सा मजा
आता नहीं

कई दूर ठिकाने
अन्देखे अन्जाने
बुला रहे

तामजाम अपना
फैलाया नहीं था
हमने कभी

समेटने में उसे
वक्त लगेगा
बिल्कुल नहीं

अब...
चला जाये क्या ?











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मंगलवार, 7 मई 2013

किम आश्चर्यम् ?

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आजकल खबरें आपको परेशान नहीं करतीं... वे अपनी शॉक-वैल्यू खो चुकी हैं... यह एक ऐसा दौर है जिसमें हमारे पतन की कोई सीमा नहीं है... कहीं भी, किसी के द्वारा भी, कैसा भी और कुछ भी संभव है... लगभग हर चीज बिकाऊ है और बिकाऊ दिख भी रही है...

पवन बंसल जी यूपीए की सरकार में एक साफ और बेदाग छवि के भरोसेमंद और काबिल नेता के तौर पर जाने जाते रहे हैं... उनका भांजा रेल मंत्रालय से होने वाली नियुक्ति और प्रमोशन के बदले लंबी चौड़ी घूस लेते सीबीआई के हाथों पकड़ा गया है... पवन बंसल कसूरवार साबित हो सकते हैं और यह भी हो ही सकता है कि जाँच के बाद यह पता चले कि पवन बंसल इस मामले में शामिल नहीं थे और उनके रिश्तेदारों ने केवल उनकी सदाशयता का अनुचित लाभ उठाया है... पर फिर भी यह मामला एक बड़े सत्य को दोबारा सबके सामने उजागर तो करता ही है... रेलवे के बड़े पदों को भी पैसा देकर कब्जाया जा सकता है, यह धारणा और यह प्रचलन केवल और केवल पवन बंसल के भाँजे विजय सिंगला का पैदा किया हुआ नहीं है... अपनी सहज बुद्धि के जरिये भी आप इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि ऐसा पहले भी हुआ और होता रहा होगा, यह तो भला हो उस सीबीआई के अफसर का, जिसका ज़मीर अब तलक बिका नहीं और उसके चलते उसने यह कारवाई कर दी और हमें भी खबर हो गयी...

२०१० में अपने एक सर्वे के बाद ट्रान्सपेरेंसी इंटरनेशनल (लिंक) ने दुनिया को बताया कि भारत में 100 में 54 लोग भ्रष्ट हैं। जो अपना काम करवाने के लिए भ्रष्टाचार का सहारा लेते हैं। फिर चाहे इसके लिए वो घूस दें या घूस लें।(लिंक) ... वे अंतर्राष्ट्रीय संस्था है अभी भी हकीकत नहीं जानते... आँकड़ा इस से कहीं ज्यादा है... मैं प्रतिशत में बताने की माथापच्ची में नहीं पड़ता पर इतना जरूर कहूँगा कि ईमानदार शख्स का मिलना हमारे देश में एक 'अति दुर्लभ अपवाद' है...

एक मुल्क-एक समाज के तौर पर हम सदियों से चार अहम चीजों घूस-खुशामद-सिफारिश-बख्शीश के जरिये चलते समाज हैं... आप हमारे धार्मिक और अध्यात्मिक क्षेत्र को ही देखें... तप-प्रार्थना-आस्था और पूर्ण समर्पण के तो बड़े बड़े बखान मिलेंगे पर मन-वचन और कर्म से ईमानदार होने के लिये कोई नहीं कहेगा... मेरी बात पर यकीन न हो तो एक पूरा दिन आप धार्मिक-अध्यात्मिक चैनल देखें और कोई गुरु-बाबा ईमानदारी बरतने के लिये कहता मिल जाये तो बतायें...

आप अपने इर्द गिर्द हमारे किसी भी संस्था, संस्थान या विभाग को देखें... एकाध अपवाद को छोड़ अहम पदों पर जो भी बैठा है उसे या तो वह पद घूस-खुशामद-सिफारिश के जरिये मिला है या किसी सत्ता संपन्न ने वह पद उसे उसकी सेवा-चापलूसी-श्वानसम वफादारी की बख्शीश के तौर पर उसे इस पद से नवाजा है... प्रत्येक विभाग-संस्था या संस्थान में एक सत्ता केंद्र है और उस केंद्र के इर्दगिर्द मंडराने उसके हितों व अहम को साधने वाले पदों से नवाजे जाते हैं और जो अपने को इतना गिरा नहीं सकता वह बेनाम-गुमनाम जिंदगी गुजारने पर मजबूर है...

हमारे नेता हमारे इसी समाज से आते हैं... आप उनमें से किसी की भी बैठक में कुछ समय गुजारिये और देखिये... आपके और मेरे जैसे ही आम आदमी रोजाना वहाँ किसी न किसी गलत काम, किसी का हक छीनने या सरकारी पैसे/नीतियों का अनुचित फायदा उठाने के प्रयोजन से सिफारिशें करवाने के लिये ही जाते हैं... नेता भी आखिर आम आदमियों से ही हैं तो वह भी बहुत जल्दी ही मिलने वाले फायदे में अपना हिस्सा माँगना/लेना सीख जाते हैं...

सदियों से इसी व्यवस्था के चलते हम आज इस स्थिति में हैं कि अधिकाँश पार्टियों के सत्ता केन्द्र पर उन्हीं नेताओं का कब्जा है जो घूस-खुशामद-सिफारिश-बख्शीश के चलते वहाँ तक पहुँचे हैं... सत्ता इन्हीं को मिलती है कभी न कभी... नतीजा, हमारे अकादमिक जगत, हमारे सभी लोक सेवा आयोग, हमारे तमाम बड़े संस्थान, हमारी तमाम संस्थाओं, हमारी तमाम उन जगहों पर जहाँ अर्थलाभ होता है, वह लोग बैठे हैं जो वहाँ घूस-खुशामद-सिफारिश-बख्शीश के चलते पहुँचे/काबिज हैं... कोई संस्था, यहाँ तक कि हमारी सशस्त्र सेनायें भी, इस चलन से अछूती नहीं हैं... कई कई 'चीफ्स' के कारनामे आप देख ही चुके हैं...

एक अवाम और समाज के तौर पर हम सबको यही स्वीकार भी है... सदियों से हम इसे देख रहे हैं... यही हमारे लिये दस्तूर भी है और हमारे जैसे समाज की तकदीर भी...

इसलिये चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में आये... घोटाले-घूसखोरी होती रहेगी-बढ़ती रहेगी... इन्हें देख हैरान-परेशान मत होईये... जो सदियों से हमारे देश में होता आ रहा है उसे एक बड़े मंच और बड़े पैमान पर देखने पर यह किम आश्चर्यम् ?

मैंने समस्या तो गिना दी अब आपमें से कुछ पूछेंगे कि समाधान क्या है... मेरा मानना यह है कि यह खोखला और सड़ा गला तंत्र इस समस्या का समाधान नहीं निकाल सकता... यह अभी और गलेगा-सड़ेगा... इसका कोढ़, इसके खुले-सड़े-गंधाते-पीब बहाते घाव अभी और दिखेंगे और फिर एक दिन ऐसा जरूर आयेगा कि अपने पूरे तामझाम के साथ यह तंत्र भरभरा कर ढह जायेगा... यह पीड़ादायक होगा, इसमें बहुत विनाश-नुकसान होगा और कष्ट भी...  पर यदि एक मुल्क और समाज के तौर पर हमें बने रहना है तो यह लाज़िमी भी है...

फिर एक नये-बेहतर और आस जगाते तंत्र का उदय होगा...

काश यह सब मेरे जीवनकाल में ही हो जाये...

मुझे स्वयं को मुस्कुराते देखना बहुत अच्छा लगता है... :)








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