गुरुवार, 7 मार्च 2013

मेरा जवाब... जाने दो दोस्त, हमें मालूम है वहाँ की हकीकत और अंजाम भी...

.
.
.


मेरे 'उस' के निर्णय की प्रतीक्षारत मित्रों,

दोस्तों, एक बहुत बड़ा प्रलोभन धर्म देता है 'अपने मानने वालों' को... और वह 'लालच' है Heaven या स्वर्ग या जन्नत का... इस लालच का आधार व वादा सभी धर्मों में कमोबेश एक सा ही है...

और वह है कि...

'मानने वाला' अपने अपने धर्म के बताये अनुसार अपने अपने धर्म-स्थल में जाकर नियम पूर्वक रोजाना 'उस' का Ego Massage करे, गुण गाये 'उसके', झुके 'उसके' आगे, 'उसकी' कृपा मांगे, शुक्रिया करे उसका यह दुनिया और 'तुम' को बनाने के लिये, जाने अनजाने में 'उसकी' शान में हुऐ गुनाहों की माफी माँगे, कुछ खास 'जगहें' (तीर्थ स्थान) जहाँ शायद 'वो' ज्यादा रहता है-उन 'जगहों' की यात्रा करें, उसके प्रति अपनी वफा जताते हुऐ भूखे रहें कुछ खास दिन और यह सब करते-करते थक कर एक दिन विदा हो जाये इस 'जहान' से...

अब इसके बाद रोल शुरू होता है 'उस' का... कुछ धर्मों के मुताबिक मरने के एकदम बाद और कुछ के मुताबिक एक नियत दिन (कयामत का दिन) 'तुम' सारों का 'फैसला' होगा... और जिन्दा रहने के दौरान कितनी वफादारी दिखाई तुमने 'उस' के प्रति... इस 'पैमाने' पर नाप कर 'तुम' को वह भेजेगा स्वर्ग या नर्क में...



ऐसा होगा नर्क-जहन्नुम-Hell

यह कैदखाना कमोबेश सभी जगह एक सा है... प्रताड़नाओं में शामिल है आग से जलाना, भूखा-प्यासा रखना, खौलता पानी शरीर पर डालना, खौलता पानी पीने को देना, बिना इलाज के छोड़ देना आदि आदि... बहुत गंदा और बदबूदार स्थान है यह!


और यह रहा स्वर्ग-जन्नत-Heaven

नर्क तो आदमी और औरत दोनों का है पर स्वर्ग केवल पुरूषों के लिये ही बनाया प्रतीत होता है अधिकाँश धर्मों मे...यहाँ मिलेंगी अति सुन्दर चिर-कुंवारी, चिर-यौवना अप्सरायें या हूरें... जिसे चाहें भोगें... पानी की जगह नालियों में बहती होगी 'सुरा' या शराब... सुगंध होगी... संगीत होगा... एअर कंडीशनिंग भी होगी वहाँ!
अब यह बात दीगर है कि इन्ही सब चीजों का जिन्दा रहते निषेध करता है हर कोई 'धर्म'...



यहाँ तक तो सब ठीक है पर एक अडंगा है.......

स्वतंत्र इच्छा या Free Will
जिस पर 'उस' का कोई जोर नहीं है!


एक सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष जो आप इस स्वर्ग-नर्क-फैसले की अवधारणा से निकाल सकते हैं वह यह है कि Free Will यानी किसी इंसान की स्वतंत्र इच्छा पर ईश्वर का कोई नियंत्रण नहीं है क्योंकि यदि होता तो पृथ्वी का हर इंसान 'उस' का ही कहा मानता और 'फैसले' की कोई जरूरत ही नहीं होती ।

धर्म अपने पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह देता है कि 'फैसले' के खौफ से ज्यादातर इन्सान नियंत्रण में रहते हैं क्योंकि वो नर्क की आग से डरते हैं और स्वर्ग के सुख भोगना चाहते हैं... इसका एक सीधा मतलब यह भी है कि अधिकाँश Hypocrite= ढोंगी,पाखण्डी अपने मूल स्वभाव को छुपाकर, अपनी अंदरूनी नीचता को काबू कर, नियत तरीके से 'उस' का नियमित Ego Massage करके स्वर्ग में प्रवेश पाने में कामयाब रहेंगे...

और एक बार स्वर्ग पहुंच कर मानवता की यह गंदगी (Scum of Humanity) अपने असली रूप में आ जायेगी... क्योंकि इनकी Free Will (स्वतंत्र इच्छा) पर 'उस' का कोई जोर तो चलता नहीं!


और कुछ समय बाद Hypocrite= ढोंगी,पाखण्डी मानवता की यह गंदगी (Scum of Humanity) स्वर्ग-जन्नत को नर्क-जहन्नुम से भी बुरा बनाने में कामयाब हो जायेगी।




फिर आप ही सोचो कि, होंगे कितने फैसले... और कितनी बार कयामत होगी ?





आभार!






...


मेरी यह पोस्ट मुझ पर अपने कुछ मित्रों द्वारा उछाले एक सवाल का जवाब है... मेरे जो पाठक ब्लॉगवुड पर नजर रखते हैं वह संदर्भ समझ ही लेंगे... जिन्हें संदर्भ समझ नहीं आ रहा वह संदर्भ समझने का प्रयास न कर पोस्ट को एक विचार बिन्दु के तौर पर लें... यह पोस्ट दूसरे शीर्षक के साथ इस ब्लॉग पर पहले भी आ चुकी है... 




...

23 टिप्‍पणियां:

  1. भाईजान, चूँकि आप जो कहते हैं वो विज्ञान और तर्क पर आधारित होता है इसलिये ठीक ही कहा होगा फ़िर भी हर तरह के लोग हर जगह होते हैं। एक उदाहरण राबिया बसरी का दे रहा हूँ -
    http://navbharattimes.indiatimes.com/-/holy-discourse/religious-discourse/--/articleshow/1894605.cms

    ये वाला उदाहरण इसलिये दिया क्योंकि हिन्दु धर्म वाले उदाहरण तो सिरे से खारिज कर दिये जायेंगे :)

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. .
      .
      .
      संजय जी,

      आप सही कहते हैं कि हर तरह के लोग हर जगह होते हैं... मुझे दिक्कत केवल और केवल तभी होती है जब कोई भी हर किसी को एक तरह का ही बनाने, एक ही सी सोच रखवाने की चेष्टा (जो मेरी नजर में अनधिकार व अनैतिक है)करता है...

      बहरहाल एक अच्छा लिंक दिया है आपने... नीचे कुछ उसी से उद्धृत किये दे रहा हूँ... :)

      राबिया ने कहा , 'ऐ खुदा, अगर मैं नरक के भय से तुम्हारी उपासना करूं तो मुझे नरक की आग में ही जलाते रहना और अगर स्वर्ग पाने की अभिलाषा से उपासना करूं तो उससे मुझे वंचित कर देना। लेकिन अगर सिर्फ तुम्हारे लिए ही तुम्हारी उपासना करूं, तो अपने अनन्त सौन्दर्य के दर्शन से मुझे वंचित न रखना।'

      एक बार राबिया अपने एक हाथ में मशाल और दूसरे में पानी लेकर जा रही थी। साधकों ने पूछा, इसका क्या मतलब है? राबिया ने बतलाया कि वह मशाल से स्वर्ग को जलाकर भस्म कर देना चाहती है और नरकाग्नि को पानी उड़ेलकर बुझा देना चाहती है, ताकि परमात्मा और उनके चाहने वालों के बीच की सारी बाधाएँ मिट जाएँ। उसके चाहने वालों के लिए ऐसी कोई वस्तु न रह जाए जिसे पाने की आशा या भय से वे उससे प्रेम करें।


      नरक के भय और स्वर्ग के लोभ में की गयी उपासना क्या उपासना है/ कहलायेगी... क्या इन्हीं दोनों के चलते किया गया बलिदान बलिदान है/कहलायेगा...


      ...

      हटाएं
    2. @ मुझे दिक्कत केवल और केवल तभी होती है जब कोई भी हर किसी को एक तरह का ही बनाने, एक ही सी सोच रखवाने की चेष्टा (जो मेरी नजर में अनधिकार व अनैतिक है)करता है...


      प्रवीण भाई, मुझे भी तो दिक्कत इसी बात से होती है। लेकिन मेरी दिक्कत तो शाश्वत है और सबसे है फ़िर चाहे एक सी सोच रखवाने की चेष्टा करने वाला कोई आस्तिक हो या नास्तिक हो :)

      लिंक इसी हाईलाईटेड पोर्शन के मद्देनजर साझा किया था, जरूरी नहीं कि उस परम सत्ता में विश्वास रखने वाला हर इंसान स्वर्ग के सुखों की कल्पना या नर्क के दुखों के भय से ही विश्वास रखता हो। ऐसे लोग भी हैं, जो ये मानते हैं कि इस दुनिया में हर स्तर के, हर विश्वास के लोग रहे हैं, रहेंगे और रहने भी चाहियें।

      हटाएं
    3. .
      .
      .
      संजय जी,

      फिर तो हम दोनों की दिक्कतें साझा हैं ... :)

      @ ऐसे लोग भी हैं, जो ये मानते हैं कि इस दुनिया में हर स्तर के, हर विश्वास के लोग रहे हैं, रहेंगे और रहने भी चाहियें।

      जी हाँ, दुनिया में हर समय में, हर स्तर पर, हर तरह के विश्वास या विचार रखने वाले लोग रहे हैं... फिर चाहे वह विश्वास धर्म-ईश्वर-आध्यात्म संबंधी हो, तर्क-वैज्ञानिकता संबंधी या आहार-चयन संबंधी... यही होना भी चाहिये... यह सब मिलकर ही दुनिया को बहुरंगी व जीने लायक बनाते हैं...वरना दुनिया एकरंगी-एकांगी व अझेल हो चुकी होती अब तक...

      पता नहीं आप सहमत होंगे या नहीं... क्योंकि आपके आक्षेप के उलट मैं हमेशा सही नहीं कहता, न ही कभी भी अपने सही ही होने का दावा करता हूँ... :)


      ...


      हटाएं
    4. दिक्कत साझी ही है प्रवीण भाई।
      और जहाँ तक सहमत होने न होने की बात ठहरी, मुँह माथा देखकर सहमति या असहमति रखने वालों में तो मैं भी नहीं :)

      हटाएं
    5. कमाल की सुक्ष्म दृष्टि संजय जी!!

      हटाएं
  2. अभी तक तो आई नहीं क़यामत और क्या जाने कब आएगा वो क़यामत का दिन??
    फिर हमको उसकी चिंता भी नहीं है, क्योंकि हमारा नंबर बहुत बाद में आने वाला है :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. .
      .
      .
      आदरणीय रविकर जी,

      बहुत बहुत आभार आपका...



      ...

      हटाएं
  4. कृपया मेरी टिप्पणी,

    इस गंभीर विषय पर -

    हलके -फुल्के अंदाज में पढ़ें

    सादर-

    आला आशिक आस्तिक, आत्मिक आद्योपांत ।

    आत्म-विस्मरित आत्मरति, रहे हमेशा शांत ।

    रहे हमेशा शांत, ईष्ट से लौ लग जाए ।

    उधर नास्तिक देह, स्वयं को केवल भाये ।

    कह के मिथ्या जगत, नकारे खुदा, शिवाला ।

    भटके बिन आलम्ब, जला के प्रेम-पुआला ॥

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. .
      .
      .
      ... :)

      रविकर जी आपकी त्वरित काव्यात्मक टीप पोस्ट को नया आयाम दे रही है...

      पर अनीश्वर वादी के लिये ' जगत सत्य, बृह्म मिथ्या' होता है मेरे ख्याल से...


      ...

      हटाएं
    2. गजब भाव,रविकर जी......

      भटके बिन आलम्ब, जला के प्रेम-पुआला ॥

      हटाएं
    3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

      हटाएं
    4. जी आदरणीय-
      माननीय सुज्ञ जी की कृपा से यह संशोधन हो चुका है-

      कहते मिथ्या मोक्ष, नकारे खुदा, शिवाला ।
      भटके बिन आलम्ब, जला के प्रेम-पुआला ॥

      हटाएं
  5. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

    उत्तर देंहटाएं
  6. स्वर्ग और नर्क की हम क्या जाने, देखा ही नहीं, न समर्थकों ने देखा और न ही विरोधियों ने। बस यही जाना है कि अच्छा करने से ही अच्छा होने की संभावना बढ़ती है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. स्वर्ग तो अच्छे कर्म करने वालों के लिए रब की तरफ से ईनाम है और ईनाम की लालसा में अच्छे कर्म करने वाला अच्छा कैसे हुआ भला? मेरी नज़र में तो बुरे कर्म से अपने रब के गुस्से का डर और अच्छे कर्म से अपने रब के प्यार की ख़ुशी ही सब कुछ है।

    मैं अपने पैदा करने वाले और मेरे लिए यह दुनिया जहां की अरबों-खरबों चीज़ें बनाने वाले का शुक्रगुज़ार ही नहीं बल्कि आशिक़ हूँ, फिर जिससे इश्क होता है उसकी रज़ा और नाराज़गी ही सबकुछ होती है। और मेरे नज़दीक जिससे इश्क़ हो उससे मिलने से बड़ा कोई ईनाम और क्या हो सकता है भला?

    उत्तर देंहटाएं
  8. बेह्तरीन अभिव्यक्ति.शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं
  9. धर्म में परलोक के जीवन की सफलता इसी बात में बताई गई है कि जिस वक्त इंसान के सिर पर जो फ़र्ज़ आयद हो, वह उसे ज़रूर अंजाम दे।
    वह बच्चा हो तो पढ़े और जब वह जवान हो जाए तो विवाह करे। माँ-बाप हों तो उनकी सेवा करे। अतिथि आ जाए तो उनकी भी करे और बच्चे हो जाएं तो उनकी परवरिश भी करे। नित्यकर्म के समय पर नित्यकर्म करे और उपासना के समय उपासना करे। भोजन के समय भोजन करे और उपवास के निश्चित काल में उपवास भी करे। ख़ुद शांति से खेती बाड़ी और दूसरे कारोबार करे और अगर दूसरे शांति व्यवस्था को भंग करें तो उन्हें बातचीत से या बल प्रयोग से रोके। फिर भी वे न मानें तो समूह का मुखिया जो कहे, उसे पूरा करे। वे हमला करें तो उनसे युद्ध करे।
    सभी फ़र्ज़ उम्र और हालात के साथ वाबस्ता हैं। शांतिकाल में हिंसा और युद्धक्षेत्र में अहिंसा धर्म नहीं सिखाता। प्रार्थना और उपवास के समय यही करना धर्म है और युद्ध अपरिहार्य हो जाए तो फिर युद्ध ही धर्म है। जो युद्ध से भाग जाए, उसे धर्म से भागा हुआ समझा जाता है और समाज में उसे जो अपयश मिलता है। वह न लड़ने वालों को भी धनुष उठाने पर मजबूर कर देता है।
    आप धर्म को ठीक से समझ लेते तो नास्तिक न होते।
    आपका नास्तिक होना, आपकी कोई उपलब्धि नहीं है बल्कि धर्म के सच्चे बोध की उपलब्धि से वंचित रह जाना है। अक्सर नास्तिकता के पीछे यही कारण होता है।
    धर्म इंसान के ज़मीर के साथ उसके बुद्धि विवेक को भी अपील करता है। वह बताता है कि ‘ऐ इंसान ! अगर तू लड़ने बाद भी ज़िंदा रहा तो दूसरों की तरह तू भी दुनिया के सुख भोगेगा और अगर मर गया तो तू उनसे ज़्यादा अच्छे सुख भोगेगा और हमेशा भोगेगा।‘
    धर्म मनुष्य को आशा का संबल देता और नास्तिकता उसे निराश करती है। नास्तिकता बताती है कि जो कुछ है, बस यही जीवन है। मौत के साथ ही तू हमेशा के लिए ख़त्म है। तेरा ज़मीर भी ख़त्म हो जाएगा। सब कुछ गवां देने का नाम है नास्तिकता है जबकि सब कुछ पा लेने की आशा का नाम धर्म है।
    सनातन काल से आज तक हरेक भाषा में यही धर्म है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. धर्म से आशा और नास्तिकता से सिर्फ़ निराशा मिलती है
    @ प्रिय प्रवीण जी ! आपने दोहराया है कि
    ' नरक के भय और स्वर्ग के लोभ में की गयी उपासना क्या उपासना है/ कहलायेगी... क्या इन्हीं दोनों के चलते किया गया बलिदान बलिदान है/कहलायेगा...'

    आप बलिदान को केवल ज़मीर से जोड़कर देख रहे हैं। कई बार आदमी इसलिए नहीं भाग पाता क्योंकि भगोड़ा बनने की सज़ा भी मौत ही होती है। ऐसे में वह मैदान में दुश्मन से लड़कर इज़्ज़त की मौत मरना पसंद करता है। सेना ने भगोड़े के लिए सज़ा ए मौत मुक़र्रर करके सैनिक को शहादत की मौत चुनने में ही भलाई समझाई है।
    सेना का क़ानून पुलिस में भी लगा दिया जाए तो भगोड़ों की तादाद बहुत कम हो जाएगी। ऐसा इसलिए नहीं होगा कि क़ानून की वजह से लोगों का ज़मीर जाग जाएगा। नहीं, बल्कि ऐसा इसलिए होगा कि अब मैदान से भागना नफ़े की बात है और तब मैदान से भागना नुक्सान की बात होगी।
    पता नहीं, आप इंसानी साइकोलॉजी की यह मामूली सी बात क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि इंसान उस काम से बचता है। जिसमें वह अपना नुक्सान देखता है और नुक्सान का काम करने वाला समाज में मूर्ख समझा जाता है।

    ज़मीर की आवाज़ पर काम करने वाले भी अपना नफ़ा देखकर ही काम करते हैं। वे अपने ज़मीर के खि़लाफ़ काम करते हैं तो उनके अंदर बेचैनी पैदा हो जाती है। अपने ज़मीर के मुताबिक़ काम करके उन्हें अपने अंदर बेपनाह ख़ुशी का अहसास होता है। बेचैनी से बचने के लिए और ख़ुशी महसूस करने के लिए ही वे ज़मीर की आवाज़ पर अपनी जान दे देते हैं। जिन्हें ज़मीर की आवाज़ पर क़ुरबानी देने के ख़याल से ही ख़ुशी महसूस होती है, वही शहादत की राह में ख़ुशी ख़ुशी क़दम बढ़ाते हैं।
    जिन्हें अपने अंदर यह ख़ुशी महसूस नहीं होती। वे दूसरे भौतिक लाभ पाने के लिए या सज़ा ए मौत और बदनामी से बचने के लिए अपनी जान देने के लिए खुद को मजबूर पाते हैं। जहां दूसरे भौतिक लाभ पर कोई आंच न आती हो और सज़ाए मौत या बदनामी भी न होती हो। वहां उन्हें उनकी अक्ल जान देने से रोकती है। वे अपने ज़मीर के बजाय अपनी अक्ल की बात मानते हैं और भाग खड़े होते हैं।

    ज़मीर की आवाज़ पर कम, बहुत कम लोग चलते हैं। ज़्यादातर लोग भौतिक नफ़े-नुक्सान का गणित देखकर फ़ैसला करते हैं। अक्ल सही हो तो मरना कोई भी न चाहेगा।
    आज समाज की रक्षा और सेवा वही लोग कर रहे हैं। जो अपने ज़मीर की आवाज़ पर काम कर रहे हैं। ये लोग बहुत कम हैं। इसीलिए न तो समाज की रक्षा ढंग से हो पा रही है और न ही उसकी सेवा। भौतिक नफ़े नुक्सान को सामने रखकर फ़ैसले करने वाले अक्सर लोगों को उनके फ़र्ज़ की अदायगी में शहादत के जज़्बे तक ले जाने से ही समाज की रक्षा व उसकी सेवा ढंग से हो पाएगी और ऐसा करने के लिए वे तभी तैयार होंगे जबकि उन्हें अपने फ़र्ज़ की अदायगी में नफ़ा और लापरवाही में सख्त सज़ा का नुक्सान नज़र आने लगेगा।
    सेना में यही नज़र आता है लेकिन दूसरे विभागों में भी यही नज़र आने की ज़रूरत है। सेना में भगोड़े के लिए सज़ा ए मौत की जानकारी ख़ुद आपने ही दी है। सेना में ड्यूटी की अदायगी और शहादत को सैनिकों के ज़मीर के भरोसे नहीं छोड़ा गया है क्योंकि किसी का कुछ भरोसा नहीं है कि वह ज़मीर की आवाज़ सुनकर उसका पालन करेगा या नहीं ?

    सैनिक अपने रिटायरमेंट के बाद कंपनियों को सिक्योरिटी गार्ड देने जैसा कोई न कोई काम कर लेते हैं। नास्तिक सैनिक भी यही करते हैं। अपने गुज़र बसर के लायक़ कमाने के बावजूद वे अपनी पेंशन भी लेते रहते हैं। नास्तिक भी पेंशन लेते रहते हैं।
    जो नास्तिक अपनी पेंशन के चंद रूपयों का लालच न छोड़ पाए। वह दूसरों को परलोक के बड़े ईनाम की चाहत पर लालची होने का दोष कैसे दे सकता है ?

    उत्तर देंहटाएं
  11. परवीन जी , आपकी पोस्ट पर अपनी टिप्पणी करने से पहले ज़रूरी समझा कि आपके सवालों को हल करती हुई डा. अनवर जमाल साहब की दो टिप्पणियां ज़रा से फ़र्क़ के साथ यहां पेश कर दूं। इससे मुझे लिखने की ज़हमत कम हो जाएगी।
    जवाब देने की ज़हमत गवारा करने के लिए शुक्रिया .

    उत्तर देंहटाएं
  12. न कहीं नर्क है न कहीं स्वर्ग -सब मनुष्य के बनाए हुए फितूर हैं!

    उत्तर देंहटाएं

मेरे इस आलेख को पढ़ कर ही यदि आपके मन में कोई विचार उत्पन्न हुऐ हैं तो कृपया उन्हें 'नेकी कर दरिया में डाल' की तर्ज पर ही यहाँ टिप्पणी रूप में दर्ज करें... इस टिप्पणी के पीछे कोई अन्य छिपा हुआ मंतव्य न रखें, आप इसे उधार में मुझे दी गयी टिप्पणी न समझें, प्रतिउत्तर में आपके ब्लॉग पर टिप्पणी करने की किसी बाध्यता को मैं नहीं मानता व मुझसे या किसी अन्य ब्लॉगर से भी ऐसी अपेक्षा रखना न तो नैतिक है न उचित ही !... मैं किसी अन्य के लिखे आलेखों पर भी इसी नियम व भावना के तहत टिपियाता हूँ !

असहमति को इस ब्लॉग पर पूरा सम्मान दिया जाता है, आप मेरे किसी भी विचार का खुल कर विरोध या समर्थन कर सकते हैं, परंतु अशिष्ट या अश्लील भाषा यु्क्त अथवा किसी के भी ऊपर व्यक्तिगत आक्षेपयुक्त टिप्पणियाँ कृपया यहाँ न दें... आप अपनी टिप्पणियाँ English, हिन्दी, रोमन में लिखी हिन्दी, हिंग्लिश आदि किसी भी तरीके से लिख सकते हैं... नहीं कुछ लिखना चाहते हैं तो भी चलेगा... आपके आने का शुक्रिया... आते रहियेगा भविष्य में भी... आभार!