मंगलवार, 12 मार्च 2013

सवाल, सवाल और सिर्फ सवाल...

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आखिर
क्या लिखा जाये
क्यों
किस लिये
और 
किसके लिये


कुछ होगा
क्या
लिखने से
जैसे कि
कुछ बदला है
आज तक
शब्दों ने


यह
बड़ा भयावह
समय है
कलम के लिये
इसलिये नहीं
कि
खतरे हैं
लिखने में


पर
इसलिये कि
लोग 
सिर्फ और सिर्फ
वही
पढ़ना चाहते हैं
जो वह
जानते हैं
मानना चाहते हैं
या जिसे वह 
मानते हैं


आओ दोस्त
तोड़ कर
फेंक देते हैं
अपनी कलमें भी
क्योंकि
अब
नहीं सहा जाता
यह तनाव


आओ
अब बनकर जियें
एक सभ्य
साधारण और
सामान्य शहरी
जिसे
नहीं करते परेशान
कोई भी सवाल


जो
जी रहा है 
सदियों से
सर झुका
रखे आस्था समर्पण
और विश्वास
वह जो
कभी भी
सोचता तक नहीं
कुछ बदलने की


आओ दोस्त
हम ही बदलें
हम गलत थे
यह दुनिया
नहीं बदलेगी
कभी भी
आखिर
हमें ही
बदलना होगा


छोड़ो यह 
सोचना
सवाल करना
और लिखना भी
तोड़ डालो
यह कलम
करो
कुछ काम 
का काम
तुम भी अब
बन जाओ
हर किसी
की तरह ही !


खुश रहोगे !







...

13 टिप्‍पणियां:

  1. हमें ही बदलना होगा तभी खुश रह पायेंगे

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  2. लीक-खींचना है भला, लीक-पीटना हेय |
    बाबा का यह कूप है, इसीलिए जल पेय |
    इसीलिए जल पेय, प्रदूषित चाहे जितना |
    बरसे झम झम मेह, होय क्या उससे हित ना |
    अपनी अपनी सोच, सोच से आँख मीच ना |
    लिखे लेखनी लेख्य, अनवरत लीक खींचना ||

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  4. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त
    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

    उत्तर देंहटाएं
  5. तुम भी अब
    बन जाओ
    हर किसी
    की तरह ही !


    खुश रहोगे

    शायद खुश हो जाएँ क्यूंकि तब कोई दुःख नहीं रहेगा .पर क्या संतुष्ट भी हो जायेंगे??
    कौन सोच कर लिखता है कि क्रान्ति आ जायेगी. अपने मन की कहने के लिए लिखा जाता है ,अगर कोई एक भी लिखने वाले की तरह सोचे तो ठीक,न भी सोचे तब भी क्या फर्क पड़ता है.

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  6. जब लिखने का दिल न हो तो हल्की फुल्की पोस्ट पढ़ लेनी चाहिए। जैसे कि यह -
    इश्क़ में भी अपनी अक्ल और बिज़नेस ख़राब नहीं करता बड़ा ब्लॉगर

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  7. यदि सब कुछ स्वीकार्य होता तो सोचने की आवश्कता ही क्या थी..संभव है, बस यही मूल कारण हो लिखने का..

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  8. सभी को अपने एक ही रंग में रंगने की अभिलाषा को दम तोड़ना ही है। सूरज चांद सा शीलत बन नहीं सकता किन्तु रोशनी देना उसका कार्य है चांद धूप नहीं दे सकता, बस चांदनी फैलाना ही उसका गुण धर्म है। पानी के पहाड़ नहीं हो सकते, न पहाडों का समतल सागर हो सकता है। सब कुछ समतल सम्भव नहीं, सभी के गुणधर्म अलग है, कर्म अलग है, स्वभाव अलग है। इसीलिए सोच अलग है विचारधारा अलग है। कर्म अलग है उनके प्रतिफल अलग है। अपनी धारणा का रंग दूसरे पर फैका तो जा सकता है पर दूसरे को सुहाना उसकी प्रियता-अप्रियता और स्वभाव पर निर्भर है। ऐसी विचारधारा न चलती है न चल सकती है। इसलिए, लेखन न करके मात्र स्याही फैलाती कलम को हताश निराश होना ही है।

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  9. अनायास ही 'अहमद फ़राज़' साहब की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयीं

    "हमसे कहें ,कुछ दोस्त हमारे मत लिक्खो
    जान अगर प्यारी है, प्यारे मत लिक्खो
    हाकिम की तलवार मुक़द्दस होती है
    हाकिम की तलवार के बारे में मत लिक्खो "

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  10. क्या करें की बोर्ड तोड़ डालें ?

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  11. निराशा का दौर थकाता है कई बार , मगर लिखने वाले फिर भी लिखते हैं . क्रांति नहीं तो कुछ दिलों दिमागों में सुगबुगाहट तो होगी , विचार चल पड़ेंगे तो कोई रास्ता बनेगा !

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  12. प्रवीण भाई,
    हैकिंग का शिकार तो नहीं हो गया आपका ब्लॉग? :)

    आज असहमति दर्ज करें। हम आप सिर्फ़ दूसरों को खुश करने के लिये तो नहीं लिखते। विचार रहेंगे तो विचारभेद भी रहेंगे और विचार विमर्श होंगे तो सभी पक्ष कुछ और भी जानेंगे। मंथन इसलिये भी जरूरी है।

    उत्तर देंहटाएं

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