मंगलवार, 5 मार्च 2013

कैसे वह आईने में देख पायेंगे खुद को ?

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घटना यह उत्तर प्रदेश की है... पर यह किसी भी प्रदेश की हो सकती है/थी ।

मरने वाले शहीद अधिकारी का नाम है डेपुटी सुपरिन्टेन्डेन्ट ऑफ पोलिस जिया उल हक... पर यह नाम कुछ और भी हो सकता है/था ।

वाकया कुछ इस तरह से है... अपने कुछ साथियों की हत्या से गुस्साई, उग्र, आक्रामक और हथियार बंद एक भीड़ है एक गाँव में, जो अपने विरोधियों के घरों, संपत्तियों व जान को निशाना बना रही है... अधिकारी क्योंकि उस इलाके का सर्किल ऑफिसर है, तो यह उसकी जिम्मेदारी है कि कानून व्यवस्था कायम रहे...
वह जाता है उस गाँव में... उसके साथ हैं एक इंस्पेक्टर, पाँच दारोगा (सब इंस्पेक्टर), उसके गनर और न जाने कितने अन्य हथियारबंद कॉन्स्टेबल... वह टीम का कमांडर है...

वह गाँव में घुसने की कोशिश करते हैं, इस टीम पर हमला होता है और तब वह घटता है जो शर्मनाक है... कायरता की हदें पार करते हुऐ अपने कमाँडर को मरने के लिये अकेला छोड़ बाकी सब भाग जाते हैं ।
लुच्चे लफंगों व असामाजिक तत्वों की वह भीड़ उस बहादुर अफसर को अकेला पा जाती है... कुछ घंटों के बाद उसकी लाश मिलती है, उसे तीन गोलियाँ एक गोली (पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार)लगी है और शरीर पर और भी चोटों के निशान हैं ।

बातें हो रही हैं राजनीतिक और आपराधिक षड़यंत्रों की, पर मेरी इस पोस्ट का यह उद्देश्य नहीं है...

मेरा सिर्फ यह कहना है, कि...

पुलिस एक वर्दीधारी बल है... यह ठीक है कि वर्दीधारियों को तन्ख्वाहें मिलतीं हैं जिनसे उनके परिवार का गुजारा होता है... पर कोई भी इंसान वर्दी मूल रूप से रोजगार के लिये धारण नहीं करता... वर्दी धारण करने के पीछे मूल भाव होता है 'इज्जत' का... अपने बल की इज्जत, अपनी इकाई की इज्जत, अपने कमाँडर की इज्जत, अपने साथियों की इज्जत, अपनी खुद की इज्जत और सबसे बढ़कर अपनी वर्दी की इज्जत... जान गंवाना इस इज्जत के सामने बहुत अदना बलिदान है।

पर फिर भी वह कायर भगोड़े भाग गये, अपने कमाँडर को मरने के लिये छोड़कर...


कुछ सवाल जो उठते हैं दिमाग में...


अगली सुबह जब वह कायर भगोड़े आईने के सामने अपनी वर्दी के बटन लगा रहे होंगे तो कैसे देख पाये होंगे अपने चेहरे को ?

कैसे वह सामना करेंगे अपने बाकी साथियों का ?

क्या और कैसी सजा मिलेगी उनको ?... 

मैं नहीं जानता कि इस कायरता और कर्तव्यच्युत होने के लिये पुलिस में क्या सजा होती है... पर विश्व की अधिकांश  सेनाओं में इस अपराध की सजा मृत्युदंड है ।(लिंक)

 


कायरता ूत की बीमारी की तरह पूरे तंत्र को घेर लेती है ।
Act before it is too late !
कुछ करो, से पहले कि बहुत देर हो जाये !



कर्णधारों, इतना तो कम से कम सुनिश्चित करो कि वह कायर भगोड़े अपनी जिंदगी में दोबारा वर्दी न पहनें !











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14 टिप्‍पणियां:

  1. घटना का समुचित विश्लेषण-

    आभार भाई -

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    1. गोड़े उर्वर खेत को, काटे सज्जन वृन्द ।

      इसके क्रिया-कलाप है, जमींदार मानिन्द ।

      जमींदार मानिन्द , सताता रहे रियाया ।

      मुजरिम देख दबंग, सामने जा रिरियाया ।

      देख काल आपात, कमांडर तनहा छोड़े ।

      लेकर भागे जान, पुलिस में भरे भगोड़े ॥

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  2. वैसे ही देख पायेंगे जैसे की इस देश को बेचने वाले आराम से देख पाते हैं अपने आप को :(

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  4. सर जी , आप निष्कर्षों पर बहुत जल्दी पहुँच जाते है। ज़रा अपनी अंतरात्मा से पूछिए कि जिस तरह के ट्रैफिक नियमो का पालन आप दिल्ली पुलिस के सामने करते है, क्या वही एनसीआर में जाकर भी करते हैं ?

    मैं बार -बार कहता हूँ कि इस देश में स्वतंत्र मानसिकता आने में अभी 100 वर्ष और लगेंगे, और गुलाम सिर्फ लाठी की भाषा समझते है। मैं तो कहूंगा कि उन पुलिसवालों ने समझदारी का काम किया। उन्हें नहीं अपने नेताओं, अपनी जुडीशियरी, अपनी मीडिया को दोष दीजिये, जिन्होंने उन्हें कायर बन्ने पर मजबूर कर दिया । उन्हें भी अपने बच्चे पालने है आप और हमारी ही तरह।

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  5. ये अपने आप में रहस्य है की दुसरे पुलिस वालो को एक भी खरोच नहीं आई है क्या ये सम्भव है की पगलाई भीड़ बस एक ही पुलिस अधिकारी पर हमला करे और बाकि सही सलामत बच कर निकल जाये , जबकि ज्यादातर मामलों में होता ये है की पुलिस पर पथराव किया जाता है उनकी गाड़ी को आग के हवाले कर दिया जाता है , ऐसा यहाँ कुछ भी नहीं हुआ । अधिकारी को दोनों पैरो में गोली मारी गई है साफ है पहले उसे भागने से रोका गया और उसके बाद उसकी हत्या की गई , ये कही से भी एक भीड़ का काम नहीं है बल्कि सोची समझी चाल के तहत सत्ता धारी भीड़ ने ये काम किया है और संभव है की जिसमे वो भाग गए पुलिस वाले भी शामिल हो किस न किसी रूप में क्योकि जो बाते सामने आ रही है उसके अनुसार शहीद अधिकारों ईमानदार टाईप का था और ऐसे लोग तो अपने ही विभाग के लोगो को पसंद नहीं होते है फिर किसी अपराधिक प्रवृत्ति वाले नेता मंत्री को कैसे हो सकता है । कल ये खबर देख कर बहुत ही खीज आ रही थी की ईमानदार होना अब अपने देश में जुर्म बनता जा रहा है और ऐसे लोग पुलिस की वर्दी तक में सुरक्षित नहीं है , अब तो पानी सर के ऊपर जा चूका है ।

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  6. बहुत हद तक संभव है कि इस षड्यंत्र में वह पुलिस वाले भी शामिल रहे हों, राजनीती में सब जायज़ बना दिया गया है, ज़मीर बेचने वाले अक्सर ऐसे ही काम करते हैं।

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  7. ज़िया उल हक़ सीओ की हत्या पर समाज का एक विश्लेषण
    राजा भैया के आदमियों ने ज़िया उल हक़ सीओ, यू. पी. पुलिस को बड़ी बेरहमी से मार डाला। वह जवान थे, जोशीले थे और ईमानदार भी। वे ग़ुंडों से भिड़ गए। उन्होंने अपनी नई नवेली दुल्हन और अपने बूढ़े माँ बाप का ख़याल भी न किया। हरेक ऐसा नहीं कर सकता। दूसरे भी ऐसा न कर सके। वे पहले देखते रहे और फिर उन्हें बदमाशों के क़ब्ज़े में देखकर भाग लिए। उनमें से कुछ को भागने की सज़ा भी मिल गई। उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। इस तरह के मामले में यही सज़ा मिलती है। सस्पेंड होने वाले जानते हैं कि वे कुछ दिन बाद बहाल हो जाएंगे। इसमें ख़र्च भी कम आएगा।
    अगर वे गोली चला देते तो कई बदमाश मारे जाते। उनके परिवार वाले मानवाधिकार आयोग में जाते और तब इन पुलिस वालों पर मासूम नागरिकों के क़त्ल का केस चलता। जांच में ज़्यादा रूपया ख़र्च हो जाता। केस की पैरवी में भी ख़र्च होता और अगर सज़ा हो जाती तो जेल में कई साल भी ख़र्च हो जाते और नौकरी भी हाथ से चली जाती। मैदान से भागने वाले उम्रदराज़ और व्यवहारिक मालूम होते हैं। उन्होंने गोली नहीं चलाई तो केवल एक मारा गया और अगर वे गोली चला देते तो कई लोग मारे जाते और ख़ुद भी सज़ा पाते और हो सकता है कि फ़ायर मिस हो जाते तो उनके हाथों ख़ुद भी मारे जाते।
    कोई पूछ रहा है कि मैदान से भागने वाले ये पुलिसकर्मी वर्दी पहनते हुए आईने में अपना चेहरा कैसे देख पाएंगे ?
    पूछने वाले भाई ब्लॉगर प्रवीण शाह जी हैं। नास्तिक वह हैं ही।
    कोई उनसे पूछे कि ज़िया उल हक़ मरने के बाद अपना चेहरा कैसे देख पाएंगे ?
    भागने वाले आईने में अपना चेहरा न देख पाएं तो भी उनके बीवी-बच्चे और मां बाप तो उनके चेहरे देख पाएंगे।
    ज़िया उल हक़ के परिवार वाले क्या देख पाएंगे ?
    साल भर में ही विधवा होने वाली उनकी बीवी परवीन उनका चेहरा कैसे देख पाएगी ?
    भागने वालों ने जीवन पाया, अपना परिवार बचाया।
    मरने वाले ने क्या पाया ?
    उनसे पहले भी बहुत लोग अपने फ़र्ज़ के लिए मारे जा चुके हैं और उन्हें भुलाया भी जा चुका है। मरने वाले अपनी जान से गए और राजनीति और समाज में कोई परिवर्तन न आया। क़ातिल माफ़िया बदस्तूर हावी हैं। जनता इन्हीं को चुनती है। देश का क़ानून यही बनाते हैं। थोड़ा बहुत जो भी मिलेगा, इनकी दया से ही मिलेगा। जो इनसे भिड़ेगा, वह अपनी जान से जाएगा। अगर भागकर अपनी जान बच सकती है तो कोई अपनी जान क्यों गवांए ?
    जान गंवाकर उसे क्या मिलेगा ?
    सिर्फ़ यही कि वह अपना चेहरा बिना किसी शर्मिंदगी के देख पाएगा ?
    जब शहीदों को जनता भुला देती है तो उन्हें यह शर्मिंदगी का अहसास भी नहीं होता बल्कि उन्हें अपने फ़ैसले पर गर्व होता है कि हम अक्लमंद थे, हमारा फ़ैसला सही था। वह हमारी बात मानता तो वह भी बच सकता था।
    इस तरह के भगोड़े जगह जगह अपनी अक्लमंदी के फ़ैसलों को बड़े गर्व से बयान करते हैं और उनकी हराम की कमाई पर चाय-दारू पीने वाले उनकी वाह वाह करते हैं।
    शहीदों के घरों हाय, हाय का माहौल होता है और भगोड़ों के घरों में वाह वाह का। उनके घरों में से कोई एक भी उन्हें शर्म नहीं दिलाता। यह हमारे समाज की तस्वीर है। इसीलिए कोई भगोड़ा यह फ़िक्र क्यों करे कि
    "अगली सुबह जब वह कायर भगोड़े आईने के सामने अपनी वर्दी के बटन लगा रहे होंगे तो कैसे देख पाये होंगे अपने चेहरे को ?

    कैसे वह सामना करेंगे अपने बाकी साथियों का ?"
    Link:
    http://hbfint.blogspot.in/2013/03/blog-post.html

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  8. बहुत ही दुखद घटना, अभी भोपाल के पास रेलवे के कर्मचारियों को जला कर मार डाला था, क्या हो गया है हमको?

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  9. बहुत ही दर्दनाक

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  10. मुझे नहीं लगता कि उन पुलिसकर्मियों को केवल भगौड़ा कहना काफी होगा बल्कि मुझे तो इस साजिश में वो भी शामिल नजर आते हैं क्योंकि यह कैसे माना जा सकता है कि वो पुलिसवाले जिया-उल-हक के साथ थे और वो लोग भागने में कामयाब हो गए और जिया-उल-हक अपने को बचा नहीं पाए बल्कि पहली नजर में देखने पर यही लगता है कि उन्ही पुलिस वालों के भरोसे वो वहाँ तक पहुंचे थे या फिर यूँ कहें कि उन पुलिसवालों ने हि साजिश करके उनको वहाँ तक ले गए थे जहां पहले से सुनियोजित मौत उनका इन्तजार कर रहे थे इसलिए उन पुलिसवालों को केवल भगौड़ा कहकर छोड़ देना सही नहीं होगा !!

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  11. जो भी हुआ बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण,शर्मनाक है!

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