रविवार, 24 मार्च 2013

लीजिये, बाँट ही दी उपाधियाँ... भाई, बुरा न मानो होली है ssssss

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सबसे पहले तो एक सूचना... आपने देख ही लिया होगा कि अब अपना नाम मैंने 'प्रवीण शाह' की बजाय 'प्रवीण' लिखा है... करना तो यह बहुत पहले से चाह रहा था पर न जाने क्यों, बार बार भूल सा जाता था... फिर रतन सिंह शेखावत जी ने लिखा जातिप्रथा को कोसने का झूठा ढकोसला क्यों ? (लिंक) जिसमें उन्होंने सवाल उठाया कि "जातिप्रथा को गरियाने वाले लोग भी अपने नाम के पीछे क्यों जातिय टाइटल चिपकाये घूमते है ? समझ से परे है !!"... तो मन किया कि सबसे पहले तो अपने पिछवाड़े खुद ही दो लात लगाई जाये... नतीजा और सबक अब यह है कि आगे से मैं 'प्रवीण' ही कहलाना पसंद करूंगा...

अब बात पिछली पोस्ट एडवांस ऑर्डर मिलने पर होली की उपाधियाँ बांट रहा हूँ... लेंगे क्या ? (लिंक) की... सबसे पहले तो एक स्वीकारोक्ति... यह मेरी एक सुविचारित तरकीब (Deliberate Ploy) थी जिसके तहत मैंने कुछ इस तरह का माहौल बनाया मानो उपाधि देने के नाम पर मैं किसी के कपड़े ही फाड़ बैठूंगा... जबकि मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाला था... मैं सिर्फ यह चाहता था कि वही सहमति दें जिनके बारे में कुछ लिखा जा सके... यह मंतव्य कामयाब हुआ और मुझे यह बताते हुऐ खुशी हो रही है कि जिन तेरह ब्लॉगरों ने अपनी सहमति दी है वे विशाल हॄदय युक्त, उदारमना, संवाद व अभिव्यक्ति के महत्व को समझने वाले व सबसे बढ़कर स्वयं के प्रति आश्वस्त लोग हैं, जिन्हें विश्वास है कि वह किसी भी स्थिति को नियंत्रित कर सकते हैं... 

मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूँ कि मेरी इस पोस्ट से उनके यह गुण और बढ़ेंगे ही... 

मुझे लगता है कि कुछ और सहमतियाँ मुझे मिलनी चाहिये थीं, पर हो सकता है वह लोग अब मेरा ब्लॉग नहीं पढ़ते या मैं उनके स्तर का नहीं लिखता...  

खैर... शहरयार ने कहा भी है न कभी...  

किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता 
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता
जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है
जुबां मिली है मगर हमज़ुबां नहीं मिलता

 
मित्र विचारशून्य ने हिन्दी ब्लॉगिंग की मंदी का हवाला दे जितनी सहमतियाँ मिली हैं उन्हीं से काम चलाने को कहा है... और मुझे यह सलाह जंची भी है... इसलिये शुरू कर रहा हूँ उसी क्रम में, जिसमें यह सहमतियाँ मिली हैं...


संजय अनेजा :- उनका ब्लॉग 'मो सम कौन' ब्लॉगवुड के सबसे लोकप्रिय ब्लॉगों में से एक है... रोजमर्रा की जिंदगी में हास्य ढूंढते कमाल के किस्सागो हैं वह... अगर वह कहीं अपनी असहमति भी दर्ज करते हैं तो बड़ी नफासत से... जीवन का उत्सव अपनी पूरी शान से दिखता है उनके लेखन में...

तो होली पर उनके लिये तुम सम कौन सरल-सहज-निष्काम


सुज्ञ जी :- नका आभामंडल बहुत विशाल है, और अनेकों उनके भक्त-प्रशंसक हैं... वह ब्लॉगवुड में धर्म-अध्यात्म-आस्था-समर्पण के ध्वजवाहक हैं और मैं एक अदना सा संशयवादी... जाहिर है कि अनेकों बार हमारे विचार नहीं मिलते... उन्हें लगता रहा है कि मैं या तो उनका विधर्मी हूँ या विधर्मियों से मिला हुआ...पर उन्होंने हमेशा संवाद बनाये रखा है... कभी कभार जब वह यह तक कह देते हैं कि भले शोषण के बहाने हिंसा करे, अन्याय के बहाने हिंसा करे, किसी भी तरह शिकार करे या चाहे धर्म के बहाने हिंसा करे, हिंसको को मैँ हिंदु नहीं मानता. यह मेरा व्यक्तिगत अभिप्राय है और मेरा बस चले तो हिंसाचारियों को मैं भारतीय तक न मानूँ.क्योँकि अहिंसा भारतीय संस्कृति की महान परम्परा है.(लिंक) तो मुझे यह अतिवाद सा लगता है और मैं असहमति जताता हूँ... पर उनसे संवाद-प्रतिवाद करना मुझे अच्छा लगता है और यह चलता रहेगा...

तो होली के मौके पर 'भय्यू जी महाराज' की तर्ज पर सुज्ञ जी हैं ब्लॉगवुड के भैय्या-बाबा


पी. सी. गोदियाल 'परचेत' जी :- वह कार्टून, कविता, कहानी, लेख, व्यंग्य सभी विधाओं में अपना हाथ आजमाते हैं... हिन्दुत्ववादी-दक्षिणपंथी लगते हैं... 'अंधड़' में ज्यादातर बार वह बहुत धारदार होते हैं... मुझे उनका स्नेह हमेशा मिला है, बड़े भाई की तरह...

तो इस होली पर गोदियाल जी हैं हर अंधड़ पर ब्लॉगवुड की तिरछी नजर


सन्जय झा जी :- हालांकि उनका अपना ब्लॉग भी है पर उसमें उन्होंने बहुत कम लिखा है... मूलत: वह एक पाठक हैं... एक ऐसा पाठक जिसे पाकर हर ब्लॉगर अपने को धन्य समझेगा... जब मैं अपनी लंबी कहानी (लिंक) लिख रहा था... तो कई कई बार यह होता था कि मुझे लगता था कि कोई पढ़ तो रहा नहीं, सो लिखने का क्या फायदा... और अचानक संजय जी की टीप मिल जाती थी... हौसला देती हुई...

होली के मौके पर संजय जी के लिये पाठक-माईबाप तुझे प्रणाम !

अन्तर सोहिल जी :-  उनके ब्लॉगहेडर पर लिखा है, अन्तर सोहिल = Inner Beautiful.. और आप उनके आलेखों को पढ़ें तो उनकी इसी अंदरूनी सुन्दरता से रूबरू होते हैं... बिना किसी दिखावे, बनाव-श्रंगार के एकदम दिल से लिखते हैं... अपने संघर्ष के दिनों का बेहद ईमानदार और मर्मस्पर्शी वर्णन करते हैं वह... सांपला का यह ब्लॉगर मन-वचन और कर्म तीनों से अन्तर-सोहिल है...

होली के मौके पर उनके लिये तेरा अन्तर है सबसे सफेद !


रविकर जी :- दिनेश चंद्र गुप्त 'रविकर' जी ने पिछले कुछ समय से अपनी त्वरित काव्य टीपों के माध्यम से एक जबरदस्त उपस्थिति जताई है... मुझे तब बहुत आनंद आता है जब उनके राष्ट्रवाद पर कोई सवाल उठाता है और वह जवाब में आरएसएस के उन सब कैंपों को गिनाने लगते हैं जिन्हें उन्होंने अटैंड किया है और वह पद भी जिन पर वह रहे हैं... रविकर जी सब पर गहरी नजर रखते हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि उनके लिये कोई अछूत नहीं है, यह बहुत बड़ी बात है...


'काका हाथरसी' की याद दिलाते रविकर जी हैं ब्लॉगवुड-काका 


सतीश सक्सेना जी :- मैं उनका फैन हूँ... बेहद जज्बाती इंसान हैं वह... हरदिल अजीज, दोस्तों के दोस्त सतीश जी बेहद भावपूर्ण गीत रचते हैं... जितनी जल्दी वह गर्म होते हैं, ठंडा होने में उस से भी कम देर लगती है... उन्हें अलग अलग पोज-लिबास में अपनी फोटो देखना-दिखाना बहुत अच्छा लगता है... उनके लिये चंद लाइनें...

'मेरे गीत' नहीं मात्र तेरे गीत
वह तो हम सबके भी हैं, मीत
छोटी सी है  यह चाहत मेरी 
ताजिंदगी सुनता रहूँ 'मेरे गीत'

तो इस होली के मौके पर सतीश जी हैं ब्लॉगवुड का गीत-सबका मीत


शाह नवाज जी :- शाहनवाज बेहद सुलझे हुऐ ब्लॉगर हैं... अक्सर मेरे विचार उनके विचारों से मिलते हैं... वह हमारीवाणी को चलाते भी हैं शायद... उनके स्वधर्मी कुछ ब्लॉगरों के निशाने पर भी वे हमेशा रहते हैं जिनको लगता है कि शाहनवाज उनके लिये कुछ नहीं कर रहे... 'प्रेम रस' और 'छोटी सी बात' कभी आपको निराश नहीं करते...

होली पर शाहनवाज जी के लिये 'उस' का ईमानदार आशिक

'उस' का अर्थ शाहनवाज जी ही बतायें तो बेहतर...


वन्दना गुप्ता जी :- वन्दना जी बहुत अच्छी कवयित्री हैं... उन्होंने टैबू समझे जाने विषयों पर भी बड़ी निडरता से लिखा है... हालांकि एक बार दबाव के चलते उनका पोस्ट हटा देना मुझे अच्छा नहीं लगा पर स्त्री न होने के कारण मैं उन दबावों की कल्पना भी नहीं कर सकता जो उस समय वह झेल रही थीं... फिर भी वह निडरता से बोल्ड लिखना जारी रखे हैं...

तो वन्दना जी हैं ब्लॉग-दिलेर


अरविन्द मिश्र जी :- यह कोई छुपी हुई बात नहीं कि मैं उनको पसंद करता हूँ... कभी कभी मेरा उनको 'देव' संबोधित करना रचना जी को काफी खलता है... मुझे पता नहीं कि कैसे एक बार उनको लगने लगा कि मैं कोई और नहीं, अपितु 'रचना जी' ही हूँ... उनके मेरे विचार अनेकों बार एक से ही होते हैं... वह सबमें हिट हैं.. मासेज-क्लासेज दोनों में... पुरूषो-महिलाओं सभी में... अक्सर शरारत सी भी  कर बैठते हैं... सरे आम प्रणय निवेदन तक कर देते हैं ब्लॉग में... 

तो अरविन्द जी हैं ब्लॉगवुड के सलमान खान


रचना जी :- रचना जी ब्लॉगवुड नारीवाद की पुरोधा हैं और स्त्री हितों के लिये किसी भी हद तक जाकर लड़ सकती हैं... वह पिछली लड़ाईयों को भूलती नहीं कभी और अवसर मिलने पर उनका भी हवाला दे प्रहार कर देती हैं... कई बार मैं भी उनसे असहमत होता हूँ और उनसे जमकर बहस होती है... पर संवाद वे हमेशा बनाये रखती हैं... यह श्रेय भी उनको दूंगा कि उन्हें कभी यह नहीं लगा कि मैं 'अरविन्द मिश्र' हूँ... मैं चाहूँगा कि मेरी बेटियाँ रचना जी सी बनें, बड़े होकर...

होली पर रचना जी के लिये उपाधि है ब्लॉगवुड-देवि


विचार शून्य जी :- मेरी जानकारी के मुताबिक उनका नाम दीप पान्डेय है... भले ही उनके ब्लॉग का नाम विचार शून्य हो पर उनमें एक खासियत है कि किसी भी मुद्दे पर गहन विचार मंथन चल जाता है उनके ब्लॉग में... आजकल कुछ कम सक्रिय हैं... पर उनका अपनी बात कहने का अनूठा अंदाज उनकी टीपों में भी झलकता है...

तो विचारशून्य जी हैं ब्लॉगवुड-विचारदीप


शिखा गुप्ता जी :- 'स्याही के बूटे' उन्होंने फरवरी में बनाया... मुख्यत: कवितायें लिखती हैं... अच्छी लगी उनकी कवितायें... हम सभी उनको ज्यादा अच्छी तरह से तब जान पायेंगे जब वह विभिन्न मसलों पर अपने विचार टिप्पणियों के रूप में देंगी...

फिलहाल वह हैं ब्लॉग-संभावना




सोच रहा हूँ उनके लिये भी कुछ कहूँ जो पोस्ट तक आये तो... पर सहमति नहीं दी... :(


शालिनी कौशिक जी 

कभी उनकी 'महक' मिली थी
अब दिखता है 'नूतन' 'कौशल'


दिनेश पारीक जी

पढ़ आये भाई साहब
बहुत सुन्दर, आभार, आपने अपने अंतर मन भाव को शब्दों में ढाल दिया !


अली सैयद साहब 

एक लम्बे इंतजार के बाद, आखिर कार
वो भी आये हमारे दर पर, यह हमारी किस्मत है
कभी हम उनको, कभी अपने दर को, देखते हैं ।




आभार आप सभी का...
और होली की शुभकामनायें भी...












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शुक्रवार, 15 मार्च 2013

एडवांस ऑर्डर मिलने पर होली की उपाधियाँ बांट रहा हूँ... लेंगे क्या ?

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होली 'त्यौहारों का त्यौहार' है... खूब मौज-मस्ती होती है इस दिन...न कोई बड़ा और न कोई छोटा... आप हर किसी के गले मिलते हैं, उसे रंगों से सराबोर करते हैं... और उससे वह बात भी कह देते हैं जो आप किसी न किसी लिहाज के चलते साल भर नहीं कह पाते... 

होली पर 'उपाधियाँ' बाँटने का दौर स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा' (link) जी  शुरू कर ही चुकी हैं।(link)... 

अरविन्द मिश्र जी बता रहे हैं कि कई और जगहों से भी उपाधियाँ बंटेंगी... वह लिखते हैं होली की उपाधि देने की परम्परा बड़ी पुरानी है, और यह पढ़े लिखे लोगों का एक शगल है -होली के अवसर पर हंसी मजाक करने का बस -इसे दिल पर लेने की बात ही नहीं होनी चाहिए .मगर यह भी सही है कि प्रायः उपाधि देने वाले का निजी मूल्यांकन किसी के बारे में काफी भावनिष्ठ हो जाता है -उपाधि पाने वाले को चोट सी लगती है कि अरे लोग मेरे बारे में ऐसा सोचते हैं,जबकि मैं तो ऐसा नहीं , लोग कहें भले न कई बार उपाधियाँ लोगों को चुभ जाती हैं -मगर फिर भी उचित तो यही है कि इन्हें गंभीरता से न लिया जाय ,बस हल्के फुल्के ही लिया जाय . अभी ब्लॉग जगत में कुछ और उपाधियाँ नामचीन ब्लागरों से और आने वाली हैं ऐसी अन्दर की खबर मुझे मिली है और मैं मानसिक रूप से खुद को उन्हें हंसी खुशी स्वीकार करने के लिए तैयार कर रहा हूँ और आपसे भी यही गुजारिश है .वैसे कभी कभी दूसरों की निगाहों से खुद का मूल्यांकन जरुर करना चाहिए! (link)

उपाधि देने के दौरान उपाधि देने वाला एक तरह से आपकी खिंचाई सी करता है... कभी आपके किसी कथन या कृत्य को exaggerate कर के, या आपकी किसी विशेषता को हाईलाइट कर, या आपकी किसी आदत का मजाक उड़ा,  या आपके बारे में एक अनूठी सी राय जाहिर कर... तरीका कोई भी हो, मूल भाव यही रहता है कि आप थोड़ा सा चिढ़ें, थोड़ा खीजें, थोड़ा दाँत पीसें, थोड़ा शर्मा जायें, थोड़ा खिसियायें आदि आदि... पर उपाधियाँ किसी को भी उसके व्यक्तित्व के अनजाने अनछुऐ पहलुओं के बारे में भी बता जाती हैं कभी कभी...

अपना भी आपमें से कुछ को उपाधि देने का मन है... पर थोड़ा फर्क है मेरी दी गयी उपाधियों में... मैं लोकतंत्रीकरण सा कर रहा हूँ इस प्रक्रिया का...

पहला-    उपाधि केवल उसी को दी जायेगी जो अपनी टीप के माध्यम से अपनी रजामंदी यानी सहमति देगा मुझे !

दूसरा- कम से कम चौबीस ब्लॉगरों की रजामंदी मिलने पर ही मैं यह काम करूंगा ।

तीसरा- मैं अपनी दी गयी किसी उपाधि को एक्सप्लेन नहीं करूंगा... आप खीजें, गुस्सायें, मुझ से नाराज हो जायें, हमेशा के लिये कुट्टी कर लें... जो भी करें,आपकी मर्जी... मेरी बला से... हाँ आप अपने जवाब में मुझे जो चाहे कहें ( अपने को कोई फर्क नहीं पड़ता, आज तक कभी पड़ा क्या ? )...

मैं पढ़ता लगभग सभी को हूँ... यह बात अलग है कि अपनी कुछ मजबूरियों के चलते ज्यादा जगह टीप नहीं पाता... इसलिये कोई भी अपने लिये उपाधि आर्डर कर सकता है...

ऑर्डर २१ मार्च, २०१३ को रात्रि ग्यारह बजे तक ही लिये जायेंगे... और तेईस मार्च की पोस्ट में उपाधियाँ बाँटी जायेंगी...


तो,
सोच क्या रहे हैं...
अरे रे,
रूकिये जरा...
सोच ही लीजिये...
बार बार और कई बार
झेल पायेंगे क्या ?


... ;)







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मंगलवार, 12 मार्च 2013

सवाल, सवाल और सिर्फ सवाल...

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आखिर
क्या लिखा जाये
क्यों
किस लिये
और 
किसके लिये


कुछ होगा
क्या
लिखने से
जैसे कि
कुछ बदला है
आज तक
शब्दों ने


यह
बड़ा भयावह
समय है
कलम के लिये
इसलिये नहीं
कि
खतरे हैं
लिखने में


पर
इसलिये कि
लोग 
सिर्फ और सिर्फ
वही
पढ़ना चाहते हैं
जो वह
जानते हैं
मानना चाहते हैं
या जिसे वह 
मानते हैं


आओ दोस्त
तोड़ कर
फेंक देते हैं
अपनी कलमें भी
क्योंकि
अब
नहीं सहा जाता
यह तनाव


आओ
अब बनकर जियें
एक सभ्य
साधारण और
सामान्य शहरी
जिसे
नहीं करते परेशान
कोई भी सवाल


जो
जी रहा है 
सदियों से
सर झुका
रखे आस्था समर्पण
और विश्वास
वह जो
कभी भी
सोचता तक नहीं
कुछ बदलने की


आओ दोस्त
हम ही बदलें
हम गलत थे
यह दुनिया
नहीं बदलेगी
कभी भी
आखिर
हमें ही
बदलना होगा


छोड़ो यह 
सोचना
सवाल करना
और लिखना भी
तोड़ डालो
यह कलम
करो
कुछ काम 
का काम
तुम भी अब
बन जाओ
हर किसी
की तरह ही !


खुश रहोगे !







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गुरुवार, 7 मार्च 2013

मेरा जवाब... जाने दो दोस्त, हमें मालूम है वहाँ की हकीकत और अंजाम भी...

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मेरे 'उस' के निर्णय की प्रतीक्षारत मित्रों,

दोस्तों, एक बहुत बड़ा प्रलोभन धर्म देता है 'अपने मानने वालों' को... और वह 'लालच' है Heaven या स्वर्ग या जन्नत का... इस लालच का आधार व वादा सभी धर्मों में कमोबेश एक सा ही है...

और वह है कि...

'मानने वाला' अपने अपने धर्म के बताये अनुसार अपने अपने धर्म-स्थल में जाकर नियम पूर्वक रोजाना 'उस' का Ego Massage करे, गुण गाये 'उसके', झुके 'उसके' आगे, 'उसकी' कृपा मांगे, शुक्रिया करे उसका यह दुनिया और 'तुम' को बनाने के लिये, जाने अनजाने में 'उसकी' शान में हुऐ गुनाहों की माफी माँगे, कुछ खास 'जगहें' (तीर्थ स्थान) जहाँ शायद 'वो' ज्यादा रहता है-उन 'जगहों' की यात्रा करें, उसके प्रति अपनी वफा जताते हुऐ भूखे रहें कुछ खास दिन और यह सब करते-करते थक कर एक दिन विदा हो जाये इस 'जहान' से...

अब इसके बाद रोल शुरू होता है 'उस' का... कुछ धर्मों के मुताबिक मरने के एकदम बाद और कुछ के मुताबिक एक नियत दिन (कयामत का दिन) 'तुम' सारों का 'फैसला' होगा... और जिन्दा रहने के दौरान कितनी वफादारी दिखाई तुमने 'उस' के प्रति... इस 'पैमाने' पर नाप कर 'तुम' को वह भेजेगा स्वर्ग या नर्क में...



ऐसा होगा नर्क-जहन्नुम-Hell

यह कैदखाना कमोबेश सभी जगह एक सा है... प्रताड़नाओं में शामिल है आग से जलाना, भूखा-प्यासा रखना, खौलता पानी शरीर पर डालना, खौलता पानी पीने को देना, बिना इलाज के छोड़ देना आदि आदि... बहुत गंदा और बदबूदार स्थान है यह!


और यह रहा स्वर्ग-जन्नत-Heaven

नर्क तो आदमी और औरत दोनों का है पर स्वर्ग केवल पुरूषों के लिये ही बनाया प्रतीत होता है अधिकाँश धर्मों मे...यहाँ मिलेंगी अति सुन्दर चिर-कुंवारी, चिर-यौवना अप्सरायें या हूरें... जिसे चाहें भोगें... पानी की जगह नालियों में बहती होगी 'सुरा' या शराब... सुगंध होगी... संगीत होगा... एअर कंडीशनिंग भी होगी वहाँ!
अब यह बात दीगर है कि इन्ही सब चीजों का जिन्दा रहते निषेध करता है हर कोई 'धर्म'...



यहाँ तक तो सब ठीक है पर एक अडंगा है.......

स्वतंत्र इच्छा या Free Will
जिस पर 'उस' का कोई जोर नहीं है!


एक सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष जो आप इस स्वर्ग-नर्क-फैसले की अवधारणा से निकाल सकते हैं वह यह है कि Free Will यानी किसी इंसान की स्वतंत्र इच्छा पर ईश्वर का कोई नियंत्रण नहीं है क्योंकि यदि होता तो पृथ्वी का हर इंसान 'उस' का ही कहा मानता और 'फैसले' की कोई जरूरत ही नहीं होती ।

धर्म अपने पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह देता है कि 'फैसले' के खौफ से ज्यादातर इन्सान नियंत्रण में रहते हैं क्योंकि वो नर्क की आग से डरते हैं और स्वर्ग के सुख भोगना चाहते हैं... इसका एक सीधा मतलब यह भी है कि अधिकाँश Hypocrite= ढोंगी,पाखण्डी अपने मूल स्वभाव को छुपाकर, अपनी अंदरूनी नीचता को काबू कर, नियत तरीके से 'उस' का नियमित Ego Massage करके स्वर्ग में प्रवेश पाने में कामयाब रहेंगे...

और एक बार स्वर्ग पहुंच कर मानवता की यह गंदगी (Scum of Humanity) अपने असली रूप में आ जायेगी... क्योंकि इनकी Free Will (स्वतंत्र इच्छा) पर 'उस' का कोई जोर तो चलता नहीं!


और कुछ समय बाद Hypocrite= ढोंगी,पाखण्डी मानवता की यह गंदगी (Scum of Humanity) स्वर्ग-जन्नत को नर्क-जहन्नुम से भी बुरा बनाने में कामयाब हो जायेगी।




फिर आप ही सोचो कि, होंगे कितने फैसले... और कितनी बार कयामत होगी ?





आभार!






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मेरी यह पोस्ट मुझ पर अपने कुछ मित्रों द्वारा उछाले एक सवाल का जवाब है... मेरे जो पाठक ब्लॉगवुड पर नजर रखते हैं वह संदर्भ समझ ही लेंगे... जिन्हें संदर्भ समझ नहीं आ रहा वह संदर्भ समझने का प्रयास न कर पोस्ट को एक विचार बिन्दु के तौर पर लें... यह पोस्ट दूसरे शीर्षक के साथ इस ब्लॉग पर पहले भी आ चुकी है... 




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मंगलवार, 5 मार्च 2013

कैसे वह आईने में देख पायेंगे खुद को ?

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घटना यह उत्तर प्रदेश की है... पर यह किसी भी प्रदेश की हो सकती है/थी ।

मरने वाले शहीद अधिकारी का नाम है डेपुटी सुपरिन्टेन्डेन्ट ऑफ पोलिस जिया उल हक... पर यह नाम कुछ और भी हो सकता है/था ।

वाकया कुछ इस तरह से है... अपने कुछ साथियों की हत्या से गुस्साई, उग्र, आक्रामक और हथियार बंद एक भीड़ है एक गाँव में, जो अपने विरोधियों के घरों, संपत्तियों व जान को निशाना बना रही है... अधिकारी क्योंकि उस इलाके का सर्किल ऑफिसर है, तो यह उसकी जिम्मेदारी है कि कानून व्यवस्था कायम रहे...
वह जाता है उस गाँव में... उसके साथ हैं एक इंस्पेक्टर, पाँच दारोगा (सब इंस्पेक्टर), उसके गनर और न जाने कितने अन्य हथियारबंद कॉन्स्टेबल... वह टीम का कमांडर है...

वह गाँव में घुसने की कोशिश करते हैं, इस टीम पर हमला होता है और तब वह घटता है जो शर्मनाक है... कायरता की हदें पार करते हुऐ अपने कमाँडर को मरने के लिये अकेला छोड़ बाकी सब भाग जाते हैं ।
लुच्चे लफंगों व असामाजिक तत्वों की वह भीड़ उस बहादुर अफसर को अकेला पा जाती है... कुछ घंटों के बाद उसकी लाश मिलती है, उसे तीन गोलियाँ एक गोली (पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार)लगी है और शरीर पर और भी चोटों के निशान हैं ।

बातें हो रही हैं राजनीतिक और आपराधिक षड़यंत्रों की, पर मेरी इस पोस्ट का यह उद्देश्य नहीं है...

मेरा सिर्फ यह कहना है, कि...

पुलिस एक वर्दीधारी बल है... यह ठीक है कि वर्दीधारियों को तन्ख्वाहें मिलतीं हैं जिनसे उनके परिवार का गुजारा होता है... पर कोई भी इंसान वर्दी मूल रूप से रोजगार के लिये धारण नहीं करता... वर्दी धारण करने के पीछे मूल भाव होता है 'इज्जत' का... अपने बल की इज्जत, अपनी इकाई की इज्जत, अपने कमाँडर की इज्जत, अपने साथियों की इज्जत, अपनी खुद की इज्जत और सबसे बढ़कर अपनी वर्दी की इज्जत... जान गंवाना इस इज्जत के सामने बहुत अदना बलिदान है।

पर फिर भी वह कायर भगोड़े भाग गये, अपने कमाँडर को मरने के लिये छोड़कर...


कुछ सवाल जो उठते हैं दिमाग में...


अगली सुबह जब वह कायर भगोड़े आईने के सामने अपनी वर्दी के बटन लगा रहे होंगे तो कैसे देख पाये होंगे अपने चेहरे को ?

कैसे वह सामना करेंगे अपने बाकी साथियों का ?

क्या और कैसी सजा मिलेगी उनको ?... 

मैं नहीं जानता कि इस कायरता और कर्तव्यच्युत होने के लिये पुलिस में क्या सजा होती है... पर विश्व की अधिकांश  सेनाओं में इस अपराध की सजा मृत्युदंड है ।(लिंक)

 


कायरता ूत की बीमारी की तरह पूरे तंत्र को घेर लेती है ।
Act before it is too late !
कुछ करो, से पहले कि बहुत देर हो जाये !



कर्णधारों, इतना तो कम से कम सुनिश्चित करो कि वह कायर भगोड़े अपनी जिंदगी में दोबारा वर्दी न पहनें !











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