शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

आतंक की जड़ें पहचानिये और उनको खोद डालिये, महज बम फोड़ने वालों के पीछे जा कर कुछ हासिल नहीं हो पायेगा... Hunt down the real Bastards !

.
.
.



हैदराबाद बम ब्लास्ट दुखद थे... निर्दोषों की जान-माल का नुकसान हमेशा आपको एक दुख और एक अजीब से गुस्से से भर देता है... आदमी सोचने लगता है कि अपने ही मुल्क में शाम के समय बाजार को निकलना भी इतना खतरनाक हो गया है... और फिर यही गुस्सा उसको मजबूर कर देता है तमाम अजीबोगरीब और असंतुलित प्रतिक्रियायें देने के लिये... जिसमें वह हर किसी को नाकारा और नामर्द ठहराने लगता है... यही आज हो रहा है...

पर मैं नहीं मानता कि आतंक से लड़ने के मोर्चे पर हम विफल रहे हैं... टीवी पर ही कोई चैनल बता रहा था कि २००५ से आज तक आठ साल में कुल २८ वारदातें हुई हैं और तकरीबन ९०० शिकार... हम १२५ करोड़ का मुल्क हैं... सीधा सा हिसाब है कि साल भर में एक करोड़ आदमियों में एक आतंक का शिकार होता है... जबकि आतंक की जमीन तैयार करने में इतना बड़ा तबका लगा है...भले ही अपनी पीठ नहीं थपथपा सकते पर यह आंकड़ा इतना बुरा भी नहीं है और दुनिया के तमाम तथाकथित 'आतंक के खिलाफ सख्त' मुल्कों से बेहतर है... निश्चित तौर पर इसका श्रेय गिरे मनोबल के साथ, संसाधन विहीन हालातों में राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच काम करती हमारी पुलिस, खुफिया संगठनों व सुरक्षा बलों को जाता है...

यह सच है कि, आतंक को धर्म से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता... पर उतना ही बड़ा सच यह भी है कि निर्दोषों का खून बहाने के लिये यह बम फोड़ने का कायर काम किया धर्म के नाम पर ही जा रहा है... ठीक उसी तरह दूसरा सच यह है कि अभी तक की वारदातों में कई धर्मों के लोगों के नाम सामने आये हैं... पर यह भी एक बड़ा सच है कि ज्यादातर वारदातें, भारत ही नहीं पूरी दुनिया में, एक धर्मविशेष से जुड़े आतंकी कर रहे हैं...

क्यों हो रहा है ऐसा... यह सबसे बड़ा सवाल होना चाहिये... बम बनाने, प्लांट करने-फोड़ने वाले लड़के तो 'फुट-सोल्जर' हैं इस आतंक की इंडस्ट्री के... पर कोई इंसान एक दिन अचानक आतंकी नहीं बन जाता... उसे धीरे धीरे जहरीला बनाया जाता है... रात दिन उसको याद दिलाया जाता है उसके दिमाग में ठूंसा जाता है... कि, उसका धर्म ही दुनिया का एकमात्र असली और सबसे महान धर्म है... कि, उसके धर्म के साथ मुल्क में नाइंसाफी हो रही है, और दूसरे धर्म को बढ़ावा दिया जा रहा है... कि, उसे अपने धर्म का लड़ाका बनना चाहिये... कि, ऐसा करके वह दूसरी दुनिया का सिकंदर हो जायेगा... कि, ऐसा करके दुनिया उसी के धर्म को एक दिन मानने लगेगी... कि, उसके धर्म का ईश्वर यही चाहता है...

सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि 'फुट सोल्जर' आतंकी तो अपनी जान बचाने के लिये बिलों में छुपने को मजबूर हैं पर उनको उनके दिमाग में जहर भर तैयार करने वाले आतंक के सेनापति खुले हैं, आजाद हैं... नेतागण उनके पैरों तले बैठे रहते हैं... प्रशासन को मजबूर किया जाता है उनके हितों का ध्यान रखने के लिये उनके कारनामों को नजरअंदाज करने के लिये... उनके पक्ष में कांव कांव करते आयातित बुद्धि वाले बुद्धिजीवी, मीडिया व आतंकी-अधिकार वादियों की फौज भी है ही...

आप आतंक के पेड़ के दो-चार पत्ते तोड़ कुछ हासिल नहीं कर सकते... इससे मुक्ति चाहते हैं तो जड़ों को खोद डालिये... जड़ें कहाँ हैं, सबको पता है, दिखता है, किसी से छुपा नहीं है यह...

सवाल सिर्फ इतना है कि आज क्या हमारे पास हौसला है कि हम अपने तंत्र को यह आदेश दे सकें कि वह 'असली हरामियों' का शिकार करे...





...

6 टिप्‍पणियां:

  1. दूसरी दुनिया का सिकंदर बनने के लिए अपने ही धर्म के लोगों को मारने की तालीम धर्म विशेष में नहीं है। किसी भी मासूम नागरिक को मारने की तालीम नहीं है, लेकिन उसकी चर्चा करना उददेश्य नहीं है।
    आतंकवाद का लाभ धर्म विशेष के लोगों को नहीं मिलता। इसका लाभ हथियार और हैलीकॉप्टर बेचने वाले पश्चिमी देशों को मिलता है। देसियों को इसमें मोटा कमीशन मिलता है। युद्ध की आशंका और आतंकी घटनाओं के बाद सेना का आधुनिकीकरण शुरू कर दिया जाता है और इसके लिए बहुत सा सैन्य सामान ख़रीदना ज़रूरी हो जाता है। आतंकवादी घटनाओं के बाद किसी विशेष राजनीतिक पार्टी के लिए वोटों का ध्रुवीकरण भी होता है।
    आतंकवाद से बहुत से लोगों के आर्थिक और राजनैतिक उददेश्य पूरे होते हैं और हो रहे हैं। आतंकी आतंक न भी करें तो भी उनके नाम से ये करते रहेंगे।
    आतंकवादी घटनाएं कांग्रेस को विफल साबित करती हैं और केन्द्र में दूसरे दल के आने के लिए रास्ता हमवार करती हैं। दूसरे दल के केन्द्र में आने के लिए रास्ता धर्म विशेष के लिए क्यों हमवार करेंगे ?
    अपना रास्ता हमवार करने के लिए यहां कोई कुछ भी कर सकता है क्योंकि प्यार और जंग में सब कुछ किया ही जाता है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. वही इच्छाशक्ति आ जाये जो अमेरिका में 9/11 के बाद आयी थी, इसे जड़ तक खोद डालने की।

    उत्तर देंहटाएं
  3. भाई कुछ ज्यादा ही तल्ख़ हो गए. लेकिन ज़रूरी भी है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस मुद्दे पर हम सभी को साथ होना होगा -इसे हिन्दू मुस्लिम के आईने से नहीं देखा जाना चाहिए

    उत्तर देंहटाएं
  5. प्रवीण भाई,आप तो शायद खुद सैन्य पृष्ठभूमि रखते हैं, इस मामले में आपसे ज्यादा अनुभवी मैं नहीं। इस सबके बावजूद कहना चाहता हूँ कि जड़-पत्ते वाली बातें ठीक हैं लेकिन कहते हैं न कि सिर्फ़ बातों से पेट नहीं भरता। इन तथाकथित पत्तों की वजह से जिनकी जान जाती है, वो पत्ते नहीं बल्कि जीते जागते इंसान होते हैं। जो तबाह होते हैं, वो टहनियाँ नहीं, भरे पूरे परिवार होते हैं।
    एक के बाद एक हादसे(सिर्फ़ बम विस्फ़ोट मामलों की बात नहीं कर रहा), उत्तर-पूर्व की हिंसा, आजाद मैदान जैसे मामले, इन्हें देखेंगे तो पता चलेगा कि हवाओं का रुख किस तरफ़ है।
    आपका सवाल तो अनुत्तरित ही रहेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  6. कुछ पत्ते और.....

    http://news.oneindia.in/2013/03/13/srinagar-terror-attack-on-crpf-camp-2-terrorists-killed-1170365.html

    उत्तर देंहटाएं

मेरे इस आलेख को पढ़ कर ही यदि आपके मन में कोई विचार उत्पन्न हुऐ हैं तो कृपया उन्हें 'नेकी कर दरिया में डाल' की तर्ज पर ही यहाँ टिप्पणी रूप में दर्ज करें... इस टिप्पणी के पीछे कोई अन्य छिपा हुआ मंतव्य न रखें, आप इसे उधार में मुझे दी गयी टिप्पणी न समझें, प्रतिउत्तर में आपके ब्लॉग पर टिप्पणी करने की किसी बाध्यता को मैं नहीं मानता व मुझसे या किसी अन्य ब्लॉगर से भी ऐसी अपेक्षा रखना न तो नैतिक है न उचित ही !... मैं किसी अन्य के लिखे आलेखों पर भी इसी नियम व भावना के तहत टिपियाता हूँ !

असहमति को इस ब्लॉग पर पूरा सम्मान दिया जाता है, आप मेरे किसी भी विचार का खुल कर विरोध या समर्थन कर सकते हैं, परंतु अशिष्ट या अश्लील भाषा यु्क्त अथवा किसी के भी ऊपर व्यक्तिगत आक्षेपयुक्त टिप्पणियाँ कृपया यहाँ न दें... आप अपनी टिप्पणियाँ English, हिन्दी, रोमन में लिखी हिन्दी, हिंग्लिश आदि किसी भी तरीके से लिख सकते हैं... नहीं कुछ लिखना चाहते हैं तो भी चलेगा... आपके आने का शुक्रिया... आते रहियेगा भविष्य में भी... आभार!