बुधवार, 9 जनवरी 2013

विचारवान, विचारयान, विचारवाहन और ऑस्कर माईक... अरे हाँ, मैं भी

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गतांक... से आगे...

ओम्

जमीन व समुद्र के नीचे बने  हमारे पाँचों स्टेशनों के निवासियों को भी यह पता लग गया कि ऊपर खुले आसमान के नीचे बसी उनकी प्यारी दुनिया अब नहीं रही... अपने प्रियजनों, अपनी स्मृतियों और अपने अनुभवों से इस तरह यकायक बिछड़ना सभी के लिये दुखदायी था व काफी समय लगा हम सबको इस सब कुछ खो देने की तड़प से उबरने में... लेकिन जिंदगी तो जिंदगी है, वह फिर परवान चढ़ी... कुछ ही महीनों बाद हमारे स्टेशनों में हजारों शादियाँ हुई... और ऐसी ही एक शादी हुई नाभिकीय भौतिकविद् भारतीय मूल के हरि और जापानी मॉलीक्यूलर बायोलॉजिस्ट योको के बीच... मैं भी इस विवाह समारोह में शामिल हुआ...  विवाह के एक साल बाद २०४५ में उनका एक पुत्र हुआ, नाम रखा गया ओम्... यही ओम् जिसे हर नाम को रेडियो कम्यूनिकेशन की शब्दावली में याद करने की अपनी आदत के चलते मैं ऑस्कर माईक कहता था, आगे हमारे इस मिशन का एक अहम किरदार बना...



हमारी तरक्की

हमारा अंदाजा था कि तकरीबन बीस साल लगेंगे ऊपर की दुनिया को फिर से रहने लायक बनने में... रेडियोएक्टिव विकिरण की मात्रा को मानव के रहने लायक होने में करीब-करीब बीस साल लगने थे... फिर भी
२०५३ से हमने अपने कुछ रोबोटिक प्रोब ऊपर भेजने शुरू कर दिये... दो-तीन साल पूरी दुनिया की खाक छानने के बाद हमें कुछ ऐसे इलाके मिले जहाँ पर रेडियोधर्मिता न के बराबर थी... पादपों,जानवरों, पक्षियों, कीट-पतंगों आदि आदि की जितनी भी प्रजातियों को हम बचा पाये थे, उनको धीरे धीरे एक क्रमबद्ध तरीके से उनके कुदरती वातावरण में छोड़ने/लगाने का कार्य २०५८ से शुरू कर दिया गया... २०६३-६४ में हमारे पाँचों स्टेशनों के निकटस्थ उपलब्ध अनुकूल स्थान पर हवाई पट्टी व स्टेशन की आबादी के लिये आवास बनाने का कार्य शुरू हो गया... २०६८ में हमने पूरी तरह से पृथ्वी की सतह पर रहना शुरू कर दिया..

जमीन के नीचे हमारे पाँचों स्टेशनों में सर्वश्रेष्ठ मानव मस्तिष्क बिना किसी अवरोध या चिंता/हस्तक्षेप के अपने अपने विषय पर शोध कर ही रहे थे... और हमें इस शोध के परिणाम भी मिलने लगे थे... हमारे स्टेशनों के आबाद होने के पाँच वर्षों के भीतर ही हमें मानव क्लोन बनाने में कामयाबी मिल गयी... मानवीय जीन संरचना को भी हम २०४७ के आसपास तक पूरी तरह से समझ चुके थे... इसके महज दो साल के भीतर ही हमने विभिन्न जीन्स को व उनके मानव देह पर असर को नियंत्रित कर पाने की क्षमता भी हासिल कर ली थी... यह एक बेहद संभावनाओं भरा दौर था व इसकी अपनी कुछ अलग सी ही चुनौतियाँ भी थीं... मुझे लगा कि 'अल्फा' को इस पूरे दौर में बहुत अहम रोल अदा करना होगा... और कुछ सोच मैंने अपना भी एक क्लोन तैयार करने का आदेश दे दिया... साथ ही मैंने यह भी आदेश दिया कि मेरे उस क्लोन की आयुवृद्धि को नियंत्रित करने वाले जीन्स की इस तरह प्रोग्रामिंग की जाये कि उस क्लोन की आयु ६० वर्ष तक तो सामान्यत: बढ़े परंतु उसके बाद आयु बढ़ने व कालिक क्षय की प्रक्रिया रूक जाये... मेरी इस सोच के पीछे एक आशा काम कर रही थी, और वह आशा थी कि हम २०७० तक मानव मस्तिष्क की गुत्थी भी सुलझा लेंगे...



ऑस्कर माइक

ओम् यानी ऑस्कर माइक, जिसके माता-पिता के विवाह में मैं शामिल हुआ था अब २२ वर्ष का युवा हो चुका था, उसके पिता से जब-तब मेरा मिलना हो जाता था... एक दिन हरि ने मुझसे अनुरोध किया कि ऑस्कर माइक मुझसे मिलना चाहता है और यह एक विशेष मुलाकात होगी... मैं राजी हो गया...

वह आया... और बिना किसी प्रस्तावना के मुझसे बोला " अल्फा, मेरी टीम को किसी एक मानव मस्तिष्क का समस्त ज्ञान, सूचनायें व अनुभव दूसरे मानव मस्तिष्क में ट्रांसफर करने की क्षमता मिल गयी है... मैं चाहता हूँ कि तुम इसे देखो "

मैं उसकी लैब गया और उसके काम को देखा... मुझे पता था कि हमारे पास प्रयोगशाला में कुछ मानव क्लोन तैयार थे... मैंने उसे उन पर प्रयोग करने की इजाजत दे दी... और वह कामयाब रहा...



मैं २०७० से ही साठ वर्ष का हूँ आज तक

मैं साठ साल का हो रहा था आज... मैंने ऑस्कर माइक को बुलाया व अपने इरादे के बारे में बताया... " मैं तो तुमसे यह करने को काफी समय से कहना चाह रहा था, अल्फा... पर मुझे भय था कि कहीं तुम मुझे गलत न समझ बैठो "

हम उसकी लैब गये... मेरे क्लोन को भी वहाँ लाया गया व मेरे मस्तिष्क का का समस्त ज्ञान, सूचनायें व अनुभव मेरे क्लोन के मस्तिष्क में स्थानान्तरित कर दिये गये... अब मेरा क्लोन ही 'मैं' था... व मेरा पुराना शरीर एक पूर्णत: खाली मस्तिष्क लिये एक अस्थि-मज्जा का ढाँचा मात्र, जिसे मैंने अपनी ही देखरेख में नष्ट करवा दिया... मैं उसी दिन से आज तक ६० साल का ही हूँ... आशा है अब आप समझ गये होंगे कि क्यों मैंने शुरूआत में ही कहा था कि " 'अल्फा' , हाँ १८५४६ साल पहले जब हम इस खोज में निकले थे तो हमारी दुनिया मुझे इसी नाम से जानती थी... ६० साल का था तब मैं... मैं आज भी ६० साल का ही हूँ... सही कहूँ तो मैं सन् २०७० से ६० ही साल का हूँ... ऐसा क्यों है इसे समझने के लिये तुमको मेरी पूरी कहानी पढ़नी पड़ेगी..."



विचारवान

ऑस्कर माइक से मेरा मिलना बढ़ता ही गया और मैंने उसे उसकी शोध को और आगे बढ़ाने को कहा.... एक दिन हम आपस में बात कर रहे थे अचानक किसी बात के दौरान वह बोला " मानव मस्तिष्क अपनी क्षमताओं के सहस्त्राँश के बराबर क्षमता का भी इस्तेमाल नहीं करता सामान्यतया "... मेरे दिमाग में एक विचार सा कौंधा... " तुम्हारी टीम के पास किसी एक मानव मस्तिष्क का समस्त ज्ञान, सूचनायें व अनुभव दूसरे मानव मस्तिष्क में ट्रांसफर करने की क्षमता तो है, पर क्या किसी एक मानव मस्तिष्क का समस्त ज्ञान, सूचनायें व अनुभव कॉपी भी किया जा सकता है, जिससे वह उसके मूल धारक के पास तो रहे ही, किसी दूसरे के मस्तिष्क में भी उसे स्थापित किया जा सके "... " देखता हूँ अल्फा, मेरी समझ से यह संभव होना चाहिये"... उस ने मुझसे विदा ली...

ऑस्कर माइक के इस 'देखने' में बारह साल लग गये... इन बारह सालों में वह अपने परिजनों के अतिरिक्त शायद ही किसी और से मिला... 

बारह साल बाद सन् २०८४ में ऑस्कर माइक मुझसे मिलने आया... वह बहुत खुश था... "मेरी टीम कामयाब हुई",वह चहका... "बहुत खूब, अब हमारी तरक्की की रफ्तार भी कई हजार गुना बढ़ जायेगी", कहा मैंने...

" मैं समझ रहा हूँ अल्फा कि तुम क्या चाह रहे हो, एक ही मानव मस्तिष्क में अनेकों मानव मस्तिष्कों का ज्ञान... पर इसमें दिक्कतें भी बहुत आयेंगी... बहुत सारे व्यक्तित्वों का एक अजीब सा मिश्रण बन जायेगा वह... ", बोला ऑस्कर माइक... " हाँ यह तो होगा ही, पर मुझे लगता है कि परिणामी महा मस्तिष्क इस समस्या का समाधान निकालने में सक्षम रहेगा "मैंने कहा...

'मैं तुम्हें भी नहीं खोना चाहता, ऑस्कर माइक' मैंने सोचा और ऑस्कर माइक का क्लोन बनाने और उस क्लोन की आयुवृद्धि के कारक जीन्स की मेरी ही तरह ६० वर्ष का बाद आयुवृद्धि व कालिक क्षय को रोक देने लायक प्रोग्रामिंग करने के आदेश दे दिये... 

फिर हम अठारह साल बाद यानी सन् २१०२ में मिले... सबसे पहले ऑस्कर माइक के मस्तिष्क की समस्त सूचनायें उसके क्लोन के मस्तिष्क में कॉपी की गयी... क्लोन को अभी सुषुप्तावस्था में ही रखा गया... यह किसी दुर्घटना की संभावना के प्रति एक प्रकार का बीमा सा था... 

हमारे तब के समाज के अपने विभिन्न विषयों के शीर्ष १००० मानव मस्तिष्कों के समस्त ज्ञान, अनुभव और सूचनाओं की कॉपी हमारे पास तैयार थी... यह सब ऑस्कर माइक के मस्तिष्क में उतार दिया गया...

वह तीन वर्षों तक स्वयं से जूझता रहा... १००१ विभिन्न व्यक्तित्व उसके अंदर संघर्षरत थे... पर आखिरकार फिर दिमाग की जीत हुई... और ऑस्कर माइक अपनी छोड़ अन्यों की व्यवहार, आस्था, विश्वास, चरित्र संबंधी व्यक्तित्वपरक सूचनायें फिल्टर करने में कामयाब रहा... 

अब एक महामस्तिष्क हमारे पास था... कुछ भी हम पा सकते थे... २१०५  में ऑस्कर माइक जब साठ साल का हुआ तो उसके मस्तिष्क के समस्त ज्ञान, अनुभव व सूचनाओं को मेरी ही तरह उसके क्लोन के मस्तिष्क में स्थानान्तरित कर दिया गया... उसने भी अपनी पुरानी देह को मेरी ही तरह अपने सामने नष्ट कराया...

अब हम दोनों अमर थे... हम हमेशा ६० ही वर्ष के रहेंगे... पर अमर होकर जीना हमारा लक्ष्य नहीं था...



विचारवान

२१३० में ऑस्कर माइक एक बार फिर मुझसे मिलने आया... " अल्फा, मेरा मानना है कि चौबीस घंटे में हम अपने मस्तिष्क का कुछ नया सोचने में मात्र कुछ मिनट ही इस्तेमाल करते हैं, हमारा बाकी समय तो सोने, खाने, जिंदगी के अन्य कारोबार निपटाने आदि में चला जाता है", उसकी आँखों में एक चमक सी थी... " तो क्या सोचा है तुमने ?", मैंने पूछा, जबकि मुझे उत्तर पता था... " मैं अपने मस्तिष्क की एक मशीनी कॉपी तैयार करने की इजाजत चाहता हूँ, यह चौबीसों घंटे सोचने में सक्षम होगी", वह बोला... " गो अहैड ", मैं मुस्कराया...

हमने उस मशीन का नाम रखा ' विचारवान '...


प्रकाशातीत गति

हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद बृह्माँड की हमारी जानकारी सीमित थी... कारण यह कि तब तक का हमारा ज्ञान कहता था कि प्रकाश की गति से अधिक गति संभव नहीं है... और बृह्माँड की कई आकाश गंगाओं व तारों का प्रकाश तब तक भी पृथ्वी पर नहीं पहुंचा था... पर २१३५ में हमें 'विचारवान' के जरिये पता चला कि प्रकाश की गति से भी अधिक गति संभव है... और वह है विचार की गति... यह प्रकाश की गति के वर्ग के बराबर थी... विचारवान को इस पर और काम करने के निर्देश दे दिये गये...



जारी...





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पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को यथासंभव शीघ्रता से आपको नई किस्त मिले...




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पिछली कड़ियाँ हैं :-

भाग-१ ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '
भाग-२ ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....
भाग-३ और वह भिडंत...
भाग ४ - बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की ! 
भाग-५ और वह रोंगटे खड़े कर देने वाला खौफनाक नजारा...
भाग ६ - वह दो रहस्यमय आदमी...
भाग-७ आखिर खत्म हो गई दुनिया...

5 टिप्‍पणियां:

  1. काहे सपने देख रहे हो प्रवीण भाई ....
    ऎसी उड़ान से अच्छा है कि कुछ पूजा पाठ शुरू कर लो , तुम्हारी दोस्ती के कारण हमें भी कुछ पुन्य मिलेगा देव !!!
    :)))

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  2. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त (समृद्ध भारत की आवाज़)
    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

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  3. तस्मात् युध्यस्व भारत - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. कालिक क्षय को कायिक क्षय भी कहा जा सकता है :-)
    अब आप उपन्यासिका /उपन्यास की और बढ़ चले हैं ...शुभ हो सफ़र,

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