सोमवार, 21 जनवरी 2013

क्या हमें मिल पायेंगे भगवान ???

.
.
.
गतांक... से आगे...

टारगेट २२३५

प्रकाशातीत गति की खोज हमारे लिये बहुत बड़ी खोज थी... अब जाकर लगने लगा था कि शायद हम बृह्मान्ड के उन हिस्सों तक पहुँच सकेंगे जहाँ जाने की हम सोच भी नहीं सकते थे...

मानव जाति के तौर पर अब हमारे सामने कोई बड़ी चुनौती नहीं थी... २०४० में जो १८०००० सदस्य भूगर्भ स्थित स्टेशनों में बसाये गये थे, वह एक बहुत अच्छा जेनेटिक आधार रखते थे... अब अपनी तरक्की के साथ हम सारी बीमारियों को जीत चुके थे... मानव शरीर के हर अंग की हार्वेस्टिंग करने में सक्षम थे... मानव की जीन संरचना को पूरी तरह समझा जा चुका था,हम जीन संरचना की गड़बड़ियों के मामले में गर्भ में ही उनको ठीक कर सकते थे... हम किसी को भी अमर बनाने की क्षमता रखते थे... पर उस समय की हमारी दुनिया में हम दो ही थे, मैं और ऑस्कर माइक, जिन्हें अमर कहा जा सकता था... हमारी उम्र ६० वर्ष पर रूकी हुई थी... कालिक/कायिक क्षय को रोकने की इस तकनीक को सबके लिये उपलब्ध न कराने का मेरा यह निर्णय सोचा समझा निर्णय था...

मेरी समझ में अब समय आ गया था कि हम वह करें जो मानव जाति में किसी ने नहीं करने की सोची थी... २०४० में हमारी हंसती-खेलती दुनिया विभिन्न धर्मों के झगड़ों के चलते खत्म हुई थी... और सभी धर्म ईश्वर को मानते थे... मैंने ईश्वर को ढूंढने, उस तक पहुंचने का निर्णय लिया...

२१३५ में ही ऑस्कर माईक को साथ लेकर मैं 'विचारवान' के पास गया और मैंने अपना इरादा उनको बताया... "मैं चाहता हूँ कि २२३५ तक हम वह क्षमता हासिल करें कि हम ईश्वर की खोज में जा सकें, चाहे वह कहीं भी हो, बृह्माँड में या इसके बाहर भी... मैं २०१० में पैदा हुआ था और अब तक १२५ वर्ष जी चुका हूँ, थक गया हूँ मैं अब... मैं ज्यादा से ज्यादा १०० वर्ष और इंतजार करूंगा... अगर तब तक कुछ नहीं हुआ तो मैं शरीर त्यागने की सोचूंगा "

"नहीं अल्फा, यह खयाल हमें भी परेशान करता है, हम पूरी कोशिश करेंगे " एक स्वर में बोले दोनों...


सफर की तैयारी

उसके बाद की घटनायें बहुत तेजी से घटी... हम यह जानने में कामयाब रहे कि पृथ्वी में जब भी कोई इंसान ईश्वर की आराधना करता है या उसे याद करता है तो वह विचार एक निश्चित दिशा की ओर जाते हैं... विचारों की गति, जो प्रकाश की गति का वर्ग है का पता तो 'विचारवान' २१३५ में ही लगा चुका था... अब ऑस्कर माईक और 'विचारवान' 'विचारयान' बनाने में जुट गये... 'विचारयान' यानी एक ऐसा यान जो विचारों की गति से चल सके वह भी किसी खास विचार को फॉलो करते हुऐ... यह एक बहुत बड़ी चुनौती थी, विशेषकर इस गति को प्राप्त करने के लिये उर्जा प्राप्त करना... पर विचारवान व ऑस्कर माईक 'विचारयान' बनाने में कामयाब रहे...

ऑस्कर माईक मेरे पास आया..." 'विचारयान' तैयार है, हम जब चाहे सफर पर निकल सकते हैं अल्फा"... "नहीं, ईश्वर की खोज में हम अमर होकर नहीं जा सकते, तुम दोनों को एक ऐसा यंत्र भी इजाद करना होगा जो मेरे और तुम्हारे लिये समय को रोक दे" मैंने कहा...

वे दोनों 'समयावरण' (Time Wrap) बनाने में भी तैयार रहे... यह एक ऐसा यंत्र था जिसे पहनने वाले के लिये समय रूक जाता था... या यों कहें कि इस आवरण के अंदर समय फ्रीज हो जाता था...

मैंने उनको एक 'विचारवाहन' भी बनाने को कहा... जो ईश्वर की खोज की इस यात्रा के हमारे अनुभवों के विवरण को पृथ्वी पर लेकर आये... जाने क्यों मुझे लगा कि न मैं और न ऑस्कर माईक ईश्वर को मिलने के बाद वापस आना चाहेंगे... वह दोनों 'विचारवाहन' बनाने में भी तैयार रहे...

यह सब काम लक्ष्य से काफी पहले २२२४ तक ही पूरे कर लिये गये...

मैंने एक बार फिर अपने और ऑस्कर माईक के सामान्य क्लोन तैयार करने के निर्देश दिये... २०४४ में जब वह क्लोन २० वर्ष के हुऐ तो हम दोनों के मस्तिष्क का समस्त ज्ञान, अनुभव व सूचनायें उन क्लोनों के मस्तिष्क में स्थानान्तरित कर दी गयीं... एक बार फिर हम दोनों ने अपनी पुरानी देहों को स्वयं ही नष्ट किया...

 
चलना यात्रा पर

अब ज्यादा कुछ करना बचा नहीं था... मैंने अपने पीछे नये 'अल्फा' को नामांकित किया... मैंने और ऑस्कर माईक ने अपने सभी संगी-साथियों से अंतिम बार विदाई ली... फिर हमने 'समयावरण' पहन लिया और विचारयान पर सवार हो गये... 'विचारवान' स्वयं इस विचारयान को नियंत्रित कर रहा था... हम दोनों निश्चिंत थे कि विचारवान किसी भी स्थिति से निपट लेगा... विचारयान को चालू किया गया... और कुछ ही देर में उसने उन विचारों को ट्रैक कर लिया जो पृथ्वी में किसी के द्वारा ईश्वर की आराधना करने या उसे याद करने पर उत्पन्न होते हैं... और हम इन्हीं विचारों को फॉलो करने लगे... वह भी विचारों की ही गति से... सफर बहुत लंबा और अनिश्चित होने वाला था... इसलिये विचारवान ने हम दोनों को Hibernate कर दिया... इससे हम दोनों के शरीर का उपापचय रूक गया व तमाम अन्य प्रक्रियायें भी... अब इस दशा से विचारवान हमें सामान्य जीवित अवस्था में तभी लायेगा जब हम अपने लक्ष्य तक पहुंच जायेंगे...


जारी...


पाठकों से:-

अगली किस्त इस लंबी कहानी की आखिरी किस्त होगी, और संभवत: विवादास्पद भी... मैंने सोचा है कि अगली किस्त में यह पूरी कहानी एक साथ दे दूं... जिससे होगा यह कि यदि किसी ने पहले की किस्ते पढ़ी हैं वह केवल अंतिम भाग पढ़ेगा व नये पाठक को पूरी कहानी एक साथ मिल जायेगी...



पिछली कड़ियाँ हैं :-

भाग-१ ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '
भाग-२ ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....
भाग-३ और वह भिडंत...
भाग ४ - बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की ! 
भाग-५ और वह रोंगटे खड़े कर देने वाला खौफनाक नजारा...
भाग ६ - वह दो रहस्यमय आदमी...
भाग-७ आखिर खत्म हो गई दुनिया...
भाग-८ विचारवान, विचारयान, विचारवाहन और ऑस्कर माईक... अरे हाँ, मैं भी







...

6 टिप्‍पणियां:

  1. आज देखी है। अदालत के लिए निकलना है। वापस लौट कर पूरी पढूंगा।

    उत्तर देंहटाएं
  2. विज्ञान कथाओं की कई अवधारणाओं को आपने पिरोने का यत्न किया है -अगला अंक देखते है //

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त (समृद्ध भारत की आवाज़)
    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

    उत्तर देंहटाएं
  4. विचार यान बापस कब लौटेगा ??
    आपके लिए मंगल कामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  5. agle part ka intazaar hai....
    jaldi post karein... ho sake to mujhe mail bhi karein

    yogesh249@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. .
      .
      .
      अगला और पूरी कहानी को समेटे आखिरी भाग यह रहा (लिंक)...


      ...

      हटाएं

मेरे इस आलेख को पढ़ कर ही यदि आपके मन में कोई विचार उत्पन्न हुऐ हैं तो कृपया उन्हें 'नेकी कर दरिया में डाल' की तर्ज पर ही यहाँ टिप्पणी रूप में दर्ज करें... इस टिप्पणी के पीछे कोई अन्य छिपा हुआ मंतव्य न रखें, आप इसे उधार में मुझे दी गयी टिप्पणी न समझें, प्रतिउत्तर में आपके ब्लॉग पर टिप्पणी करने की किसी बाध्यता को मैं नहीं मानता व मुझसे या किसी अन्य ब्लॉगर से भी ऐसी अपेक्षा रखना न तो नैतिक है न उचित ही !... मैं किसी अन्य के लिखे आलेखों पर भी इसी नियम व भावना के तहत टिपियाता हूँ !

असहमति को इस ब्लॉग पर पूरा सम्मान दिया जाता है, आप मेरे किसी भी विचार का खुल कर विरोध या समर्थन कर सकते हैं, परंतु अशिष्ट या अश्लील भाषा यु्क्त अथवा किसी के भी ऊपर व्यक्तिगत आक्षेपयुक्त टिप्पणियाँ कृपया यहाँ न दें... आप अपनी टिप्पणियाँ English, हिन्दी, रोमन में लिखी हिन्दी, हिंग्लिश आदि किसी भी तरीके से लिख सकते हैं... नहीं कुछ लिखना चाहते हैं तो भी चलेगा... आपके आने का शुक्रिया... आते रहियेगा भविष्य में भी... आभार!