सोमवार, 28 जनवरी 2013

ईश्वर की खोज में ! ... (पूरा किस्सा-The Complete Story)

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पृथ्वीवासी मेरी मानव संतानों,

मैं कमांडर 'अल्फा'  यह संदेश आप सभी के लिये लिख रहा हूँ... मिशन 'ईश्वर की खोज में' अपने अंजाम को पाने में कामयाब रहा... और आज हमारे मिशन पर निकलने के १८५४६ साल बाद हम ईश्वर को पाने में कामयाब रहे...

एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है अब मेरे ऊपर, कि तुम सबको बताऊँ कि क्या क्या और कैसे हुआ इस मिशन के दौरान... कैसे हम ईश्वर तक पहुँचे और हमें वहाँ क्या मिला, क्या दिखा...

यह मेरा ही आइडिया था कि हम ईश्वर तक पहुँचने का एक प्रयास जरूर करें... मुझे अपार खुशी है कि हम कामयाब हुऐ... चलिये अब इस कहानी को शुरूआत से शुरू करते हैं...


अल्फा

'अल्फा' ,  हाँ १८५४६ साल पहले जब हम इस खोज में निकले थे तो हमारी दुनिया मुझे इसी नाम से जानती थी... ६० साल का था तब मैं... मैं आज भी ६० साल का ही हूँ... सही कहूँ तो मैं सन् २०७० से ६० ही साल का हूँ... ऐसा क्यों है इसे समझने के लिये तुमको मेरी पूरी कहानी पढ़नी पड़ेगी...

आज सन् २०७९० चल रहा होगा पृथ्वी में... और पूरी दुनिया में कोई भौगोलिक सीमायें नहीं हैं... ऐसे में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं तुमको यह न बताऊँ कि मैं किस देश में पैदा हुआ था... बस इतना जानना तुम्हारे लिये काफी है कि मेरी पैदाइश सन २०१० की है...

यह सारा किस्सा शुरू हुआ सन २०३१ की गर्मियों में... तब की दुनिया के सर्वश्रेष्ठ इंजीनियरिंग कॉलेज से डिग्री लेने के बाद मैंने कोई नौकरी करने की बजाय समाज शास्त्र की पढ़ाई करने के लिये एक दूसरे विश्वविद्मालय में दाखिला ले लिया... मेरे पिता उस समय के अमीरों में माने जाते थे इसलिये मुझ पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं था... उस समय के और विद्मार्थियों की तरह ही मेरा समय भी पढ़ाई, फुटबॉल-बास्केटबॉल के मैदान और विश्वविद्मालय की कैंटीन के बीच बीतता था... हाँ एक गर्लफ्रेन्ड भी थी मेरी...

कुल मिलाकर मेरी जिंदगी चल रही थी बड़े सुकून से... फिर अचानक वह हुआ जिसने मेरी पूरी दुनिया और दुनिया को देखने का नजरिया ही बदल दिया... 

वह जुलाई का महीना था... हमारे नोटिस बोर्ड पर एक नोटिस लगा देखा मैंने... मेरे देश के 'वाह्य सुरक्षा विभाग' का नोटिस था वह... कैंपस प्लेसमेंट के लिये आने वाली थी उनकी टीम... एक अलग सा अनुभव लेने के लिये मैंने भी अप्लाई कर दिया... 

तीन दिन के बाद इम्तहान हुआ... मुझे आज भी याद है कि मैंने सारे सवाल सही हल किये थे... उसके बाद हमें फिटनेस टेस्ट के लिये बुलाया गया... जिस जगह बुलाया गया वहाँ मेरे देश की सेना के विशिष्ट कमांडो की भी ट्रेनिंग होती थी... पूरे एक सप्ताह तक चला यह टेस्ट... भूख, प्यास, थकान, नींद का अभाव आदि झेलने की हमारे शरीर की क्षमताओं को उनकी पूरी सीमा जाँचा गया वहाँ,,, फिर शुरू हुआ मेडिकल जाँचों का दौर... इसके बाद मनोवैज्ञानिकों की एक पूरी टीम ने हम सबके व्यवहार का आकलन किया पूरे एक महीने तक... आज जब सोचता हूँ तो हंसी आती है कि कैसे उस समय हमारे साथ ही रहते हुऐ कुछ उम्मीदवार असलियत में अपने क्षेत्र के प्रतिष्ठित मनोवैज्ञानिक थे... जो हमारे मन को भांपने के लिये ही हमारे साथ रह रहे थे...

और आखिर वह दिन आया जब मेरा फाइनल इंटरव्यू था... यह इंटरव्यू मेरे जीवन की पूरी दिशा बदल देने वाला था....





 इंटरव्यू

इंटरव्यू के दिन मैं सुबह सुबह तैयार हो समय से पाँच मिनट पहले बताई गयी जगह पहुँच गया... जिस होटल में इंटरव्यू था वहाँ लॉबी में एक बोर्ड पर नोटिस लगा था... एक हॉल में जाने को कहा गया था नोटिस में... मैं उस हॉल में पहुंचा... वेटर से दिखने वाले एक आदमी ने मुझे चाय कॉफी के लिये पूछा... मैंने उसे एक कप ब्लैक कॉफी, बिना चीनी के लाने को कहा और खिड़की के पास खड़ा हो बाहर का जायजा लेने लगा... हॉल में मुझी जैसे दो उम्मीदवार और थे... एक लड़का और एक बहुत सुन्दर लड़की भी... बहरहाल उस समय मैं किसी से कोई बात करने के मूड में नहीं था, मैं स्थिति का आकलन कर रहा था... मैंने अनुमान लगाया कि हमें कहीं और ले जाया जायेगा...

मेरा अनुमान सही निकला, मैं अभी कॉफी खत्म भी नहीं कर पाया था कि एक शख्स ने, जो अपनी चाल ढाल व हेयरकट से फौजी सा लग रहा था, हॉल में प्रवेश किया... बिना किसी प्रस्तावना के उसने हम तीनों को नाम से पुकारा और कहा " चलिये हमें दूसरी जगह चलना है, गाड़ी बाहर खड़ी है "...

होटल के पोर्श में एक वैन खड़ी थी... हम तीनों उस पर चढ़े... हमारे चढ़ने के बाद वही आदमी ड्राइविंग सीट पर बैठा और इंजन स्टार्ट किया... फिर न जाने उसने कौन से बटन दबाये कि हमारे और ड्राइवर के बीच एक पार्टिशन गाड़ी के फर्श से ऊपर उठ सरक गया और सारी खिड़कियों पर एक और काला शीशा चढ़ गया... यह राहत की बात थी कि लाइट जल रही थी... अंदर एक छोटी सी डिस्प्ले स्क्रीन पर वह फिर हमें दिखा और बोला " सॉरी, पर मुझे ऐसे ही निर्देश हैं "...

तकरीबन एक घंटे तक गाड़ी दौड़ती रही... मैं गाड़ी के मूवमेंट व इंजन के एक्सलरेशन व ब्रेक आदि लेने से अंदाजा सा लगाता रहा कि आखिर हमें कहाँ ले जाया जा रहा है... आखिर मुझे केवल इतना ही समझ में आ पाया कि गाड़ी शहर से बाहर किसी हाइवे में दौड़ रही है...

आखिरकार गाड़ी रूकी... वह एक बहुत बड़े गैराज के अंदर जाकर रूकी थी... हम तीनों बाहर निकले... उसने हमें सीढ़ी चढ़ने का इशारा किया... अब हम एक बहुत बड़ी इमारत की लॉबी  में थे... एक सख्त सी दिखने वाली अधेड़ महिला हमारे पास आई... " उस तरफ लाइन से काफी सारे बाथरूम हैं... जाओ... बाथरूम में रखे साबुन से नहाओ... और बाथरूम में रखे टीशर्ट-पाजामा व स्लिपर पहन लो... याद रहे अपने सारे कपड़े, घड़ी, अंगूठी, ब्रेसलेट, ताबीज वगैरह सब के सब तुमने बाथरूम में ही उतार देने हैं... मैंने वैसा ही किया, बाहर निकला तो मुझे एक बंदा बाहर अपना इंतजार करता मिला... उसने फिर भी मेरी तलाशी ली... " पार्टनर, अंडरवियर तक तो उतरवा लिये, अब क्या बच्चे की जान लोगे " मजाक किया मैंने... पर वह भावशून्य चेहरा बनाये रहा... "जल्दी चलो, बड़ी देर लगाते हो नहाने में, हमें देर हो रही है " कह वह लगभग दौड़ाता सा हुआ मुझे एक कमरे के बाहर छोड़ गया...

" तुम अंदर आ सकते हो "... एक आवाज गूँजी और मैं कमरे के अंदर था... एक बड़ी सी गोल मेज के चारों ओर वह सातों बैठे थे... मैंने सातों को देख जायजा लिया और मेरी नजर उनमें से एक पर जाकर अटक गयी... वह एक विशालकाय आदमी था, सुपरहैवीवेट बॉक्सर जैसी डील डौल वाला... मोटी और छोटी गर्दन और उसके ऊपर बड़ा सा सिर... बाल खिचड़ी काले-सफेद थे, पर उसने उन्हें बहुत छोटा कटाया हुआ था... पर सबसे विशिष्ट थी उसकी आँखें... ऐसा लगता था कि वह उनसे आपके अंदर ही नहीं आपके आर-पार भी झाँक सकता हो... उन आँखों ने बहुत कुछ देखा था... और उनसे ताकत व जिम्मेदारी दोनों झलक रही थीं...

इंटरव्यू शुरू हुआ... उन लोगों ने मेरा पूरा बैकग्राउंड चैक किया था... प्राइमरी में मेरे साथ पढ़े दोस्तों तक से पूछा गया था मेरे बारे में... कुछ छोटे मोटे सवाल किये गये मुझ से... उस के बाद उनमें से एक बोला " अल्फा, अब तुम पूछो जो भी पूछना है "...  तो वह विशालकाय आदमी 'अल्फा' है...

" माई सन "... उसकी आवाज पूरे कमरे में गूंज रही थी... " तुम्हें कुछ समझ में आ रहा है कि तुम किस दुनिया और धंधे में एंट्री ले रहे हो ? "...
" इतना बेवकूफ समझते हो अगर मुझे, तो बुलाया क्यों यहाँ " झुंझला कर कहा मैंने...
बहुत देर तक उसके हंसने की आवाज गूँजती रही... " यू हैव ए प्वायंट, सन्नी "... मुझे अपने इंजीनियरिंग के प्रिय प्रोफेसर सा लगा वह यह कहता हुआ...
" अच्छा यह बताओ कि एक कठिन टास्क है, जिसमें तुम्हारे असफल होने की संभावना सफल होने से कहीं ज्यादा है, क्या चुनौती के तौर पर तुम उसे लोगे ? और असफल होने पर तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया होगी ? " पूछा अल्फा ने...
अब हंसने की बारी मेरी थी... " जिस धंधे में तुम हो, क्या उसमें 'टास्क' चुनने की आजादी है ? "...
फिर थोड़ा गंभीर होते हुऐ मैं बोला " टास्क में असफल होने का कोई विकल्प मैं नहीं रखना चाहता, और शायद इसीलिये मुझे तुम लोगों का धंधा पसंद है।"
काफी देर तक चुप रहा अल्फा... फिर बोला " तुम काम के आदमी हो"... उसने हाथ आगे बढ़ाया " हमारी दुनिया में स्वागत है सन्नी "
मैंने उसका हाथ अपने हाथों में थामा " अच्छी कटेगी तुम्हारे साथ, पॉप "

मेरे और उसके कई सालों के साथ के दौरान मैं हमेशा उसके लिये 'सन्नी' रहा और वह मेरे लिये 'पॉप'...


' अल्फा केवल एक ही होता है '


तीन दिन बाद ट्रेनिंग का बुलावा आया...  नौ महीने की ट्रेनिंग... सख्त कहना भी एक तरह का अन्डरस्टेटमेंट होगा उस ट्रेनिंग के लिये... हम में से कोई नहीं जानता था कि शरीर और दिमाग की कष्ट सह पाने की कोई सीमा नहीं होती... आप जब तक जिंदा रहते हैं झेलते ही रहते हैं... और सबसे बड़ी बात यह है कि झेलने के बाद भी मौत को ख्याल में भी नहीं लाते, जिंदा ही रहना चाहते हैं...

फिर छह महीने का अगला हिस्सा था... 'सॉफ्ट स्किल्स' के लिये... यहाँ इन्सान की कमजोरियों-मजबूतियों को पहचानना व उनको अपने मिशन की सफलता के लिये इस्तेमाल करना सिखाया गया... हमें यह भी सिखाया गया कि दिये गये टास्क को पूरा करना है हर हाल में... जिसकी भी वजह से वह पूरा नहीं हो पाता, वह 'रूकावट' है... और रूकावट हटनी ही चाहिये हर हाल में...

मैंने टॉप  किया दोनों कोर्सों में... महज एक हफ्ते का आराम मिला... और ठीक एक हफ्ते के बाद मैं 'एजेन्सी' के दफ्तर में था...

रिसेप्शन पर कार्यरत लड़की को मेरे आने का पहले से ही पता था... बिना मेरे कुछ पूछे " कमरा नं० १८८ ए " बोला उसने और फिर से काम में लग गयी... शायद लैपटॉप पर कुछ गेम खेल रही थी...

कमरे के बाहर पहुँचते ही अंदर से आवाज आई " प्लीज कम इन "... मैं अंदर गया... एक बुजुर्ग सा आदमी था वह, चेहरे से लग रहा था कि बहुत कुछ देखा व झेला है उसने... मैंने मुस्कुराकर उसका अभिवादन किया... पर वह पूर्ववत चेहरा बनाये रहा...  कुछ दिनों में मुझे पता चला कि पूरी एजेंसी उसे 'कनेक्शन' कहती है... और 'कनेक्शन' आपके लिये मुस्कराये, ऐसा तभी होगा जब कोई बहुत बड़ी सफलता पाई हो आपने...

"एजेंसी में तुम्हें ' प्रोफेसर' के नाम से जाना जायेगा" कहा उसने... "अल्फा ने तुमको मध्य एशिया की पेट्रो इकॉनॉमी वाले एक मुल्क में भेजने को कहा है'... कमरा नं० १८९ में तुमको तुम्हारी पहचान से संबंधित सब ब्रीफिंग कर दी जायेगी, एक ऑयल कम्पनी के सीनियर मार्केटिंग मैनेजर बन कर जा रहे हो तुम वहाँ"

"बाकी सब ठीक है पर यह बताओ कि कितने 'अल्फा' हैं एजेंसी में ?" मैंने पूछा...
" अल्फा केवल एक ही होता है, एजेंसी में ही नहीं, हमारी पूरी दुनिया में केवल एक ही अल्फा है " कुछ खीझ कर बोला वह...

मेरी ब्रीफिंग पूरे १५ दिन चली और सोलहवें दिन मैंने अपनी पोस्टिंग वाले देश को फ्लाईट पकड़ ली...




दिसंबर २०३२

दिसंबर २०३२ को मैं अपनी पहली फील्ड पोस्टिंग पर गया, मुझे एक 'मुल्क विशेष' के इरादों के बारे में पता लगाने का टास्क दिया गया था... बहुत स्रोतों से सूचना 'अल्फा' तक पहुँचती थी और उन में से ही एक स्रोत मैं भी था...

२००१ से २०३२ तक के विश्व की कुछ प्रमुख घटनायें इस प्रकार से थीं...

* ११ सितम्बर २००१ को कुछ इस्लाम को मानने वाले आतंकियों ने अमेरिका पर आतंकी हमला कर हजारों लोगों की जान ले ली...
* आतंक के सरगना को मारने के इरादे से अमेरिका ने अफगानिस्तान पर अपनी फौजें उतार दीं और मई २०११ में अपने एक सहयोगी मुल्क पाकिस्तान के भीतर जा सरगना को मार गिराया...
* ईरान नामक एक देश के राष्ट्रपति ने २०१२ में यहूदी देश इजरायल को दुनिया के नक्शे पर एक नासूर बताते हुऐ जल्दी ही उसे मिटाने की बात कही, जवाब में इजरायल ने कहा कि वह कभी भी किसी भी हालात में ईरान को एटम बम नहीं बनाने देगा...
* २०१५ की गर्मियों में अमेरिका व उसके सहयोगी देशों ने अफगानिस्तान की सत्ता अफगानी सरकार को सौंप अपनी फौजें वहाँ से हटा लीं...
* २०१७ में इस्लामी आतंकियों ने फिर एक बार अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया...
* २०१९ में पाकिस्तान के अधिकाँश भागों पर भी इस्लामी आतंकियों का कब्जा हो गया व पाकिस्तानी फौज का एक बड़ा हिस्सा उनके साथ मिल गया, इस्लामाबाद की चारों ओर से घेराबंदी कर दी गयी ...
* २०२० में इस्लामी आतंकियों का इस्लामाबाद पर भी कब्जा हो गया व वे भी पाकिस्तानी सेना में शामिल हो गये...पाकिस्तान पर कट्टरपंथियों का एक समूह शासन करने लगा... इसके तुरंत बाद ही पाकिस्तान ने अपनी पूर्वी सीमा पर स्थित पड़ासी मुल्क भारत से कुछ हिस्सों को आजाद कराने के लिये खुली व छिपी दोनों तरह की जंग का एलान कर दिया...
* २०२२ में बार बार पाकिस्तान की ओर से एटमी हमले की धमकी से आजिज आ भारतीय नेतृत्व ने पूरे विश्व के सामने ऐलान कर दिया कि कहीं से भी भारत पर ऐटमी हमला होने की स्थिति में भारत उस देश पर ३०० से ज्यादा नाभिकीय हमले एक साथ करेगा, चाहे इसके परिणाम दुनिया के लिये कुछ भी हों...
* इसके तुरंत बाद २०२२ में इजरायल ने भी समूचे विश्व के सामने यह ऐलान किया कि उसकी हवाई सीमा में कोई हमलावर मिसाईल या विमान घुसते ही स्वचालित रूप से उसके सारे नाभिकीय हथियार दुनिया के विभिन्न इलाकों के उसके दुश्मन मुल्कों की ओर रवाना कर दिये जायेंगे...
* २०२३ में यह भी साबित हो गया कि एड्स जैसी महामारी का कारण HIV एक कुदरती वायरस नहीं बल्कि बायोलॉजिकल वारफेयर के लिये विश्व के एक विकसित मुल्क द्वारा तैयार किया जा रहा वायरस था... जो जानबूझ कर छोड़ा गया... जिससे इसकी वैक्सीन विकसित हो सके... तथा HIV परिवार के उससे भी घातक अन्य वायरस जैविक युद्ध के लिये विकसित किये जा सकें जिनकी वैक्सीन केवल उसी देश के पास मौजूद हो...
* २०२४ में HIV के खिलाफ १००% प्रतिरोधक क्षमता वाली वैक्सीन विकसित कर ली गयी...
* २०२८ में चीन दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक व सैन्य शक्ति, अमेरिका दूसरी व भारत तीसरी सबसे बड़ी शक्ति के तौर पर जाना जाने लगा, विश्व में जिनका पहले प्रभुत्व था उन मुल्कों को यह नागवार गुजरा और कई ऐसे गुप्त समूह बन गये जो हर हाल में चीन व भारत को उनके पुराने हाल में फिर भेज देना चाहते थे...
* २०२९ में यूरोप के एक ताकतवर मुल्क के एक वैज्ञानिक ने यह आरोप लगा सनसनी फैला दी कि कुछ प्रयोगशालाओं में दशकों पहले विश्व से खत्म कर दी गयी महामारी चेचक व पोलियो के वायरसों का जैविक युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने पर काम किया जा रहा है... वह वैज्ञानिक तीन दिन बाद अपने घर में मृत पाया गया... पत्नि ने बताया शायद वह पागल हो गया था और उसी पागलपने में उसने जहर खा लिया था...
* २०३० में दुनिया की ५५ प्रतिशत आबादी डायबिटीज, मोटापा, हाइपरटेंशन, हॄदय रोग, गु्र्दा रोग आदि लाईफ स्टाइल डिजीज से ग्रस्त हो चुकी थी... २०१२ में मुम्बई, भारत के एक अस्पताल द्वारा पहली बार रिपोर्ट किया TDR TB (टोटली ड्रग रेजिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस) एक बहुत बड़ी समस्या बन चुका था व हर साल उससे समूचे विश्व में २० लाख मौतें होने लगीं थी... कोई भी ज्ञात दवाई इस बीमारी के खिलाफ काम नहीं कर रही थीं...
* २०३१ में यह खबर आई कि पाकिस्तान के एक आतंकी-जनरल ने अपने नियंत्रण के तीन नाभिकीय हथियार एक बहुत बड़ी रकम के बदले एक मुल्क को बेच दिये थे...
* २०३१ में ही एक 'मुल्क विशेष' का कट्टरपंथी शासक अपने करीबियों को यह कहते सुना गया कि दुनिया शायद जल्द ही खत्म होने वाली है, ऐसा उसने सपने में देखा है...

मुझे भी उसी 'मुल्क विशेष' में ही भेजा गया था... मेरे टास्क दो थे, पहला यह पता लगाना कि क्या वह 'तीन बम' उसी देश ने खरीदे थे, दूसरा यह कि उनका क्या प्रयोग होना था... मेरा काम मुख्य रूप से 'एजेंसी' के उस देश में मौजूद अनेकों इन्फॉर्मर्स से सूचना संकलित कर उनका विश्लेषण कर अपनी राय अल्फा को देना था...

मैं जाते ही अपने काम में जुट गया... धीरे-धीरे सूचनायें मुझ तक आने लगीं... पर निश्चितता से किसी नतीजे पर पहुँचने लायक सूचना मेरे से अभी बहुत दूर थी...

तभी वह फोन आया... वह भी उसके ऑफिशियल नंबर से... उसका नाम कुछ और था पर मैं उसको जूलू (Zulu) कहूँगा... मैं फोन उठाते ही बोला '"ठीक है, मैं अपनी एम्बेसी जा रहा हूँ, और पहली फ्लाइट से ही वापस चला जाउंगा "... बहुत जोर से ठहाका लगाकर हंसा वह " प्रोफेसर, (उसे मेरा नाम पता था) अगर मुझे तुमसे यही कहना होता तो क्या मैं खुद फोन करता, मेरे आदमी तुम्हें सड़क से उठा सीधा फ्लाईट में बैठा देते"... मैं झेंप सा गया... मुँह जब भी खोलो, समझदारी की ही बात बोलो, खास तौर पर अपने हमपेशा से, वरना तुमको ही शर्मिन्दा होना होगा, यह मेरे लिये बड़ा सबक था... " सॉरी" बस इतना ही मेरे मुँह से निकल पाया... " कोई बात नहीं बेटा, आओ साथ लंच करेंगे" वह अचानक मेरे पिता समान हो गया...

एक मैक्सिकन रेस्त्रां में हम मिले... खूब जमकर खाया-पिया... खूब सारी बातें की... उसने अपनी बेटी के बारे में बताया... बोला कि मेरे जैसा वर खोज रहा है उसके लिये... खाना खाते खाते अचानक उसने प्लेट में थोड़ा ज्यादा सॉस डाल दिया, मैंने सामान्य रूप से बातों के क्रम को बनाये रखा पर अब मेरी नजरें उसके हाथ के चम्मच काँटे पर थीं... खाना खाते खाते अचानक उसने काँटे की नोक से सॉस पर दो आकार बनाये  '+ α' ... मेरे होंठो पर हल्की मुस्कुराहट उभरी... उसने चम्मच से जल्दी जल्दी सारी प्लेट साफ कर दी...

वह अल्फा से मिलना चाहता था।

यह एक इमरजेंसी थी... उसी शाम मैं अपने देश के लिये फ्लाईट पर सवार हो गया... १२ घंटे बाद मैं एजेंसी के आफिस में था, मैंने 'कनेक्शन' को खबर दी कि जुलू अल्फा से मिलना चाहता है... और कनेक्शन मुस्कुराने लगा... शायद मैंने कोई बड़ा काम कर दिखाया था...

अल्फा और जुलू आपस में कैसे मिले, यह बताना यहाँ जरूरी नहीं... पर 'अल्फा' को 'अल्फा' क्यों कहते थे यह बताना अब जरूरी हो गया है... तब दुनिया का लगभग हर मुल्क अपनी एक जासूसी एजेंसी रखता था... मुल्कों में सत्ता परिवर्तन होते रहते थे, कभी कभी सरफिरे, जनूनी यहाँ तक कि पागल भी शासक बन जाते थे... पर जासूसी एजेंसियाँ हमेशा ही समझदारों के ही हाथ में रहती थीं... दुनिया की सारी जासूसी एजेंसियों के प्रमुखों का एक अनौपचारिक क्लब सा होता था, यह दुनिया का सबसे रहस्यमयी और एक्सक्लुसिव क्लब था... ' अल्फा' इस क्लब के सरगना को कहा जाता था... मुल्क एक दूसरे के खिलाफ आतंक फैलाते थे, रहस्यों को खरीदते थे, एक दूसरे के जासूसों को बेनकाब करते थे, कभी कभी इस काम में जानें भी ली जाती थीं... पर यह झगड़े, राजनीति व नफरत कभी पूरी मानवता को ही न निगल बैठे, इसीलिये यह क्लब बना था... एक तरह से 'अल्फा' केवल अपने देश का ही नहीं पूरी मानवता का रक्षक था...

जुलू अल्फा से मिलना चाहता था क्योंकि जुलू की निगाह में दुनिया खतरे में थी...

वो दोनों मिले, कहाँ मिले कैसे मिले, यह मैं नहीं बताना चाहता, पर जुलू ने अल्फा को बताया कि उसके 'मुल्क विशेष' के हुक्मरान ने ही वह तीनों बम खरीदे हैं, और बहुत जल्द ही उसकी उन्हें भारत व इजरायल के खिलाफ इस्तेमाल करने की योजना है... उसका ख्याल था, जो सही भी था कि ऐसा होते ही अपने खुले ऐलान के मुताबिक दोनों देश अपने सारे नाभिकीय हथियार, जो हजारों की संख्या में थे, अपने अपने दुश्मनों की ओर रवाना कर देंगे और महज एक दो दिनों में ही पूरी दुनिया नष्ट हो जायेगी...

पर अल्फा को हर हाल में इसे रोकना था...

और उसने यह किया भी...

और वह भिडंत

अचानक घटनायें तेजी से घटित हुई और तीन दिन के भीतर ही हमारे राष्ट्रपति उस 'मुल्क विशेष' के प्रधान मंत्री से 'तेल के दामों के उतारचढ़ाव व विश्व की अर्थव्यवस्था पर इसके कुप्रभाव' को रोकने के लिये शिखरवार्ता के लिये उस 'मुल्क विशेष' की राजधानी को रवाना हो गये... यह अभूतपूर्व था... और राष्ट्रपति की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये हमारी वायुसेना के लड़ाकू विमान, हैलीकॉप्टर व एक बहुत बड़ा सुरक्षा दल भी साथ गये... अल्फा भी दल का हिस्सा था और पूरे घटनाचक्र के दौरान मैं उसके साथ रहा...

एयरपोर्ट पर स्वागत के तुरंत बाद दोनों नेता शिखरवार्ता के लिये निर्धारित जगह पहुँचे... मीडिया के लिये मुस्कुराने व फोटो खिंचाने के बाद घोषणा हुई कि अब वे दोनों बंद कमरे में एक दूसरे से वार्ता करेंगे व केवल अनुवादक व निजी सचिव ही उनके साथ रहेंगे... बहरहाल अब राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री दोनों एक कमरे में थे जिसे 'एजेंसी' व 'मुल्क विशेष' के खुफिया विभाग ने पहले से ही सैनिटाइज किया हुआ था... हमारी ओर से अल्फा, मैं और राष्ट्रपति थे और उनकी तरफ से प्रधानमंत्री, जुलू और उनकी फौज का एक बंदा... वार्ता शुरू होते ही राष्ट्रपति ने इशारा किया... अल्फा उठा और प्रधानमंत्री के पास गया, अपने टेबलेट पीसी पर उसने प्रधानमंत्री को एक वीडियो दिखाया... अचानक प्रधानमंत्री के चेहरे का रंग उतर सा गया... फिर अल्फा ने एक दूसरा वीडियो प्रधानमंत्री को दिखाया... प्रधानमंत्री को उस एयरकंडीशन्ड रूम में ही पसीना सा आ गया... जुलू की ओर देख वह चिल्लाया " हरामी, तूने हमारे महान देश को धोखा दिया है "... जुलू चेहरे पर कोई भाव लाये बिना बैठा रहा... अब अल्फा ने राष्ट्रपति की ओर इशारा किया... और पहली बार राष्ट्रपति ने मुँह खोला "मिस्टर प्राइम मिनिस्टर आपको अगले पाँच मिनट के भीतर ही कुछ जरूरी फोन कॉल करनी होंगी"... निस्तेज, सर झुकाये बैठे प्रधान मंत्री ने फौजी बंदे को इशारा किया, पर जुलू ने अपना फोन आगे बढ़ा दिया... कुल तीन मिनट तक बातें हुई...

'मुल्क विशेष' की राजधानी के हवाई अड्डे पर अचानक गतिविधियाँ बढ़ गयीं... मुल्क विशेष की सेना के तीन भारी भरकम हैलीकॉप्टर उतरे व उनमें से तीन काफी भारी बड़े बक्से क्रेन द्वारा उतारे गये... हरेक हैलीकॉप्टर से चार चार वैज्ञानिक से दिखते आदमी भी उतरे... बड़ी ही शीघ्रता से यह सारा सामान व आदमी हमारे कार्गो प्लेन में चढ़ाये गये... और प्लेन रनवे पर दौड़ता उड़ान भर आँखों से ओझल हो गया...

उधर मीटिंग रूम में राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के साथ बड़ी तल्लीनता से वीडियो गेम खेल रहे थे... मैं, अल्फा, जुलू और फौजी मेज पर लगे खाने पीने के सामान का सफाया करने में जुट गये... तकरीबन सवा घंटे के बाद अल्फा के फोन पर कॉल आई, वह खुश नजर आया... " मेरा ख्याल है अब हम मीटिंग खत्म कर सकते हैं सर, पंछी उड़ कर सरहद से पार निकल गया है "...

अब राष्ट्रपति को अपना काम करना था... मुस्कुराते हुऐ राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री के गले में हाथ डाला और बाहर चलने को कहा... बाहर पूरी दुनिया के मीडिया के कैमरे लगे थे... " हमारे दोनों महान देशों ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को तेल की कीमत के उतारचढ़ाव के नुकसान से बचाने के लिये एक रणनीति तैयार की है, सभी स्टेकहोल्डर्स से बात करने के बाद यह दुनिया के सामने होगी " कहा राष्ट्रपति ने...

तय यह हुआ कि यहीं से दोनों नेता रात के खाने पर जायेंगे और रात का खाना खाने के बाद राष्ट्रपति अपने देश रवाना हो जायेंगे... बहुत शानदार रात्रिभोज था, और उतना ही लजीज खाना भी... जुलू लगातार चिंतित लग रहा था... वह अल्फा के पास आया... अल्फा ने उसका हाथ दबाया और बोला "चिंता मत करो, पागल कुत्ता जिंदा नहीं छोड़ा जायेगा"... ठीक डेढ़ घंटे में रात्रिभोज खत्म हुआ और विदाई के बाद राष्ट्रपति का प्लेन रनवे की ओर बढ़ा... अल्फा और मैं पीछे की सीट पर बैठे थे... अल्फा ने अपनी जेब से फोन निकाल एक मैसेज किया... और रेडियो खोल न्यूज चैनल लगा दिया... पाँच मिनट के बाद खबर आने लगी... ' दिमाग की रक्त वाहिनियों में रक्तस्राव के कारण 'मुल्क विशेष' के प्रधानमंत्री को कोमा की अवस्था में अस्पताल ले जाया गया है, सूत्र बताते हैं कि पिछले एक दिन की अतिव्यस्तता व तनाव के चलते ऐसा हुआ होगा' रेडियो कह रहा था... "पागल कुत्ता अपने अंजाम तक पहुँच गया है" मुस्कुरा कर कहा अल्फा ने और अगले ही पल खर्राटे भरने लगा... अस्पताल में जाने के कुछ घंटे बाद ही प्रधानमंत्री की मृत्यु की घोषणा कर दी गयी...





हम अपने देश पहुँचे, रास्ते भर अल्फा सोता ही रहा, बस बीच बीच में खाने-पीने के लिये उठ जाता था वह, जाहिर था कि पिछले कुछ दिनों से शायद सो नहीं पाया था वह...

एयरपोर्ट पर वह बोला " सनी, जाओ और जम कर सोओ, दो दिनों के बाद मिलते हैं एजेंसी में "... " ओ के पॉप " मैंने कहा... और दौड़ता हुआ टैक्सी स्टैंड पहुँचा... मैंने अपने फ्लैट का पता ड्राईवर को बताया और जल्दी से जल्दी पहुँचाने को कहा... मैं फुटबॉल के विश्वकप के फाईनल के टीवी प्रसारण का एक सेकेंड भी मिस नहीं करना चाहता था...

दो दिन बाद मैं घर से एजेंसी के लिये निकला, रास्ते में मैंने समय काटने के लिये रेडियो ऑन किया... अचानक एक खबर ने मेरा ध्यान खींचा, खबर थी...

एक कॉन्फ्रेंस के बाद एक विश्व प्रसिद्ध टूरिस्ट स्पॉट पर छुट्टियाँ मनाने जा रहे 'न्यूक्लियर साईंटिस्ट्स' से भरे एक चार्टर्ड प्लेन  का संपर्क राडारों से टूट गया था, प्लेन में कुल मिलाकर विश्व के विभिन्न देशों के ४३ वैज्ञानिक सवार थे और यह सभी न्यक्लियर रिएक्टर निर्माण व संचालन के विशेषज्ञ थे...

एजेंसी में 'कनेक्शन' मानो मेरा ही इंतजार कर रहा था... "जाओ अंदर जाओ, अल्फा इज वेटिंग फॉर यू " बोला उसने और अपने लैपटॉप पर कुछ काम करने में लग गया...

अल्फा अपनी मेज पर ही नाश्ता कर रहा था... "चाय लोगे, सन्नी" पूछा उसने... मैंने अपने लिये एक कप बनाया और फिर उसके नाश्ते पर नजर डाली... अल्फा का खाना खाने का तरीका सारी एजेंसी में चर्चा का विषय था, वह बहुत-बहुत खाता था... अभी भी उसके सामने कम से कम एक दर्जन अंडों का आमलेट और दस से ज्यादा सैंडविच रखे थे... "यह नाश्ता तुम्हारे लिये कुछ ज्यादा नहीं है, पॉप" मैंने टोका उसे... "हाँ, ज्यादा तो है सन , पर अगर किसी ने बचपन में मेरी तरह फाके किये हों तो भर पेट खाना खाने लायक बन जाने पर वह मेरी तरह ही खाता है"... मैं चुप हो गया, उसके अभावग्रस्त बचपन और जीवन संघर्ष पर दसियों किताबें लिखी जा सकती थीं... "कल लगभग पूरी रात भर जगा रहा मैं, देर से सोया, इसलिये नाश्ता भी देर से ही हो रहा है" बताया उसने...

वह बहुत शान्त सा था... क्या उसने वह खबर नहीं सुनी, पर ऐसा कैसे हो सकता है... मुझसे रहा नहीं गया और आखिरकार मैंने पूछ ही लिया... "खबर सुनी पॉप ?"... उसने ज्यादा गौर नहीं किया मेरी बात पर और बोला 

"आज से तुम मेरे साथ इसी ऑफिस में काम करोगे, और तुम्हारा टास्क होगा 'मिशन-सर्वाइवल ऑफ द रेस' को संभव बनाना... "यह क्या है ?" पूछा मैंने... " यह मेरा मिशन है, 'अल्फा' का मिशन, हमें इसमें कामयाब होना है हर हाल में, आज की तारीख में हमारा आकलन यह है कि अगर यही स्थितियाँ बनी रही तो बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की ! और हमें बचाना है अपनी नस्ल को ....बहुत सा शुरूआती काम हम कर चुके हैं और अब सबसे महत्वपूर्ण और आखिरी काम होने बाकी हैं"... 

"अब बताओ, तुम क्या समझे? "... 

मेरे दिमाग ने अपने सामने की स्थिति का आकलन शुरू किया और थोड़ी देर बाद बोला मैं... " यानी वह तुम्हारे लिये रियेक्टर बनायेंगे ?"... "तुम्हारा कोड नेम 'प्रोफेसर' सही रखा गया है सन्नी, पर वे रियेक्टर मेरे या तुम्हारे लिये नहीं इंसान की नस्ल के लिये बनायेंगे" मुस्कुराते हुऐ बोला वह...

मैं अगले दिन से ही काम में जुट गया... 'अल्फा' ने एक टीम बनायी थी इस काम के लिये... यह एक बहुत बड़ी जिग-सॉ पहेली सा था, जिसे पूरी संपूर्णता में केवल 'अल्फा' ही समझ सकता था... 

मुझे दो मीटिंगों से पहले की तैयारी करनी थी... और इस तैयारी में पूरे पाँच साल लग गये... सन  २०३७  की शुरूआत हो चुकी थी दुनिया में...

२०३१ से २०३७ के बीच की दुनिया की मुख्य घटनायें थीं...

* विश्व के तमाम कच्चे तेल व प्राकृतिक गैस के भंडार २०५० तक पूरी तरह से खत्म हो जाने वाले थे... तेल बेचने से मिले पैसों पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले देशों में पूरी तरह से निराशा घर कर गयी थी।
* विश्व के तमाम देश उर्जा के अन्य स्रोतों जैसे सौर उर्जा, पवन उर्जा, जल उर्जा तथा नाभिकीय उर्जा का अधिकाधिक प्रयोग करने की राह पर थे।
* २०३५ में एशिया की एक महाशक्ति के एक  महानगर में अचानक से विश्व में बहुत पहले खत्म हो गयी बीमारी चेचक का संक्रमण हो गया, बीमारी के टीके विकसित करने में छह माह लगे, तब तक वह बीमारी एक करोड़ सत्तर लाख जानें ले चुकी थी, उस देश की अर्थव्यवस्था कम से कम दस साल पीछे जा चुकी थी...
* लगभग सभी देश नाभिकीय उर्जा से अपनी उर्जा जरूरतें पूरी करने लगे थे, इसी के साथ यह संभावना भी सिर उठाने लगी थी कि नाभिकीय हथियार भी बहुत से ऐसे देशों को सुलभ हो जायेंगे जहाँ उन्मादियों का शासन था।
* २०३७ के आकड़ों के अनुसार दुनिया की ६० प्रतिशत आबादी डायबिटीज, मोटापा, हाइपरटेंशन, हॄदय रोग, गु्र्दा रोग आदि लाईफ स्टाइल डिजीज से ग्रस्त हो चुकी थी... और अधिकाँश मुल्क अपने कुल बजट का ३० प्रतिशत तक बीमारियों से निपटने में खर्च करने लगे थे...
* २०३७ में ही चारों तरफ समुद्र से घिरे, उच्च तकनीक पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले आर्थिक महाशक्ति एक देश ने अपने प्रतिद्वन्दी दो देशों पर यह आरोप लगा सनसनी फैला दी कि २०३७ में ही उसके तटीय इलाकों को तबाह कर देने वाली सुनामी का आना कोई प्राकृतिक घटना नहीं थी, अपितु ऐसा उसके प्रतिद्वन्दी देशों ने समुद्र की तलहटी पर 'कंट्रोल्ड न्यूक्लियर एक्सपलोजन्स' कर इस सुनामी को जन्म दे उसकी अर्थव्यवस्था को क्षति पहुँचाई थी। दोनों ओर से खंडन व मंडन का सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा... 




और वह पहली मीटिंग

वह एक गुप्त जगह थी... उस मीटिंग को 'अल्फा' ने बुलाया था... और वह तीस भी आये थे... वह सभी अपने अपने मुल्कों की खुफिया एजेंसियों के प्रमुख थे... सबसे पहले 'अल्फा' ने अपना प्रेजेंटेशन दिया... सभी मंत्रमुग्ध होकर उसे देखते ही रह गये... कैसे पूरे दो घंटे बीत गये, पता ही नहीं चला... फिर कमरे की रोशनियाँ जलीं और 'अल्फा' की आवाज गूँजी... "तो सज्जनों, हमारे पास ज्यादा समय नहीं है, ज्यादा से ज्यादा चार-पाँच साल और, फैसला आपको करना है क्या आप इंसान की नस्ल को इस तरह खत्म हो जाने देंगे?... वे सभी आपस में चर्चा में लग गये... पंद्रह मिनट बाद एक स्वर में सभी बोले "नहीं !!!"... 

(यह केवल मैं और अल्फा जानते थे कि उनमें से ग्यारह पहले से ही मिशन से जुड़े हुऐ थे)

मुझे इसी क्षण का इन्तजार था... मैंने इंटरकॉम पर आदेश दिया... "तुम्हारा काम अब शुरू होता है, डॉक्टर"... और अपने दो सहायकों के साथ डॉक्टर ने कमरे में प्रवेश किया... एक बड़ी सी ट्रे थी उनके पास... बारी बारी से वे तीनों उन तीसों के पास गये व हरेक की कोहनी के पास की नस में एक चमकीला सा इन्जेक्शन सा लगाया... फिर एक और आदमी आया कमरे में, उसके पास भी एक ट्रे थी, ट्रे में चमकती धातु की कुछ अंगूठियाँ और  ब्रेसलेट थे,...  "आप इनमें से कोई एक पहन सकते हैं, याद रखिये कि किसी भी हाल में इसे उतारना नहीं है, कभी उतारना भी पड़े तो यह कभी भी आपसे तीन फीट से ज्यादा दूर न रहे"... सबने सिर हिलाया, उनमें से कोई भी कभी भी अपनी अंगूठी या ब्रेसलेट नहीं उतारने वाला था।

"अच्छा सज्जनों, फिर आप अपने अपने देश जा बताये तरीके से शिखरवार्ता की तैयारी करिये" अल्फा की आवाज गूंजी...

और हम सभी डाइनिंग एरिया की ओर बढ़ चले, हाथों में हाथ डाले व आपस में मर्दाना मजाक करते हुऐ...








शिखरवार्ता



वह २०३७ का सितम्बर का महीना था, जब दुनिया के ३० असरदार देशों के शीर्ष नेता जुटे थे उस शिखरवार्ता के लिये, मेरे देश की राजधानी में... एजेंडा था 'विश्व शांति'... पहले तीन दिन जमकर भाषणबाजी हुई, प्रेस वार्ताओं का दौर चला, विश्वशाँति के लिये अपने प्रतिद्वन्दी या शत्रु देशों को सबसे बड़ा खतरा बताया गया कईयों के द्वारा तथा यह चेतावनी भी दी गयी कि शाँति बनाये रखने की जिम्मेदारी बयान देने वाले नेता के देश की नहीं अपितु विश्व समुदाय की है... उधर एजेंसी में हम सभी चौथे दिन की तैयारी में लगे थे...




वह चौथा दिन

दुनिया को यह कहा गया कि आज के आखिरी दिन सभी शीर्ष नेता बंद कमरे में केवल अपने खासमखास सहायकों के साथ एक दूसरे के साथ 'वन टू वन' वार्ता करेंगे और मुद्दे सुलझाने का प्रयास करेंगे... और वह खास मीटिंग शुरू हुई... एक बड़ी सी गोल मेज के चारों ओर बैठे थे तीसों राष्ट्राध्यक्ष और उनसे थोड़ा पीछे उनसे सटी कुर्सी पर उनके खुफिया एजेंसी प्रमुख... हमारे राष्ट्रपति ने एक छोटा सा संबोधन देकर स्टेज अल्फा को सौंप दिया...

अल्फा ने फिर वही दो घंटे का प्रेजेंटेशन दिया जिसमें बताया गया था कि किस तरह इंसान की नस्ल अगले कुछ सालों में खत्म हो सकती है और उसके बाद 'मिशन- सर्वाइवल आफ द रेस' के बारे में बताया गया... मैं देख रहा था कि कुछ राष्ट्राध्यक्ष तो पूरी उत्सुकता से इसे देख रहे थे... कुछ उबासियाँ भरते भी दिखे... और चार पाँच ऐसे भी थे जिनके चेहरे पर यह सब देखने के बाद एक जहरीली मुस्कान चिपक सी गयी...

पर इस बार अल्फा ने अपना प्रेजेंटेशन देने के बाद स्टेज नहीं छोड़ा बल्कि एक वीडियो दिखाने लगा... यह सभी वीडियो पिछले आठ महीनों में अलग-अलग मुल्कों में अलग-अलग जगहों पर खींचे गये थे... और यह राष्ट्राध्यक्षों के मेज पर बैठने के क्रम में ही था... बारी बारी से बड़ी स्क्रीन पर सभी राष्ट्राध्यक्षों को बिस्तर पर लेटे हुऐ तथा उनकी कोहनी के पास की नस पर किसी डॉक्टर को एक चमकीला सा इंजेक्शन सा लगाते हुऐ दिखाया गया... वीडियों में अपने को देखते ही एक ने अपने खुफिया एजेंसी प्रमुख को फाड़ खाने वाली नजरों से देखा... स्टेज से अल्फा ने मुस्कुराते हुऐ कहा " कृपया किसी पर गुस्सा न करिये, वे सब मजबूर थे "... अब कई गहरी चिंता में पड़ गये... आखिरकार वीडियो खत्म हुआ तो उनमें से चार-पाँच दहाड़े " क्या है इस सब का मतलब ? "

इस बार अल्फा सीरियस हो गया और उसने एक अगला वीडियो दिखाना शुरू किया... स्क्रीन पर वही चमकीला इंजेक्शन दिखाई दिया और कैमरे ने उसकी पारदर्शी सुई पर फोकस किया... सुई के बीच में हल्के गुलाबी रंग का कुछ था...वह आलपिन के सिर का भी आधा ही रहा होगा आकार में... यह एक 'बायोअल्ट्रामाइक्रोरोबोटिक यंत्र' है... इसे किसी भी इंसान की किसी भी नस के अंदर प्रवेश करा देने के तीन घंटों के अंदर यह स्वयंमेव उसके दिमाग की रक्तवाहिनियों तक पहुँचकर वहाँ अपने को जमा लेता है...और यह हमारे केंद्रीय नियंत्रण कक्ष द्वारा नियंत्रित है... यह इस प्रकार के मटीरियल से बनाया गया है कि आज की तारीख में हमारे सिवाय दुनिया में किसी के पास वह तकनीक नहीं है कि किसी के शरीर के भीतर इसकी मौजूदगी को डिटेक्ट तक कर सके... अब अल्फा ने मुझे इशारा किया...

मेरे हाथ में एक हैंड-हैल्ड स्कैनर था... मैंने बारी बारी से उसे सभी नेताओं के चेहरे के सामने रखना शुरू किया और उधर बड़ी स्क्रीन पर बारी बारी से उनका कपाल और कपाल के बीच में एक चमकता बिन्दु दिखाई देना शुरू हो गया... अब उनमें से कुछ पसीने से भीग चुके थे जबकि हॉल का तापमान १७ डिग्री सेल्सियस था...

"आगे बताओ"... बुझी सी आवाज में उनमें से कुछ बोले...

" यह सब यह बताने के लिये कि हमारा यह अनूठा यंत्र आप लोगों के मस्तिष्क में स्थापित हो गया है, इसमें किसी को कोई शक न रहे" अल्फा की आवाज गूंजी...



और वह खौफनाक नजारा


 "अब मैं दिखाउंगा कि हमारा यह यंत्र क्या क्या कर सकता है" अल्फा बोला... और स्क्रीन पर एक और वीडियो चालू हो गया... अल्फा ने अपने हाथ में पकड़े रिमोट का बटन दबाया और चलता हुआ वीडियो रूक गया बीच में ही... "सबसे पहले आप सब को यह भरोसा दिलाने के लिये कि यंत्र आपके दिमाग के भीतर लगा है और काम भी कर रहा है, मैं आपको थोड़ा कष्ट दूँगा मात्र पाँच मिनट तक" और उसने ईशारा किया... अचानक विश्व के वह तीसों शीर्ष नेता अपनी आँखें झपकाने लगे, सामान्य आँखें झपकने से फर्क यह था कि एक साथ सबकी पहले बाँयी आँख झपकी और फिर दाहिनी... झपकने की रफ्तार धीरे धीरे बढ़ती रही, पाँच मिनट पूरे होने तक आप इसे आँखों का झपकना नहीं, बल्कि एक अविश्वस्नीय रफ्तार से फड़फड़ाना कह सकते थे... ठीक पाँच मिनट बाद सब सामान्य हो गया लेकिन वह सभी काफी समय तक अपनी आँखों व सिर को मलते रहे... डर उनके चेहरों से साफ झलक रहा था...

"यह सिर्फ इसलिये कि आप मेरी बातों का भरोसा करें" कहा अल्फा ने... और फिर से वीडियो को चालू कर दिया... सामने एक आदमी था... " यह हमारे देश का एक शत्रु है जिसके फैलाये आतंक ने हमें बहुत नुकसान पहुँचाया, इसे जीने का कोई हक नहीं, हमें इसे मारना ही था इसलिये सोचा कि क्यों न अपने वीडियो का हीरो इसी को बना लिया जाये" अब गंभीर था अल्फा...

"सज्जनों, हार्ट अटैक का दर्द मानव को अनुभव होने वाले सबसे तेज दर्दों में गिना जाता है, पर इस यंत्र के जरिये हम अपने शिकार को इस से भी कई हजार गुना तेज दर्द दे सकते हैं" यह देखिये... और अचानक वीडियो पर दिखता आदमी बेहद दर्द में अजीबोगरीब तरीके से अपने शरीर को मोड़ने तोड़ने लगा, उसने अपने हाथ की उंगलियाँ मुँह के अंदर डाल दीं और एक झटके में ही दो उंगलियाँ अपने ही शरीर से अलग कर दीं... वीडियो यहीं पर बंद हो गया... "चार पाँच सेकेंड भी इस दर्द को झेलने के बाद पंद्रह दिन तक इंसान आइने में अपने आप को पहचानने लायक भी नहीं रहता" अल्फा का स्वर गूँजा...

"इस यंत्र को हमने विस्फोटक क्षमतायुक्त भी बनाया है, अगर हम हल्का विस्फोट करें तो दिमाग की रक्तवाहिनियाँ फटेंगी और 'ब्रेन हैमरेज' से मौत होगी, जैसी 'मुल्कविशेष' के पागल कुत्ते की हुई थी... और"... वीडियो फिर चालू हो गया, स्क्रीन पर वही पहले वाला आतंकी था... " अगर हम उच्च शक्ति का विस्फोट करें तो" अल्फा का चेहरा भावशून्य था... अचानक स्क्रीन पर दिख रहे आतंकी की खोपड़ी एक धमाके से उड़ गयी, सरविहीन शरीर काफी देर तक हरकत करता रहा...

पूरे हॉल में सन्नाटा था... अल्फा ने मुझे ईशारा किया... मैंने फोन पर कुछ निर्देश दिये... और एक बड़ी सी ट्रे में सुनहरे ब्रेसलेट व अंगूठियाँ लिये एक शख्स हॉल में आया... " यह अंगूठी या ब्रेसलेट आपको पहनने हैं, आपके पल-पल की खबर हमें इनसे मिलती रहेगी, किसी भी हाल में इनको अपने शरीर से तीन फुट से ज्यादा दूर नहीं होने देना है, ऐसा होते ही आपके दिमाग में जमे यंत्र में स्वयम ही विस्फोट हो जायेगा" बोला अल्फा... और जल्दी से जल्दी अंगूठी या ब्रेसलेट पहनने के लिये भगदड़ सी मच गयी...

यह सब हो जाने के बाद उनमें से दो-तीन से साहस जुटा पूछा " क्या चाहते हो हमसे"... अब पहली बार अल्फा मुस्कराया, एक गर्वीली व आश्वस्त मुस्कान थी वह " ज्यादा कुछ नहीं, केवल दो चीजें, पहली अगले चार साल तक किसी भी हाल में कोई मिसएडवेंचर नहीं और दूसरा 'मिशन-सर्वाईवल ऑफ द रेस' को सम्पूर्ण सहयोग तन-मन और धन का, मेरे ख्याल से कुछ ज्यादा नहीं मांग रहा मैं"...

अब बारी हमारे राष्ट्रपति की थी " यह देखना हमारा काम है कि अगले चार सालों तक आपलोग ही सत्ता में रहें, चाहे इसके लिये हमें आपके पड़ोसी से युद्ध की धमकी दिलानी पड़े या भूकंप-सुनामी पैदा करने पड़ें, यह हम पर छोड़ दीजिये "

इसी के साथ शिखरवार्ता समाप्त हो गयी...



बाद में


वह तीसों अगले दिन हमारे देश के एक खूबसूरत रिसोर्ट पर पिकनिक मनाने चले गये... सारे मीडिया में उनकी मित्रवत बॉन्डिंग के चर्चे थे...


और 'मिशन-सर्वाइवल ऑफ द रेस' अपने सबसे महत्वपूर्ण दौर में पहुँच चुका था...अब हमें दिन-रात भी कम पड़ने वाले थे काम करने को...






अब बहुत सी घटनायें बेहद तेजी से घटीं...

उनमें से जो सबसे महत्वपूर्ण थीं वह यह हैं...

* विश्व के तमाम देशों की साझेदारी वाली एक कंपनी का गठन हुआ जिसने तेल व गैस की खोज के लिये बहुत बड़े पैमाने पर दुनिया के तमाम हिस्सों उत्तरी व दक्षिणी ध्रुव, पर्वतों की घाटियों व गहरे समुद्र में भी खुदाई करना शुरू कर दिया।

* एक नयी बहुराष्ट्रीय कंपनी का उदय हुआ जो केवल स्वास्थ्य जाँच का काम करती थी... इस कंपनी ने बहुत ही सस्ते दामों में हेल्थ चेकअप करना शुरू किया... सबसे विशेष बात यह थी कि समाज के प्रतिष्ठित लोगों के चेकअप कंपनी मुफ्त करती थी... 

* शिखरवार्ता में शामिल उन तीस में से एक की मौत दिमाग की रक्तवाहिनियाँ फटने के कारण हुऐ रक्त स्राव से हुई तथा एक का सिर मोबाइल पर बात करते करते अचानक हुऐ एक धमाके में उड़ गया... बताया गया कि बम मोबाइल में था... दोनों ही मामलों में पूरी दुनिया के सहयोग से सत्ता का सहज हस्तांतरण हो गया उन दोनों के उत्तराधिकारियों के हाथ...




और वह दो रहस्यमय आदमी


दुनिया के हर हिस्से में दो रहस्यमय आदमी लोगों से मिलने उनके आफिस, घर, कॉलेज या खेल के मैदानों में जाते थे... और हर जगह लगभग यही बातें होतीं थी..

" मिस्टर वंडरकिड, हमें राष्ट्रपति ने भेजा है और यह है हमारा अथॉराइजेशन, हमें अभी और अकेले में आपसे कुछ बातें करनी हैं "

आइये मेरे कमरे में चलते हैं वंडरकिड बोला... कमरे में जाते ही उन दोनों ने खिडकियों के परदे गिरा दिये और दरवाजा भीतर से बोल्ट कर दिया... उनमें से एक ने लैपटॉप खोला और एक छोटी सी फिल्म वंडरकिड को दिखाई... फिल्म मिशन-सर्वाइवल ऑफ द रेस के बारे में थी... वंडरकिड की आँखें मानो हैरानी से फटी जा रही थीं...

" मिस्टर वंडरकिड, मिशन के हिसाब से आप एक ऐसे आदमी हैं जिनका बचे रहने से मानव सभ्यता को अपने आगे के सफर में आसानी होगी... हमने यह भी पता कर लिया है कि आपको कोई भी आनुवांशिक, मानसिक व शारीरिक बीमारी नहीं है और न ही आपके शरीर में कोई असाध्य संक्रमण है... आपको मिशन के बारे में बता दिया गया है... अब मैं कैमरा निकालने जा रहा हूँ ताकि आपकी सूचित सम्मति (Informed Consent) ली व रिकॉर्ड की जा सके..."

उनमें से एक ने कैमरा ऑन किया व वंडरकिड पर फोकस किया...  दूसरे ने वंडरकिड को सामने रखे लैपटॉप से कुछ जोर से बोल कर पढ़ने को कहा... वंडरकिड के पूरा पढ़ने के बाद दूसरे आदमी ने उससे पूछा " क्या आप सब कुछ जानते-समझते हुऐ मिशन सर्वाइवल ऑफ द रेस का हिस्सा बनने को तैयार हो ?"

"मैं सब कुछ जानते-समझते हुऐ मिशन-सर्वाइवल ऑफ द रेस का हिस्सा बनने को तैयार हूँ" जोर जोर से बोल दो बार दोहराया वंडरकिड ने... पहला आदमी कैमरे से यह सब रिकॉर्ड कर रहा था, रिकार्डिंग पूरी होने के बाद भी उसने कैमरे का फोकस वंडरकिड के चेहरे पर ही रखा व तीन बटन एक साथ दबाये... कैमरे के लेंस के ठीक ऊपर से नीले-हरे रंग की किरणें निकल वंडरकिड के माथे पर पड़ीं, उसे कुछ महसूस नहीं हुआ... 

वह दोनों मुस्कुराते हुऐ कमरे से बाहर निकले... वंडरकिड ने मिशन का हिस्सा बनने की रजामंदी जाहिर की थी... उन नीली-हरी किरणों के चलते उसे पिछले दो घंटे व आने वाले आधे घंटे में हुआ कुछ भी याद नहीं रहने वाला था... यह कुछ इस तरह का था मानो उसकी जिंदगी में यह ढाई घंटे घटे ही नहीं...

यह सूचित सम्मति तकरीबन दो लाख लोगों से लेने का लक्ष्य था...




और अचानक ही


और अचानक ही मुझे एजेंसी से बुलावा आया एक दिन... हर हाल में तुरंत पहुंचना था मुझे... पहुंचने पर पता चला कि अल्फा को गंभीर हॄदयाघात हुआ था... अपने खाने पीने का बिल्कुल भी ख्याल नहीं रखता था वह... टोकने पर कहता था कि मैं हार्टअटैक से ही मरना चाहता हूँ... मैं अस्पताल पहुँचा वह बोलने की हालत में नहीं था... और कुछ ही देर में उसने दम तोड़ दिया... काफी समय से साथ रहते रहते व उसके कारनामों को जानने के कारण अंदर ही अंदर बहुत लगाव हो गया था उससे मेरा... मशीनों-नलियों से जुड़े उसके शरीर को मशीनों-नलियों से अलग कर जब बाहर ले जाया जा रहा था तो मैंने स्ट्रैचर ट्रॉली रूकवायी, उसका चेहरा खोला, माथे को चूमा और बोला " बेफिक्र जाओ और खुश रहो, पॉप, तुमने अपना काम हमेशा अच्छे से किया!"... तब मुझे यह कतई महसूस नहीं हुआ पर देखने वालों ने मुझे बाद में बताया कि मेरी आँखों से आँसुओं की धार निकल रही थी तब...

अल्फा के किये नोमिनेशन के मुताबिक मैं ही नया अल्फा था... यह एक बहुत बड़ा दायित्व था... मैंने निश्चित कर लिया था कि मिशन को हर हाल में २०४० के सितम्बर महीने तक पूरा करना है...







 २०३९


जमीन के नीचे हमारे पाँचों स्टेशन २०३९ तक बन कर तैयार हो चुके थे... हरेक पूरी तरह से नाभिकीय उर्जा युक्त व ८०,००० आदमियों का साठ साल तक बाहर की दुनिया से कोई संपर्क रखे बिना भरण-पोषण करने में सक्षम था... इन स्टेशनों में भविष्य में आने वाली किसी भी आपात स्थिति से निपटने की क्षमता थी व पाँचों स्टेशन आपस में संपर्क में रहने वाले थे...

अभी भी थोड़े बहुत छोटे छोटे काम बचे थे... दुनिया में टकराव बढ़ रहा था ... मैंने ३० सितम्बर २०४० की डेडलाइन जारी कर दी...

आबाद होना स्टेशनों का


* अपने विश्व विद्मालय के इतिहास में सबसे कम उम्र में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर बनने वाली कार्ला हमेशा की तरह सुबह विभाग को जाने घर से निकली और रोजाना की तरह ही सड़क पर पहुंचते ही टैक्सी को हाथ दिया... पर वह यह देख हैरान रह गयीं कि जिस टैक्सी में वे चढ़ीं उसकी पीछे की सीट पर पहले से ही कोई बैठा हुआ था... बिना किसी प्रस्तावना के वह अजनबी अपने लैपटॉप पर कार्ला को एक वीडियो दिखाने लगा...

उस दिन के बाद कार्ला कभी भी देखी नहीं गयी...

* टेनिस एस विक्टर अपने कोच की शुभकामनायें स्वीकार कर रात देर से सोये... अगले दिन सुबह उन्हें एक ग्रैन्ड स्लैम टूर्नामेंट खेलने दूसरे महाद्वीप जाने के लिये फ्लाईट पकड़नी थी... वह घर से एयरपोर्ट को निकले... पर अपनी फ्लाईट में वह नहीं थे... 

वे भी दोबारा कभी देखे नहीं गये...

* सिलिकॉन वैली के वह छहों युवा 'टैकी' भारत के एक प्रसिद्ध तकनीकी संस्थान से निकले थे व अपने अपने क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ दिमागों में उनकी गिनती होती थी... वह छहों आपस में गहरे दोस्त भी थे... आज उन सभी को एक अनाम वेंचर कैपिटलिस्ट ने एक प्रोजेक्ट पर बातचीत के लिये बुलाया था और उनके लिये एक चार्टर्ड प्लेन भी भेजा था... छहों दोस्त प्लेन में सवार हुए...

उनमें से कोई भी कभी दोबारा नहीं देखा गया...

दुनिया के हरेक हिस्से से इसी तरह लोग गायब हो रहे थे... यह वह लोग थे जो अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ माने और जाने जाते थे... किसी सरकार के पास उनके गायब होने का कोई स्पष्टीकरण नहीं था...


दिखना विचित्र विमानों का

और फिर एक नया मामला सामने आया... दुनिया के विभिन्न हिस्सों में, दिन में और रात में भी आकाश में कुछ विचित्र से विमान दिखायी देने लगे... ऐसे विमान दुनिया ने पहले कभी नहीं देखे थे... और इसी के साथ साथ अफवाहों का बाजार भी गर्म हो गया... मीडिया में, बहसों में और आम लोगों में भी अनुमान लगने लगे कि कोई बाहरी सभ्यता पृथ्वी से आदमियों को उठा ले जा रही है...

और आदमियों-औरतों का अचानक लापता होना बढ़ता ही चला गया...





शिखर बैठक


फिर से एक शिखर बैठक आयोजित की गयी... बैठक से पहले ही अफवाहें उड़ने लगीं कि वह बाहरी सभ्यता सभी राष्ट्राध्यक्षों को भी छीन कर ले जा सकती है... सुरक्षा के सारे इंतजाम किये गये... फिर भी ऐसी किसी घटना के वाकई घट जाने की स्थिति में दुनिया के वह तीस ताकतवर देश नेतृत्वविहीन न हों जाये इसे ध्यान में रखते हुऐ सभी राष्ट्राध्यक्ष अपने उत्तराधिकारी का इंतजाम भी करने के बाद शिखर बैठक के लिये गये...

पूरी दुनिया के मीडिया का जमावड़ा था वहाँ... वह तीसों उस हॉल में पहुँचे... और फिर वह घटा जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था... अचानक उस पूरे इलाके की बिजली चली गयी... यही नहीं उस हॉल के आस-पास के तकरीबन चार वर्ग किमी० के इलाके के सारे इलेक्ट्रानिक व मैकेनिकल उपकरणों, मोबाईल फोनों, रेडियो सेटों, वाहनों आदि ने अचानक काम करना बन्द कर दिया... और फिर वहाँ उपस्थित सभी ने देखा कि एक विशाल विचित्र विमान शिखर बैठक स्थल पर मंडरा रहा है... तकरीबन दस मिनट तक वह विमान मंडराता रहा... 

दस मिनट के बाद वह विमान कहीं दूर के लिये उड़ चला... उसके जाते ही बिजली भी आ गयी और सब कुछ यथावत भी हो गया... बस एक ही कमी थी... तीसों राष्ट्राध्यक्ष गायब हो चुके थे...

यह ३० सितम्बर २०४० का दिन था...




शुरू होना मिशन का


हमारे पाँचों स्टेशन आबाद हो चुके थे... कुल १,८०,००० आदमी व औरतें इस मिशन का हिस्सा बने... हमने ऊपर की दुनिया को उसके हाल पर छोड़ दिया था... सभी ने पूरे छह साल स्टेशनों में रहना था और यदि इसके बाद भी दुनिया बची रहती तो मिशन को वहीं खत्म कर सब के सब को वापस दुनिया में सामान्य जिंदगी गुजारने के लिये वापस चले जाना था...

पर हमारे अनुमान गलत साबित नहीं हुऐ... २०४३ की गर्मियों में छोटी सी झड़प से शुरू हुई लड़ाई नाभिकीय युद्ध में बदल गयी... दुनिया के तमाम मुल्कों की न्यूक्लियर डॉक्ट्राईन 'पारस्परिक सुनिश्चित सम्पूर्ण विनाश' के सिद्धान्त पर आधारित थी... और यही हुआ भी... जल, थल और आकाश से हजारों नाभिकीय हथियार एक दूसरे पर छोड़े गये... और पूरी दुनिया खत्म हो गयी... नाभिकीय उर्जा ने तमाम शहरों को धुंआ बना दिया... मानव की आबादी मटियामेट हो गयी... जंगल आग से जल गये... बर्फ के तमाम भंडार पिघल गये और नतीजे के तौर पर तमाम तटीय इलाके समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण डूब गये... 

विस्फोटों के कारण धूल और धुंऐ के बादल उठे और उठते ही चले गये... यह बादल २०० किमी० की ऊंचाई तक गये और फिर नीचे बैठने में एक साल से भी ज्यादा का समय लिया... यानी एक साल तक पूरी दुनिया पर सूर्य की किरणें नहीं पहुंचने दी इन बादलों ने... नतीजा ज्यादातर जगह शून्य से तकरीबन अस्सी डिग्री नीचे का तापमान हो गया विस्फोटों से लगी आग बुझने के बाद... और तमाम तरह का जीवन खत्म हो गया...



योग्यतम की उत्तरजीविता

लेकिन जमीन और समुद्र के डेढ़ से दो किमी० नीचे बने स्टेशनों में जिंदगी अपने पूरे परवान पर थी... बाकी दुनिया को खोने का गम अगर था तो सम्पूर्ण विनाश के बाद भी मानव नस्ल को जिंदा रखने की चुनौतियाँ भी थीं... 

Theory of 'Natural Selection' और Theory of 'Survival of the Fittest' मानो पूर्णता से अपने को साबित कर चुकी थी...


ओम्

जमीन व समुद्र के नीचे बने  हमारे पाँचों स्टेशनों के निवासियों को भी यह पता लग गया कि ऊपर खुले आसमान के नीचे बसी उनकी प्यारी दुनिया अब नहीं रही... अपने प्रियजनों, अपनी स्मृतियों और अपने अनुभवों से इस तरह यकायक बिछड़ना सभी के लिये दुखदायी था व काफी समय लगा हम सबको इस सब कुछ खो देने की तड़प से उबरने में... लेकिन जिंदगी तो जिंदगी है, वह फिर परवान चढ़ी... कुछ ही महीनों बाद हमारे स्टेशनों में हजारों शादियाँ हुई... और ऐसी ही एक शादी हुई नाभिकीय भौतिकविद् भारतीय मूल के हरि और जापानी मॉलीक्यूलर बायोलॉजिस्ट योको के बीच... मैं भी इस विवाह समारोह में शामिल हुआ...  विवाह के एक साल बाद २०४५ में उनका एक पुत्र हुआ, नाम रखा गया ओम्... यही ओम् जिसे हर नाम को रेडियो कम्यूनिकेशन की शब्दावली में याद करने की अपनी आदत के चलते मैं ऑस्कर माईक कहता था, आगे हमारे इस मिशन का एक अहम किरदार बना...



हमारी तरक्की

हमारा अंदाजा था कि तकरीबन बीस साल लगेंगे ऊपर की दुनिया को फिर से रहने लायक बनने में... रेडियोएक्टिव विकिरण की मात्रा को मानव के रहने लायक होने में करीब-करीब बीस साल लगने थे... फिर भी
२०५३ से हमने अपने कुछ रोबोटिक प्रोब ऊपर भेजने शुरू कर दिये... दो-तीन साल पूरी दुनिया की खाक छानने के बाद हमें कुछ ऐसे इलाके मिले जहाँ पर रेडियोधर्मिता न के बराबर थी... पादपों,जानवरों, पक्षियों, कीट-पतंगों आदि आदि की जितनी भी प्रजातियों को हम बचा पाये थे, उनको धीरे धीरे एक क्रमबद्ध तरीके से उनके कुदरती वातावरण में छोड़ने/लगाने का कार्य २०५८ से शुरू कर दिया गया... २०६३-६४ में हमारे पाँचों स्टेशनों के निकटस्थ उपलब्ध अनुकूल स्थान पर हवाई पट्टी व स्टेशन की आबादी के लिये आवास बनाने का कार्य शुरू हो गया... २०६८ में हमने पूरी तरह से पृथ्वी की सतह पर रहना शुरू कर दिया..

जमीन के नीचे हमारे पाँचों स्टेशनों में सर्वश्रेष्ठ मानव मस्तिष्क बिना किसी अवरोध या चिंता/हस्तक्षेप के अपने अपने विषय पर शोध कर ही रहे थे... और हमें इस शोध के परिणाम भी मिलने लगे थे... हमारे स्टेशनों के आबाद होने के पाँच वर्षों के भीतर ही हमें मानव क्लोन बनाने में कामयाबी मिल गयी... मानवीय जीन संरचना को भी हम २०४७ के आसपास तक पूरी तरह से समझ चुके थे... इसके महज दो साल के भीतर ही हमने विभिन्न जीन्स को व उनके मानव देह पर असर को नियंत्रित कर पाने की क्षमता भी हासिल कर ली थी... यह एक बेहद संभावनाओं भरा दौर था व इसकी अपनी कुछ अलग सी ही चुनौतियाँ भी थीं... मुझे लगा कि 'अल्फा' को इस पूरे दौर में बहुत अहम रोल अदा करना होगा... और कुछ सोच मैंने अपना भी एक क्लोन तैयार करने का आदेश दे दिया... साथ ही मैंने यह भी आदेश दिया कि मेरे उस क्लोन की आयुवृद्धि को नियंत्रित करने वाले जीन्स की इस तरह प्रोग्रामिंग की जाये कि उस क्लोन की आयु ६० वर्ष तक तो सामान्यत: बढ़े परंतु उसके बाद आयु बढ़ने व कालिक क्षय की प्रक्रिया रूक जाये... मेरी इस सोच के पीछे एक आशा काम कर रही थी, और वह आशा थी कि हम २०७० तक मानव मस्तिष्क की गुत्थी भी सुलझा लेंगे...



ऑस्कर माइक

ओम् यानी ऑस्कर माइक, जिसके माता-पिता के विवाह में मैं शामिल हुआ था अब २२ वर्ष का युवा हो चुका था, उसके पिता से जब-तब मेरा मिलना हो जाता था... एक दिन हरि ने मुझसे अनुरोध किया कि ऑस्कर माइक मुझसे मिलना चाहता है और यह एक विशेष मुलाकात होगी... मैं राजी हो गया...

वह आया... और बिना किसी प्रस्तावना के मुझसे बोला " अल्फा, मेरी टीम को किसी एक मानव मस्तिष्क का समस्त ज्ञान, सूचनायें व अनुभव दूसरे मानव मस्तिष्क में ट्रांसफर करने की क्षमता मिल गयी है... मैं चाहता हूँ कि तुम इसे देखो "

मैं उसकी लैब गया और उसके काम को देखा... मुझे पता था कि हमारे पास प्रयोगशाला में कुछ मानव क्लोन तैयार थे... मैंने उसे उन पर प्रयोग करने की इजाजत दे दी... और वह कामयाब रहा...



मैं २०७० से ही साठ वर्ष का हूँ आज तक

मैं साठ साल का हो रहा था आज... मैंने ऑस्कर माइक को बुलाया व अपने इरादे के बारे में बताया... " मैं तो तुमसे यह करने को काफी समय से कहना चाह रहा था, अल्फा... पर मुझे भय था कि कहीं तुम मुझे गलत न समझ बैठो "

हम उसकी लैब गये... मेरे क्लोन को भी वहाँ लाया गया व मेरे मस्तिष्क का का समस्त ज्ञान, सूचनायें व अनुभव मेरे क्लोन के मस्तिष्क में स्थानान्तरित कर दिये गये... अब मेरा क्लोन ही 'मैं' था... व मेरा पुराना शरीर एक पूर्णत: खाली मस्तिष्क लिये एक अस्थि-मज्जा का ढाँचा मात्र, जिसे मैंने अपनी ही देखरेख में नष्ट करवा दिया... मैं उसी दिन से आज तक ६० साल का ही हूँ... आशा है अब आप समझ गये होंगे कि क्यों मैंने शुरूआत में ही कहा था कि " 'अल्फा' , हाँ १८५४६ साल पहले जब हम इस खोज में निकले थे तो हमारी दुनिया मुझे इसी नाम से जानती थी... ६० साल का था तब मैं... मैं आज भी ६० साल का ही हूँ... सही कहूँ तो मैं सन् २०७० से ६० ही साल का हूँ... ऐसा क्यों है इसे समझने के लिये तुमको मेरी पूरी कहानी पढ़नी पड़ेगी..."



विचारवान

ऑस्कर माइक से मेरा मिलना बढ़ता ही गया और मैंने उसे उसकी शोध को और आगे बढ़ाने को कहा.... एक दिन हम आपस में बात कर रहे थे अचानक किसी बात के दौरान वह बोला " मानव मस्तिष्क अपनी क्षमताओं के सहस्त्राँश के बराबर क्षमता का भी इस्तेमाल नहीं करता सामान्यतया "... मेरे दिमाग में एक विचार सा कौंधा... " तुम्हारी टीम के पास किसी एक मानव मस्तिष्क का समस्त ज्ञान, सूचनायें व अनुभव दूसरे मानव मस्तिष्क में ट्रांसफर करने की क्षमता तो है, पर क्या किसी एक मानव मस्तिष्क का समस्त ज्ञान, सूचनायें व अनुभव कॉपी भी किया जा सकता है, जिससे वह उसके मूल धारक के पास तो रहे ही, किसी दूसरे के मस्तिष्क में भी उसे स्थापित किया जा सके "... " देखता हूँ अल्फा, मेरी समझ से यह संभव होना चाहिये"... उस ने मुझसे विदा ली...

ऑस्कर माइक के इस 'देखने' में बारह साल लग गये... इन बारह सालों में वह अपने परिजनों के अतिरिक्त शायद ही किसी और से मिला... 

बारह साल बाद सन् २०८४ में ऑस्कर माइक मुझसे मिलने आया... वह बहुत खुश था... "मेरी टीम कामयाब हुई",वह चहका... "बहुत खूब, अब हमारी तरक्की की रफ्तार भी कई हजार गुना बढ़ जायेगी", कहा मैंने...

" मैं समझ रहा हूँ अल्फा कि तुम क्या चाह रहे हो, एक ही मानव मस्तिष्क में अनेकों मानव मस्तिष्कों का ज्ञान... पर इसमें दिक्कतें भी बहुत आयेंगी... बहुत सारे व्यक्तित्वों का एक अजीब सा मिश्रण बन जायेगा वह... ", बोला ऑस्कर माइक... " हाँ यह तो होगा ही, पर मुझे लगता है कि परिणामी महा मस्तिष्क इस समस्या का समाधान निकालने में सक्षम रहेगा "मैंने कहा...

'मैं तुम्हें भी नहीं खोना चाहता, ऑस्कर माइक' मैंने सोचा और ऑस्कर माइक का क्लोन बनाने और उस क्लोन की आयुवृद्धि के कारक जीन्स की मेरी ही तरह ६० वर्ष का बाद आयुवृद्धि व कालिक क्षय को रोक देने लायक प्रोग्रामिंग करने के आदेश दे दिये... 

फिर हम अठारह साल बाद यानी सन् २१०२ में मिले... सबसे पहले ऑस्कर माइक के मस्तिष्क की समस्त सूचनायें उसके क्लोन के मस्तिष्क में कॉपी की गयी... क्लोन को अभी सुषुप्तावस्था में ही रखा गया... यह किसी दुर्घटना की संभावना के प्रति एक प्रकार का बीमा सा था... 

हमारे तब के समाज के अपने विभिन्न विषयों के शीर्ष १००० मानव मस्तिष्कों के समस्त ज्ञान, अनुभव और सूचनाओं की कॉपी हमारे पास तैयार थी... यह सब ऑस्कर माइक के मस्तिष्क में उतार दिया गया...

वह तीन वर्षों तक स्वयं से जूझता रहा... १००१ विभिन्न व्यक्तित्व उसके अंदर संघर्षरत थे... पर आखिरकार फिर दिमाग की जीत हुई... और ऑस्कर माइक अपनी छोड़ अन्यों की व्यवहार, आस्था, विश्वास, चरित्र संबंधी व्यक्तित्वपरक सूचनायें फिल्टर करने में कामयाब रहा... 

अब एक महामस्तिष्क हमारे पास था... कुछ भी हम पा सकते थे... २१०५  में ऑस्कर माइक जब साठ साल का हुआ तो उसके मस्तिष्क के समस्त ज्ञान, अनुभव व सूचनाओं को मेरी ही तरह उसके क्लोन के मस्तिष्क में स्थानान्तरित कर दिया गया... उसने भी अपनी पुरानी देह को मेरी ही तरह अपने सामने नष्ट कराया...

अब हम दोनों अमर थे... हम हमेशा ६० ही वर्ष के रहेंगे... पर अमर होकर जीना हमारा लक्ष्य नहीं था...



विचारवान

२१३० में ऑस्कर माइक एक बार फिर मुझसे मिलने आया... " अल्फा, मेरा मानना है कि चौबीस घंटे में हम अपने मस्तिष्क का कुछ नया सोचने में मात्र कुछ मिनट ही इस्तेमाल करते हैं, हमारा बाकी समय तो सोने, खाने, जिंदगी के अन्य कारोबार निपटाने आदि में चला जाता है", उसकी आँखों में एक चमक सी थी... " तो क्या सोचा है तुमने ?", मैंने पूछा, जबकि मुझे उत्तर पता था... " मैं अपने मस्तिष्क की एक मशीनी कॉपी तैयार करने की इजाजत चाहता हूँ, यह चौबीसों घंटे सोचने में सक्षम होगी", वह बोला... " गो अहैड ", मैं मुस्कराया...

हमने उस मशीन का नाम रखा ' विचारवान '...


प्रकाशातीत गति

हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद बृह्माँड की हमारी जानकारी सीमित थी... कारण यह कि तब तक का हमारा ज्ञान कहता था कि प्रकाश की गति से अधिक गति संभव नहीं है... और बृह्माँड की कई आकाश गंगाओं व तारों का प्रकाश तब तक भी पृथ्वी पर नहीं पहुंचा था... पर २१३५ में हमें 'विचारवान' के जरिये पता चला कि प्रकाश की गति से भी अधिक गति संभव है... और वह है विचार की गति... यह प्रकाश की गति के वर्ग के बराबर थी... विचारवान को इस पर और काम करने के निर्देश दे दिये गये...



टारगेट २२३५

प्रकाशातीत गति की खोज हमारे लिये बहुत बड़ी खोज थी... अब जाकर लगने लगा था कि शायद हम बृह्मान्ड के उन हिस्सों तक पहुँच सकेंगे जहाँ जाने की हम सोच भी नहीं सकते थे...

मानव जाति के तौर पर अब हमारे सामने कोई बड़ी चुनौती नहीं थी... २०४० में जो १८०००० सदस्य भूगर्भ स्थित स्टेशनों में बसाये गये थे, वह एक बहुत अच्छा जेनेटिक आधार रखते थे... अब अपनी तरक्की के साथ हम सारी बीमारियों को जीत चुके थे... मानव शरीर के हर अंग की हार्वेस्टिंग करने में सक्षम थे... मानव की जीन संरचना को पूरी तरह समझा जा चुका था,हम जीन संरचना की गड़बड़ियों के मामले में गर्भ में ही उनको ठीक कर सकते थे... हम किसी को भी अमर बनाने की क्षमता रखते थे... पर उस समय की हमारी दुनिया में हम दो ही थे, मैं और ऑस्कर माइक, जिन्हें अमर कहा जा सकता था... हमारी उम्र ६० वर्ष पर रूकी हुई थी... कालिक/कायिक क्षय को रोकने की इस तकनीक को सबके लिये उपलब्ध न कराने का मेरा यह निर्णय सोचा समझा निर्णय था...

मेरी समझ में अब समय आ गया था कि हम वह करें जो मानव जाति में किसी ने नहीं करने की सोची थी... २०४० में हमारी हंसती-खेलती दुनिया विभिन्न धर्मों के झगड़ों के चलते खत्म हुई थी... और सभी धर्म ईश्वर को मानते थे... मैंने ईश्वर को ढूंढने, उस तक पहुंचने का निर्णय लिया...

२१३५ में ही ऑस्कर माईक को साथ लेकर मैं 'विचारवान' के पास गया और मैंने अपना इरादा उनको बताया... "मैं चाहता हूँ कि २२३५ तक हम वह क्षमता हासिल करें कि हम ईश्वर की खोज में जा सकें, चाहे वह कहीं भी हो, बृह्माँड में या इसके बाहर भी... मैं २०१० में पैदा हुआ था और अब तक १२५ वर्ष जी चुका हूँ, थक गया हूँ मैं अब... मैं ज्यादा से ज्यादा १०० वर्ष और इंतजार करूंगा... अगर तब तक कुछ नहीं हुआ तो मैं शरीर त्यागने की सोचूंगा "

"नहीं अल्फा, यह खयाल हमें भी परेशान करता है, हम पूरी कोशिश करेंगे " एक स्वर में बोले दोनों...


सफर की तैयारी

उसके बाद की घटनायें बहुत तेजी से घटी... हम यह जानने में कामयाब रहे कि पृथ्वी में जब भी कोई इंसान ईश्वर की आराधना करता है या उसे याद करता है तो वह विचार एक निश्चित दिशा की ओर जाते हैं... विचारों की गति, जो प्रकाश की गति का वर्ग है का पता तो 'विचारवान' २१३५ में ही लगा चुका था... अब ऑस्कर माईक और 'विचारवान' 'विचारयान' बनाने में जुट गये... 'विचारयान' यानी एक ऐसा यान जो विचारों की गति से चल सके वह भी किसी खास विचार को फॉलो करते हुऐ... यह एक बहुत बड़ी चुनौती थी, विशेषकर इस गति को प्राप्त करने के लिये उर्जा प्राप्त करना... पर विचारवान व ऑस्कर माईक 'विचारयान' बनाने में कामयाब रहे...

ऑस्कर माईक मेरे पास आया..." 'विचारयान' तैयार है, हम जब चाहे सफर पर निकल सकते हैं अल्फा"... "नहीं, ईश्वर की खोज में हम अमर होकर नहीं जा सकते, तुम दोनों को एक ऐसा यंत्र भी इजाद करना होगा जो मेरे और तुम्हारे लिये समय को रोक दे" मैंने कहा...

वे दोनों 'समयावरण' (Time Wrap) बनाने में भी तैयार रहे... यह एक ऐसा यंत्र था जिसे पहनने वाले के लिये समय रूक जाता था... या यों कहें कि इस आवरण के अंदर समय फ्रीज हो जाता था...

मैंने उनको एक 'विचारवाहन' भी बनाने को कहा... जो ईश्वर की खोज की इस यात्रा के हमारे अनुभवों के विवरण को पृथ्वी पर लेकर आये... जाने क्यों मुझे लगा कि न मैं और न ऑस्कर माईक ईश्वर को मिलने के बाद वापस आना चाहेंगे... वह दोनों 'विचारवाहन' बनाने में भी तैयार रहे...

यह सब काम लक्ष्य से काफी पहले २२२४ तक ही पूरे कर लिये गये...

मैंने एक बार फिर अपने और ऑस्कर माईक के सामान्य क्लोन तैयार करने के निर्देश दिये... २०४४ में जब वह क्लोन २० वर्ष के हुऐ तो हम दोनों के मस्तिष्क का समस्त ज्ञान, अनुभव व सूचनायें उन क्लोनों के मस्तिष्क में स्थानान्तरित कर दी गयीं... एक बार फिर हम दोनों ने अपनी पुरानी देहों को स्वयं ही नष्ट किया...

 
चलना यात्रा पर

अब ज्यादा कुछ करना बचा नहीं था... मैंने अपने पीछे नये 'अल्फा' को नामांकित किया... मैंने और ऑस्कर माईक ने अपने सभी संगी-साथियों से अंतिम बार विदाई ली... फिर हमने 'समयावरण' पहन लिया और विचारयान पर सवार हो गये... 'विचारवान' स्वयं इस विचारयान को नियंत्रित कर रहा था... हम दोनों निश्चिंत थे कि विचारवान किसी भी स्थिति से निपट लेगा... विचारयान को चालू किया गया... और कुछ ही देर में उसने उन विचारों को ट्रैक कर लिया जो पृथ्वी में किसी के द्वारा ईश्वर की आराधना करने या उसे याद करने पर उत्पन्न होते हैं... और हम इन्हीं विचारों को फॉलो करने लगे... वह भी विचारों की ही गति से... सफर बहुत लंबा और अनिश्चित होने वाला था... इसलिये विचारवान ने हम दोनों को Hibernate कर दिया... इससे हम दोनों के शरीर का उपापचय रूक गया व तमाम अन्य प्रक्रियायें भी... अब इस दशा से विचारवान हमें सामान्य जीवित अवस्था में तभी लायेगा जब हम अपने लक्ष्य तक पहुंच जायेंगे...


...

अभी तक की यह कहानी इन पिछली किस्तों में लिखी गयी थी...

भाग-१ ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '
भाग-२ ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....
भाग-३ और वह भिडंत...
भाग ४ - बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की ! 
भाग-५ और वह रोंगटे खड़े कर देने वाला खौफनाक नजारा...
भाग ६ - वह दो रहस्यमय आदमी...
भाग-७ आखिर खत्म हो गई दुनिया...
भाग-८ विचारवान, विचारयान, विचारवाहन और ऑस्कर माईक... अरे हाँ, मैं भी


अब अंतिम भाग...
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 विचारवान ने मुझे और ऑस्कर माईक को जगाया उस गहरी और लंबी नींद से...

"१८५४६ साल बीत चुके हैं और यह २०७९० है, अल्फा... हम अपनी मंजिल तक पहुंच चुके हैं... जब तुम कहो मैं वहीं ले चलूंगा तुम दोनों को" बोला विचारवान...

हम किसी तरह की देर करने के मूड में नहीं थे...पहले ही बहुत देर हो चुकी थी... मैंने उसे जल्दी वहाँ ले जाने को कहा...

अब हम 'उस' के सामने थे...  मेरे बगल में ऑस्कर माईक था और सामने 'वह' जिसे ढूंढते हम वहाँ तक आये थे... ऑस्कर माईक बहुत उत्साहित था, बिल्कुल बच्चों जैसा...

पहली बात ऑस्कर माईक ने ही कही...

पर आप तो त्रिमूर्ति हैं...

और हमारे सामने वे तीन थे

पर उनमें से एक चतुर्मुख थे

और उनमें से एक चतुर्मुख हो गये

और एक त्रिनेत्र भी

दूसरे हमें त्रिनेत्र दिखने लगे

एक चतुर्भुज भी थे

और चतुर्भुज हमारे सामने थे

आपके साथ आपकी संगिनियाँ भी थीं

और तीनों अपनी अपनी जोड़ियों के साथ खड़े थे

आप तैंतीस करोड़ भी बताये जाते हैं

और हमारे सामने वह तैंतीस करोड़ थे



यह सचमुच अनूठा सा था... मुझे लगा कि मुझे भी कुछ कहना-पूछना चाहिये...



पर आप तो केवल एक ही बताये जाते हो

और वहाँ वह एक ही था

और निराकार भी

अब वहाँ कोई आकार नहीं था

आप एक अद्वितिय ज्योति पुंज हो

और हम उस रोशनी को देखने में असमर्थ थे

आप एक अनंत शून्य हो

और वहाँ विराट शून्य था, हमें भी निगलने को तत्पर

कहा यह भी जाता है कि आप हो ही नहीं

और सचमुच वहाँ कोई नहीं था



ऑस्कर माईक ने फिर मोर्चा संभाला...


आपके संदेश वाहक भी थे

और हमारे सामने हजारों संदेश वाहक थे

आपका बेटा भी था

और बेटे हमारे सामने खड़े थे

क्या आप अवतार भी लेते हैं

और हमारे सामने असंख्य अवतार खड़े थे

गुरू के रूप में भी आप ही हो

और असंख्य गुरू वहाँ थे... वह भी जिन्होंने मुझ को और ऑस्कर माईक को पढ़ाया था... 



अब फिर मुझे कुछ और पूछने का मन हुआ...


आप बच्चे की मुस्कान में हो...

और वहाँ एक खूबसूरत बच्चा मुस्कुरा रहा था...

आप फूलों के खिलने में हो

इतने सुंदर और सुगंध भरे फूल हमने कहीं नहीं देखे थे...

और चिड़ियों की चहचहाहट में भी...

कितना अच्छा लग रहा था उन चिड़ियों का चहचहाना...

आप और कुछ नहीं प्रकृति हो...

और हमारी पृथ्वी के खूबसूरत नजारे हमारे सामने थे...



दोबारा से ऑस्कर माईक अपने को रोक नहीं सका...


आप हम सबके रोम-रोम में हो...

और हमें अपने रोम-रोम में वही दिखाई देने लगा...

आप सबका हिसाब रखते हो...

और हिसाब रखने का इतना बड़ा तामझाम सामने था, जैसा किसी ने नहीं देखा होगा...

बुरे कर्मों की सजा देते हो आप...

और बहुत बेरहम सजायें मिलती दिखीं हमें...

और अच्छे कर्मों का ईनाम भी...

और अतुल्य ईनाम मिल रहा था वहाँ...

 हर कोई आपका ही अंश है...

और हम उसके अंश बन गये...


अब तक हम दोनों काफी कुछ समझ चुके थे... अब हम दोनों ने मिलकर कुछ सवाल पूछने का सोचा...

पर आपको कोई भी देख नहीं सकता

और वह हमें दिखाई देना बन्द हो गया...

आप तक कोई भी पहुंच नहीं सकता...

वह हमारी कल्पनाओं से भी दूर था अब...

क्या आप ही ने यह सब कुछ रचा ?...

यह भी एक विचार ही तो है

आप हैं क्या...

मेरा होना भी एक  विचार है...

विचारों का जनक कौन होता है...

परिस्थितियाँ...

किसकी ?

तुम्हारी, तुम्हारे विकास क्रम की ऐतिहासिक परिस्थितियाँ...

क्या आप ही हैं जो दुनिया चलाते हैं...

हाँ, यह भी तुम्हारा एक विचार है...

क्या आप हमेशा ऐसे ही रहोगे ?

यह भी एक विचार है...

आप हमारे साथ साथ बदलोगे

यह भी एक विचार ही है...


 इतना बहुत था... अब हमने  इस से ज्यादा कुछ नहीं जानना था... मैं और ऑस्कर माईक विचारयान में वापस लौटे... अब मैं ऑस्कर माईक के साथ मिलकर यह पूरी कहानी लिखूंगा, उसे 'विचारवाहन' में फीड करूँगा और फिर हम तीनों, मैं, ऑस्कर माईक और विचारवान अपने विचारों को केन्द्रित करेंगे अपनी प्यारी पृथ्वी की ओर... 'विचारवाहन' इन्हीं विचारों की दिशा व उर्जा के सहारे पृथ्वी तक की वापसी का सफर करेगा...


  
पोस्टस्क्रिप्ट (लिखे जाने के बाद)

'विचारवाहन' के उड़ान भरते ही अल्फा व ऑस्कर माईक ने अपने अपने समयावरण को तोड़ दिया... हजारों सालों से वह समय जो उन दोनों के लिये रोक रखा गया था... एक ही क्षण में गुजरा... और वहाँ उन दोनों के शरीरों की जगह कुछ गैसें व धूल के छोटे से ढेर रह गये थे... विचारयान  अब स्थिर था और विचारवान किसी इंसान के आदेश के इंतजार में... यह इंतजार अनंत काल तक चलेगा शायद...

'विचारवाहन' ने वापसी यात्रा में भी १८५४६ साल लगाये और पृथ्वी के वायु मंडल में प्रवेश किया... वह कई महीनों तक उड़ता रहा 'होमिंग सिग्नल' की तलाश में... पर उसे होमिंग सिग्नल नहीं मिला और आखिरकार उर्जाविहीन हो वह गिर गया...

इन सैंतीस हजार सालों में मानव जाति बहुत उन्नत हो चुकी थी... और अपने लिये कुछ नये आराध्य भी गढ़ चुकी थी... उनके लिये झगड़ों के चलते विभिन्न हिस्सों में बंट वे बृह्मांड के अन्य हिस्सों के लिये पलायन कर चुके थे...

पृथ्वी पर बंदर, लंगूर और चिंपांजी भी मानसिक रूप से विकसित हो आबादियां बसा चुके थे... 'विचारवाहन' बंदरों को मिला... उन्होंने उसे एक चबूतरे पर स्थापित किया और पूजने लगे... भविष्य में उनकी लंगूरों और चिंपाजियों से लड़ाई होने वाली थीं... 'विचारवाहन' को पूजने के अधिकार के चलते...











...

6 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक है यह भाग -सोलोप्सिज्म की झलक लिए है -भारतीय दर्शन में भी आये कुछ विचार समाहित हुए हैं - भारतीयता को समाहित किये एक रोचक विज्ञान कथा !

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  2. wah..........bahoot khoob................kalpana-shilta yatharth ke vimb liye.........

    abhi ek-adh baar aur gahna hai isko......


    pranam.

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  3. कड़ियों में पढ़ने की बजाय आज ही पूरा निपटाया। पता था जब आपने शुरू किया था। मगर तब नहीं, आज ही पूरा पढ़ा। बिना रुके। दो घंटे लगे मुझे पूरा पढ़ने में। ध्यान से पढ़ा पूरा। कहानी और उससे मिलने वाली शिक्षाओं का क्या कहना? वह तो अभूतपूर्व था ही। बहुत मेहनत की आपने इसको लिखने में, यह भी दिखाई पड़ा। कुल मिलाकर पूरी कथावस्तु बहुत ही अच्छी लगी। एक हॉलीवुड फ़िल्म भी बन सकती है इसपर।

    अब कुछ कमियों और गलतियों को भी बताते चलें जो पढ़ते समय महसूस हुईं। एक तो ये कि जब एल्फ़ा टाइम वार्प का प्रयोग कर रहा है तो उसे हिबेर्नेट में जाने की जरुरत क्यों पड़ी? खुद सोंचिये कि जब समय हमारे लिए रुक ही गया है, फिर शरीर की उपापचय की क्रियाये स्वतः ही बंद हो जाएँगी। उसके लिए अलग से कुछ करने की जरुरत ही कहाँ है? और समय किसी बाँध के पानी को रोकने के जैसा तो नहीं होता, जो बाँध टूटते ही सारा पानी टूट पड़े। जैसा कि आपने दोनों के अंत को दिखाया। दूसरी बात इतने वेग में समय स्वतः ही रुक जाता, अलग से टाइम वार्प करने की जरुरत ही न पड़ती। मगर आपने यहाँ सापेक्षता को उपेक्षित कर दिया है, प्रकाश से ज्यादा रफ़्तार लेकर, इसलिए समय के रुकने को उपेक्षित करना उपेक्षित किया जा सकता था।

    तीसरी बात ये कि विचारयान को विचारवान चला रहा था, जिसमें 1001 लोगों के मष्तिष्क की शक्ति थी। फिर भी उसे किसी मानव के आदेश की जरुरत थी? और बिना उस आदेश के वह गिर गया? यह बात तब सही लगती जब विचारवान बिना मष्तिस्क के होता। मगर उसके पास तो एक नहीं 1001 लोगों का दिमाग था न?

    अंतिम बात आप शुरुवात से तो बड़े इत्मीनान से लिखना चालू किये थे। मगर बाद में आते आते और ऐसा लगा जैसे बस आप जल्दी से ख़तम करना चाहते हैं। सुपरफ़ास्ट ट्रेन पकड़ ली हो जैसे आपने। :) सबकुछ इतना जल्दी ख़तम हो गया कि पता ही चला।

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    प्रिय अनमोल,
    आपने धैर्य पूर्वक पूरी कथा पढ़ी, आभारी हूँ आपका।
    अब उन विसंगतियों के बारे में जो आपने गिनाई...
    १- समयावरण की जो अवधारणा कथा में है वह प्रकाश की गति के वर्ग की रफ़्तार से यात्रा करने हेतु जरुरी थी, सापेक्षता के सिद्धांत से इस गति में पात्र वर्ना पिछले समय में चले जाते, hibernation सिर्फ इसलिये कि इस पूरी यात्रा में जब alpha और ऑस्कर माइक का कोई काम नहीं तो क्यों उनकी किसी भी क्रिया को सक्रीय रखा जाये। समयावरण के टूटते ही समय बीता और दो नश्वर शरीर अपनी गति को प्राप्त हुए।
    २- जो गिरा वह विचारयान नहीं विचारवाहन था,... "अब मैं ऑस्कर माईक के साथ मिलकर यह पूरी कहानी लिखूंगा, उसे 'विचारवाहन' में फीड करूँगा और फिर हम तीनों, मैं, ऑस्कर माईक और विचारवान अपने विचारों को केन्द्रित करेंगे अपनी प्यारी पृथ्वी की ओर... 'विचारवाहन' इन्हीं विचारों की दिशा व उर्जा के सहारे पृथ्वी तक की वापसी का सफर करेगा..."... उसे मिली उर्जा एक ही बार मिली और सीमित थी, होमिंग न हो पाने के कारण वह गिरा।
    ३- विचारवान एक यंत्र है, और इसको मैंने था कुछ इस तरह "२१३० में ऑस्कर माइक एक बार फिर मुझसे मिलने आया... " अल्फा, मेरा मानना है कि चौबीस घंटे में हम अपने मस्तिष्क का कुछ नया सोचने में मात्र कुछ मिनट ही इस्तेमाल करते हैं, हमारा बाकी समय तो सोने, खाने, जिंदगी के अन्य कारोबार निपटाने आदि में चला जाता है", उसकी आँखों में एक चमक सी थी... " तो क्या सोचा है तुमने ?", मैंने पूछा, जबकि मुझे उत्तर पता था... " मैं अपने मस्तिष्क की एक मशीनी कॉपी तैयार करने की इजाजत चाहता हूँ, यह चौबीसों घंटे सोचने में सक्षम होगी", वह बोला... " गो अहैड ", मैं मुस्कराया...
    हमने उस मशीन का नाम रखा ' विचारवान '..." यहाँ एक स्वतंत्र सोच की कल्पना नहीं है, वह ऑस्कर माइक द्वारा ही संचालित था।
    ४- sequel का स्कोप बचाये रखने के लिये विचारयान और विचारवान अभी भी इंतजार में हैं।
    ५- वाकई मैंने कहानी को जल्दी में समेटा, मैं सब्र खो रहा था और कहानी दिन ब दिन लम्बी होती जा रही थी।
    ६- इतनी लम्बी कहानी में अन्य भी कई विसंगतियाँ हो सकती हैं, पर उनको creative license के दायरे में मान मेरे आप जैसे सह्रदय पाठक मुझे अभय दान देंगे, यह मुझे विश्वास है।


    ...

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