शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

जब मैंने शिल्पा मेहता जी को कहा- आप (मैं भी) केवल अपनी अपनी सोचने, अपनों को देखने, रूढ़िवाद, जातिवाद, अतीत के झूठे गौरवगान में मस्त, दोगली, स्वार्थी, कायर, धन/संपत्ति संग्रहण के लिये ईमान/सिद्धांतों को ताक पर रख देने वाले, अतार्किक, अवैज्ञानिक व पोंगापंथ हैं

.
.
.



एक आत्म-अवलोकन सा कर रही हैं आदरणीय शिल्पा मेहता जी यहाँ पर... सभ्यता शासन सुरक्षा क़ानून व्यवस्था दंड प्रक्रिया  (लिंक)

ैं वहाँ पर कह आया...
.
.
.
 
मैं अपनी ओर से सिर्फ यही जोड़ना चाहता हूँ कि किसी भी 'लोक' (समाज) को वही तंत्र मिलता है जिसका वह हकदार होता है, तंत्र कहीं बाहर से नहीं उतरता, वह लोक में/से ही जनमता-पनपता है... यही समझ लीजिये कि आज का हमारा लोक साल दो साल में किसी एक मामले पर अपना गुस्सा/विरोध कुछ इसी तरह दिखा अपनी आत्मा की ड्राईक्लीनिंग कर फिर से अपनी जिंदगी पहले जैसी ही गुजारने में खुश है...

आप पूछती हैं कि 'साफ़ दिख रहा है कि हमारा तंत्र ठीक से काम नहीं कर रहा । क्या हम सब के लिए यह सोचने का समय नहीं आ गया कि पूरे सिस्टम को ही फिर से देखें और समझें - कि , जो लोकतंत्र अमेरिका में काम कर रहा है - क्या वह हमारे देश में काम कर रहा है ? यदि नहीं, तो क्या मूल भूत अंतर हैं हमारी मानसिकताओं में ? या यह कि वे क्या सही कर रहे हैं और हम क्या गलत कर रहे हैं कि यह काम नहीं कर रहा ? क्या हम कुछ कर सकते हैं ?'

मेरा जवाब होगा कि हम कुछ खास नहीं कर सकते, क्योंकि भले ही हैं हम एक लोकतंत्र पर हमारी सोच, हमारी मानसिकता लोकतांत्रिक नहीं है... हम केवल अपनी सोचने, अपनों को देखने, रूढ़िवाद, जातिवाद, अतीत के झूठे गौरवगान में मस्त, दोगले, स्वार्थी, कायर, धन/संपत्ति संग्रहण के लिये ईमान/सिद्धांतों को ताक पर रख देने वाले, अतार्किक, अवैज्ञानिक व पोंगापंथ समाज हैं... जो तंत्र हमें मिला है शायद हम उस के भी पात्र नहीं... हम अपने इन कर्मों से उस स्थिति को प्राप्त करेंगे जब इस तंत्र का स्वयमेव नाश होगा, इसमें कुछ समय लगेगा, शायद ४०-५० साल और... फिर हो सकता है कुछ नया सृजित हो... :(



... 

 
आप क्या कहते हैं, वहीं जाकर कहें कृपया...


आभार !



...