सोमवार, 25 नवंबर 2013

शान्तिपूर्वक विश्राम करो हेमराज, और आरूषि तुम भी... और प्लीज, बंद करो अब यह कांव कांव फिर से...

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कभी कभी घटनायें कुछ इस तरह घटती हैं कि आप उम्मीद खो देते हैं, आपको लगने लगता है कि चारों तरफ सिवा अंधेरे के और कुछ नहीं है, आपको लगता है कि शायद अब कभी रोशनी होगी ही नहीं... फिर भी मन की गहराइयों से एक धीमी सी आवाज उठती है आपके, कि नहीं, सब कुछ नहीं खत्म हुआ अभी... एक किरण कहीं चमकेगी, उम्मीदें फिर से जवां होंगी और हमारी दुनिया फिर से रोशन होगी... कुछ ऐसी ही मन:स्थिति में मैंने अपनी पोस्ट लिखी थी सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट लगने के बाद ३१ दिसम्बर २०१० को, पोस्ट थी आखिर क्यों मारा गया बेचारा हेमराज... क्या इस मामले में कोई कुसूरवार था ही नहीं, या बड़े लोगों के लिये खून माफ है ?  (लिंक)

मैंने इस पोस्ट के अंत में एक सवाल किया था, अपने पाठक से...

केस आज भले ही बन्द हो जाये...पर मैं उम्मीद का दामन नहीं छोड़ूंगा... हर एक हत्यारा कभी न कभी अपने करमों के बारे में 'गाता' जरूर है...
देर से ही सही यह केस सोल्व होगा जरूर, मेरे जीवनकाल में ही...
क्या आप भी मेरी ही तरह आशावान हैं ?
बताईये अवश्य...



तो आप खुद ही जान सकते हैं कि यह फैसला कितना सुकून देने वाला है मेरे लिये, और हम सबके लिये भी... यह एक विश्वास जगाने वाला फैसला है, यह फैसला साबित करता है कि अभी भी हमारी न्याय व्यवस्था और जाँच एजेंसियों में नीर-क्षीर विवेकी लोगों की कमी नहीं है...

पाँच साल से भी ज्यादा लंबे चले इस मामले के अंत में मैं यही कहूँगा कि 'अंत भला तो सब भला'...अब शान्तिपूर्वक विश्राम करो हेमराज, और आरूषि तुम भी...

आज फैसला हो गया, कल सजा सुनायी जानी है और मैं देख रहा हूँ कि हमारे इलेक्ट्रानिक मीडिया के कई कई चैनलों पर दोषियों के नाते-रिश्तेदार व पीआरओ अपने साथ अन्याय होने की दुहाई देते व स्वयं को छोड़ बाकी पूरी दुनिया को मूढ़मति-मंदबुद्धि समझने की मानसिकता रखते हुऐ दोषियों का बेशर्म-बेहूदा बचाव कर रहे हैं तो मुझे फिर एक बार अपनी पिछली पोस्ट (लिंक) में उठाया अपना सवाल याद आता है, वह था...

क्या यह सच नहीं कि अगर इलेक्ट्रानिक मीडिया ने हर पल इतना दबाव न बनाया होता, टीआरपी की होड़ में इतनी कांव-कांव न की होती... तो न कातिलों का हौसला बढ़ता, और पुलिस सभी संदिग्धों से थाने में ले जाकर की 'सामान्य पूछताछ' करने को आजाद होती... तो कत्ल के सारे सबूत आसानी से मिल जाते... और कातिल भी आज सजा काट रहे होते...

यदि आप अपराध व आपराधिक जाँच के संबंध में कुछ अनुभव रखते हैं या आपका कोई परिचित रखता है तो उस से पूछने पर आप को वह यही कहेगा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य, परिवारजनों का व्यवहार व बयान, क्राईम सीन के साथ की गयी छेड़छाड़ एवम् उसके पीछे के इरादों व अन्य तथ्यों की जानकारी होने पर इस मामले को हल करना किसी भी अनुभवी पुलिस अधिकारी के लिये कोई मुश्किल नहीं था... हत्या करने के बाद दोषियों द्वारा यह पूरा प्रयत्न किया गया कि आरूषि का अंतिम संस्कार करने/ कानूनी खानापूरी होने के बाद जब भीड़ छंटे तो घर की छत पर छुपाई हेमराज की लाश ठिकाने लगा दी जाये... और यह मामला, 'नेपाली नौकर लूटपाट कर मालिक की बेटी की हत्या कर नेपाल भागा' की फाइनल रिपोर्ट के साथ फाइलों में दफन हो जाये... पर वे अपने मकसद में कामयाब नहीं रहे और इतने सारे परिस्थितिजन्य सबूत फिर भी बचे रह गये थे कि उन्हें/उनके झूठ को पकड़ने के लिये सीबीआई की कोई जरूरत ही नहीं थी... आपको अगर उस समय की कुछ याद हो तो उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस मामले को वारदात होने के चंद दिनों में ही सॉल्व कर लिया था और प्रदेश के शीर्ष राजनीतिक/पुलिस नेतृत्व ने अपनी प्रेस कान्फ्रेंस में इस आशय की घोषणा भी कर दी थी... पर फिर क्या हुआ, एक साथ कई कई चैनल कांव कांव कर हल्ला मचाने लगे कि 'उत्तर प्रदेश पुलिस का कारनामा देखिये, जिनकी बेटी मरी उन्हीं पर इल्जाम लगा रहे हैं'... नतीजा दोषियों को हौसला मिला और जबान भी, और उन्होंने मौके का फायदा उठा कुछ सबूत और मिटाये और मामले को उलझाने-लटकाने के लिये सीबीआई की जाँच की माँग भी कर दी... नतीजे में क्या क्या नहीं हुआ, हम सब के सामने है...

आज जब न्याय हुआ है तो एक बार फिर मीडिया के टीआरपी की चाह में दोषियों के नाते-रिश्तेदारों को अपने साथ अन्याय होने की दुहाई देते दोषियों का बेशर्म बचाव करने का मौका देते देख मेरा मन कर रहा है कि मीडिया के लंबरदारों से कहूँ "यार प्लीज, बंद करो अब यह कांव कांव फिर से"... और शान्तिपूर्व विश्राम करने दो हेमराज और आरूषि को भी...






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सोमवार, 4 नवंबर 2013

कुकुरमुत्तों की तरह उगते जीनियस, झाँसा देते निराशाराम, मरा हुआ चूहा, दीपावली के मंत्र और लॉर्ड मैकाले के नाम का दीया ...

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हमारे हिन्दी के खबरिया चैनल उस बच्चे (और उस जैसे और भी कई बच्चों को भी) बार बार दिखा रहे हैं... जीनियस बता कर... जीनियस का लाईव टैस्ट लिया जा रहा है... पाँच छह साल के उस बच्चे को चाणक्य का दूसरा नाम दिया गया है... बाल भयंकर तरीके से बिल्कुल टीवी सीरियल वाले चाणक्य की तरह काटे गये हैं... बृह्मान्ड के संबंध में कुछ जानकारियाँ उसके अति महत्वाकाँक्षी पिता ने उसे रटवाई हैं... मुझे बेचारे का हाल देख न जाने क्यों तथागत अवतार तुलसी (लिंक) की याद आने लगती है... सौ बात की एक बात यह है कि जीनियस भले ही छह साल का ही हो... अपनी बेहूदी नुमायश के लिये कभी तैयार नहीं होता...




निराशाराम नाम का वह तथाकथित संत जीवन भर सबको झांसा देता रहा... पर पके बुढ़ापे में फंस ही गया एक नाबालिग के यौन शोषण के अपराध में, और फंसा भी ऐसा, कि कानून से तो उसे जल्दी ही कोई राहत मिलती नहीं दिखती... कानून अब बेटे की फिराक में भी है... और बेटा शहर शहर-प्रदेश प्रदेश भाग रहा है संतई दिखाते-जताते... पर मुझे बाप बेटे का बचाव करते, उनमें ईश्वरत्व बताते-ढूंढते उनके साधक-भक्त हैरान करते हैं... आस्था भी एक चीज है भाई, पर आँखों और दिमाग को इस कदर बंद रखने वाले भक्तों को देख कभी कभी यह लगता है कि झाँसाराम ने उल्टे उस्तरे से इनको मूंड कुछ गलत नहीं किया... यह इसी लायक लोग थे...



यहाँ भी एक तथाकथित महान संत हैं जो कभी कैमरे के सामने नहीं आते... पर उनके चेला नंबर वन को कैमरों से परहेज नहीं... गुरू चेले दोनों मिलकर सपने देखते हैं... छोटे मोटे नहीं... कई कई जगहों पर हजारों टन खालिस सोने के खजानों के दबे होने के सपने... फिलहाल उनके सपनों में देखे सबसे छोटे यानी हजार टन सोने के खजाने की खुदाई जारी है सरकारी खर्चे पर... यह भी लगभग पक्का है कि मरा चूहा तक नहीं निकलना इस खुदाई में... पर उन पर विश्वास करने वाले भक्तों की तादाद और दबाव इतना है कि इस अंधविश्वास की आलोचना करने के अगले ही दिन नरेन्द्र मोदी को संत को नमन करना पड़ गया... खोदो और खोदो भाई, फिर जब कुछ न मिले तो यह कहना कि खजाने का रक्षक सरकार की गलत नीयत भाँप खजाने को जमीन के भीतर कहीं और ले गया...




कोई भी त्यौहार हो... खास तौर से हिन्दुओं का... सारे खबरिया चैनल उतावले-बावरे से हो जाते हैं... दीपावली पर भी यही हुआ... एक आध ने तो बाकायदा खम ठोक यह बताया भी कि केवल अपना टीवी हमारे चैनल पर खोले रखो... पूरे विधि विधान से पूजा करायेंगे आपकी, वह भी एकदम सही मुहुर्त पर... क्या खाओ-पकाओ-पहनो, सब बताया गया...गजब के भगवान हैं, पूजा के लिये भी खास वर्दी और मुहूर्त चाहते हैं... एक मिनट पहले या एक मिनट बाद पूजा किये तो फिर अगले साल तक अर्जी मुलतवी... मैं सोचता हूँ कि यह मामला कहाँ तक अभी आगे और बढ़ेगा... क्या दूसरे धर्मों को भी शामिल करेंगे यह चैनल वाले...






ऊपरी तौर पर देखें तो चारों मामले अलग अलग ही दिखते हैं... पर जरा गंभीरता से सोचें तो आप पायेंगे कि यह सब एक योजनाबद्ध तरीके से हो रहा है... कुछ ताकते हैं जो हमें दोबारा से पीछे ले जाना चाहती हैं... इन लोगों को पहचानिये... यह वही लोग हैं जो हमारी तथाकथित महान व प्राचीन भारतीय संस्कृति, पुरातन धर्म, अध्यात्म, आस्था-समर्पण, आँचल-पर्दा-पायल-घूंघट, वर्ण व्यवस्था, दंड विधान आदि आदि का गुणगान करते है... जो फिर उसी जालिम जमाने की ओर लौटना चाहते हैं... हाशिये पर फेंक दी गयी यह ताकतें आज फिर मुख्यधारा पर काबिज होने का जुगाड़ लगा रही हैं... यह वो लोग हैं जो दोबारा से उन्ही अंधेरों की ओर हमें ठेलना चाहते हैं... 




इस दीवाली पर मैंने भी एक दीया जलाया... लॉर्ड मैकाले के नाम का... मुझे कोई जरूरत नहीं पड़ी कहने की 'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय'... क्योंकि मैं यह जानता हूँ कि यह दीया असंख्यों के दिलो दिमाग को रोशन कर रहा है और करेगा भी... इंसान का आज तक का सफर हमेशा ही अंधेरे से उजाले का रहा है... और अब भी ऐसा ही होगा... मनुवाद को तो दफन होना ही होगा... इतना गहरा कि कोई कभी भी उसको खोद बाहर निकाल उसे हवा-पानी देने का सपना तक न देख सके....





आभार आपका...









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सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

देख भाई देख, देख तमाशा देख !

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देख
देख
देख
देख भाई
देख तमाशा देख



उनको दुनिया संत बोलती
सोतों को जगाते हैं जो
दिनदहाड़े उनका सोना देख
सोने में सोने का स्वप्न देख
सोना सोना की रट कर के
जागतों को भी सुलाना देख



देख
देख
देख
देख भाई
देख तमाशा देख



पुरानी पोथा पत्री  बाँचते
ग्रहचालों की रफ्तार नापते
रत्न-जत्न सुझाते पाखंडी देख
और यह सब करते हुऐ भी
सच झुठलाते-मन भरमाते
उनके वैज्ञानिकता के दावे देख



देख
देख
देख
देख भाई
देख तमाशा देख



सदियों से काबिज हैं हमपर
लैंगिक भेद की अवधारणायें
उनका खुला महिमामंडन देख
जिनके जिम्मे काम था यह
महिलाओं को जगायेंगी ही वह
उनका करवाचौथ मनाना देख



देख
देख
देख
देख भाई
देख तमाशा देख




लाखों की रैली में हुंकारे भरते
गरजते हुऐ नेताओं को सुन
फिर रैली के बीच धमाके देख
आरोपों-प्रत्यारोपों के घमासान में
मरने वाले जीते जागते इंसानों का
महज चंद आंकड़ों में बदलना देख



 देख
देख
देख
देख भाई
देख तमाशा देख


जुल्म और अन्याय जो करता
बाँध देता है पट्टी आँखों पर
फिर भी धर्म का मंडन देख
हर उस कुरीति, जिसकी जड़ में
धर्म ही देता है खाद-पानी तक
के धार्मिक समाधान के दावे देख



देख
देख
देख
देख भाई
देख तमाशा देख





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बुधवार, 9 अक्तूबर 2013

'गंदा है पर धंधा है'... और यह धंधा अभी तो जारी ही रहेगा... क्यों सही है न, तथाकथित बाबा-गुरू-महाराज-संत-पीर-फकीर जी ?

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तथाकथित व स्वयंभू संत व अपने उत्साही भक्तों की नजर में सिद्ध पुरूष-साक्षात ईश्वर का रूप आसाराम आजकल जेल में हैं... इस मामले में यह उनका दुर्भाग्य ही कहा जायेगा... दसियों सालों से इस तरह के अनेकों आरोपों को वह और उनका गिरोह रफा दफा करता आ रहा था... तमाम आरोपों के बावजूद दक्षिण भारत के टुच्ची हाथ की सफाई दिखाने वाले अफ्रो-हेयर धारी एक बाबा अपने भक्तों में पूर्व प्रधानमंत्री व सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को तक शामिल करा गये और राजकीय सम्मान के साथ उनको समाधि दी गयी... आसाराम भी दसियों सालों से तमाम आरोपों को निपटा ही रहे थे... पर आप पूरे घटना क्रम पर गौर करें तो दो बातें ऐसी हुईं कि वह सलाखों के पीछे पहुंच गये... पहला, दुराचार पीड़िता का उत्तरप्रदेश वासी होना... पंद्रह अगस्त को मामला दर्ज होने बाद गिरफ्तारी हुई ३० अगस्त की रात को... इस दौरान राजस्थान, दिल्ली, गुजरात व मध्यप्रदेश की भक्त सरकारों ने उनकी जितनी मदद की, यह सभी ने देखा... उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा असर रखने वाली दोनों पार्टियों सपा व बसपा में उनका कोई भक्त नहीं था... नतीजा यह हुआ की वह पीड़िता के परिवार पर स्थानीय प्रशासन का दबाव व अपना भय दिखाने में नाकामयाब रहे और मामला रफा दफा नहीं हो पाया... दूसरा कारण था 'इंडिया न्यूज' के दीपक चौरसिया और 'टाइम्स नाऊ' के अर्णब गोस्वामी... जिन्होंने लगातार कवरेज कर और सवाल उठा उठा कर इस मामले को इसी जैसे और मामलों की तरह दफन नहीं होने दिया... आसाराम के भक्तों की संख्या ५ से १५ करोड़ के बीच बतायी जाती है, अभियोजन पक्ष बस इतनी सावधानी रखे, कि किसी भी न्यायालय में मामला जाने पर यह विनम्र अनुरोध न्यायाधीश से करे कि अगर आप भी आरोपी के भक्त हैं तो कृपया स्वयं को इस मामले से अलग कर लें, तो मेरा अनुमान है कि पीड़िता को न्याय अवश्य मिलेगा...

जिसने भी इस मामले को देखा होगा... बॉडी लेंग्वेज से लेकर कथ्य और कृत्य खुली गवाही दे रहे हैं कि आरोपी ने जरूर कुछ गलत किया है... स्वयं के आत्म साक्षात्कार का सार्वजनिक उत्सव मनाने वाला और ईश्वर के समक्ष स्वयं को रखने वाला,  तथाकथित तमाम सिद्धियों का स्वामी व मोक्ष का रास्ता बताने वाला आरोपी जेल जाने को लेकर इतना परेशान क्यों है... जबकि धर्म कहता है कि जो कुछ आप आज भोग रहे हो वह या तो आपका संचित कर्मफल है या इस जन्म में किये कर्मों का फल... दोनों ही स्थितियों में आरोपी को कोई शिकायत नहीं करनी चाहिये...

रोज टीवी देखता हूँ और देख कर हैरानी होती है कि इतने घृणित आरोप लगे होने के बावजूद अंधश्रद्धा के वशीभूत भक्त आरोपी का बचाव करते हैं... जो बचाव नहीं करते वह भी दुराचार पीड़िता के समर्थन में आगे नहीं आते... कुछ बड़े नाम तो आरोपों को हिन्दू धर्म पर हमला बताते हैं... शर्म करो भाइयों, हिन्दू धर्म का स्तर इतना तो न गिराओ कि यह आरोपी उसके मुख्य रक्षकों में गिना जाये...

एक को सजा तो शायद मिल ही जायेगी... पर खुद के बिना मरे बाकियों को मोक्ष का रास्ता बताने, आत्म साक्षात्कार, परमात्मा से साक्षात्कार-मिलन, जन्म जन्म के आवागमन से मुक्ति, स्वर्ग-जन्नत, नाम दान, गुरूमंत्र, कुंडलिनी जागरण, शक्तिपात आदि आदि जैसे तमाम झाँसे और शब्दजाल बुन अंधश्रद्धा का शिकार बना भक्तों का मानसिक-शारीरिक-सामाजिक-आर्थिक व वैचारिक शोषण व दोहन करने वाले अनेकों तथाकथित गुरू-बाबा-संत-पीर-फकीर अभी भी इस देश में हैं... और उन सब का यह बड़ा चोखा, बिना रिस्क-बड़े मुनाफे का धंधा है... जो सैकड़ों साल से 'मेरे भारत महान' में चल रहा है...और अभी चलता ही रहेगा...


'गंदा है पर धंधा है'... 
और यह धंधा अभी तो जारी ही रहेगा... 
क्यों सही है न, बाबा-गुरू-महाराज-संत-पीर-फकीर जी ?







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अरविन्द शेष जी को यहाँ उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ यहाँ पर... वे सवालों से डरा हुआ धर्म-तंत्र...  में कहते हैं...

सामाजिक विकास के एक ऐसे दौर में, जब प्रकृति का कोई भी उतार-चढ़ाव या रहस्य समझना संभव नहीं था, तो कल्पनाओं में अगर पारलौकिक धारणाओं का जन्म हुआ होगा, तो उसे एक हद तक मजबूरी मान कर टाल दिया जा सकता है। लेकिन आज न सिर्फ ज्यादातर प्राकृतिक रहस्यों को समझ लिया गया है, बल्कि किसी भी रहस्य या पारलौकिकता की खोज की जमीन भी बन चुकी है। यानी विज्ञान ने यह तय कर दिया है कि अगर कुछ रहस्य जैसा है, तो उसकी कोई वजह होगी, उस वजह की खोज संभव है। तो ऐसे दौर में किसी बीमारी के इलाज के लिए तंत्र-मंत्र, टोना-टोटका का सहारा लेना, बलि चढ़ाना, मनोकामना के पूरा होने के लिए किसी बाबा या धर्माधिकारी जैसे व्यक्ति की शरण में जाना एक अश्लील उपाय लगता है। बुखार चढ़ जाए और मरीज या उसके परिजनों के दिमाग में यह बैठ जाए कि यह किसी भूत या प्रेत का साया है, यह चेतना के स्तर पर बेहद पिछड़े होने का सबूत है, भक्ति या आस्था निबाहने में अव्वल होने का नहीं। इस तरह की धारणाओं के साथ जीता व्यक्ति अपनी इस मनःस्थिति के लिए जितना जिम्मेदार है, उससे ज्यादा समाज का वह ढांचा उसके भीतर यह मनोविज्ञान तैयार करता है। पैदा होने के बाद जन्म-पत्री बनवाने से लेकर किसी भी काम के लिए मुहूर्त निकलवाने के लिए धर्म के एजेंटों का मुंह ताकना किसी के भी भीतर पारलौकिकता के भय को मजबूत करता जाता है और उसके व्यक्तित्व को ज्यादा से ज्यादा खोखला करता है।


सवाल है कि समाज का यह मनोविज्ञान तैयार करना या इसका बने रहना किसके हित में है? किसी भी धर्म के सत्ताधारी तबकों की असली ताकत आम समाज का यही खोखलापन होता है। पारलौकिक भ्रम की गिरफ्त में ईश्वर और दूसरे अंधविश्वासों की दुनिया में भटकते हुए लोग आखिरकार बाबाओं-गुरुओं, तांत्रिकों, चमत्कारी फकीरों जैसे ठगों के फेर में पड़ते हैं और अपना बचा-खुचा विवेक गवां बैठते हैं। यह केवल समाज के आम और भोले-भाले लोगों की बंददिमागी नहीं है, बड़े-बड़े नेताओं, मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों तक को फर्जी और कथित चमत्कारी बाबाओं के चरणों में सिर नवाने में शर्म नहीं आती। यही नहीं, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के वैज्ञानिक तक अंतरिक्ष यानों के सफल प्रक्षेपण की प्रार्थना करते हुए पहले मंदिरों में पूजा करते दिख जाते हैं। यह बेवजह नहीं हैं कि कला या वाणिज्य विषय तो दूर, स्कूल-कॉलेजों से लेकर उच्च स्तर पर इंजीनिरिंग या चिकित्सा जैसे विज्ञान विषयों में शिक्षा हासिल करने के बावजूद कोई व्यक्ति पूजा-पाठ या अंधविश्वासों में लिथड़ा होता है।

ऐसे में अगर कोई अंतिम रूप से यह कहता है कि मैं ईश्वर और धर्म का विरोध नहीं करता हूं, मैं सिर्फ अंधविश्वासों के खिलाफ हूं तो वह एक अधूरी लड़ाई की बात करता है। धर्म और ईश्वर को अंधविश्वासों से बिल्कुल अलग करके देखना या तो मासूमियत है या फिर एक शातिर चाल। हां, अंध-आस्थाओं में डूबे समाज में ये अंधविश्वासों की समूची बुनियाद के खिलाफ व्यापक लड़ाई के शुरुआती कदम हो सकते हैं। इसे पहले रास्ते पर अपने साथ लाने की प्रक्रिया कह सकते हैं। लेकिन बलि, झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र, गंडा-ताबीज, बाबा-गुरु, तांत्रिक अनुष्ठान आदि के खिलाफ एक जमीन तैयार करने के बाद अगर रास्ता समूचे धर्म और ईश्वर की अवधारणा से मुक्ति की ओर नहीं जाता है तो वह अधूरे नतीजे ही देगा।


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आभार आपका !






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रविवार, 25 अगस्त 2013

समय बदल रहा है दोस्तों !

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समय बदल रहा है दोस्तों
बहुत विचित्र समय है यह
और कुछ हद तक भयावह भी
दिन भर चलती खबरे हैं, बहसे हैं
उछलते नारे हैं और जुमले भी
पर उनके अर्थ भिन्न हो गये है
आदमी सब कुछ देखता है
सुनता और महसूसता भी
पर उसे अब सीखना पड़ेगा
कुछ नये निष्कर्ष निकालना
क्योंकि समय बदल गया है


भले ही कितना ही मुश्किल हो यह करना
आपको जबरन इस बात को पचाना होगा
महज पंद्रह सोलह बरस की एक मासूम
पहले बहाना बनाती है अपनी बीमारी का
फिर करती है जुगाड़ एकांत में मिलने का
वह भी घर विद्मालय से बहुत बहुत दूर
अनजाने प्रदेश-शहर की अनदेखी कुटिया में
ताकि चरित्रहनन कर सके एक संत का
वह जो उम्र में उसके पितामह से बड़ा है


आपको मान लेना होगा आखिरकार
कानून की नजरों में सब नहीं हैं बराबर
कैसा भी हो इल्जाम, हों कितने ही सबूत
पर कुछ नहीं होंगे कभी भी गिरफ्तार
उन्हें मिलेगा मनचाहा समय, सुविधा भी
ताकि तोड़ सकें मनोबल, कर सकें बदनाम
और फिर दे कर तरह तरह के प्रलोभन
आखिर खरीद लें अपने शिकार की खामोशी


तुम्हारी-मेरी, यानी जनता की एक खूबी है
हमारी याद्दाश्त बहुत बहुत कमजोर है यारों
कुछ दिनों में निपट जायेगा यह मामला भी
कुछ ऐसे ही अनेकों अन्य मामलों की तरह
फिर से जमने लगेंगे सत्संग के जमावड़े
और लीलायें भी दोबारा से प्रारंभ हो जायेंगी
अपने घर के किसी अंधेरे कोने में पड़ी हुई
गुमनाम जिंदगी गुजारेगी वह मासूम कली
खुदकुशी का विकल्प हरदम खुला रखते हुए


समय बदल रहा है दोस्तों
बहुत विचित्र समय है यह

और बहुत हद तक भयावह भी...






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शुक्रवार, 21 जून 2013

आइये यह सब रोना-कोसना-कलपना छोड़ फिर से अपना अपना धर्म निभायें ! ...

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पहाड़ का धर्म है
समय बीतने जाने के साथ साथ
धसक-टूट टूट कर बरसातों में करना कोशिशें
एक दिन खुद के भी सपाट मैदान बन जाने की
पहाड़ हमेशा यही कोशिश करता आया है
और वही कोशिशें उसने कीं इस बार भी

बादलों का धर्म है
समंदर से भर ले जा अथाह जलराशि
बरस कर उड़ेल देना उस को
प्यासे जंगल, मैदानों और पहाड़ों में
बादल कैसे अपने फर्ज से पीछे हट जाते
और धर्म निभाया गया घनघोर बरसकर

इंसान का धर्म है
अपनी सात पुश्तों के इंतजाम की खातिर
हर उस चीज को घेरना हड़पना कब्जाना
जो दिखती हो उसको आँखों के सामने
पहाड़ हो, जंगल या नदी का किनारा
और इन्हें रौंद धर्म निभाने में चूक नहीं की गयी

नदी का धर्म है
पहाड़ पर बरसे पानी की हर उस बूंद को
जिसे पहाड़ सोख नहीं पाया किसी कारण
सहेज कर ले जा सौंप देना समंदर को
चाहे रास्ता बनाने में उजड़ें इंसानी बस्तियाँ
और नदियाँ अपने मकसद में कामयाब हुई

ईश्वर का धर्म है
देखते रहना शाँत और निष्पक्ष रहकर
होने देना जो भी आखिरकार होना ही है
फिर भी दिखाना कृपायें किसी को बचाकर
और किसी को असमय अपने पास बुलाकर
और ईश्वर कब धर्म से अपने पीछे हटा है

हम सबका धर्म है
सबके अपने धर्म-पालन की वजह को जान
पहले भी हुऐ अन्य वाकयों की तरह ही
इस हादसे को भी जल्दी से जल्दी भूलकर
अगले नये हादसे का करते रहना इंतजार 
और धर्म पालन करना तो हमें आता ही है

आओ दोस्तों !
अब छोड़ो यह रोना-कोसना-कलपना
आओ एक बार हम फिर से लग जायें
वही करने में जो करते आये हैं आज तक
पहले की तरह अपना धर्म निबाहने में
और धर्म निभाना सबसे जरूरी तो है ही







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मंगलवार, 11 जून 2013

एक योद्धा के विकल्प... Walking into the Sunset...

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They admire you
only and only because 
you were a fierce warrior
who raised an army
out of nowhere


They acknowledge
that you developed
that rag tag army
into a fighting unit
having high aspirations


Everybody saw your guts
when at your prime
you used a new weapon
to storm the fort
and succeeded in occupying it


But you must accept
that in the last battle
you were the undisputed leader
and despite your best effort
your army could not win


Age is not on your side
and your army is impatient
they've found a new warrior
to lead them into the battle
to storm the fort again


It pains me to see
that people are saying
that you are sulking in private
refusing to accept the new reality
preferring to relive old glories


Oh, dear, fierce old warrior
accepted, your tribe doesn't retire
old warriors just fade away
but,they, just for the sake of it
don't fight with own disciples


Your place is secure in history
and your army still loves you
but they want to see you
walk into the Sunset
head held high, dignity personified



Now, It's your choice... 

Oh, Fierce, Old Warrior...







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सोमवार, 10 जून 2013

पाठक तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका ?

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पाठक माईबाप,

आदरणीय एस० एम० मासूम साहब की इच्छा का सम्मान करते हुऐ यह पोस्ट हटा दी गयी है... उनका व मेरा संवाद आप देख सकते हैं    उनकी पोस्ट- "लविंग जिहाद' और ऑनर किलिंग" पर (लिंक)

आपको हुई असुविधा के लिये क्षमा चाहता हूँ...

आभार...


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शनिवार, 8 जून 2013

क्या सचमुच ऐसी किसी दुनिया का अस्तित्व में आना संभव है कभी ?

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आप अपने चारों ओर की दुनिया को देखें कभी खुली आँखों से और उसके बारे में सोचने लगें तो सोचते सोचते दिमाग का रायता सा बन जाता है... कितनी असमानता है, भूख है, गरीबी है और है नाइन्साफी भी...

जिस रास्ते अपने आफिस जाता हूँ उसमें एक जगह रेलवे लाईन और सड़क के बीच की थोड़ी सी खाली जगह में कुछ समय से डेरा बनाया हुआ है कूड़ा बीनने वाले परिवारों ने... पूरा का पूरा परिवार दिन भर शहर के कूड़े में से कुछ भी कीमत रखने वाली चीजें बीनता है, घर के छोटे छोटे बच्चों से लेकर औरतें भी फिर उस सामान को अलग अलग करते हैं... इस हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी यह साफ लगता है कि यह परिवार भरपेट भोजन तक नहीं पाते... दूसरी तरफ अपने शहर के मॉल्स में मैं देखता हूँ एक और पीढ़ी को, जंक फूड खा खाकर जिसकी यह हालत है कि लगता है शरीर कभी किसी भी समय कपड़ों को फाड़ बाहर झाँकने लगेगा... एक तरफ गरीब मेहनतकशों के वह बच्चे जिनके पास रहने तक का कोई स्थाई ठिकाना नहीं, किसी जगह पर केवल तब तक ही वह रह पायेंग जब तक वहाँ से खदेड़ न दिये जायें और दूसरी तरफ वह भी जिनके पैदा होते ही उनके नाम के प्लॉट-फ्लैट खरीद लिये जाते हैं... एक तरफ वह बच्चा जिसके लिये शिक्षा एक सपना तक नहीं, इंसान होते हुऐ भी पशु से केवल थोड़ा सा ही बेहतर जीवन जीने को अभिशप्त और दूसरी तरफ वह भी जिनमें कुछ भी काबलियत न होते हुऐ भी उनके माँ बाप का रसूख और पैसा येन केन प्रकारेण उनको उद्मोगपति, इंजीनियर, जज, अभिनेता, डॉक्टर, अधिकारी आदि आदि बनाकर ही मानेगा...

कहाँ है इन्साफ इस दुनिया में ? कहाँ हैं हर किसी के लिये समान सुविधायें ? सबके लिये समान अवसर कहाँ हैं ? जो कर्णधार हैं, जो नीति निर्णायक हैं, जिनका यह काम है कि हमारी इस दुनिया में हरेक के लिये एक गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करें, उनको समझ की इतनी कमी है कि वह यह मानकर चलते हैं कि महीने में चंद किलो गेंहू दो रूपये किलो और चावल तीन रूपये किलो बाँटने वाला बिल लाकर ही उन्होंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया है...

एक पक्ष तो ऊपर लिखा है वहीं एक दूसरा पक्ष भी है... वह यह है कि वही नगण्य सुविधाओं वाला गाँव का सरकारी स्कूल... उसी में पढ़ने वाले दो बच्चे... एक ने कभी ध्यान दे पढ़ने की कोशिश नहीं की और आम तोड़ने और पास की नदी में मछली पकड़ने में ही पाँच साल गुजार दिये... आज वह अपने बीपीएल राशन कार्ड को एक तमगे की तरह दिखाता घूमता है... दूसरे ने हर अड़चन के बावजूद पढ़ा और जिंदगी का वह मुकाम हासिल किया जहाँ आज वह अपने बच्चों को एक गरिमापूर्ण जिंदगी दे सकता है... कूड़ा बीनने वाले एक ने अपने कमाये हर पैसे का सदुपयोग किया, अवसर की ताक में रहा, आज वह कबाड़ का थोक कारोबारी है और ठीकठाक जिंदगी जीता है ... और उसी के जैसे दूसरे ने जो कमाया, बीड़ी-तंबाकू-शराब में उड़ा दिया... जिस दिन थोड़ा ज्यादा कमा लिया तो तीन दिन तक लगातार नशे में पड़ा रहा... वह आज भी कूड़ा ही बीनता और कूड़े के बीच ही मरेगा भी...

अब यही सब देख देख कुछ सवाल उठते हैं मन में...

१- क्या ऐसी कोई दुनिया संभव है जिसमें हर किसी को एक गरिमापूर्ण जीवन जीने को मिले ?

२- क्या वर्ग-जाति-वर्ण-रंग आदि आदि के हर तरह के इंसान द्वारा बनाये भेदों को दरकिनार कर हम इंसान के हर बच्चे के लिये जीवन में आगे बढ़ने के लिये समान सुविधायें और समान अवसर प्रदान कर सकते हैं ?

३- यदि ऊपर लिखी बातें संभव हैं तो क्या उनको पाने के लिये हमें धन-संपत्ति के एक पीढ़ी द्वारा अगली पीढ़ी को उत्तराधिकार के रूप में दिये जाने के चलन को खत्म करना होगा ?

४- ऐसी किसी दुनिया में नाकारा, मानसिक या शारीरिक श्रम से कतराने वाले, अकर्मण्य, गलत लतों के शिकार और नशेड़ियों को कैसे एडजस्ट किया जायेगा ?

सवाल अभी और भी हैं... सोच सोच मैं तो कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं... क्या आपके पास कोई उत्तर है ?

क्या सचमुच ऐसी किसी दुनिया का अस्तित्व में आना संभव है कभी भी ?

या इंसान की नस्ल एक ऐसी दुनिया की कल्पना करते हुऐ एक मृगमरीचिका के पीछे ही भाग रही है... एक ऐसी खोज में, जिसका कोई अंत नहीं...



आभार आपका...











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बुधवार, 5 जून 2013

तू कौन है, बे ???

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मैं कौन हूँ
जो हो जाता हूँ बहरा
नीरा राडिया के टेप सुन
जिसमें मेरे ही साथी
कर रहे हैं फिक्स
नीतियाँ, लाइसेंस
यहाँ तक कि मंत्रालय तक


मैं कौन हूँ
जिसको दिखते ही नहीं
अंधे हो जाने के कारण
कोयला घोटाले में
नाम काला न करने की
ऐवज में सौ करोड़
की रंगदारी माँगते हुऐ
अपने दो दो झंडाबरदार


मैं कौन हूँ
जुबान बन्द होती है जिसकी
जब लाखों गरीबों की
खूनपसीने की कमाई को
चिटफंड के जरिये कब्जा
कोई खोलता है दसियों चैनल
और इसी रसूख के चलते
हो जाता है मान्यवर


मैं कौन हूँ
गूंगा बन जो नहीं कुछ बोलता
जब बात खुलती है
कि कोयला खदानों की
उस नंगी लूट में
पूरी तरह से थे हिस्सेदार
कुछ मीडिया समूह भी
जो चलाते हैं कई कई
खूब बिकने वाले अखबार


मैं कौन हूँ
जिसे कभी सुनाई नहीं देती
अपना हक माँगने और
करने शिकायतें भी
राजधानी तक पहुँचे
लाखों की तादाद में
दलित, आदिवासी और
मेहनतकश मजदूरों की
कोई भी आवाज कभी
क्योंकि मेरे हिसाब से
यह कोई खबर नहीं


मैं कौन हूँ
जो स्टूडियो में बैठे बैठे ही
बना देता हूँ नायक
आजादी की दूसरी लड़ाई का
उस खद्दर-टोपी धारी को
जो केवल इसलिये
ऊंगली उठा, देख दूर क्षितिज को
देता है अपने पलटीमार बयान
ताकि दुनिया उसको भी
दूरदॄष्टि रखने वाला समझे


मैं कौन हूँ
जो भूल जाता हूँ
टीआरपी की होड़ में
कि मुल्क में अदालते हैं
जहाँ की जा सकती हैं शिकायतें
ऐसे में आखिर क्यों
कागज की सफेद टोपी पहने
यह लोग क्यों लगा रहे हैं
हर किसी पर आरोप
वह भी तिरंगा लहराते हुऐ


मैं कौन हूँ
जो आँख-कान बंद रखते हुऐ
घोषित कर देता हूँ
आटा-तेल-जूस-साबुन के
साथ दवाई और योग भी
अद्भुत लाभ की गारंटी के संग
दुनिया को बेचते हुऐ
धर्म और कारोबार के
गठजोड़ का दोहन करते
एक चतुर इंसान को
क्रांति वाहक,देश का कर्णधार


मैं कौन हूँ
जो बड़ी बेशर्मी से
मायानगरी की चकाचौंध में
खुद को असफल मान
जिंदगी से मुँह मोड़ गयी
महज पच्चीस साल की
उस प्रतिभाशाली लड़की की
मौत को बनाता हूँ
एक राष्ट्रीय अहम मुद्दा
उस बेचारी व उसके परिवार की
निजता को करते तार-तार


मैं कौन हूँ
जिसने कर बंद अपने दिमाग
बना दिया एकदम अचानक
श्रीनि का अपने पद से हटना
देश का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा
मैं लगाता हूँ उल्टे सीधे इल्जाम
एक कप्तान की पत्नी पर
क्योंकि कसूर उसका इतना है
वह खेल देखने गयी मैदान पर


मैं कौन हूँ
जिसकी याद्दाश्त गायब है
भूल गया हूँ सहजता से कि
वह अभी भी वही खिलाड़ी है
जिसकी कप्तानी में ही
खेल के तीनों फार्मेट में
टीम बनी थी नंबर वन
जीते गये थे दो विश्व कप
और आज मैं कह रहा हूँ
चीख-चीख, बिना आधार
कि वह है कप्तान और टीम में
किसी खास की कृपा-दया से


तू कौन है, बे !
मैं इस महान भारत देश का
इलेक्ट्रानिक-प्रिंट मीडिया हूँ
जिसके न नाखून हैं न दाँत ही
धनझोलाओं का मैं गुलाम हूँ
चैनल चलाने-विज्ञापन जुटाने
और पेट अपना पालने के लिये
ढूंढता केवल आसान शिकार हूँ


धिक्कार है तुझ पर, बे...
दूर हट जा आगे से मेरे
नहीं तो मुझे पूरा डर है
मैं शब्दों की मर्यादा तोड़ दूंगा
जा फिर से कर वही काम
जो आज तक करता आया है
तू केवल यही करना जानता है
तुझे पाला इसीलिये धनकुबेरों ने
रात दिन जमीर बेचते, झूठ परोसते
यही करने को तू है अभिशप्त भी !



Indian captain M S Dhoni receives the ICC ODI Shield from David Morgan at Cardiff




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डिस्क्लेमर- ब्लॉग लेखक क्रिकेट प्रेमी है, भारतीय क्रिकेट टीम का शुभचिंतक है और भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का प्रशंसक भी...


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सोमवार, 3 जून 2013

मैं...

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मैं
मस्त हूँ
खुश 
और
संतुष्ट भी
अपने
मैं
ही 
रहने में


मैं
कभी
ख्यालों में
तक नहीं
होना चाहता
तुम 
या 
किसी 
और सा


मैं
जो
मैं 
बना
खुद ही
मेरा
मैं 
बनना
मेरा ही
जागृत
निर्णय था

मैं
ही हूँ
जिम्मेदार
अपने
मैं 
होने का
और
इस कारण हुई
हर जीत
और
हरेक हार का


मैं
नहीं चाहता
दौड़ना
तुम्हारे
या 
तुम जैसे
कई औरों के
साथ
किसी भी
दौड़ में


मैं
दौड़ता हूँ
खुद के साथ
स्वयं
चुनकर
अपनी दौड़
दौड़
का समय
और
दौड़ने का
मैदान भी


मैं
हमेशा
खुद को
नापता हूँ
खुद की ही
नजरों से
अपने
ही
पैमानों पर


मैं
मानता हूँ
कि
तुम्हारे 
या किसी और
के पास
मुझे नापने
का पैमाना
और 
नजर नहीं


मैं
अपने
मैं बनने 
के लिये
अपने 
परिवार
के सिवा
किसी का
कृतज्ञ या
कर्जदार नहीं


मैं
मानता हूँ
कि मेरा
मैं 
रहना
नहीं जुड़ा
किसी के
भी स्वीकार 
या
अस्वीकार से


मैं
मैं ही रहूँगा
तुम्हारे
मुझ को
कुछ कुछ
या
बहुत कुछ
कहने के
बाद भी 


मैं
जानता हूँ
कि 
फिर भी
तुम
आँकोगे मुझे
लगाओगे 
अनुमान
मेरी हैसियत
और वजूद का


मैं
हमेशा की
तरह ही
कर दूँगा
दरकिनार
तुम्हारी
इस 
अनधिकार
चेष्टा को


मैं
मैं
ही रहूँगा
पर यह
पूछंगा जरूर
कि क्या
तुम्हें वाकई
यकीन था
कि मेरे
मैं 
ही रहने
के अलावा
कोई दूसरा 
परिणाम
संभव था ?












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बुधवार, 29 मई 2013

उफ्फ गर्मी... आह गर्मी... वाह गर्मी... सूरज आग बरसाता, बाबा !

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लगता है जैसे कोई भठ्ठी सी हो
है दिन भर जो आग उगल रही
दिन को चैन है न रात को नींद
यह सूरज आग बरसाता, बाबा


बेगाने शहर में कहीं प्याउ नहीं
हाँ, पानी चौराहों पर बिकता है
इस तपती तेज दुपहरिया में
प्यासे ही दिन कट जाता, बाबा


खुद का खड़े हो पाना मुश्किल है
बार बार लगता, गिर जाउंगा मैं
ऐसे में सवारियों को पुकार रहा
कैसे वह है रिक्शा चलाता, बाबा 


लू से दिनभर लड़ता है बेपरवाह
मेहनतकश लगा है अपने कामों में
मौसम की आग क्या बिगाड़े उसका
वह जो पेट की आग बुझाता, बाबा


'ओह, यस अभी' लिखा चारों तरफ
फल रस,पना, शिकंजी को पछाड़ता
धड़ाधड़ गलियों चौराहों में बिक रहा
पेप्सी क्यों इतना ललचाता, बाबा  


है जीभ निकाले तड़पता डोल रहा
हर चौखट-ठिकाने से दुत्कारा जाता
वह आवारा कुत्ता भी यह सोच रहा
कहीं गज-दो-गज छाँव पाता, बाबा


तरह तरह के रंगीन सूती दुपट्टों से
ढंके चेहरा पूरा, पहने लंबे दस्ताने
उन लड़कियों का बाहर निकलना ही
एक हौसला सबको दे जाता, बाबा


किसी अच्छे-बुरे हर दौर की तरह 
जल्द कट जायेंगे ही यह दिन भी
आने वाली रिमझिम बरसातों का
मौसम यह विश्वास दिलाता, बाबा













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बुधवार, 22 मई 2013

क्या आपको लगता है कि 'उस' को मानने वालों के पास कोई जवाब है वाकई !!!

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अब जब भी 'उस' की बात होगी, 'उस' के वजू़द पर सवाल होगा तो मानने वालों का सबसे पहला तर्क यही होता है कि जब तुम मानते नहीं तो तुम्हें क्या फर्क पड़ता है उसके होने या न होने से... क्यों तुम उसके पीछे पड़े हो भाई... ऐसे में मैं जवाब देना चाहूँगा कि चाहे अनचाहे दुनिया को फर्क तो पड़ता ही है 'उस' को माने जाते रहने के कारण... यथास्थिति बरकरार रहती है, जुल्म और शोषण की ताकतें बनी रहती हैं, मजलूम अपनी हालत को कर्मफल समझ आवाज नहीं उठाता, बहुत सा समय, खाद्म और संसाधन 'उस' के गुणगान में व्यर्थ होते हैं, एक बड़ा निकम्मा तबका केवल और केवल कुछ उलजलूल बेसिरपैर की बातों को फैलाकर समाज में प्रभुत्व बनाये रखता है, दुनिया बंटी रहती है, दंगे होते हैं, मुल्क युद्ध करते हैं, आतंक फैलता है, इंसान अपने ही जैसे दूसरे इंसान से नफरत करता है... और आप कहते हो, भाई तुम्हें क्या फर्क पड़ता है... फर्क पड़ता है भाई, क्योंकि मैं और मुझ जैसे कई इस खेल के आर-पार देख पा रहे हैं... मानने वाले भले ही हमें अपना न मानें, पर मुझ जैसे सभी मानते हैं कि 'सच को जानने का हक सभी को है !'

जब यह ब्लॉग शुरू किया तो बहुत सारे सवाल उठाये 'उस' और 'उस' की अवधारणा पर... अल्लम गल्लम बातें तो बहुत की लोगों ने पर तर्क की कसौटी पर खरा व विश्वसनीय जवाब कोई नहीं मिला... आप चाहें तो यह आलेख नीचे पढ़ सकते हैं... यह सभी लिंक हैं...

काहे को भूखा मारते हो अपने ही प्यारे बच्चों को... मेरे माई-बाप...हम सबके पालनहार ?

चित, पट और अंटा तीनों उसी का ???

वफादारी या ईमानदारी ?... फैसला आपका !

बिना साइकिल की मछली... और धर्म ।

अदॄश्य गुलाबी एकश्रंगी का धर्म...

जानिये होंगे कितने फैसले,और कितनी बार कयामत होगी ?

पड़ोसी की बीबी, बच्चा और धर्म की श्रेष्ठता...

ईश्वर है या नहीं, आओ दाँव लगायें...

क्या वह वाकई पूजा का हकदार है...

एक कुटिल(evil) ईश्वर को क्यों माना जाये...

यह कौन रचनाकार है ?...


और 

क्या होती है आत्मा ?

आज देखता हूँ कि संजय ग्रोवर जी की पोस्ट (लिंक) पर भी वही नजारा है... और मेरी उपरोक्त पोस्टें लिखे जाने के बाद ब्लॉगरों और फेसबुकियों की एक नयी पीढ़ी भी उतर आई है मैदान में... तो दोबारा वही सवाल पूछने का मन है... आपका मन हो तो जवाब दीजिये, नहीं हो तो पढ़कर अगली पोस्ट की ओर बढ़िये... पोस्ट का उद्देश्य केवल पाठक के दिमाग तक उन सवालों को पहुंचाना है... कईयों के दिमागों में वह और कई सवालों की तरह दफन हो जायेंगे हमेशा के लिये और कुछ के दिमागों में वह जिन्दा रहेंगे हमेशा और काम करेंगे इस पूरे प्रपंच को तोड़ने-उजागर-नंगा और खत्म करने का... आदमीयत अपने असली रूप में तभी जिन्दा होगी...

मोटामोटी तौर पर मैं और मुझ जैसे यह मानते हैं कि अपनी विकास अवस्था के दौरान जब मानव ने सामूहिक शिकार के प्रयोजन से झुंडों में रहना शुरू किया और शिकार, खाद्मान्न व फलादि का संग्रहण शुरू किया, भाषा विकसित हुई तो कुदरत की ताकतों जैसे वर्षा, बिजली, गर्मी, सूखा, बाढ़, बीमारी, जंगली जीव और सर्प आदि के द्वारा जान-माल की क्षति होने के कारण वह भयभीत सा हुआ... वह और कुछ करने की स्थिति में नहीं था तो भय के चलते उनको पूजने, खुश करने या मनाये रखने की परंपरा सी चल पड़ी, यद्मपि इन सबसे कुछ होता नहीं था... कालांतर में मानव समाज का एक तबका, जो इस सब प्रपंच को समझता था परंतु यह सब समझते हुऐ भी क्योंकि उस तबके को इन प्रपंचों के चलते समाज में प्रभुत्व व बैठे ठाले बिना शारीरिक श्रम किये रोजी रोटी का जुगाड़ मिलता था, उस तबके ने इस प्रपंच को और बढ़ाया, उसने ग्रंथ रचे, आकाशवाणियाँ सुनीं, देव दूत देखे, अवतार गढ़े, संदेशवाहकों से मिला और एक लंबा चौड़ा काल्पनिक मिथकों का मायाजाल रच दिया... पूर्ण आस्था जो कोई सवाल नहीं करती और समर्पण पर जोर दे उस तबके ने अपने को और इस सारे प्रपंच-मायाजाल को सवालों के दायरे से बाहर कर दिया... उसी तबके ने फलित ज्योतिष, वास्तु, फेंग शुई और तमाम तरीकों के अल्लम गल्लम गल्प विज्ञान रचे और मामले को इतना उलझा दिया कि आज का इंसान बमुश्किल उसके पार देख पाता है... शायद इसीलिये उनकी जिम्मेदारी अहम है जो इस सब के पार देख पा रहे हैं...

आज फिर इस पोस्ट के माध्यम से मेरे सवाल हैं ...


१- ईश्वर क्या है, उसका स्वरूप क्या है ?

२- क्या आज तक के मानव इतिहास में किसी ने उसको देखा, सुना या अनुभव किया है ?

३- वह क्या करता है ?

४- वह क्यों चाहता है कि उसे पूजा जाये, उसके सामने झुका जाये, उसे याद रखा जाये या उसका ध्यान किया जाये ?

५- आत्मा क्या चीज है ?

६- क्या होता है अध्यात्म ?

७- धर्म का उद्देश्य क्या है, अगर उद्देश्य गलत काम से बचाने का है तो क्या यही काम कानून बेहतर तरीके से नहीं करते, जिनमें इसी जन्म में गलत काम की सजा भी है ?

८- क्या यह सब जो खाद्म नदियों में बहाया जाता है, आग में फूंका जाता है या मूर्तियों पर च़ाया जाता है, सुगंधित धुउसके घर में किया जाता है मोमबत्ती-दिये जलाये जाते हैं, उसके नाम पर कुरबानियाँ-च़ावे होते हैं... क्या उसे इनकी जरूरत है ?

९- क्या वह चाहता हकि उसको याद/खुश करने के लिये कोखा रहे ?

१०- और सबसे खिरी सवाल, उसे किसी कार्य को करने में सक्षम कहा जाता है तो क्या वह एक इतना भारी पत्थर बना सकता है जिसे वह खुद ी न ठा सके ?... :) 
 









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मंगलवार, 21 मई 2013

क्या आप देखना चाहेंगे कि क्या हो रहा है यहाँ पर ?...

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पिछले कुछ समय से एक अजीब सी मुर्दनी-वीरानगी सी छाई है ब्लॉगवुड में... कहीं कोई एक्शन ही नहीं ... :)

अब ऐसे माहौल में यहाँ पर (लिंक) मुझे एक अच्छी बहस के थोड़े आसार से दिख रहे हैं... तो फिर देर क्या है... समय है अगर आपके पास तो या तो कूद पड़िये बीच बहस, अपनी ओर से कुछ जोड़िये घटाईये... या फिर किनारे-किनारे खड़े ही आनंद लीजिये... :)

क्या सोच रहे हैं ? लिंक पर क्लिक करिये न... :)





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गुरुवार, 9 मई 2013

चला जाये क्या ?

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हमने अबतक
बहुत अपनी
बकवास की

मन भर के 
हर किसी से
झगड़  लिये

जो कहना था
किसी को भी
कह चुके

बेलाग बेखौफ
सुनाना था जो
सुना दिया

सुनाने वाले
सबकी हमने
दिल से सुनी

कहीं किसी को
फर्क तो कोई
पड़ता नहीं

दुनिया वही
पहले जैसी
चलती रही

अपनी बकबक
अब खुद ही को
चुभने लगी

कुछ रूककर
सुस्ताकर भी
देख लिया

इस डेरे में 
पहले सा मजा
आता नहीं

कई दूर ठिकाने
अन्देखे अन्जाने
बुला रहे

तामजाम अपना
फैलाया नहीं था
हमने कभी

समेटने में उसे
वक्त लगेगा
बिल्कुल नहीं

अब...
चला जाये क्या ?











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मंगलवार, 7 मई 2013

किम आश्चर्यम् ?

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आजकल खबरें आपको परेशान नहीं करतीं... वे अपनी शॉक-वैल्यू खो चुकी हैं... यह एक ऐसा दौर है जिसमें हमारे पतन की कोई सीमा नहीं है... कहीं भी, किसी के द्वारा भी, कैसा भी और कुछ भी संभव है... लगभग हर चीज बिकाऊ है और बिकाऊ दिख भी रही है...

पवन बंसल जी यूपीए की सरकार में एक साफ और बेदाग छवि के भरोसेमंद और काबिल नेता के तौर पर जाने जाते रहे हैं... उनका भांजा रेल मंत्रालय से होने वाली नियुक्ति और प्रमोशन के बदले लंबी चौड़ी घूस लेते सीबीआई के हाथों पकड़ा गया है... पवन बंसल कसूरवार साबित हो सकते हैं और यह भी हो ही सकता है कि जाँच के बाद यह पता चले कि पवन बंसल इस मामले में शामिल नहीं थे और उनके रिश्तेदारों ने केवल उनकी सदाशयता का अनुचित लाभ उठाया है... पर फिर भी यह मामला एक बड़े सत्य को दोबारा सबके सामने उजागर तो करता ही है... रेलवे के बड़े पदों को भी पैसा देकर कब्जाया जा सकता है, यह धारणा और यह प्रचलन केवल और केवल पवन बंसल के भाँजे विजय सिंगला का पैदा किया हुआ नहीं है... अपनी सहज बुद्धि के जरिये भी आप इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि ऐसा पहले भी हुआ और होता रहा होगा, यह तो भला हो उस सीबीआई के अफसर का, जिसका ज़मीर अब तलक बिका नहीं और उसके चलते उसने यह कारवाई कर दी और हमें भी खबर हो गयी...

२०१० में अपने एक सर्वे के बाद ट्रान्सपेरेंसी इंटरनेशनल (लिंक) ने दुनिया को बताया कि भारत में 100 में 54 लोग भ्रष्ट हैं। जो अपना काम करवाने के लिए भ्रष्टाचार का सहारा लेते हैं। फिर चाहे इसके लिए वो घूस दें या घूस लें।(लिंक) ... वे अंतर्राष्ट्रीय संस्था है अभी भी हकीकत नहीं जानते... आँकड़ा इस से कहीं ज्यादा है... मैं प्रतिशत में बताने की माथापच्ची में नहीं पड़ता पर इतना जरूर कहूँगा कि ईमानदार शख्स का मिलना हमारे देश में एक 'अति दुर्लभ अपवाद' है...

एक मुल्क-एक समाज के तौर पर हम सदियों से चार अहम चीजों घूस-खुशामद-सिफारिश-बख्शीश के जरिये चलते समाज हैं... आप हमारे धार्मिक और अध्यात्मिक क्षेत्र को ही देखें... तप-प्रार्थना-आस्था और पूर्ण समर्पण के तो बड़े बड़े बखान मिलेंगे पर मन-वचन और कर्म से ईमानदार होने के लिये कोई नहीं कहेगा... मेरी बात पर यकीन न हो तो एक पूरा दिन आप धार्मिक-अध्यात्मिक चैनल देखें और कोई गुरु-बाबा ईमानदारी बरतने के लिये कहता मिल जाये तो बतायें...

आप अपने इर्द गिर्द हमारे किसी भी संस्था, संस्थान या विभाग को देखें... एकाध अपवाद को छोड़ अहम पदों पर जो भी बैठा है उसे या तो वह पद घूस-खुशामद-सिफारिश के जरिये मिला है या किसी सत्ता संपन्न ने वह पद उसे उसकी सेवा-चापलूसी-श्वानसम वफादारी की बख्शीश के तौर पर उसे इस पद से नवाजा है... प्रत्येक विभाग-संस्था या संस्थान में एक सत्ता केंद्र है और उस केंद्र के इर्दगिर्द मंडराने उसके हितों व अहम को साधने वाले पदों से नवाजे जाते हैं और जो अपने को इतना गिरा नहीं सकता वह बेनाम-गुमनाम जिंदगी गुजारने पर मजबूर है...

हमारे नेता हमारे इसी समाज से आते हैं... आप उनमें से किसी की भी बैठक में कुछ समय गुजारिये और देखिये... आपके और मेरे जैसे ही आम आदमी रोजाना वहाँ किसी न किसी गलत काम, किसी का हक छीनने या सरकारी पैसे/नीतियों का अनुचित फायदा उठाने के प्रयोजन से सिफारिशें करवाने के लिये ही जाते हैं... नेता भी आखिर आम आदमियों से ही हैं तो वह भी बहुत जल्दी ही मिलने वाले फायदे में अपना हिस्सा माँगना/लेना सीख जाते हैं...

सदियों से इसी व्यवस्था के चलते हम आज इस स्थिति में हैं कि अधिकाँश पार्टियों के सत्ता केन्द्र पर उन्हीं नेताओं का कब्जा है जो घूस-खुशामद-सिफारिश-बख्शीश के चलते वहाँ तक पहुँचे हैं... सत्ता इन्हीं को मिलती है कभी न कभी... नतीजा, हमारे अकादमिक जगत, हमारे सभी लोक सेवा आयोग, हमारे तमाम बड़े संस्थान, हमारी तमाम संस्थाओं, हमारी तमाम उन जगहों पर जहाँ अर्थलाभ होता है, वह लोग बैठे हैं जो वहाँ घूस-खुशामद-सिफारिश-बख्शीश के चलते पहुँचे/काबिज हैं... कोई संस्था, यहाँ तक कि हमारी सशस्त्र सेनायें भी, इस चलन से अछूती नहीं हैं... कई कई 'चीफ्स' के कारनामे आप देख ही चुके हैं...

एक अवाम और समाज के तौर पर हम सबको यही स्वीकार भी है... सदियों से हम इसे देख रहे हैं... यही हमारे लिये दस्तूर भी है और हमारे जैसे समाज की तकदीर भी...

इसलिये चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में आये... घोटाले-घूसखोरी होती रहेगी-बढ़ती रहेगी... इन्हें देख हैरान-परेशान मत होईये... जो सदियों से हमारे देश में होता आ रहा है उसे एक बड़े मंच और बड़े पैमान पर देखने पर यह किम आश्चर्यम् ?

मैंने समस्या तो गिना दी अब आपमें से कुछ पूछेंगे कि समाधान क्या है... मेरा मानना यह है कि यह खोखला और सड़ा गला तंत्र इस समस्या का समाधान नहीं निकाल सकता... यह अभी और गलेगा-सड़ेगा... इसका कोढ़, इसके खुले-सड़े-गंधाते-पीब बहाते घाव अभी और दिखेंगे और फिर एक दिन ऐसा जरूर आयेगा कि अपने पूरे तामझाम के साथ यह तंत्र भरभरा कर ढह जायेगा... यह पीड़ादायक होगा, इसमें बहुत विनाश-नुकसान होगा और कष्ट भी...  पर यदि एक मुल्क और समाज के तौर पर हमें बने रहना है तो यह लाज़िमी भी है...

फिर एक नये-बेहतर और आस जगाते तंत्र का उदय होगा...

काश यह सब मेरे जीवनकाल में ही हो जाये...

मुझे स्वयं को मुस्कुराते देखना बहुत अच्छा लगता है... :)








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रविवार, 24 मार्च 2013

लीजिये, बाँट ही दी उपाधियाँ... भाई, बुरा न मानो होली है ssssss

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सबसे पहले तो एक सूचना... आपने देख ही लिया होगा कि अब अपना नाम मैंने 'प्रवीण शाह' की बजाय 'प्रवीण' लिखा है... करना तो यह बहुत पहले से चाह रहा था पर न जाने क्यों, बार बार भूल सा जाता था... फिर रतन सिंह शेखावत जी ने लिखा जातिप्रथा को कोसने का झूठा ढकोसला क्यों ? (लिंक) जिसमें उन्होंने सवाल उठाया कि "जातिप्रथा को गरियाने वाले लोग भी अपने नाम के पीछे क्यों जातिय टाइटल चिपकाये घूमते है ? समझ से परे है !!"... तो मन किया कि सबसे पहले तो अपने पिछवाड़े खुद ही दो लात लगाई जाये... नतीजा और सबक अब यह है कि आगे से मैं 'प्रवीण' ही कहलाना पसंद करूंगा...

अब बात पिछली पोस्ट एडवांस ऑर्डर मिलने पर होली की उपाधियाँ बांट रहा हूँ... लेंगे क्या ? (लिंक) की... सबसे पहले तो एक स्वीकारोक्ति... यह मेरी एक सुविचारित तरकीब (Deliberate Ploy) थी जिसके तहत मैंने कुछ इस तरह का माहौल बनाया मानो उपाधि देने के नाम पर मैं किसी के कपड़े ही फाड़ बैठूंगा... जबकि मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाला था... मैं सिर्फ यह चाहता था कि वही सहमति दें जिनके बारे में कुछ लिखा जा सके... यह मंतव्य कामयाब हुआ और मुझे यह बताते हुऐ खुशी हो रही है कि जिन तेरह ब्लॉगरों ने अपनी सहमति दी है वे विशाल हॄदय युक्त, उदारमना, संवाद व अभिव्यक्ति के महत्व को समझने वाले व सबसे बढ़कर स्वयं के प्रति आश्वस्त लोग हैं, जिन्हें विश्वास है कि वह किसी भी स्थिति को नियंत्रित कर सकते हैं... 

मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूँ कि मेरी इस पोस्ट से उनके यह गुण और बढ़ेंगे ही... 

मुझे लगता है कि कुछ और सहमतियाँ मुझे मिलनी चाहिये थीं, पर हो सकता है वह लोग अब मेरा ब्लॉग नहीं पढ़ते या मैं उनके स्तर का नहीं लिखता...  

खैर... शहरयार ने कहा भी है न कभी...  

किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता 
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता
जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है
जुबां मिली है मगर हमज़ुबां नहीं मिलता

 
मित्र विचारशून्य ने हिन्दी ब्लॉगिंग की मंदी का हवाला दे जितनी सहमतियाँ मिली हैं उन्हीं से काम चलाने को कहा है... और मुझे यह सलाह जंची भी है... इसलिये शुरू कर रहा हूँ उसी क्रम में, जिसमें यह सहमतियाँ मिली हैं...


संजय अनेजा :- उनका ब्लॉग 'मो सम कौन' ब्लॉगवुड के सबसे लोकप्रिय ब्लॉगों में से एक है... रोजमर्रा की जिंदगी में हास्य ढूंढते कमाल के किस्सागो हैं वह... अगर वह कहीं अपनी असहमति भी दर्ज करते हैं तो बड़ी नफासत से... जीवन का उत्सव अपनी पूरी शान से दिखता है उनके लेखन में...

तो होली पर उनके लिये तुम सम कौन सरल-सहज-निष्काम


सुज्ञ जी :- नका आभामंडल बहुत विशाल है, और अनेकों उनके भक्त-प्रशंसक हैं... वह ब्लॉगवुड में धर्म-अध्यात्म-आस्था-समर्पण के ध्वजवाहक हैं और मैं एक अदना सा संशयवादी... जाहिर है कि अनेकों बार हमारे विचार नहीं मिलते... उन्हें लगता रहा है कि मैं या तो उनका विधर्मी हूँ या विधर्मियों से मिला हुआ...पर उन्होंने हमेशा संवाद बनाये रखा है... कभी कभार जब वह यह तक कह देते हैं कि भले शोषण के बहाने हिंसा करे, अन्याय के बहाने हिंसा करे, किसी भी तरह शिकार करे या चाहे धर्म के बहाने हिंसा करे, हिंसको को मैँ हिंदु नहीं मानता. यह मेरा व्यक्तिगत अभिप्राय है और मेरा बस चले तो हिंसाचारियों को मैं भारतीय तक न मानूँ.क्योँकि अहिंसा भारतीय संस्कृति की महान परम्परा है.(लिंक) तो मुझे यह अतिवाद सा लगता है और मैं असहमति जताता हूँ... पर उनसे संवाद-प्रतिवाद करना मुझे अच्छा लगता है और यह चलता रहेगा...

तो होली के मौके पर 'भय्यू जी महाराज' की तर्ज पर सुज्ञ जी हैं ब्लॉगवुड के भैय्या-बाबा


पी. सी. गोदियाल 'परचेत' जी :- वह कार्टून, कविता, कहानी, लेख, व्यंग्य सभी विधाओं में अपना हाथ आजमाते हैं... हिन्दुत्ववादी-दक्षिणपंथी लगते हैं... 'अंधड़' में ज्यादातर बार वह बहुत धारदार होते हैं... मुझे उनका स्नेह हमेशा मिला है, बड़े भाई की तरह...

तो इस होली पर गोदियाल जी हैं हर अंधड़ पर ब्लॉगवुड की तिरछी नजर


सन्जय झा जी :- हालांकि उनका अपना ब्लॉग भी है पर उसमें उन्होंने बहुत कम लिखा है... मूलत: वह एक पाठक हैं... एक ऐसा पाठक जिसे पाकर हर ब्लॉगर अपने को धन्य समझेगा... जब मैं अपनी लंबी कहानी (लिंक) लिख रहा था... तो कई कई बार यह होता था कि मुझे लगता था कि कोई पढ़ तो रहा नहीं, सो लिखने का क्या फायदा... और अचानक संजय जी की टीप मिल जाती थी... हौसला देती हुई...

होली के मौके पर संजय जी के लिये पाठक-माईबाप तुझे प्रणाम !

अन्तर सोहिल जी :-  उनके ब्लॉगहेडर पर लिखा है, अन्तर सोहिल = Inner Beautiful.. और आप उनके आलेखों को पढ़ें तो उनकी इसी अंदरूनी सुन्दरता से रूबरू होते हैं... बिना किसी दिखावे, बनाव-श्रंगार के एकदम दिल से लिखते हैं... अपने संघर्ष के दिनों का बेहद ईमानदार और मर्मस्पर्शी वर्णन करते हैं वह... सांपला का यह ब्लॉगर मन-वचन और कर्म तीनों से अन्तर-सोहिल है...

होली के मौके पर उनके लिये तेरा अन्तर है सबसे सफेद !


रविकर जी :- दिनेश चंद्र गुप्त 'रविकर' जी ने पिछले कुछ समय से अपनी त्वरित काव्य टीपों के माध्यम से एक जबरदस्त उपस्थिति जताई है... मुझे तब बहुत आनंद आता है जब उनके राष्ट्रवाद पर कोई सवाल उठाता है और वह जवाब में आरएसएस के उन सब कैंपों को गिनाने लगते हैं जिन्हें उन्होंने अटैंड किया है और वह पद भी जिन पर वह रहे हैं... रविकर जी सब पर गहरी नजर रखते हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि उनके लिये कोई अछूत नहीं है, यह बहुत बड़ी बात है...


'काका हाथरसी' की याद दिलाते रविकर जी हैं ब्लॉगवुड-काका 


सतीश सक्सेना जी :- मैं उनका फैन हूँ... बेहद जज्बाती इंसान हैं वह... हरदिल अजीज, दोस्तों के दोस्त सतीश जी बेहद भावपूर्ण गीत रचते हैं... जितनी जल्दी वह गर्म होते हैं, ठंडा होने में उस से भी कम देर लगती है... उन्हें अलग अलग पोज-लिबास में अपनी फोटो देखना-दिखाना बहुत अच्छा लगता है... उनके लिये चंद लाइनें...

'मेरे गीत' नहीं मात्र तेरे गीत
वह तो हम सबके भी हैं, मीत
छोटी सी है  यह चाहत मेरी 
ताजिंदगी सुनता रहूँ 'मेरे गीत'

तो इस होली के मौके पर सतीश जी हैं ब्लॉगवुड का गीत-सबका मीत


शाह नवाज जी :- शाहनवाज बेहद सुलझे हुऐ ब्लॉगर हैं... अक्सर मेरे विचार उनके विचारों से मिलते हैं... वह हमारीवाणी को चलाते भी हैं शायद... उनके स्वधर्मी कुछ ब्लॉगरों के निशाने पर भी वे हमेशा रहते हैं जिनको लगता है कि शाहनवाज उनके लिये कुछ नहीं कर रहे... 'प्रेम रस' और 'छोटी सी बात' कभी आपको निराश नहीं करते...

होली पर शाहनवाज जी के लिये 'उस' का ईमानदार आशिक

'उस' का अर्थ शाहनवाज जी ही बतायें तो बेहतर...


वन्दना गुप्ता जी :- वन्दना जी बहुत अच्छी कवयित्री हैं... उन्होंने टैबू समझे जाने विषयों पर भी बड़ी निडरता से लिखा है... हालांकि एक बार दबाव के चलते उनका पोस्ट हटा देना मुझे अच्छा नहीं लगा पर स्त्री न होने के कारण मैं उन दबावों की कल्पना भी नहीं कर सकता जो उस समय वह झेल रही थीं... फिर भी वह निडरता से बोल्ड लिखना जारी रखे हैं...

तो वन्दना जी हैं ब्लॉग-दिलेर


अरविन्द मिश्र जी :- यह कोई छुपी हुई बात नहीं कि मैं उनको पसंद करता हूँ... कभी कभी मेरा उनको 'देव' संबोधित करना रचना जी को काफी खलता है... मुझे पता नहीं कि कैसे एक बार उनको लगने लगा कि मैं कोई और नहीं, अपितु 'रचना जी' ही हूँ... उनके मेरे विचार अनेकों बार एक से ही होते हैं... वह सबमें हिट हैं.. मासेज-क्लासेज दोनों में... पुरूषो-महिलाओं सभी में... अक्सर शरारत सी भी  कर बैठते हैं... सरे आम प्रणय निवेदन तक कर देते हैं ब्लॉग में... 

तो अरविन्द जी हैं ब्लॉगवुड के सलमान खान


रचना जी :- रचना जी ब्लॉगवुड नारीवाद की पुरोधा हैं और स्त्री हितों के लिये किसी भी हद तक जाकर लड़ सकती हैं... वह पिछली लड़ाईयों को भूलती नहीं कभी और अवसर मिलने पर उनका भी हवाला दे प्रहार कर देती हैं... कई बार मैं भी उनसे असहमत होता हूँ और उनसे जमकर बहस होती है... पर संवाद वे हमेशा बनाये रखती हैं... यह श्रेय भी उनको दूंगा कि उन्हें कभी यह नहीं लगा कि मैं 'अरविन्द मिश्र' हूँ... मैं चाहूँगा कि मेरी बेटियाँ रचना जी सी बनें, बड़े होकर...

होली पर रचना जी के लिये उपाधि है ब्लॉगवुड-देवि


विचार शून्य जी :- मेरी जानकारी के मुताबिक उनका नाम दीप पान्डेय है... भले ही उनके ब्लॉग का नाम विचार शून्य हो पर उनमें एक खासियत है कि किसी भी मुद्दे पर गहन विचार मंथन चल जाता है उनके ब्लॉग में... आजकल कुछ कम सक्रिय हैं... पर उनका अपनी बात कहने का अनूठा अंदाज उनकी टीपों में भी झलकता है...

तो विचारशून्य जी हैं ब्लॉगवुड-विचारदीप


शिखा गुप्ता जी :- 'स्याही के बूटे' उन्होंने फरवरी में बनाया... मुख्यत: कवितायें लिखती हैं... अच्छी लगी उनकी कवितायें... हम सभी उनको ज्यादा अच्छी तरह से तब जान पायेंगे जब वह विभिन्न मसलों पर अपने विचार टिप्पणियों के रूप में देंगी...

फिलहाल वह हैं ब्लॉग-संभावना




सोच रहा हूँ उनके लिये भी कुछ कहूँ जो पोस्ट तक आये तो... पर सहमति नहीं दी... :(


शालिनी कौशिक जी 

कभी उनकी 'महक' मिली थी
अब दिखता है 'नूतन' 'कौशल'


दिनेश पारीक जी

पढ़ आये भाई साहब
बहुत सुन्दर, आभार, आपने अपने अंतर मन भाव को शब्दों में ढाल दिया !


अली सैयद साहब 

एक लम्बे इंतजार के बाद, आखिर कार
वो भी आये हमारे दर पर, यह हमारी किस्मत है
कभी हम उनको, कभी अपने दर को, देखते हैं ।




आभार आप सभी का...
और होली की शुभकामनायें भी...












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