सोमवार, 17 दिसंबर 2012

और आखिर खत्म हो ही गयी दुनिया...

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गतांक... से आगे...

आबाद होना स्टेशनों का


* अपने विश्व विद्मालय के इतिहास में सबसे कम उम्र में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर बनने वाली कार्ला हमेशा की तरह सुबह विभाग को जाने घर से निकली और रोजाना की तरह ही सड़क पर पहुंचते ही टैक्सी को हाथ दिया... पर वह यह देख हैरान रह गयीं कि जिस टैक्सी में वे चढ़ीं उसकी पीछे की सीट पर पहले से ही कोई बैठा हुआ था... बिना किसी प्रस्तावना के वह अजनबी अपने लैपटॉप पर कार्ला को एक वीडियो दिखाने लगा...

उस दिन के बाद कार्ला कभी भी देखी नहीं गयी...

* टेनिस एस विक्टर अपने कोच की शुभकामनायें स्वीकार कर रात देर से सोये... अगले दिन सुबह उन्हें एक ग्रैन्ड स्लैम टूर्नामेंट खेलने दूसरे महाद्वीप जाने के लिये फ्लाईट पकड़नी थी... वह घर से एयरपोर्ट को निकले... पर अपनी फ्लाईट में वह नहीं थे... 

वे भी दोबारा कभी देखे नहीं गये...

* सिलिकॉन वैली के वह छहों युवा 'टैकी' भारत के एक प्रसिद्ध तकनीकी संस्थान से निकले थे व अपने अपने क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ दिमागों में उनकी गिनती होती थी... वह छहों आपस में गहरे दोस्त भी थे... आज उन सभी को एक अनाम वेंचर कैपिटलिस्ट ने एक प्रोजेक्ट पर बातचीत के लिये बुलाया था और उनके लिये एक चार्टर्ड प्लेन भी भेजा था... छहों दोस्त प्लेन में सवार हुए...

उनमें से कोई भी कभी दोबारा नहीं देखा गया...

दुनिया के हरेक हिस्से से इसी तरह लोग गायब हो रहे थे... यह वह लोग थे जो अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ माने और जाने जाते थे... किसी सरकार के पास उनके गायब होने का कोई स्पष्टीकरण नहीं था...



दिखना विचित्र विमानों का

और फिर एक नया मामला सामने आया... दुनिया के विभिन्न हिस्सों में, दिन में और रात में भी आकाश में कुछ विचित्र से विमान दिखायी देने लगे... ऐसे विमान दुनिया ने पहले कभी नहीं देखे थे... और इसी के साथ साथ अफवाहों का बाजार भी गर्म हो गया... मीडिया में, बहसों में और आम लोगों में भी अनुमान लगने लगे कि कोई बाहरी सभ्यता पृथ्वी से आदमियों को उठा ले जा रही है...

और आदमियों-औरतों का अचानक लापता होना बढ़ता ही चला गया...





शिखर बैठक


फिर से एक शिखर बैठक आयोजित की गयी... बैठक से पहले ही अफवाहें उड़ने लगीं कि वह बाहरी सभ्यता सभी राष्ट्राध्यक्षों को भी छीन कर ले जा सकती है... सुरक्षा के सारे इंतजाम किये गये... फिर भी ऐसी किसी घटना के वाकई घट जाने की स्थिति में दुनिया के वह तीस ताकतवर देश नेतृत्वविहीन न हों जाये इसे ध्यान में रखते हुऐ सभी राष्ट्राध्यक्ष अपने उत्तराधिकारी का इंतजाम भी करने के बाद शिखर बैठक के लिये गये...

पूरी दुनिया के मीडिया का जमावड़ा था वहाँ... वह तीसों उस हॉल में पहुँचे... और फिर वह घटा जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था... अचानक उस पूरे इलाके की बिजली चली गयी... यही नहीं उस हॉल के आस-पास के तकरीबन चार वर्ग किमी० के इलाके के सारे इलेक्ट्रानिक व मैकेनिकल उपकरणों, मोबाईल फोनों, रेडियो सेटों, वाहनों आदि ने अचानक काम करना बन्द कर दिया... और फिर वहाँ उपस्थित सभी ने देखा कि एक विशाल विचित्र विमान शिखर बैठक स्थल पर मंडरा रहा है... तकरीबन दस मिनट तक वह विमान मंडराता रहा... 

दस मिनट के बाद वह विमान कहीं दूर के लिये उड़ चला... उसके जाते ही बिजली भी आ गयी और सब कुछ यथावत भी हो गया... बस एक ही कमी थी... तीसों राष्ट्राध्यक्ष गायब हो चुके थे...

यह ३० सितम्बर २०४० का दिन था...




शुरू होना मिशन का


हमारे पाँचों स्टेशन आबाद हो चुके थे... कुल १,८०,००० आदमी व औरतें इस मिशन का हिस्सा बने... हमने ऊपर की दुनिया को उसके हाल पर छोड़ दिया था... सभी ने पूरे छह साल स्टेशनों में रहना था और यदि इसके बाद भी दुनिया बची रहती तो मिशन को वहीं खत्म कर सब के सब को वापस दुनिया में सामान्य जिंदगी गुजारने के लिये वापस चले जाना था...

पर हमारे अनुमान गलत साबित नहीं हुऐ... २०४३ की गर्मियों में छोटी सी झड़प से शुरू हुई लड़ाई नाभिकीय युद्ध में बदल गयी... दुनिया के तमाम मुल्कों की न्यूक्लियर डॉक्ट्राईन 'पारस्परिक सुनिश्चित सम्पूर्ण विनाश' के सिद्धान्त पर आधारित थी... और यही हुआ भी... जल, थल और आकाश से हजारों नाभिकीय हथियार एक दूसरे पर छोड़े गये... और पूरी दुनिया खत्म हो गयी... नाभिकीय उर्जा ने तमाम शहरों को धुंआ बना दिया... मानव की आबादी मटियामेट हो गयी... जंगल आग से जल गये... बर्फ के तमाम भंडार पिघल गये और नतीजे के तौर पर तमाम तटीय इलाके समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण डूब गये... 

विस्फोटों के कारण धूल और धुंऐ के बादल उठे और उठते ही चले गये... यह बादल २०० किमी० की ऊंचाई तक गये और फिर नीचे बैठने में एक साल से भी ज्यादा का समय लिया... यानी एक साल तक पूरी दुनिया पर सूर्य की किरणें नहीं पहुंचने दी इन बादलों ने... नतीजा ज्यादातर जगह शून्य से तकरीबन अस्सी डिग्री नीचे का तापमान हो गया विस्फोटों से लगी आग बुझने के बाद... और तमाम तरह का जीवन खत्म हो गया...



योग्यतम की उत्तरजीविता
 

लेकिन जमीन और समुद्र के डेढ़ से दो किमी० नीचे बने स्टेशनों में जिंदगी अपने पूरे परवान पर थी... बाकी दुनिया को खोने का गम अगर था तो सम्पूर्ण विनाश के बाद भी मानव नस्ल को जिंदा रखने की चुनौतियाँ भी थीं... 

Theory of 'Natural Selection' और Theory of 'Survival of the Fittest' मानो पूर्णता से अपने को साबित कर चुकी थी...







जारी...




पिछली कड़ियाँ हैं :-

भाग-१ ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '
भाग-२ ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....
भाग-३ और वह भिडंत...
भाग ४ - बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की ! 
भाग-५ और वह रोंगटे खड़े कर देने वाला खौफनाक नजारा...
भाग ६ - वह दो रहस्यमय आदमी...



पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को यथासंभव शीघ्रता से आपको नई किस्त मिले...




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8 टिप्‍पणियां:

  1. घोड़े अच्छी नस्ल के हैं ...
    बधाई !

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  2. aapne jhansa diya 'aur duniya khatm ho gaee'....balak ne samjha shrinkhla ka ant' hua
    ek baar dobara sari shrinkhal fir se padha.....

    khoob bandhe hain ...... par 'namrashi' bahijee ke
    tarah hammai bhi ek baar me poora padh jane ki lat hai.....aur aap kiston me de rahe hain.....khair,
    ye bhi achha hai.....kuch to abhi bacha hai....


    pranam.

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    उत्तर
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      धन्यवाद संजय,

      आपका साथ रहा अच्छा लगा, अब शायद दो किस्त और... और अल्फा का साक्षात्कार हो ही जायेगा ईश्वर से...


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  3. हमको तो चिंता ब्लॉगरों की हो रही है..180000 में कित्ते उठाये गये! :)अब आगे की बुनवाट को पढ़ना और भी रोचक होगा।

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    उत्तर
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      बाद वाला अल्फा शायद ब्लॉगर भी रहा होगा ... :)


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  4. शुक्र है कहानी ख़त्म नहीं हुयी ....... :-)

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  5. अरे ये देखा नहीं! अब सब किस्तें बांचेंगे!

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