शनिवार, 29 दिसंबर 2012

जाओ लड़की... पर यह दुनिया इतनी बुरी नहीं...

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अपने छोटे से गाँव से
उम्मीद की पोटली बाँध
चली आयीं थी जब तुम
मुल्क की राजधानी में
पढ़ने और भविष्य बनाने
तुम आशावान थी, लड़की


जहाँ रहा करती थी तुम
वहाँ बहुत कम लड़कियाँ
दिखा पाती हैं हौसला
इस तरह बाहर जाने का
पर तुम फिर भी गयी
तुम हिम्मती थी, लड़की


उस काली रात तक
सब कुछ ठीक ही था
आकर रूकी वह बस
थी जा रही गंतव्य को
और तुम उसमें चढ़ गयी
तुम विश्वासी थी, लड़की


बस में वह छह दरिंदे
निकले थे जो मौज लेने
टूट पड़े जब तुम पर
जम कर प्रतिरोध किया
जान की परवाह न कर
तुम अदम्य थी, लड़की


घायल, क्षत-विक्षत हुई
हालत बहुत खराब थी
पर तुम ने हार नहीं मानी
रही जीने के लिये जूझती
उम्मीद का दामन छोड़े बिन
तुम बेहद बहादुर थी, लड़की


आज तुम हो चली गयी
शोकाकुल सबको छोड़ कर
है सर सभी का झुका हुआ
अपराधबोध पूरे देश को है
तेरा भरोसा था जो टूट गया
हमें माफ कर देना, लड़की


तुझ पर जो बर्बरता हुई
अपवाद था, नियम नहीं
माना कि लुच्चे हैं, दरिंदे भी
पर अपने इसी समाज में
बाप बेटे भाई हैं, प्रेमी-पति भी
जो तस्वीर बदलेंगे , लड़की


तंद्रा से झकझोर कर अब
सब को जगा गयी है तू
तेरे जाने का दुख तो है
पर है यह दॄढ़ निश्चय भी
आगे ऐसा नहीं होने देंगे
कर हम पर भरोसा, लड़की



आज तुम हो चली गयी
नाम तुम्हारा नहीं जानता
कुछ अगर कह सकता तुम्हें
तो बार बार यही कहता मैं
माना कि तुम हो छली गयी
पर दुनिया इतनी बुरी नहीं, लड़की







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सोमवार, 24 दिसंबर 2012

तमाम चिंताओं व आक्रोश के बावजूद क्या हम में अगला बलात्कार रोक पाने की सामर्थ्य है ?...

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देश की राजधानी दिल्ली में चलती बस में हुऐ बर्बर बलात्कार ने मानो पूरे देश को तंद्रा से झकझोर कर जगा सा दिया है... इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने व दोषियों को जल्द से जल्द व कड़ी से कड़ी सजा देने की माँग लिये आंदोलित है सारा देश... आज दिन भर टीवी पर देख रहा था कि किस तरह स्वत: स्फूर्त युवाओं का राजपथ, इंडिया गेट व जंतर मंतर पर एकत्र वह जमावड़ा शाम होते होते हटा दिया गया... हर बार की तरह ही कुछ उत्पाती तत्व इस जमावड़े में घुस आये या घुसा दिये गये... हिंसा हुई और पुलिस प्रशासन को मौका मिल गया अपने मन की करने का... आंदोलनरत युवाओं को भीड़ व एक परिवर्तनकामी जन-आंदोलन का फर्क समझना होगा... यदि इस आक्रोश को किसी अंजाम तक पहुंचाना है तो आंदोलन के कर्णधारों को इसको उत्पातियों-उन्मादियों से मुक्त रखने का साहस स्वयं दिखाना होगा, उत्पातियों-उन्मादियों को छाँट अलग करने की अपेक्षा यदि पुलिस-प्रशासन से की जायेगी तो हर बार वही होगा जो आज हुआ...

दिल्ली में उस दिन जो हुआ वह कुछ इस प्रकार था... छह दरिंदे बस में जॉय राइड पर निकले, पहले उन्होंने एक यात्री को लूट उसके कुछ हजार रूपये छीने फिर बलात्कार के शिकार की तलाश में पीड़िता और उसके मित्र को उठा लिया... यह इत्तफाक था कि उन्हें जबरदस्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ा... वरना ज्यादातर मामलों में पीड़िता उन छह दरिंदों का कोई प्रतिरोध न कर पाती... यही नहीं लाज-शर्म व परिवार की इज्जत के चलते यह मामला कभी दुनिया पर जाहिर भी नहीं होता... बस वह पीड़िता अपना पूरा जीवन उस दुस्वप्न को भुलाने की कोशिश करते करते बिता देती...

पर क्या कोई इंसान बलात्कारी दरिंदा अचानक एक ही पल में बन जाता है... नहीं, ऐसा संभव नहीं है... एक समाज के तौर पर हम कई ऐसी गलतियाँ करते हैं जो इन दरिंदों को जन्म देती हैं...

१- हम अपनी लड़कियों पर तमाम तरह की पाबंदियाँ लगाते हैं... पहनावे की पाबंदी, समय की पाबंदी, बाहर निकलते समय किसी पुरूष के संरक्षण में जाने की पाबंदी आदि आदि... मतलब कहीं न कहीं हम एक धारणा को पुष्ट कर रहे होते हैं कि अपनी इज्जत बचाना लड़की की खुद या उसके परिवार की जिम्मेदारी है... एक समाज के तौर पर अपनी लड़कियों के लिये भी एक भयमुक्त व सुरक्षित वातावरण बनाने, जिसमें उसको अपनी मर्जी से रहने, पहनने व किसी भी समय अकेले कहीं भी निर्बाध जाने की स्वतंत्रता हो, बनाने के बारे में हमने आज तक कभी सोचा तक नहीं है... ऐसी किसी भी माँग पर हम संस्कृति के पल्लू में अपना चेहरा छिपा लेते हैं...

२- हम एक कायर समाज हो गये हैं जिसमें खुले आम बसों में हैवान महिलाओं, बच्चियों यहाँ तक कि बच्चों के साथ भी अनुचित यौन स्पर्श व कई बार अश्लील फब्तियाँ भी कसते हैं और कहीं कोई विरोध नहीं करता... रेलों में रोजाना सफर करने वालों के संगठित समूह भी कई बार महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करते हैं पर अधिकाँश मामलों में लोग दूसरी ओर देखना बेहतर समझते हैं... यही नजारा बाजारों, चौराहों, कॉलेजों का है...

३- भाषा के मामले में हमारी सारी गालियाँ यौनिक हैं व अपने विरोधी की माँ, बहन, बेटी या पत्नी के शीलभंग का इशारा देती हैं... खुल्लम खुल्ला यह गालियाँ दी जाती हैं... और हम इनको सुन भी सहज बने रहते हैं... जबकि यही गालियाँ हममें से कुछ के अवचेतन में गहरा और दूरगामी असर डाल देती हैं... यौनिक गालियों को व्यवहार से खत्म करने की जरूरत है...

४- हमारे ही लड़के जब लड़कियों से दुर्व्यवहार करते हैं और इसकी शिकायत होती है तो लड़के का परिवार अपने पद-पैसे-रसूख का पूरा इस्तेमाल करता है... अपने 'सपूत' को बेदाग बचाने के लिये... यही 'सपूत' फिर यारी-दोस्ती में अपने कारनामों का बखान करते हैं... दिन ब दिन नये रोमांच की तलाश करते हैं और अपने ही जैसे कई अनुसरणकर्ता बनाने में कामयाब रहते हैं...

५- समाज में स्त्रियों का दोयम दर्जा आज भी कायम है... कन्या के विवाह पर सामाजिकता व समाज में मुँह दिखाने के नाम पर दहेज को लेकर लंबी चौड़ी सौदेबाजी व दहेज के लेन देन से यह दोयम दर्जा और पुष्ट होता है... हैरत की बात तो यह है कि प्रबुद्ध वर्ग भी दहेज माँगने व इसके लेन देन में कुछ भी गलत नहीं मानता... जबकि प्रत्यक्ष रूप से यह परंपरा स्त्री का दर्जा एक इंसान से घटा लेन-देन के सामान बराबर कर देती है... पर हमारे समाज की अन्य कई विडंबनाओं की तरह हम इस पर मौन साधे हैं...

६- आजादी के बाद से आज तक जितने भी साम्प्रदायिक दंगे कहीं भी हुऐ... दंगाई भले ही किसी भी धर्म के रहे हों... दो बातें सभी मामलों में समान रहीं... पहली कि दंगाइयों ने पहला निशाना बनाया महिलाओं की अस्मत को... और दूसरी कि एकाध अपवाद को छोड़ किसी दंगाई को सजा नहीं हुई... वे जीवन भर अपने समाज के नेता भी बने रहे और लुच्चों-बलात्कारियों के संरक्षक भी...

७- महिलाओं के यौन उत्पीड़न के अधिकाँश मामले अव्वल तो पुलिस के पास तक पहुंचते ही नहीं हैं और अगर पहुंचते भी हैं तो अधिकारियों का रवैया उनमें दोषी को सजा दिलवाने की बजाय स्त्री के परिवार को सामाजिक लोकलाज का भय दिखा रफा दफा कराने का होता है... और वे कामयाब रहते हैं...

८- बलात्कार के जो मामले अदालतों तक पहुंचते भी हैं... उनमें अपराधी जमानत पा जाते हैं... तारीख पर तारीखें लगती रहती हैं... पीड़िता को हर स्तर पर असहज करने वाली, धीमी, लंबी व पीड़ादायक कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है... और अंतत: उसका प्रतिरोध दम तोड़ देता है और बलात्कारी फिर से आजाद और तत्पर हो जाते हैं अगला शिकार दबोचने को...

आइये सोचते हैं कि क्या कुछ ऐसा किया जाये कि अब अगला बलात्कार न हो कहीं भी...

यौन अपराधों के प्रति जागरूकता - छोटे छोटे यौन अपराधों से शुरू कर अपराधी एक दिन बलात्कारी दरिंदे में तब्दील हो जाता है सिर्फ इसीलिये क्योंकि पहले कभी किसी ने उसके बहके कदम नहीं थामे... हमें अनुचित यौन स्पर्श, भाषा व यौन उत्पीड़न के बारे में सभी को जागरूक करना होगा... बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को... और प्रोत्साहित भी करना होगा कि अपने इर्दगिर्द ऐसा कोई मामला देखते ही वह इसको रिपोर्ट करे...

पुलिस प्रशासन की अग्रसक्रियता - बलात्कारी कहीं बाहर के किसी दूसरे ग्रह से नहीं आता... वह हमारे समाज के बीच ही पैदा होता, पलता व पनपता भी है... बलात्कार करने से पहले भी वह अपने व्यवहार से अपने इस कृत्य की ओर बढ़ने के संकेत समाज को दे रहा होता है... जरूरत यह है कि हमारी पुलिस व प्रशासन निष्क्रिय हो ऐसी किसी वारदात के होने के बाद कारवाई करने के बजाय प्रो-एक्टिव हो ऐसे तत्वों को ढूंढें हमारी बस्तियों, गलियों, बाजारों व कॉलोनियों के पार्कों में भी... जरूरत पड़ने पर उन्हें चुग्गा डाल फंसाया भी जाये... हमेशा उनको लगे कि कोई उनको देख रहा है... यह कार्य प्रयत्न माँगता है पर असंभव नहीं है...

यौन अपराधों पर प्रभावी कार्यवाही - पुलिस और प्रशासन के पास शिकायत होने पर भी प्रभावी कार्यवाही अक्सर नहीं हो पाती... तमाम तरह के दबाव अपना काम करने लगते हैं... इसलिये हर जिला स्तर पर स्त्री  अधिकारों-सम्मान के प्रति प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं का एक आब्जर्वर ग्रुप गठित हो, जिसे कानूनी दर्जा प्राप्त हो और जो दर्ज होने वाले हर अपराध पर प्रभावी कार्यवाही को सुनिश्चित करे...

त्वरित न्याय व दंड - इस पर सभी का जोर है अभी... हमें विशेष अदालतें बनानी होंगी... जो इस तरह के मामलों के पीड़ितों के प्रति संवेदनशील हों... रोजाना और निर्बाध सुनवाई करें व एक निश्चित समय सीमा में फैसला सुना दें... मौजूदा दंड भी नाकाफी है, यह तो सुनिश्चित किया ही जाना चाहिये कि कोई भी साबित बलात्कारी कम से कम ६५ साल की उम्र से पहले बाहर न आये...

सामाजिक हस्तक्षेप - समाज का रोल अहम है... यौन अपराध करने वाले अपने घरों में शान से पनाह पाते हैं और कई मामलों में तो उनके घर वाले अपने 'लालों' की इन उपलब्धियों का बखान भी करते हैं... समाज को इतना दबाव बनाना चाहिये कि उनके परिवार तक उनका बहिष्कार कर दें... समाज उनको छूत के रोगियों की तरह देखे... यह भविष्य के बलात्कारी के उस ओर बढ़ते कदम रोकने का सबसे सही तरीका है...

यह सब उपाय और तरीके एक समाज के तौर पर हम सबसे और व्यक्ति के तौर हम में से हरेक से काफी कुछ करना माँगते हैं... क्या हम यह कर पायेंगे...

तमाम चिंताओं व आक्रोश के बावजूद क्या हम में अगला बलात्कार रोक पाने की सामर्थ्य है ?...


सोचिये जरा...







आभार !






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सोमवार, 17 दिसंबर 2012

और आखिर खत्म हो ही गयी दुनिया...

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गतांक... से आगे...

आबाद होना स्टेशनों का


* अपने विश्व विद्मालय के इतिहास में सबसे कम उम्र में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर बनने वाली कार्ला हमेशा की तरह सुबह विभाग को जाने घर से निकली और रोजाना की तरह ही सड़क पर पहुंचते ही टैक्सी को हाथ दिया... पर वह यह देख हैरान रह गयीं कि जिस टैक्सी में वे चढ़ीं उसकी पीछे की सीट पर पहले से ही कोई बैठा हुआ था... बिना किसी प्रस्तावना के वह अजनबी अपने लैपटॉप पर कार्ला को एक वीडियो दिखाने लगा...

उस दिन के बाद कार्ला कभी भी देखी नहीं गयी...

* टेनिस एस विक्टर अपने कोच की शुभकामनायें स्वीकार कर रात देर से सोये... अगले दिन सुबह उन्हें एक ग्रैन्ड स्लैम टूर्नामेंट खेलने दूसरे महाद्वीप जाने के लिये फ्लाईट पकड़नी थी... वह घर से एयरपोर्ट को निकले... पर अपनी फ्लाईट में वह नहीं थे... 

वे भी दोबारा कभी देखे नहीं गये...

* सिलिकॉन वैली के वह छहों युवा 'टैकी' भारत के एक प्रसिद्ध तकनीकी संस्थान से निकले थे व अपने अपने क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ दिमागों में उनकी गिनती होती थी... वह छहों आपस में गहरे दोस्त भी थे... आज उन सभी को एक अनाम वेंचर कैपिटलिस्ट ने एक प्रोजेक्ट पर बातचीत के लिये बुलाया था और उनके लिये एक चार्टर्ड प्लेन भी भेजा था... छहों दोस्त प्लेन में सवार हुए...

उनमें से कोई भी कभी दोबारा नहीं देखा गया...

दुनिया के हरेक हिस्से से इसी तरह लोग गायब हो रहे थे... यह वह लोग थे जो अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ माने और जाने जाते थे... किसी सरकार के पास उनके गायब होने का कोई स्पष्टीकरण नहीं था...



दिखना विचित्र विमानों का

और फिर एक नया मामला सामने आया... दुनिया के विभिन्न हिस्सों में, दिन में और रात में भी आकाश में कुछ विचित्र से विमान दिखायी देने लगे... ऐसे विमान दुनिया ने पहले कभी नहीं देखे थे... और इसी के साथ साथ अफवाहों का बाजार भी गर्म हो गया... मीडिया में, बहसों में और आम लोगों में भी अनुमान लगने लगे कि कोई बाहरी सभ्यता पृथ्वी से आदमियों को उठा ले जा रही है...

और आदमियों-औरतों का अचानक लापता होना बढ़ता ही चला गया...





शिखर बैठक


फिर से एक शिखर बैठक आयोजित की गयी... बैठक से पहले ही अफवाहें उड़ने लगीं कि वह बाहरी सभ्यता सभी राष्ट्राध्यक्षों को भी छीन कर ले जा सकती है... सुरक्षा के सारे इंतजाम किये गये... फिर भी ऐसी किसी घटना के वाकई घट जाने की स्थिति में दुनिया के वह तीस ताकतवर देश नेतृत्वविहीन न हों जाये इसे ध्यान में रखते हुऐ सभी राष्ट्राध्यक्ष अपने उत्तराधिकारी का इंतजाम भी करने के बाद शिखर बैठक के लिये गये...

पूरी दुनिया के मीडिया का जमावड़ा था वहाँ... वह तीसों उस हॉल में पहुँचे... और फिर वह घटा जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था... अचानक उस पूरे इलाके की बिजली चली गयी... यही नहीं उस हॉल के आस-पास के तकरीबन चार वर्ग किमी० के इलाके के सारे इलेक्ट्रानिक व मैकेनिकल उपकरणों, मोबाईल फोनों, रेडियो सेटों, वाहनों आदि ने अचानक काम करना बन्द कर दिया... और फिर वहाँ उपस्थित सभी ने देखा कि एक विशाल विचित्र विमान शिखर बैठक स्थल पर मंडरा रहा है... तकरीबन दस मिनट तक वह विमान मंडराता रहा... 

दस मिनट के बाद वह विमान कहीं दूर के लिये उड़ चला... उसके जाते ही बिजली भी आ गयी और सब कुछ यथावत भी हो गया... बस एक ही कमी थी... तीसों राष्ट्राध्यक्ष गायब हो चुके थे...

यह ३० सितम्बर २०४० का दिन था...




शुरू होना मिशन का


हमारे पाँचों स्टेशन आबाद हो चुके थे... कुल १,८०,००० आदमी व औरतें इस मिशन का हिस्सा बने... हमने ऊपर की दुनिया को उसके हाल पर छोड़ दिया था... सभी ने पूरे छह साल स्टेशनों में रहना था और यदि इसके बाद भी दुनिया बची रहती तो मिशन को वहीं खत्म कर सब के सब को वापस दुनिया में सामान्य जिंदगी गुजारने के लिये वापस चले जाना था...

पर हमारे अनुमान गलत साबित नहीं हुऐ... २०४३ की गर्मियों में छोटी सी झड़प से शुरू हुई लड़ाई नाभिकीय युद्ध में बदल गयी... दुनिया के तमाम मुल्कों की न्यूक्लियर डॉक्ट्राईन 'पारस्परिक सुनिश्चित सम्पूर्ण विनाश' के सिद्धान्त पर आधारित थी... और यही हुआ भी... जल, थल और आकाश से हजारों नाभिकीय हथियार एक दूसरे पर छोड़े गये... और पूरी दुनिया खत्म हो गयी... नाभिकीय उर्जा ने तमाम शहरों को धुंआ बना दिया... मानव की आबादी मटियामेट हो गयी... जंगल आग से जल गये... बर्फ के तमाम भंडार पिघल गये और नतीजे के तौर पर तमाम तटीय इलाके समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण डूब गये... 

विस्फोटों के कारण धूल और धुंऐ के बादल उठे और उठते ही चले गये... यह बादल २०० किमी० की ऊंचाई तक गये और फिर नीचे बैठने में एक साल से भी ज्यादा का समय लिया... यानी एक साल तक पूरी दुनिया पर सूर्य की किरणें नहीं पहुंचने दी इन बादलों ने... नतीजा ज्यादातर जगह शून्य से तकरीबन अस्सी डिग्री नीचे का तापमान हो गया विस्फोटों से लगी आग बुझने के बाद... और तमाम तरह का जीवन खत्म हो गया...



योग्यतम की उत्तरजीविता
 

लेकिन जमीन और समुद्र के डेढ़ से दो किमी० नीचे बने स्टेशनों में जिंदगी अपने पूरे परवान पर थी... बाकी दुनिया को खोने का गम अगर था तो सम्पूर्ण विनाश के बाद भी मानव नस्ल को जिंदा रखने की चुनौतियाँ भी थीं... 

Theory of 'Natural Selection' और Theory of 'Survival of the Fittest' मानो पूर्णता से अपने को साबित कर चुकी थी...







जारी...




पिछली कड़ियाँ हैं :-

भाग-१ ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '
भाग-२ ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....
भाग-३ और वह भिडंत...
भाग ४ - बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की ! 
भाग-५ और वह रोंगटे खड़े कर देने वाला खौफनाक नजारा...
भाग ६ - वह दो रहस्यमय आदमी...



पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को यथासंभव शीघ्रता से आपको नई किस्त मिले...




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सोमवार, 10 दिसंबर 2012

वह दो रहस्यमय आदमी !

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गताँक से आगे...



अब बहुत सी घटनायें बेहद तेजी से घटीं...

उनमें से जो सबसे महत्वपूर्ण थीं वह यह हैं...

* विश्व के तमाम देशों की साझेदारी वाली एक कंपनी का गठन हुआ जिसने तेल व गैस की खोज के लिये बहुत बड़े पैमाने पर दुनिया के तमाम हिस्सों उत्तरी व दक्षिणी ध्रुव, पर्वतों की घाटियों व गहरे समुद्र में भी खुदाई करना शुरू कर दिया।

* एक नयी बहुराष्ट्रीय कंपनी का उदय हुआ जो केवल स्वास्थ्य जाँच का काम करती थी... इस कंपनी ने बहुत ही सस्ते दामों में हेल्थ चेकअप करना शुरू किया... सबसे विशेष बात यह थी कि समाज के प्रतिष्ठित लोगों के चेकअप कंपनी मुफ्त करती थी... 

* शिखरवार्ता में शामिल उन तीस में से एक की मौत दिमाग की रक्तवाहिनियाँ फटने के कारण हुऐ रक्त स्राव से हुई तथा एक का सिर मोबाइल पर बात करते करते अचानक हुऐ एक धमाके में उड़ गया... बताया गया कि बम मोबाइल में था... दोनों ही मामलों में पूरी दुनिया के सहयोग से सत्ता का सहज हस्तांतरण हो गया उन दोनों के उत्तराधिकारियों के हाथ...




और वह दो रहस्यमय आदमी


दुनिया के हर हिस्से में दो रहस्यमय आदमी लोगों से मिलने उनके आफिस, घर, कॉलेज या खेल के मैदानों में जाते थे... और हर जगह लगभग यही बातें होतीं थी..

" मिस्टर वंडरकिड, हमें राष्ट्रपति ने भेजा है और यह है हमारा अथॉराइजेशन, हमें अभी और अकेले में आपसे कुछ बातें करनी हैं "

आइये मेरे कमरे में चलते हैं वंडरकिड बोला... कमरे में जाते ही उन दोनों ने खिडकियों के परदे गिरा दिये और दरवाजा भीतर से बोल्ट कर दिया... उनमें से एक ने लैपटॉप खोला और एक छोटी सी फिल्म वंडरकिड को दिखाई... फिल्म मिशन-सर्वाइवल ऑफ द रेस के बारे में थी... वंडरकिड की आँखें मानो हैरानी से फटी जा रही थीं...

" मिस्टर वंडरकिड, मिशन के हिसाब से आप एक ऐसे आदमी हैं जिनका बचे रहने से मानव सभ्यता को अपने आगे के सफर में आसानी होगी... हमने यह भी पता कर लिया है कि आपको कोई भी आनुवांशिक, मानसिक व शारीरिक बीमारी नहीं है और न ही आपके शरीर में कोई असाध्य संक्रमण है... आपको मिशन के बारे में बता दिया गया है... अब मैं कैमरा निकालने जा रहा हूँ ताकि आपकी सूचित सम्मति (Informed Consent) ली व रिकॉर्ड की जा सके..."

उनमें से एक ने कैमरा ऑन किया व वंडरकिड पर फोकस किया...  दूसरे ने वंडरकिड को सामने रखे लैपटॉप से कुछ जोर से बोल कर पढ़ने को कहा... वंडरकिड के पूरा पढ़ने के बाद दूसरे आदमी ने उससे पूछा " क्या आप सब कुछ जानते-समझते हुऐ मिशन सर्वाइवल ऑफ द रेस का हिस्सा बनने को तैयार हो ?"

"मैं सब कुछ जानते-समझते हुऐ मिशन-सर्वाइवल ऑफ द रेस का हिस्सा बनने को तैयार हूँ" जोर जोर से बोल दो बार दोहराया वंडरकिड ने... पहला आदमी कैमरे से यह सब रिकॉर्ड कर रहा था, रिकार्डिंग पूरी होने के बाद भी उसने कैमरे का फोकस वंडरकिड के चेहरे पर ही रखा व तीन बटन एक साथ दबाये... कैमरे के लेंस के ठीक ऊपर से नीले-हरे रंग की किरणें निकल वंडरकिड के माथे पर पड़ीं, उसे कुछ महसूस नहीं हुआ... 

वह दोनों मुस्कुराते हुऐ कमरे से बाहर निकले... वंडरकिड ने मिशन का हिस्सा बनने की रजामंदी जाहिर की थी... उन नीली-हरी किरणों के चलते उसे पिछले दो घंटे व आने वाले आधे घंटे में हुआ कुछ भी याद नहीं रहने वाला था... यह कुछ इस तरह का था मानो उसकी जिंदगी में यह ढाई घंटे घटे ही नहीं...

यह सूचित सम्मति तकरीबन दो लाख लोगों से लेने का लक्ष्य था...




और अचानक ही


और अचानक ही मुझे एजेंसी से बुलावा आया एक दिन... हर हाल में तुरंत पहुंचना था मुझे... पहुंचने पर पता चला कि अल्फा को गंभीर हॄदयाघात हुआ था... अपने खाने पीने का बिल्कुल भी ख्याल नहीं रखता था वह... टोकने पर कहता था कि मैं हार्टअटैक से ही मरना चाहता हूँ... मैं अस्पताल पहुँचा वह बोलने की हालत में नहीं था... और कुछ ही देर में उसने दम तोड़ दिया... काफी समय से साथ रहते रहते व उसके कारनामों को जानने के कारण अंदर ही अंदर बहुत लगाव हो गया था उससे मेरा... मशीनों-नलियों से जुड़े उसके शरीर को मशीनों-नलियों से अलग कर जब बाहर ले जाया जा रहा था तो मैंने स्ट्रैचर ट्रॉली रूकवायी, उसका चेहरा खोला, माथे को चूमा और बोला " बेफिक्र जाओ और खुश रहो, पॉप, तुमने अपना काम हमेशा अच्छे से किया!"... तब मुझे यह कतई महसूस नहीं हुआ पर देखने वालों ने मुझे बाद में बताया कि मेरी आँखों से आँसुओं की धार निकल रही थी तब...

अल्फा के किये नोमिनेशन के मुताबिक मैं ही नया अल्फा था... यह एक बहुत बड़ा दायित्व था... मैंने निश्चित कर लिया था कि मिशन को हर हाल में २०४० के सितम्बर महीने तक पूरा करना है...







 २०३९


जमीन के नीचे हमारे पाँचों स्टेशन २०३९ तक बन कर तैयार हो चुके थे... हरेक पूरी तरह से नाभिकीय उर्जा युक्त व ८०,००० आदमियों का साठ साल तक बाहर की दुनिया से कोई संपर्क रखे बिना भरण-पोषण करने में सक्षम था... इन स्टेशनों में भविष्य में आने वाली किसी भी आपात स्थिति से निपटने की क्षमता थी व पाँचों स्टेशन आपस में संपर्क में रहने वाले थे...

अभी भी थोड़े बहुत छोटे छोटे काम बचे थे... दुनिया में टकराव बढ़ रहा था ... मैंने ३० सितम्बर २०४० की डेडलाइन जारी कर दी... 




जारी...






पिछली कड़ियाँ हैं :-

भाग-१ ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '
भाग-२ ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....
भाग-३ और वह भिडंत...
भाग ४ - बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की ! 
भाग-५ और वह रोंगटे खड़े कर देने वाला खौफनाक नजारा...


पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को यथासंभव शीघ्रता से आपको नई किस्त मिले...


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