रविवार, 18 नवंबर 2012

बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की !

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भाग-१ ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '
भाग-२ ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....
भाग-३ और वह भिडंत...

 




अब आगे...


हम अपने देश पहुँचे, रास्ते भर अल्फा सोता ही रहा, बस बीच बीच में खाने-पीने के लिये उठ जाता था वह, जाहिर था कि पिछले कुछ दिनों से शायद सो नहीं पाया था वह...

एयरपोर्ट पर वह बोला " सनी, जाओ और जम कर सोओ, दो दिनों के बाद मिलते हैं एजेंसी में "... " ओ के पॉप " मैंने कहा... और दौड़ता हुआ टैक्सी स्टैंड पहुँचा... मैंने अपने फ्लैट का पता ड्राईवर को बताया और जल्दी से जल्दी पहुँचाने को कहा... मैं फुटबॉल के विश्वकप के फाईनल के टीवी प्रसारण का एक सेकेंड भी मिस नहीं करना चाहता था...

दो दिन बाद मैं घर से एजेंसी के लिये निकला, रास्ते में मैंने समय काटने के लिये रेडियो ऑन किया... अचानक एक खबर ने मेरा ध्यान खींचा, खबर थी...

एक कॉन्फ्रेंस के बाद एक विश्व प्रसिद्ध टूरिस्ट स्पॉट पर छुट्टियाँ मनाने जा रहे 'न्यूक्लियर साईंटिस्ट्स' से भरे एक चार्टर्ड प्लेन  का संपर्क राडारों से टूट गया था, प्लेन में कुल मिलाकर विश्व के विभिन्न देशों के ४३ वैज्ञानिक सवार थे और यह सभी न्यक्लियर रिएक्टर निर्माण व संचालन के विशेषज्ञ थे...

एजेंसी में 'कनेक्शन' मानो मेरा ही इंतजार कर रहा था... "जाओ अंदर जाओ, अल्फा इज वेटिंग फॉर यू " बोला उसने और अपने लैपटॉप पर कुछ काम करने में लग गया...

अल्फा अपनी मेज पर ही नाश्ता कर रहा था... "चाय लोगे, सन्नी" पूछा उसने... मैंने अपने लिये एक कप बनाया और फिर उसके नाश्ते पर नजर डाली... अल्फा का खाना खाने का तरीका सारी एजेंसी में चर्चा का विषय था, वह बहुत-बहुत खाता था... अभी भी उसके सामने कम से कम एक दर्जन अंडों का आमलेट और दस से ज्यादा सैंडविच रखे थे... "यह नाश्ता तुम्हारे लिये कुछ ज्यादा नहीं है, पॉप" मैंने टोका उसे... "हाँ, ज्यादा तो है सन , पर अगर किसी ने बचपन में मेरी तरह फाके किये हों तो भर पेट खाना खाने लायक बन जाने पर वह मेरी तरह ही खाता है"... मैं चुप हो गया, उसके अभावग्रस्त बचपन और जीवन संघर्ष पर दसियों किताबें लिखी जा सकती थीं... "कल लगभग पूरी रात भर जगा रहा मैं, देर से सोया, इसलिये नाश्ता भी देर से ही हो रहा है" बताया उसने...

वह बहुत शान्त सा था... क्या उसने वह खबर नहीं सुनी, पर ऐसा कैसे हो सकता है... मुझसे रहा नहीं गया और आखिरकार मैंने पूछ ही लिया... "खबर सुनी पॉप ?"... उसने ज्यादा गौर नहीं किया मेरी बात पर और बोला 

"आज से तुम मेरे साथ इसी ऑफिस में काम करोगे, और तुम्हारा टास्क होगा 'मिशन-सर्वाइवल ऑफ द रेस' को संभव बनाना... "यह क्या है ?" पूछा मैंने... " यह मेरा मिशन है, 'अल्फा' का मिशन, हमें इसमें कामयाब होना है हर हाल में, आज की तारीख में हमारा आकलन यह है कि अगर यही स्थितियाँ बनी रही तो बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की ! और हमें बचाना है अपनी नस्ल को ....बहुत सा शुरूआती काम हम कर चुके हैं और अब सबसे महत्वपूर्ण और आखिरी काम होने बाकी हैं"... 

"अब बताओ, तुम क्या समझे? "... 

मेरे दिमाग ने अपने सामने की स्थिति का आकलन शुरू किया और थोड़ी देर बाद बोला मैं... " यानी वह तुम्हारे लिये रियेक्टर बनायेंगे ?"... "तुम्हारा कोड नेम 'प्रोफेसर' सही रखा गया है सन्नी, पर वे रियेक्टर मेरे या तुम्हारे लिये नहीं इंसान की नस्ल के लिये बनायेंगे" मुस्कुराते हुऐ बोला वह...

मैं अगले दिन से ही काम में जुट गया... 'अल्फा' ने एक टीम बनायी थी इस काम के लिये... यह एक बहुत बड़ी जिग-सॉ पहेली सा था, जिसे पूरी संपूर्णता में केवल 'अल्फा' ही समझ सकता था... 

मुझे दो मीटिंगों से पहले की तैयारी करनी थी... और इस तैयारी में पूरे पाँच साल लग गये... सन  २०३७  की शुरूआत हो चुकी थी दुनिया में...

२०३१ से २०३७ के बीच की दुनिया की मुख्य घटनायें थीं...

* विश्व के तमाम कच्चे तेल व प्राकृतिक गैस के भंडार २०५० तक पूरी तरह से खत्म हो जाने वाले थे... तेल बेचने से मिले पैसों पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले देशों में पूरी तरह से निराशा घर कर गयी थी।
* विश्व के तमाम देश उर्जा के अन्य स्रोतों जैसे सौर उर्जा, पवन उर्जा, जल उर्जा तथा नाभिकीय उर्जा का अधिकाधिक प्रयोग करने की राह पर थे।
* २०३५ में एशिया की एक महाशक्ति के एक  महानगर में अचानक से विश्व में बहुत पहले खत्म हो गयी बीमारी चेचक का संक्रमण हो गया, बीमारी के टीके विकसित करने में छह माह लगे, तब तक वह बीमारी एक करोड़ सत्तर लाख जानें ले चुकी थी, उस देश की अर्थव्यवस्था कम से कम दस साल पीछे जा चुकी थी...
* लगभग सभी देश नाभिकीय उर्जा से अपनी उर्जा जरूरतें पूरी करने लगे थे, इसी के साथ यह संभावना भी सिर उठाने लगी थी कि नाभिकीय हथियार भी बहुत से ऐसे देशों को सुलभ हो जायेंगे जहाँ उन्मादियों का शासन था।
* २०३७ के आकड़ों के अनुसार दुनिया की ६० प्रतिशत आबादी डायबिटीज, मोटापा, हाइपरटेंशन, हॄदय रोग, गु्र्दा रोग आदि लाईफ स्टाइल डिजीज से ग्रस्त हो चुकी थी... और अधिकाँश मुल्क अपने कुल बजट का ३० प्रतिशत तक बीमारियों से निपटने में खर्च करने लगे थे...
* २०३७ में ही चारों तरफ समुद्र से घिरे, उच्च तकनीक पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले आर्थिक महाशक्ति एक देश ने अपने प्रतिद्वन्दी दो देशों पर यह आरोप लगा सनसनी फैला दी कि २०३७ में ही उसके तटीय इलाकों को तबाह कर देने वाली सुनामी का आना कोई प्राकृतिक घटना नहीं थी, अपितु ऐसा उसके प्रतिद्वन्दी देशों ने समुद्र की तलहटी पर 'कंट्रोल्ड न्यूक्लियर एक्सपलोजन्स' कर इस सुनामी को जन्म दे उसकी अर्थव्यवस्था को क्षति पहुँचाई थी। दोनों ओर से खंडन व मंडन का सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा... 




और वह पहली मीटिंग

वह एक गुप्त जगह थी... उस मीटिंग को 'अल्फा' ने बुलाया था... और वह तीस भी आये थे... वह सभी अपने अपने मुल्कों की खुफिया एजेंसियों के प्रमुख थे... सबसे पहले 'अल्फा' ने अपना प्रेजेंटेशन दिया... सभी मंत्रमुग्ध होकर उसे देखते ही रह गये... कैसे पूरे दो घंटे बीत गये, पता ही नहीं चला... फिर कमरे की रोशनियाँ जलीं और 'अल्फा' की आवाज गूँजी... "तो सज्जनों, हमारे पास ज्यादा समय नहीं है, ज्यादा से ज्यादा चार-पाँच साल और, फैसला आपको करना है क्या आप इंसान की नस्ल को इस तरह खत्म हो जाने देंगे?... वे सभी आपस में चर्चा में लग गये... पंद्रह मिनट बाद एक स्वर में सभी बोले "नहीं !!!"... 

(यह केवल मैं और अल्फा जानते थे कि उनमें से ग्यारह पहले से ही मिशन से जुड़े हुऐ थे)

मुझे इसी क्षण का इन्तजार था... मैंने इंटरकॉम पर आदेश दिया... "तुम्हारा काम अब शुरू होता है, डॉक्टर"... और अपने दो सहायकों के साथ डॉक्टर ने कमरे में प्रवेश किया... एक बड़ी सी ट्रे थी उनके पास... बारी बारी से वे तीनों उन तीसों के पास गये व हरेक की कोहनी के पास की नस में एक चमकीला सा इन्जेक्शन सा लगाया... फिर एक और आदमी आया कमरे में, उसके पास भी एक ट्रे थी, ट्रे में चमकती धातु की कुछ अंगूठियाँ और  ब्रेसलेट थे,...  "आप इनमें से कोई एक पहन सकते हैं, याद रखिये कि किसी भी हाल में इसे उतारना नहीं है, कभी उतारना भी पड़े तो यह कभी भी आपसे तीन फीट से ज्यादा दूर न रहे"... सबने सिर हिलाया, उनमें से कोई भी कभी भी अपनी अंगूठी या ब्रेसलेट नहीं उतारने वाला था।

"अच्छा सज्जनों, फिर आप अपने अपने देश जा बताये तरीके से शिखरवार्ता की तैयारी करिये" अल्फा की आवाज गूंजी...

और हम सभी डाइनिंग एरिया की ओर बढ़ चले, हाथों में हाथ डाले व आपस में मर्दाना मजाक करते हुऐ...





जारी....


पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को यथासंभव शीघ्रता से आपको नई किस्त मिले... आपकी प्रतिक्रियायें अहम हैं क्योंकि वही इस कहानी की भविष्य की दिशा तय करेंगी...अगर आप टिप्पणी कर रहे हैं तो थोड़ा कल्पना को जोर दे यह भी बतायें कि अगर आप इसे लिख रहे होते तो अगली किस्त में क्या होता... तथ्यों को सही रखने के लिये हो सकता है कि मैं पहले के लिखे में कुछ बदलाव भी करूँ, जब भी ऐसा होगा, आपको बताया जायेगा... मुझे पाठकों से फीडबैक की आशा थी, है और भविष्य में भी रहेगी... फीडबैक इस कहानी को बेहतर बना सकता है ऐसा मैं मानता हूँ...


6 टिप्‍पणियां:

  1. कोशिश यह की जाय कि विवरणात्मक अंश किन्ही न किन्ही पात्रों के संवाद के रूप में हों ताकि कहानी का स्वरुप बना रहे !
    अब स्वर्पित चुनौती ले लिए हैं तो झेलिये ......(मैंने कब कहा था :-) )
    बढियां चल रही है विज्ञान कथा

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  2. मुझे तो लग रहा है पूरी कथा लिखी जा चुकी है। शक का आधार यह कि पूरी प्लानिंग के बिना यह मिशन सफल कैसे हो सकता है! रोचकता इतनी कि रूक-रूक कर पढ़ने में खीझ हो रही है। इसे तो पूरा एक साथ पढ़ने में अधिक मजा आता।

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    उत्तर
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      आदरणीय देवेन्द्र जी,

      शायद आप यकीन न करें पर कथा नहीं लिखी गयी है अभी, केवल एक धुंधला सा आईडिया है बस मेरे पास कि इसका अंत कैसे करना है... लैपटॉप पर काम करने की आदत लग जाने के कारण कागज पर अब लिखा भी नहीं जाता... पूरा सप्ताह जब भी समय मिलता है कहानी की अगली किस्त के बारे में सोचता हूँ, और जिस दिन पोस्ट लगाने का मन करता है उसी दिन पोस्ट ड्राफ्ट में ही जाकर लिखता हूँ... यह डर हमेशा बना रहता है कि कुछ विरोधाभास न आ जाये कहानी में इस तरीके से...



      ...

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    2. हम्म..तब तो पोस्ट करने में रिस्क है। ठीक है लिखते रहिए अंत का आइडिया है तो बीच का बाद में (चूक हो जाने पर) संपादित भी किया जा सकता है। इसे बहाने सृजन होगा।

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  3. रोचक, लेकिन अपनी आदत का क्या करें प्रवीण भाई कि कहानी हो या उपन्यास, मजा एक ही सिटिंग में निबटाने में आता है:)
    समापन के बाद एक बार फ़िर से पढ़ेंगे और फ़ीडबैक भी जरूर देंगे।

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