शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

करवाचौथ पर...

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वो
थे
दो
आजाद
परिंदे

जो
अगर
उड़ते
रहते
साथ साथ
देते
एक दूसरे
के
परों को
ताकत

तो
शायद
नाप देते
आसमान

देख लेते
दुनिया को
इस छोर से
उस
छोर तक

पर
उन्होंने
बाँधा
एक दूजे को
इक
रिश्ते की
डोर से

मिल
बनाया
खुद ही
एक नीड़
जिसे
घर कहते हैं
और
वे
खुद
कहलाये
पति-पत्नी

उड़ते
अब भी
हैं
वे
पर
यह
उड़ान
होती है
नीड़ के
इर्द गिर्द
ही

आज
उनमें से
एक
रहेगा
भूखा
निर्जल
पूरे
दिन भर

मन्नत
माँगते
कि
जब भी
साथ छूटे
तो
वही जाये
पहले

रहते
हुऐ
अखंड-सुहागन

मुझे
अच्छा
नहीं लगता
यह
पर्व

मैं
नहीं चाहता
कि
कोई
सोचे तक
भी
मुझे
छोड़
पहले जाने की



जाने क्यों
क्या करूँ
मैं कुछ
ऐसा ही हूँ.... 






...



आज मेरी पत्नी श्री से बहुत बहस हुई... हमारे यहाँ करवा चौथ मनाने की परंपरा नहीं है... परंतु पिछले वर्ष मेरे मना करने पर भी उन्होंने यह व्रत रख लिया... इस बार मेरी ओर से पक्की मनाही है... इसी बहस के बाद उपजे अपने मनोभावों को यहाँ लिख दिया है... बस...



...

30 टिप्‍पणियां:

  1. शुभकामनाएं -

    सामाजिक दुर्व्यवस्था, बिधवा संग बर्ताव ।

    निकृष्टतम होता रहा, रखें लोग दुर्भाव ।

    रखें लोग दुर्भाव, जानवर से भी बदतर ।

    इसीलिए मन-भाव, सुहागिन का यह अक्सर ।

    रहा समय अब बदल, सुरक्षा की गारंटी ।

    इसीलिए पट रही, जमाना बबली-बंटी ।।

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  2. खुशी हो तो किसी पर्व को मनाना बुरा नहीं ..
    कष्‍ट हो तो किसी पर्व को मनाना अच्‍छा नहीं ..

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  3. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  4. बहुत खूब ...
    बढ़िया स्नेह अभिव्यक्ति !

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  5. उड़ उड़ कर हम क्या पायेंगे,
    अपने में बहते जायेंगे,
    संग रहें, समरंग रहें,
    पथिक बने प्रभु घर आयेंगे ।

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  6. पिछली बार इस शिकायत से आप की पोस्ट से गई थी की आप सवालो के जवाब नहीं देते है आज इस पोस्ट पर आई हूँ क्योकि आप ने मेरे बिना पूछे ही मेरे एक सवाल का जवाब दिया :)

    सुबह महीने भर से बीमार चल रही छोटी बहन के पति को फोन किया ये सोच के की यदि वो आज व्रत होगी तो उसके पति की अच्छी खबर लुंगी, हफ्ते भर पहले ही इसके लिए मुझसे डांट खा चुकी बहन ने फोन उठाया और कहा की पति देव ने सख्त मना किया है व्रत रखने से सो नहीं रख रही हूँ । तब मेरे दिमाग में यही ख्याल आया था की वो कैसे पति होते है जो पत्नी के इस कामना से व्रत रखने पर की मै पति से पहले मर जाऊ और वो पति शाम को उसके पैर छुने पर उसके व्रत के सफल होने का आशीर्वाद देता है , की हा ठीक है मुझसे पहले तुम मर जाना , वाह रे पति परमेश्वरजो अपने पत्नी का कभी जीवन साथी नहीं बना पाता है :(

    और तर्क देंगे सब के सब पत्नी की ख़ुशी उसका विश्वास आदि आदि एक बार वो इस कामना से व्रत रख देखे कैसे कोई भी पत्नी उन्हें ये व्रत न रखने देने के लिए क्या क्या कर गुजरती है ।

    वैसे आप की जगह मै होती तो पत्नी से कहती की यदि वो इसलिए व्रत रखेगी की वो मुझसे पहले मर जाये तो मै भी व्रत रखूँगा की मै उससे पहले मर जाऊ, फिर देखते पत्नी जी पर असर :)

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    उत्तर
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      @वैसे आप की जगह मै होती तो पत्नी से कहती की यदि वो इसलिए व्रत रखेगी की वो मुझसे पहले मर जाये तो मै भी व्रत रखूँगा की मै उससे पहले मर जाऊ, फिर देखते पत्नी जी पर असर :)


      ... :))



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    2. आइडिया बढ़िया है अंशुमाला जी

      आपकी बात से याद आया इस मामले में कुछ वाकये जो अभी हाल ही मेरी जानकारी में आये उनमें एक बात कोमन थी, बहू का कन्फ्यूज होकर सास से व्रत करने या नहीं करने के बारे में पूछना और सास का कहना की स्वास्थ्य ठीक ना होने पर व्रत नहीं करना चाहिए। ये एक बहुत अच्छी बात मुझे लगी इसलिए यहाँ इस बात को कह रहा हूँ।

      एक सवाल उठना स्वभाविक है की ये व्रत महिलाओं के लिए ही क्यों ? जवाब ढूंढना बहुत मुश्किल तो नहीं लेकिन इस पर थोड़ी और जानकारी जुटानी होगी जो की अभी समयाभाव से संभव नहीं। सिर्फ कथाओं के आधार पर किसी भी बात की आलोचना का उसकी तारीफ़ करना समय की बर्बादी ही मानता हूँ इसलिए कुछ नहीं कहूँगा |

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  7. बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति .पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब,

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  8. बराबरी तो वहीं खत्म कर दी जाती है जब फेरो के समय वधू से वर के पैर छूने को कहा जाता है।शादी की सालगिरह मना लो वो सही है लेकिन ये करवा चौथ तो बिल्कुल सही नहीं लगता ।और ऐसा कुछ नहीं है कि सभी पुरुष कोई जबरदस्ती करने को कह रहे हैं या उन्हे ये सब अच्छा लगता ही है।बस रिवाज चलता आ रहा है इसलिए सब कर रहे हैं ।सच तो ये है कि अधिकाश पुरुषो की इस बारे में कोई राय ही नहीं होती।हमारे यहाँ यही माना जाता है कि अधिकतर व्रतादि करना महिलाओं का ही काम है इसलिए पुरुष वैसे ही ध्यान नहीं देते।ये सब बन्द भी हो जाए कम से कम शहरो में तो जैसे इसी तरह के और कई व्रत और त्योहार लगभग बंद हो चुके हैं लेकिन बाजार और मीडिया इन्हें भाव देता रहता है ।कुछ पुरुष भी ये व्रत करने लगे हैं पर मुझे ये भी सही नहीं लगता ।मैं जब आस्तिक था (सच तो ये है कि मै तब भी भगवान के अस्तित्व के प्रति संदेह रखता था) तभी कभी कोई व्रत नहीं किया तो अब क्यों करूँ ऐसे ही मैं नहीं चाहूँगा कि मेरे लिए कोई ये व्रत रखे और पैर तो मुझे लगता है किसी बहन या बेटी को बडे भाई या पिता के भी नहीं छूने चाहिए पति तो दूर की बात।

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  9. आभारी है पति-जगत, व्रती-नारि उपकार ।
    नतमस्तक हम आज हैं, स्वीकारो उपहार ।।

    (महिमा )
    नारीवादी हस्तियाँ, होती क्यूँ नाराज |
    गृह-प्रबंधन इक कला, ताके सदा समाज ||

    मर्द कमाए लाख पण, करे प्रबंधन-काज |
    घर लागे नारी बिना, डूबा हुआ जहाज ||

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  10. परिहास

    जली कटी देती सुना, महीने में दो चार ।

    तुम तो भूखी एक दिन, सैंयाँ बारम्बार ।

    सैंयाँ बारम्बार, तुम्हारे व्रत की माया ।

    सौ प्रतिशत अति शुद्ध, प्रेम-विश्वास समाया ।

    रविकर फांके खीज, गालियाँ भूख-लटी दे ।

    कैसे मांगे दम्भ, रोटियां जली कटी दे ।।

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  11. आज दिनों बाद भटक रहा हूँ अपने प्रिय ब्लौगो पर...कैसे हैं सर? अच्छा लग रहा है आपकी नियमितता देखकर...

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    उत्तर
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      प्रिय गौतम,

      आपको पढ़ना मुझे भी बहुत अच्छा लगता है, काफी समय से आप नियमित रूप से सक्रिय नहीं थे, आपको मिस किया... आशा है अब आप भी नियमित रह पायेंगे...


      ...


      ...

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  12. :)) बहुत अच्छी लगी आपकी रचना !
    और भी ऐसे पति हैं...जो आप जैसा ही सोचते हैं... :)
    अब अपनी पत्नी जी को मना भी लीजिए...! उन्होनें अपना काम किया...आप अपना काम करिए... :)
    ~सादर !

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  13. अनंत ब्रह्माण्ड की तरह , दिख गया आपके मन में भरा अनंत / अखंड प्रेम - इन चंद लाईनों की बदोलत , इश्वर की कृपा सदा आपके परिवार पर बनी रहे ,

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  14. प्रवीण शाह जी मैँ वरुण कुमार साह मैने कई ब्लोग के पोस्ट एक ही जगह पढे जा सके ईसलिए sanatanbloggers.blogspot.com एक ब्लोग बनाया आप भी इस ब्लोग मेँ अपनी पोस्ट करे इसके लिए लिए आप ब्लोग के लेखक बन जायेँ ये ब्लोग आपकी जरा भी समय नही लेगी क्योकि आप जो पोस्ट अपने ब्लोग पर लिखते हैँ उसकी प्रतिलीपी इस पर करना हैँ यहाँ पर अन्य आप के तरह ब्लोगर के साथ आपके पोस्ट भी चमकेँगी जिससे आपके ब्लोग कि ट्रैफिक तो बढेगी साथ ही साथ जो आपके ब्लोग को नही जानते उन्हे भी आपकी पोस्ट पठने के साथ ब्लोग के बारेँ मे जानकारी मिलेगी पोस्ट के टाईटल के पहले बाद अपना नाम अपने ब्लोग का नाम और फिर अंत मे अपने ब्लोग के बारेँ मे दो लाईन लिखे इससे ज्ञानोदय तो होगा ही और आप ईस मंच के लिए भी कुछ यहाँ पर पोस्ट कर पायेँगे।

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  15. कवि की यह सोच उसकी मानवीयता के चलते है किन्तु हालात अभी भी ऐसे हैं कि जाना ही उसका उसके खुद के लिए मोक्ष पा जाना है -वैसे भी साथ साथ जाने का कोई विधान नहीं है !

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  16. एक दम सच - सच बताइये मुद्दा व्रत है या करवा चौथ का व्रत ? जहां तक मैं आपके ब्लॉग के माध्यम से आपको समझ पाया हूँ आप व्रत आदि में भी यकीन नहीं रखते ।

    अपने पिछले कमेन्ट में कुछ सुधार करते हुए उम्मीद कर रहा हूँ आपका उदेश्य 2 नवम्बर के दिन ही कोई वैज्ञानिक(?) बहस छेड़ना नहीं रहा होगा

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    1. नहीं नहीं!!, ऐसे वैसे कोई उद्देश्य नहीं है……… :)
      गौरव जी,
      प्रवीण जी तो हिंसा वाली आस्थाओं को भी चोट नहीं पहुँचाते तो इस चौथ का क्या सकाल व्रत खण्ड़न करेंगे? :)
      आपका स्पष्ट मत है… "मेरा हमेशा से मानना रहा है और यह सही भी है कि हमारे धार्मिक विश्वास-आस्थाओं-परंपराओं को तर्क के तराजू पर तौल कर नहीं आंका जा सकता"
      हमारा तुम्हारा में क्या अन्तर है यह तो मुझे भी नहीं पता…… :(

      हटाएं
    2. .
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      मित्र गौरव,

      मैं व्रत-उपवास में यकीन नहीं रखता और नहीं चाहता कि मेरी पत्नि भी कम से कम मेरे कुशल-मंगल की कामना के लिये तो कोई उपवास या व्रत न ही करें... इसीलिये करवाचौथ को हम में बहस हुई और नाश्ते की मेज पर उनको दो पराठे अपने सामने खिलाने के बाद ही मैं १५ मिनट देर से ऑफिस गया... उनको समझाने के लिये जो बोला वही चंद लाइनों में इस पोस्ट में लिख दिया...


      @ आदरणीय सुज्ञ जी,

      आप एक महामना हैं... अगर आप कुछ कह रहे हैं तो निश्चित तौर से यह निष्कर्ष या राय आपने अपनी समझ व सुविधा से ही निकाले होंगे... मेरे कुछ भी कहने से कुछ भी बदलने वाला नहीं... इसलिये मैं कुछ नहीं कहूँगा यहाँ पर...


      ...

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    3. @ आदरणीय प्रवीण जी,
      अरे बंधु, महामना जैसा कुछ भी नहीं बस गलतियों का पुतला भर, प्रयास में कि फिर फिर गलतियाँ न हो :)
      निष्कर्ष मेरी समझ पर आधारित अवश्य है पर इस में सुविधा जैसा कुछ भी नहीं :)

      हटाएं
  17. बहुत सी बातें हैं
    1. वैसे यह व्रत हम लोग रखें या न रखें - कम से कम यह रखते हुए हम सिर्फ अपने आप को ही तकलीफ देते हैं , किसी और प्राणी को तो नहीं देते ।

    2. किन्तु मैं चकित इस बात से हूँ, की अभी दस दिन भी नहीं हुए, आपने निरामिष पर मेरी एक पर (जो क़ुरबानी पर प्रश्न कर रही थी) रचना जी की आपत्ति के समर्थन में यह कहा था कि त्यौहार के दिन ऐसा पोस्ट लिखना धार्मिक आस्थाओं को चोट पहुंचाएगा - कहा था न ?
    आपके शब्द :
    .
    आदरणीय शिल्पा जी,
    आप एक विदुषी महिला हैं परंतु आपके आज के इस आलेख पर रचना जी की टिप्पणी की भावना से सहमत होना मुझे उचित लग रहा है।
    :
    और रचना जी की टिप्पणी की भावना थी : "मैने पोस्ट के जिस समय वो पब्लिश की गयी हैं उस समय की बात की हैं . बहस करने के लिये त्योहार का समय ही क्यूँ ?"

    :)
    प्रवीण जी - आपने ही तो ब्लॉग जागत के दोहरे मानकों पर प्रश्न करते हुए पोस्ट लिखी थी न ? :) :)
    --------------
    3. नहीं - मुझे नहीं लगता की आप "double standards " रखते हैं । होता यह है कि जब कोई भी बात हमारे अपने गहरे विश्वासों से टकराती है - तो हमें तकलीफ होती है - जैसे भाभीजी के करवाचौथ व्रत करने से आपको हुई । तब हम उसका अनायास ही विरोध करते हैं । यह कोई दुर्भावना नहीं होती - हम वही कहते (और करते) हैं जो हमारा अंतर्मन हमें कहे ।
    ... या हम कभी चुप भी रह जाते हैं क्योंकि हम जानते हैं की जो हम कहेंगे या करेंगे वह हमारे किसी अपने को चोट पहुंचाएगा । भले ही हमें वह ठीक न भी लगे -- फिर भी हम उनकी ख़ुशी के लिए चुप रह जाते हैं । परन्तु जब यह बहुत गहरे विश्वासों से टकराता है - तो हम चुप रह नहीं पाते ।
    ------------------
    4. अब पोस्ट के विषय पर :
    करवाचौथ :
    यह त्यौहार / व्रत शुरू तब हुआ था जब समाज के सन्दर्भ अब से बहुत अलग थे । जब स्त्री का जीवन और उसकी सामाजिक स्थिति, सुख, दुःख सब कुछ पूरी तरह पति पर निर्भर था । तब जब पति युद्ध पर जाते - तो स्त्री विधवा होने के terror में रहती थी ।
    तो शायद यह व्रत किसी ने किया होगा - और पति शायद किसी बड़ी समस्या से बच गया हो ? तो यह परम्परा चल पड़ी हो ? फिर आगे देखा देखि में तो समाज भेडचाल से चलता ही है - यह हम सभी जानते हैं ।
    फिर उसमे कहानियाँ जोड़ दी गयी होंगी - कि कैसे किसी स्त्री ने व्रत नहीं किया और उसका पति मर गया । तो ले दे कर एक अंधविश्वास सा बन गया की यदि व्रत न किया जाए तो पति के जीवन पर संकट होगा, और किया जाए तो पति deerghaayu होवे :)

    अब - जो आज इसका विरोध कर रहे हैं - वे सही हैं - क्योंकि हम जानते हैं कि एक व्यक्ति के भूखे रहने से दुसरे के जीवन पर कोई प्रभाव नहीं होता । ऊपर से हम अपने ही धर्म के अनुसार यह कहते हैं की प्रत्येक व्यक्ति के जन्म के समय ही यह तय होते है कि उसकी मृत्यु किस घडी होगी । तब आश्चर्य है कि अपने ही विश्वास को अपने ही अंधविश्वास से छला जाता है ।

    कई स्त्रियाँ मानती / jaanti भी हैं कि यह मूर्खता है - किन्तु उनके प्रेम ने उन्हें बाँध रखा है । यदि व्रत न करें - तो परिवार के उम्रदराज़ जन (जैसे सास) (और शायद पति खुद भी?) जो इसमें विश्वास रखते हैं - साल भर उसके पति के जीवन के प्रति आशंकित रहेंगे । तो - उसे लगता है कि सबको इतनी चिंता देने से अच्छा है कि एक दिन भूखे रह लिया जाए :)

    ऊपर से आजकल के so called news channels इसे खूब glamourize करते हैं .... :( जबकि सही मायनों में उन्हें ही समाज को educate करना चाहिए ।

    बहरहाल मुझे तो लगता है कि और 2-3 पीढियां बीतते बीतते यह रिवाज़ काफी कम हो जाएगा । यहाँ कर्नाटक में तो करवा चौथ का कोई रिवाज़ है ही नहीं - मेरी फ्रेंड्स तो खूब हंसती हैं इस रिवाज़ पर ।

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    उत्तर
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      आदरणीय शिल्पा जी,

      ... :)

      मेरी यह पोस्ट केवल और 'केवल' एक अतुकान्त कविता है... और वह भी मेरे एक नितांत निजी भाव को बताती हुई...

      "मैं
      नहीं चाहता
      कि
      कोई
      सोचे तक
      भी
      मुझे
      छोड़
      पहले जाने की"

      न यहाँ किसी व्रत-परंपरा का विरोध है... और न ही समर्थन ही... और स्वयं के सही होने का भी मैं कभी दावा नहीं करता... मेरी समझ में इस पोस्ट को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले रहे हैं कुछ पाठकगण... जबकि यह उसकी हकदार नहीं है...



      ...

      हटाएं
    2. शिल्पा जी की प्रतिक्रिया का इंतजार था .. जैसा सोचा था उससे भी बेहतर ढंग से आपने अपनी बात अभिव्यक्त की है .. बधाई !

      हटाएं
  18. @शिल्पा जी,
    बिल्कुल सहमत हूँ आपकी बातों से।धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  19. साथ साथ उड़ान भरिए. दोनों का लम्बा सुखमय जीवन हो. आपके भाव पढ़कर अच्छा लगा.
    घुघूती बासूती

    उत्तर देंहटाएं

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