गुरुवार, 22 नवंबर 2012

एक आवश्यकता का आविष्कार थे बालासाहब ठाकरे...

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सत्रह नवम्बर को मुम्बई का शेर चला गया हमेशा हमेशा के लिये... अब फिर वह दहाड़ नहीं सुनाई देगी... बालासाहब ठाकरे का विरोध करना बहुत आसान था, है, फैशनेबल भी है और बड़ी आसानी के साथ आपको प्रगतिशील सोच रखने वाले के तौर पर स्थापित भी कर देता है... पर मुझे लगता है बालासाहब ठाकरे का असली मूल्यांकन उनके जाने के बाद ही हो पायेगा... वह अपने दौर की जरूरत थे और भारत को आगे भी बहुत सारे बाला साहबों की जरूरत होगी, हर प्रान्त में... यह अलग बात है कि वह मिलें या नहीं...

१९ जून १९६६ को मुंबई की नौकरियों में गुजरातियों व दक्षिण भारतीयों के बढ़ते वर्चस्व के विरूद्ध मराठियों को वरीयता देने के मुद्दे पर उन्होंने शिव सेना की स्थापना की... उनका मानना था कि मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी है अत: मुंबई का मूलत: मराठी चरित्र व मिजाज बरकरार रहना चाहिये... यह किसी भी तरीके से एक नाजायज माँग नहीं थी... यह बात और है कि ऐसा कहने से वे मीडिया के एक बड़े वर्ग के निशाने पर आ गये... पर ठाकरे अपने विश्वास और माँग पर अंत तक कायम रहे... कालांतर में इस तरह की माँग कई जगहों से उठी और आगे भी उठती रहेगी... आज जब मेरे उत्तराखन्ड के अधिकाँश शहर व कस्बे अपना मूलत: पहाड़ी चरित्र व मिजाज खोकर दिल्ली जैसा लगने लगे हैं तो कभी कभी शिद्दत से हूक उठती है कि काश हमारे प्रदेश में भी एक बाल ठाकरे होता जो ऐसा होने को रोक लेता...

बालासाहब के निधन पर प्रधानमंत्री ने कहा कि "ठाकरे के लिए महाराष्ट्र के हित खास तौर से महत्वपूर्ण थे और वह हमेशा इसकी जनता में गौरव की भावना पैदा करने के उत्सुक रहे।"  लगभग यही बात द्रमुक प्रमुख एम करूणानिधि ने भी कही कि "ठाकरे के लिए उनके राज्य के लोगों के हित ही सर्वोपरि थे।"...  इन हितों को साधने के उनके तौरतरीकों पर सवाल उठाये जा सकते हैं लेकिन मंशा पर नहीं...

बाद में बालासाहब ने हिंदू अस्मिता के मुद्दे भी उठाने शुरू किये, उन्होंने हिंदुत्‍व की बात की और खुलकर कहा  कि वो हिंदूवादी हैं। उन्होंने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने का विरोध किया और इसी के चलते अपने अहम सिपहसालार छगन भुजबल को गंवाया भी... पर यह बाल ठाकरे की शख्सियत ही है कि वो कभी कुछ कहकर पलटे नहीं... बाल ठाकरे के लिये सत्ता ही एकमात्र लक्ष्य नही था, उनकी राजनीति स्वत;स्फूर्त थी , वे अपने समर्थकों के दिल-दिमाग पर एकछत्र राज करते थे... उनके व्यक्तित्व को, तौर तरीकों को और उनके असर को भी सामान्य राजनीतिक पैमाने पर मापना व परखना बेमानी होगा और मूर्खतापूर्ण भी...  उनमें एक दुर्लभ और आजकल लुप्तप्राय: किस्म की ईमानदारी थी... उनकी सोच और कार्यों में कभी कोई लाग-लपेट नहीं दिखा,  उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं... वे आज की राजनीति में एक अपवाद से थे... उन्हें न संसद जाना था, न मुख्यमंत्री बनना था, न उन्हें स्वयं के लिये सम्मान चाहिये थे... वह अपने विचारों व विश्वास के प्रति गजब के आस्थावान थे...

बालासाहब ने शिवसेना को एक आक्रामक दल की छवि दी... वे हिन्दू हित की बात करते थे... और आज की राजनीति में हिन्दू हितों की वोटों के चलते अक्सर बलि दे दी जाती है... मुंबई में हिन्दू हित की बात करने वाला कोई भी दल आसानी से बुलडोज कर जमींदोज कर दिया जाता अगर उनकी बनाई शिवसेना इतनी आक्रामक नहीं होती तो उसकी भी यही गत कर दी जाती ... 

आपने वह कहानी जरूर सुनी होगी जिसमें एक शरीफ आदमी का एक परिवार एक मौहल्ले में रहता है उसके चार बच्चे हैं दो लड़के और दो लड़कियाँ... सबसे बड़ा लड़का भी निहायत शरीफ और दब्बू है... दोनों लड़कियाँ बड़ी हो रही हैं और मोहल्ले के मवाली आते जाते उनको तंग करते रहते हैं... शिकायत करने पर भी नेता-पुलिस-प्रशासन बस गाल बजाई करते हैं, होता कुछ नहीं... परिवार बस्ती छोड़ने का मन बना रहा है... अचानक एक दिन चमत्कार होता है घर का सबसे प्रतिभावान छोटा लड़का अपनी बहनों की रक्षा के लिये हथियार उठा लेता है और एक गुन्डे को मार देता है और दो को अस्पताल भेज देता है... अदालत-पुलिस की नौटंकी के बाद जब वह घर आता है, तो वह भी एक मवाली हो चुका होता है... शरीफ और दब्बू बड़ा लड़का अपने पिता से अपने 'मवाली' छोटे भाई को घर से निकाल बाहर करने को कहता है तो पिता कहता है "यह ठीक है कि तेरा भाई आज एक शरीफ नहीं रहा, पर आज के दिन वह मुझे तुझ से ज्यादा प्यारा है, उसकी बगावत तेरी शराफत से ज्यादा कीमती है, कम से कम उसके चलते तेरी बहनें और माँ चैन से सर उठा जीते तो हैं, किसी की हिम्मत तो नहीं होती उनका अपमान करने की" 

बालासाहब भी हिन्दुस्तान के एक गरम मिजाज, बगावती और आक्रामक बेटे थे... उनकी यह आक्रामकता केवल और केवल इसलिये थी क्योंकि इसकी भी एक जरूरत थी उनके दौर के मुंबई, महाराष्ट्र और हिन्दुस्तान को... भारत को यदि अपना भारतीय और मूलत: हिन्दू चरित्र व मिजाज बरकरार रखना है तो आने वाले समय में बहुत से बालासाहबों की जरूरत पड़ने वाली है, ऐसा मुझे लगता है ...


बालासाहेब, 
आपको प्रणाम और अश्रुपूरित श्रद्धाँजलि भी... 



मुझे आप बहुत प्यारे थे, बाकी कईयों से बहुत बहुत ज्यादा ...







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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही रोचक विश्लेषण, ये प्रश्न सदा ही रहेंगे, एकता और फिर भी पृथकता..

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  2. पूर्वाग्रहरहित आलेख।
    यदा कदा क्षेत्रीय या राष्ट्रीय अस्मिता के लिये बगावती तेवर और स्वाभिमान दिखाते और भी व्यक्तित्व राजनीति में आते रहे हैं लेकिन कभी सत्ता का सुख और कभी सत्ता न मिलने का दुख उनके मन, वाणी और कर्मों को प्रभावित कर देता रहा।

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