रविवार, 25 नवंबर 2012

और वह रोंगटे खड़े कर देने वाला खौफनाक नजारा...

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गताँक से आगे...

शिखरवार्ता



वह २०३७ का सितम्बर का महीना था, जब दुनिया के ३० असरदार देशों के शीर्ष नेता जुटे थे उस शिखरवार्ता के लिये, मेरे देश की राजधानी में... एजेंडा था 'विश्व शांति'... पहले तीन दिन जमकर भाषणबाजी हुई, प्रेस वार्ताओं का दौर चला, विश्वशाँति के लिये अपने प्रतिद्वन्दी या शत्रु देशों को सबसे बड़ा खतरा बताया गया कईयों के द्वारा तथा यह चेतावनी भी दी गयी कि शाँति बनाये रखने की जिम्मेदारी बयान देने वाले नेता के देश की नहीं अपितु विश्व समुदाय की है... उधर एजेंसी में हम सभी चौथे दिन की तैयारी में लगे थे...




वह चौथा दिन

दुनिया को यह कहा गया कि आज के आखिरी दिन सभी शीर्ष नेता बंद कमरे में केवल अपने खासमखास सहायकों के साथ एक दूसरे के साथ 'वन टू वन' वार्ता करेंगे और मुद्दे सुलझाने का प्रयास करेंगे... और वह खास मीटिंग शुरू हुई... एक बड़ी सी गोल मेज के चारों ओर बैठे थे तीसों राष्ट्राध्यक्ष और उनसे थोड़ा पीछे उनसे सटी कुर्सी पर उनके खुफिया एजेंसी प्रमुख... हमारे राष्ट्रपति ने एक छोटा सा संबोधन देकर स्टेज अल्फा को सौंप दिया...

अल्फा ने फिर वही दो घंटे का प्रेजेंटेशन दिया जिसमें बताया गया था कि किस तरह इंसान की नस्ल अगले कुछ सालों में खत्म हो सकती है और उसके बाद 'मिशन- सर्वाइवल आफ द रेस' के बारे में बताया गया... मैं देख रहा था कि कुछ राष्ट्राध्यक्ष तो पूरी उत्सुकता से इसे देख रहे थे... कुछ उबासियाँ भरते भी दिखे... और चार पाँच ऐसे भी थे जिनके चेहरे पर यह सब देखने के बाद एक जहरीली मुस्कान चिपक सी गयी...

पर इस बार अल्फा ने अपना प्रेजेंटेशन देने के बाद स्टेज नहीं छोड़ा बल्कि एक वीडियो दिखाने लगा... यह सभी वीडियो पिछले आठ महीनों में अलग-अलग मुल्कों में अलग-अलग जगहों पर खींचे गये थे... और यह राष्ट्राध्यक्षों के मेज पर बैठने के क्रम में ही था... बारी बारी से बड़ी स्क्रीन पर सभी राष्ट्राध्यक्षों को बिस्तर पर लेटे हुऐ तथा उनकी कोहनी के पास की नस पर किसी डॉक्टर को एक चमकीला सा इंजेक्शन सा लगाते हुऐ दिखाया गया... वीडियों में अपने को देखते ही एक ने अपने खुफिया एजेंसी प्रमुख को फाड़ खाने वाली नजरों से देखा... स्टेज से अल्फा ने मुस्कुराते हुऐ कहा " कृपया किसी पर गुस्सा न करिये, वे सब मजबूर थे "... अब कई गहरी चिंता में पड़ गये... आखिरकार वीडियो खत्म हुआ तो उनमें से चार-पाँच दहाड़े " क्या है इस सब का मतलब ? "

इस बार अल्फा सीरियस हो गया और उसने एक अगला वीडियो दिखाना शुरू किया... स्क्रीन पर वही चमकीला इंजेक्शन दिखाई दिया और कैमरे ने उसकी पारदर्शी सुई पर फोकस किया... सुई के बीच में हल्के गुलाबी रंग का कुछ था...वह आलपिन के सिर का भी आधा ही रहा होगा आकार में... यह एक 'बायोअल्ट्रामाइक्रोरोबोटिक यंत्र' है... इसे किसी भी इंसान की किसी भी नस के अंदर प्रवेश करा देने के तीन घंटों के अंदर यह स्वयंमेव उसके दिमाग की रक्तवाहिनियों तक पहुँचकर वहाँ अपने को जमा लेता है...और यह हमारे केंद्रीय नियंत्रण कक्ष द्वारा नियंत्रित है... यह इस प्रकार के मटीरियल से बनाया गया है कि आज की तारीख में हमारे सिवाय दुनिया में किसी के पास वह तकनीक नहीं है कि किसी के शरीर के भीतर इसकी मौजूदगी को डिटेक्ट तक कर सके... अब अल्फा ने मुझे इशारा किया...

मेरे हाथ में एक हैंड-हैल्ड स्कैनर था... मैंने बारी बारी से उसे सभी नेताओं के चेहरे के सामने रखना शुरू किया और उधर बड़ी स्क्रीन पर बारी बारी से उनका कपाल और कपाल के बीच में एक चमकता बिन्दु दिखाई देना शुरू हो गया... अब उनमें से कुछ पसीने से भीग चुके थे जबकि हॉल का तापमान १७ डिग्री सेल्सियस था...

"आगे बताओ"... बुझी सी आवाज में उनमें से कुछ बोले...

" यह सब यह बताने के लिये कि हमारा यह अनूठा यंत्र आप लोगों के मस्तिष्क में स्थापित हो गया है, इसमें किसी को कोई शक न रहे" अल्फा की आवाज गूंजी...



और वह खौफनाक नजारा


 "अब मैं दिखाउंगा कि हमारा यह यंत्र क्या क्या कर सकता है" अल्फा बोला... और स्क्रीन पर एक और वीडियो चालू हो गया... अल्फा ने अपने हाथ में पकड़े रिमोट का बटन दबाया और चलता हुआ वीडियो रूक गया बीच में ही... "सबसे पहले आप सब को यह भरोसा दिलाने के लिये कि यंत्र आपके दिमाग के भीतर लगा है और काम भी कर रहा है, मैं आपको थोड़ा कष्ट दूँगा मात्र पाँच मिनट तक" और उसने ईशारा किया... अचानक विश्व के वह तीसों शीर्ष नेता अपनी आँखें झपकाने लगे, सामान्य आँखें झपकने से फर्क यह था कि एक साथ सबकी पहले बाँयी आँख झपकी और फिर दाहिनी... झपकने की रफ्तार धीरे धीरे बढ़ती रही, पाँच मिनट पूरे होने तक आप इसे आँखों का झपकना नहीं, बल्कि एक अविश्वस्नीय रफ्तार से फड़फड़ाना कह सकते थे... ठीक पाँच मिनट बाद सब सामान्य हो गया लेकिन वह सभी काफी समय तक अपनी आँखों व सिर को मलते रहे... डर उनके चेहरों से साफ झलक रहा था...

"यह सिर्फ इसलिये कि आप मेरी बातों का भरोसा करें" कहा अल्फा ने... और फिर से वीडियो को चालू कर दिया... सामने एक आदमी था... " यह हमारे देश का एक शत्रु है जिसके फैलाये आतंक ने हमें बहुत नुकसान पहुँचाया, इसे जीने का कोई हक नहीं, हमें इसे मारना ही था इसलिये सोचा कि क्यों न अपने वीडियो का हीरो इसी को बना लिया जाये" अब गंभीर था अल्फा...

"सज्जनों, हार्ट अटैक का दर्द मानव को अनुभव होने वाले सबसे तेज दर्दों में गिना जाता है, पर इस यंत्र के जरिये हम अपने शिकार को इस से भी कई हजार गुना तेज दर्द दे सकते हैं" यह देखिये... और अचानक वीडियो पर दिखता आदमी बेहद दर्द में अजीबोगरीब तरीके से अपने शरीर को मोड़ने तोड़ने लगा, उसने अपने हाथ की उंगलियाँ मुँह के अंदर डाल दीं और एक झटके में ही दो उंगलियाँ अपने ही शरीर से अलग कर दीं... वीडियो यहीं पर बंद हो गया... "चार पाँच सेकेंड भी इस दर्द को झेलने के बाद पंद्रह दिन तक इंसान आइने में अपने आप को पहचानने लायक भी नहीं रहता" अल्फा का स्वर गूँजा...

"इस यंत्र को हमने विस्फोटक क्षमतायुक्त भी बनाया है, अगर हम हल्का विस्फोट करें तो दिमाग की रक्तवाहिनियाँ फटेंगी और 'ब्रेन हैमरेज' से मौत होगी, जैसी 'मुल्कविशेष' के पागल कुत्ते की हुई थी... और"... वीडियो फिर चालू हो गया, स्क्रीन पर वही पहले वाला आतंकी था... " अगर हम उच्च शक्ति का विस्फोट करें तो" अल्फा का चेहरा भावशून्य था... अचानक स्क्रीन पर दिख रहे आतंकी की खोपड़ी एक धमाके से उड़ गयी, सरविहीन शरीर काफी देर तक हरकत करता रहा...

पूरे हॉल में सन्नाटा था... अल्फा ने मुझे ईशारा किया... मैंने फोन पर कुछ निर्देश दिये... और एक बड़ी सी ट्रे में सुनहरे ब्रेसलेट व अंगूठियाँ लिये एक शख्स हॉल में आया... " यह अंगूठी या ब्रेसलेट आपको पहनने हैं, आपके पल-पल की खबर हमें इनसे मिलती रहेगी, किसी भी हाल में इनको अपने शरीर से तीन फुट से ज्यादा दूर नहीं होने देना है, ऐसा होते ही आपके दिमाग में जमे यंत्र में स्वयम ही विस्फोट हो जायेगा" बोला अल्फा... और जल्दी से जल्दी अंगूठी या ब्रेसलेट पहनने के लिये भगदड़ सी मच गयी...

यह सब हो जाने के बाद उनमें से दो-तीन से साहस जुटा पूछा " क्या चाहते हो हमसे"... अब पहली बार अल्फा मुस्कराया, एक गर्वीली व आश्वस्त मुस्कान थी वह " ज्यादा कुछ नहीं, केवल दो चीजें, पहली अगले चार साल तक किसी भी हाल में कोई मिसएडवेंचर नहीं और दूसरा 'मिशन-सर्वाईवल ऑफ द रेस' को सम्पूर्ण सहयोग तन-मन और धन का, मेरे ख्याल से कुछ ज्यादा नहीं मांग रहा मैं"...

अब बारी हमारे राष्ट्रपति की थी " यह देखना हमारा काम है कि अगले चार सालों तक आपलोग ही सत्ता में रहें, चाहे इसके लिये हमें आपके पड़ोसी से युद्ध की धमकी दिलानी पड़े या भूकंप-सुनामी पैदा करने पड़ें, यह हम पर छोड़ दीजिये "

इसी के साथ शिखरवार्ता समाप्त हो गयी...



बाद में


वह तीसों अगले दिन हमारे देश के एक खूबसूरत रिसोर्ट पर पिकनिक मनाने चले गये... सारे मीडिया में उनकी मित्रवत बॉन्डिंग के चर्चे थे...


और 'मिशन-सर्वाइवल ऑफ द रेस' अपने सबसे महत्वपूर्ण दौर में पहुँच चुका था...अब हमें दिन-रात भी कम पड़ने वाले थे काम करने को...








जारी....



पिछली कड़ियाँ हैं :-

भाग-१ ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '
भाग-२ ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....
भाग-३ और वह भिडंत...
भाग ४ - बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की ! 


पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को यथासंभव शीघ्रता से आपको नई किस्त मिले... आपकी प्रतिक्रियायें अहम हैं क्योंकि वही इस कहानी की भविष्य की दिशा तय करेंगी...अगर आप टिप्पणी कर रहे हैं तो थोड़ा कल्पना को जोर दे यह भी बतायें कि अगर आप इसे लिख रहे होते तो अगली किस्त में क्या होता... तथ्यों को सही रखने के लिये हो सकता है कि मैं पहले के लिखे में कुछ बदलाव भी करूँ, जब भी ऐसा होगा, आपको बताया जायेगा... मुझे पाठकों से फीडबैक की आशा थी, है और भविष्य में भी रहेगी... फीडबैक इस कहानी को बेहतर बना सकता है ऐसा मैं मानता हूँ...


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गुरुवार, 22 नवंबर 2012

एक आवश्यकता का आविष्कार थे बालासाहब ठाकरे...

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सत्रह नवम्बर को मुम्बई का शेर चला गया हमेशा हमेशा के लिये... अब फिर वह दहाड़ नहीं सुनाई देगी... बालासाहब ठाकरे का विरोध करना बहुत आसान था, है, फैशनेबल भी है और बड़ी आसानी के साथ आपको प्रगतिशील सोच रखने वाले के तौर पर स्थापित भी कर देता है... पर मुझे लगता है बालासाहब ठाकरे का असली मूल्यांकन उनके जाने के बाद ही हो पायेगा... वह अपने दौर की जरूरत थे और भारत को आगे भी बहुत सारे बाला साहबों की जरूरत होगी, हर प्रान्त में... यह अलग बात है कि वह मिलें या नहीं...

१९ जून १९६६ को मुंबई की नौकरियों में गुजरातियों व दक्षिण भारतीयों के बढ़ते वर्चस्व के विरूद्ध मराठियों को वरीयता देने के मुद्दे पर उन्होंने शिव सेना की स्थापना की... उनका मानना था कि मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी है अत: मुंबई का मूलत: मराठी चरित्र व मिजाज बरकरार रहना चाहिये... यह किसी भी तरीके से एक नाजायज माँग नहीं थी... यह बात और है कि ऐसा कहने से वे मीडिया के एक बड़े वर्ग के निशाने पर आ गये... पर ठाकरे अपने विश्वास और माँग पर अंत तक कायम रहे... कालांतर में इस तरह की माँग कई जगहों से उठी और आगे भी उठती रहेगी... आज जब मेरे उत्तराखन्ड के अधिकाँश शहर व कस्बे अपना मूलत: पहाड़ी चरित्र व मिजाज खोकर दिल्ली जैसा लगने लगे हैं तो कभी कभी शिद्दत से हूक उठती है कि काश हमारे प्रदेश में भी एक बाल ठाकरे होता जो ऐसा होने को रोक लेता...

बालासाहब के निधन पर प्रधानमंत्री ने कहा कि "ठाकरे के लिए महाराष्ट्र के हित खास तौर से महत्वपूर्ण थे और वह हमेशा इसकी जनता में गौरव की भावना पैदा करने के उत्सुक रहे।"  लगभग यही बात द्रमुक प्रमुख एम करूणानिधि ने भी कही कि "ठाकरे के लिए उनके राज्य के लोगों के हित ही सर्वोपरि थे।"...  इन हितों को साधने के उनके तौरतरीकों पर सवाल उठाये जा सकते हैं लेकिन मंशा पर नहीं...

बाद में बालासाहब ने हिंदू अस्मिता के मुद्दे भी उठाने शुरू किये, उन्होंने हिंदुत्‍व की बात की और खुलकर कहा  कि वो हिंदूवादी हैं। उन्होंने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने का विरोध किया और इसी के चलते अपने अहम सिपहसालार छगन भुजबल को गंवाया भी... पर यह बाल ठाकरे की शख्सियत ही है कि वो कभी कुछ कहकर पलटे नहीं... बाल ठाकरे के लिये सत्ता ही एकमात्र लक्ष्य नही था, उनकी राजनीति स्वत;स्फूर्त थी , वे अपने समर्थकों के दिल-दिमाग पर एकछत्र राज करते थे... उनके व्यक्तित्व को, तौर तरीकों को और उनके असर को भी सामान्य राजनीतिक पैमाने पर मापना व परखना बेमानी होगा और मूर्खतापूर्ण भी...  उनमें एक दुर्लभ और आजकल लुप्तप्राय: किस्म की ईमानदारी थी... उनकी सोच और कार्यों में कभी कोई लाग-लपेट नहीं दिखा,  उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं... वे आज की राजनीति में एक अपवाद से थे... उन्हें न संसद जाना था, न मुख्यमंत्री बनना था, न उन्हें स्वयं के लिये सम्मान चाहिये थे... वह अपने विचारों व विश्वास के प्रति गजब के आस्थावान थे...

बालासाहब ने शिवसेना को एक आक्रामक दल की छवि दी... वे हिन्दू हित की बात करते थे... और आज की राजनीति में हिन्दू हितों की वोटों के चलते अक्सर बलि दे दी जाती है... मुंबई में हिन्दू हित की बात करने वाला कोई भी दल आसानी से बुलडोज कर जमींदोज कर दिया जाता अगर उनकी बनाई शिवसेना इतनी आक्रामक नहीं होती तो उसकी भी यही गत कर दी जाती ... 

आपने वह कहानी जरूर सुनी होगी जिसमें एक शरीफ आदमी का एक परिवार एक मौहल्ले में रहता है उसके चार बच्चे हैं दो लड़के और दो लड़कियाँ... सबसे बड़ा लड़का भी निहायत शरीफ और दब्बू है... दोनों लड़कियाँ बड़ी हो रही हैं और मोहल्ले के मवाली आते जाते उनको तंग करते रहते हैं... शिकायत करने पर भी नेता-पुलिस-प्रशासन बस गाल बजाई करते हैं, होता कुछ नहीं... परिवार बस्ती छोड़ने का मन बना रहा है... अचानक एक दिन चमत्कार होता है घर का सबसे प्रतिभावान छोटा लड़का अपनी बहनों की रक्षा के लिये हथियार उठा लेता है और एक गुन्डे को मार देता है और दो को अस्पताल भेज देता है... अदालत-पुलिस की नौटंकी के बाद जब वह घर आता है, तो वह भी एक मवाली हो चुका होता है... शरीफ और दब्बू बड़ा लड़का अपने पिता से अपने 'मवाली' छोटे भाई को घर से निकाल बाहर करने को कहता है तो पिता कहता है "यह ठीक है कि तेरा भाई आज एक शरीफ नहीं रहा, पर आज के दिन वह मुझे तुझ से ज्यादा प्यारा है, उसकी बगावत तेरी शराफत से ज्यादा कीमती है, कम से कम उसके चलते तेरी बहनें और माँ चैन से सर उठा जीते तो हैं, किसी की हिम्मत तो नहीं होती उनका अपमान करने की" 

बालासाहब भी हिन्दुस्तान के एक गरम मिजाज, बगावती और आक्रामक बेटे थे... उनकी यह आक्रामकता केवल और केवल इसलिये थी क्योंकि इसकी भी एक जरूरत थी उनके दौर के मुंबई, महाराष्ट्र और हिन्दुस्तान को... भारत को यदि अपना भारतीय और मूलत: हिन्दू चरित्र व मिजाज बरकरार रखना है तो आने वाले समय में बहुत से बालासाहबों की जरूरत पड़ने वाली है, ऐसा मुझे लगता है ...


बालासाहेब, 
आपको प्रणाम और अश्रुपूरित श्रद्धाँजलि भी... 



मुझे आप बहुत प्यारे थे, बाकी कईयों से बहुत बहुत ज्यादा ...







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रविवार, 18 नवंबर 2012

बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की !

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भाग-१ ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '
भाग-२ ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....
भाग-३ और वह भिडंत...

 




अब आगे...


हम अपने देश पहुँचे, रास्ते भर अल्फा सोता ही रहा, बस बीच बीच में खाने-पीने के लिये उठ जाता था वह, जाहिर था कि पिछले कुछ दिनों से शायद सो नहीं पाया था वह...

एयरपोर्ट पर वह बोला " सनी, जाओ और जम कर सोओ, दो दिनों के बाद मिलते हैं एजेंसी में "... " ओ के पॉप " मैंने कहा... और दौड़ता हुआ टैक्सी स्टैंड पहुँचा... मैंने अपने फ्लैट का पता ड्राईवर को बताया और जल्दी से जल्दी पहुँचाने को कहा... मैं फुटबॉल के विश्वकप के फाईनल के टीवी प्रसारण का एक सेकेंड भी मिस नहीं करना चाहता था...

दो दिन बाद मैं घर से एजेंसी के लिये निकला, रास्ते में मैंने समय काटने के लिये रेडियो ऑन किया... अचानक एक खबर ने मेरा ध्यान खींचा, खबर थी...

एक कॉन्फ्रेंस के बाद एक विश्व प्रसिद्ध टूरिस्ट स्पॉट पर छुट्टियाँ मनाने जा रहे 'न्यूक्लियर साईंटिस्ट्स' से भरे एक चार्टर्ड प्लेन  का संपर्क राडारों से टूट गया था, प्लेन में कुल मिलाकर विश्व के विभिन्न देशों के ४३ वैज्ञानिक सवार थे और यह सभी न्यक्लियर रिएक्टर निर्माण व संचालन के विशेषज्ञ थे...

एजेंसी में 'कनेक्शन' मानो मेरा ही इंतजार कर रहा था... "जाओ अंदर जाओ, अल्फा इज वेटिंग फॉर यू " बोला उसने और अपने लैपटॉप पर कुछ काम करने में लग गया...

अल्फा अपनी मेज पर ही नाश्ता कर रहा था... "चाय लोगे, सन्नी" पूछा उसने... मैंने अपने लिये एक कप बनाया और फिर उसके नाश्ते पर नजर डाली... अल्फा का खाना खाने का तरीका सारी एजेंसी में चर्चा का विषय था, वह बहुत-बहुत खाता था... अभी भी उसके सामने कम से कम एक दर्जन अंडों का आमलेट और दस से ज्यादा सैंडविच रखे थे... "यह नाश्ता तुम्हारे लिये कुछ ज्यादा नहीं है, पॉप" मैंने टोका उसे... "हाँ, ज्यादा तो है सन , पर अगर किसी ने बचपन में मेरी तरह फाके किये हों तो भर पेट खाना खाने लायक बन जाने पर वह मेरी तरह ही खाता है"... मैं चुप हो गया, उसके अभावग्रस्त बचपन और जीवन संघर्ष पर दसियों किताबें लिखी जा सकती थीं... "कल लगभग पूरी रात भर जगा रहा मैं, देर से सोया, इसलिये नाश्ता भी देर से ही हो रहा है" बताया उसने...

वह बहुत शान्त सा था... क्या उसने वह खबर नहीं सुनी, पर ऐसा कैसे हो सकता है... मुझसे रहा नहीं गया और आखिरकार मैंने पूछ ही लिया... "खबर सुनी पॉप ?"... उसने ज्यादा गौर नहीं किया मेरी बात पर और बोला 

"आज से तुम मेरे साथ इसी ऑफिस में काम करोगे, और तुम्हारा टास्क होगा 'मिशन-सर्वाइवल ऑफ द रेस' को संभव बनाना... "यह क्या है ?" पूछा मैंने... " यह मेरा मिशन है, 'अल्फा' का मिशन, हमें इसमें कामयाब होना है हर हाल में, आज की तारीख में हमारा आकलन यह है कि अगर यही स्थितियाँ बनी रही तो बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की ! और हमें बचाना है अपनी नस्ल को ....बहुत सा शुरूआती काम हम कर चुके हैं और अब सबसे महत्वपूर्ण और आखिरी काम होने बाकी हैं"... 

"अब बताओ, तुम क्या समझे? "... 

मेरे दिमाग ने अपने सामने की स्थिति का आकलन शुरू किया और थोड़ी देर बाद बोला मैं... " यानी वह तुम्हारे लिये रियेक्टर बनायेंगे ?"... "तुम्हारा कोड नेम 'प्रोफेसर' सही रखा गया है सन्नी, पर वे रियेक्टर मेरे या तुम्हारे लिये नहीं इंसान की नस्ल के लिये बनायेंगे" मुस्कुराते हुऐ बोला वह...

मैं अगले दिन से ही काम में जुट गया... 'अल्फा' ने एक टीम बनायी थी इस काम के लिये... यह एक बहुत बड़ी जिग-सॉ पहेली सा था, जिसे पूरी संपूर्णता में केवल 'अल्फा' ही समझ सकता था... 

मुझे दो मीटिंगों से पहले की तैयारी करनी थी... और इस तैयारी में पूरे पाँच साल लग गये... सन  २०३७  की शुरूआत हो चुकी थी दुनिया में...

२०३१ से २०३७ के बीच की दुनिया की मुख्य घटनायें थीं...

* विश्व के तमाम कच्चे तेल व प्राकृतिक गैस के भंडार २०५० तक पूरी तरह से खत्म हो जाने वाले थे... तेल बेचने से मिले पैसों पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले देशों में पूरी तरह से निराशा घर कर गयी थी।
* विश्व के तमाम देश उर्जा के अन्य स्रोतों जैसे सौर उर्जा, पवन उर्जा, जल उर्जा तथा नाभिकीय उर्जा का अधिकाधिक प्रयोग करने की राह पर थे।
* २०३५ में एशिया की एक महाशक्ति के एक  महानगर में अचानक से विश्व में बहुत पहले खत्म हो गयी बीमारी चेचक का संक्रमण हो गया, बीमारी के टीके विकसित करने में छह माह लगे, तब तक वह बीमारी एक करोड़ सत्तर लाख जानें ले चुकी थी, उस देश की अर्थव्यवस्था कम से कम दस साल पीछे जा चुकी थी...
* लगभग सभी देश नाभिकीय उर्जा से अपनी उर्जा जरूरतें पूरी करने लगे थे, इसी के साथ यह संभावना भी सिर उठाने लगी थी कि नाभिकीय हथियार भी बहुत से ऐसे देशों को सुलभ हो जायेंगे जहाँ उन्मादियों का शासन था।
* २०३७ के आकड़ों के अनुसार दुनिया की ६० प्रतिशत आबादी डायबिटीज, मोटापा, हाइपरटेंशन, हॄदय रोग, गु्र्दा रोग आदि लाईफ स्टाइल डिजीज से ग्रस्त हो चुकी थी... और अधिकाँश मुल्क अपने कुल बजट का ३० प्रतिशत तक बीमारियों से निपटने में खर्च करने लगे थे...
* २०३७ में ही चारों तरफ समुद्र से घिरे, उच्च तकनीक पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले आर्थिक महाशक्ति एक देश ने अपने प्रतिद्वन्दी दो देशों पर यह आरोप लगा सनसनी फैला दी कि २०३७ में ही उसके तटीय इलाकों को तबाह कर देने वाली सुनामी का आना कोई प्राकृतिक घटना नहीं थी, अपितु ऐसा उसके प्रतिद्वन्दी देशों ने समुद्र की तलहटी पर 'कंट्रोल्ड न्यूक्लियर एक्सपलोजन्स' कर इस सुनामी को जन्म दे उसकी अर्थव्यवस्था को क्षति पहुँचाई थी। दोनों ओर से खंडन व मंडन का सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा... 




और वह पहली मीटिंग

वह एक गुप्त जगह थी... उस मीटिंग को 'अल्फा' ने बुलाया था... और वह तीस भी आये थे... वह सभी अपने अपने मुल्कों की खुफिया एजेंसियों के प्रमुख थे... सबसे पहले 'अल्फा' ने अपना प्रेजेंटेशन दिया... सभी मंत्रमुग्ध होकर उसे देखते ही रह गये... कैसे पूरे दो घंटे बीत गये, पता ही नहीं चला... फिर कमरे की रोशनियाँ जलीं और 'अल्फा' की आवाज गूँजी... "तो सज्जनों, हमारे पास ज्यादा समय नहीं है, ज्यादा से ज्यादा चार-पाँच साल और, फैसला आपको करना है क्या आप इंसान की नस्ल को इस तरह खत्म हो जाने देंगे?... वे सभी आपस में चर्चा में लग गये... पंद्रह मिनट बाद एक स्वर में सभी बोले "नहीं !!!"... 

(यह केवल मैं और अल्फा जानते थे कि उनमें से ग्यारह पहले से ही मिशन से जुड़े हुऐ थे)

मुझे इसी क्षण का इन्तजार था... मैंने इंटरकॉम पर आदेश दिया... "तुम्हारा काम अब शुरू होता है, डॉक्टर"... और अपने दो सहायकों के साथ डॉक्टर ने कमरे में प्रवेश किया... एक बड़ी सी ट्रे थी उनके पास... बारी बारी से वे तीनों उन तीसों के पास गये व हरेक की कोहनी के पास की नस में एक चमकीला सा इन्जेक्शन सा लगाया... फिर एक और आदमी आया कमरे में, उसके पास भी एक ट्रे थी, ट्रे में चमकती धातु की कुछ अंगूठियाँ और  ब्रेसलेट थे,...  "आप इनमें से कोई एक पहन सकते हैं, याद रखिये कि किसी भी हाल में इसे उतारना नहीं है, कभी उतारना भी पड़े तो यह कभी भी आपसे तीन फीट से ज्यादा दूर न रहे"... सबने सिर हिलाया, उनमें से कोई भी कभी भी अपनी अंगूठी या ब्रेसलेट नहीं उतारने वाला था।

"अच्छा सज्जनों, फिर आप अपने अपने देश जा बताये तरीके से शिखरवार्ता की तैयारी करिये" अल्फा की आवाज गूंजी...

और हम सभी डाइनिंग एरिया की ओर बढ़ चले, हाथों में हाथ डाले व आपस में मर्दाना मजाक करते हुऐ...





जारी....


पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को यथासंभव शीघ्रता से आपको नई किस्त मिले... आपकी प्रतिक्रियायें अहम हैं क्योंकि वही इस कहानी की भविष्य की दिशा तय करेंगी...अगर आप टिप्पणी कर रहे हैं तो थोड़ा कल्पना को जोर दे यह भी बतायें कि अगर आप इसे लिख रहे होते तो अगली किस्त में क्या होता... तथ्यों को सही रखने के लिये हो सकता है कि मैं पहले के लिखे में कुछ बदलाव भी करूँ, जब भी ऐसा होगा, आपको बताया जायेगा... मुझे पाठकों से फीडबैक की आशा थी, है और भविष्य में भी रहेगी... फीडबैक इस कहानी को बेहतर बना सकता है ऐसा मैं मानता हूँ...


शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

और वह भिडंत...

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भाग-१  ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '
व 
भाग-२  ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....
 
से आगे...


दिसंबर २०३२

दिसंबर २०३२ को मैं अपनी पहली फील्ड पोस्टिंग पर गया, मुझे एक 'मुल्क विशेष' के इरादों के बारे में पता लगाने का टास्क दिया गया था... बहुत स्रोतों से सूचना 'अल्फा' तक पहुँचती थी और उन में से ही एक स्रोत मैं भी था...

२००१ से २०३२ तक के विश्व की कुछ प्रमुख घटनायें इस प्रकार से थीं...

* ११ सितम्बर २००१ को कुछ इस्लाम को मानने वाले आतंकियों ने अमेरिका पर आतंकी हमला कर हजारों लोगों की जान ले ली...
* आतंक के सरगना को मारने के इरादे से अमेरिका ने अफगानिस्तान पर अपनी फौजें उतार दीं और मई २०११ में अपने एक सहयोगी मुल्क पाकिस्तान के भीतर जा सरगना को मार गिराया...
* ईरान नामक एक देश के राष्ट्रपति ने २०१२ में यहूदी देश इजरायल को दुनिया के नक्शे पर एक नासूर बताते हुऐ जल्दी ही उसे मिटाने की बात कही, जवाब में इजरायल ने कहा कि वह कभी भी किसी भी हालात में ईरान को एटम बम नहीं बनाने देगा...
* २०१५ की गर्मियों में अमेरिका व उसके सहयोगी देशों ने अफगानिस्तान की सत्ता अफगानी सरकार को सौंप अपनी फौजें वहाँ से हटा लीं...
* २०१७ में इस्लामी आतंकियों ने फिर एक बार अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया...
* २०१९ में पाकिस्तान के अधिकाँश भागों पर भी इस्लामी आतंकियों का कब्जा हो गया व पाकिस्तानी फौज का एक बड़ा हिस्सा उनके साथ मिल गया, इस्लामाबाद की चारों ओर से घेराबंदी कर दी गयी ...
* २०२० में इस्लामी आतंकियों का इस्लामाबाद पर भी कब्जा हो गया व वे भी पाकिस्तानी सेना में शामिल हो गये...पाकिस्तान पर कट्टरपंथियों का एक समूह शासन करने लगा... इसके तुरंत बाद ही पाकिस्तान ने अपनी पूर्वी सीमा पर स्थित पड़ासी मुल्क भारत से कुछ हिस्सों को आजाद कराने के लिये खुली व छिपी दोनों तरह की जंग का एलान कर दिया...
* २०२२ में बार बार पाकिस्तान की ओर से एटमी हमले की धमकी से आजिज आ भारतीय नेतृत्व ने पूरे विश्व के सामने ऐलान कर दिया कि कहीं से भी भारत पर ऐटमी हमला होने की स्थिति में भारत उस देश पर ३०० से ज्यादा नाभिकीय हमले एक साथ करेगा, चाहे इसके परिणाम दुनिया के लिये कुछ भी हों...
* इसके तुरंत बाद २०२२ में इजरायल ने भी समूचे विश्व के सामने यह ऐलान किया कि उसकी हवाई सीमा में कोई हमलावर मिसाईल या विमान घुसते ही स्वचालित रूप से उसके सारे नाभिकीय हथियार दुनिया के विभिन्न इलाकों के उसके दुश्मन मुल्कों की ओर रवाना कर दिये जायेंगे...
* २०२३ में यह भी साबित हो गया कि एड्स जैसी महामारी का कारण HIV एक कुदरती वायरस नहीं बल्कि बायोलॉजिकल वारफेयर के लिये विश्व के एक विकसित मुल्क द्वारा तैयार किया जा रहा वायरस था... जो जानबूझ कर छोड़ा गया... जिससे इसकी वैक्सीन विकसित हो सके... तथा HIV परिवार के उससे भी घातक अन्य वायरस जैविक युद्ध के लिये विकसित किये जा सकें जिनकी वैक्सीन केवल उसी देश के पास मौजूद हो...
* २०२४ में HIV के खिलाफ १००% प्रतिरोधक क्षमता वाली वैक्सीन विकसित कर ली गयी...
* २०२८ में चीन दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक व सैन्य शक्ति, अमेरिका दूसरी व भारत तीसरी सबसे बड़ी शक्ति के तौर पर जाना जाने लगा, विश्व में जिनका पहले प्रभुत्व था उन मुल्कों को यह नागवार गुजरा और कई ऐसे गुप्त समूह बन गये जो हर हाल में चीन व भारत को उनके पुराने हाल में फिर भेज देना चाहते थे...
* २०२९ में यूरोप के एक ताकतवर मुल्क के एक वैज्ञानिक ने यह आरोप लगा सनसनी फैला दी कि कुछ प्रयोगशालाओं में दशकों पहले विश्व से खत्म कर दी गयी महामारी चेचक व पोलियो के वायरसों का जैविक युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने पर काम किया जा रहा है... वह वैज्ञानिक तीन दिन बाद अपने घर में मृत पाया गया... पत्नि ने बताया शायद वह पागल हो गया था और उसी पागलपने में उसने जहर खा लिया था...
* २०३० में दुनिया की ५५ प्रतिशत आबादी डायबिटीज, मोटापा, हाइपरटेंशन, हॄदय रोग, गु्र्दा रोग आदि लाईफ स्टाइल डिजीज से ग्रस्त हो चुकी थी... २०१२ में मुम्बई, भारत के एक अस्पताल द्वारा पहली बार रिपोर्ट किया TDR TB (टोटली ड्रग रेजिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस) एक बहुत बड़ी समस्या बन चुका था व हर साल उससे समूचे विश्व में २० लाख मौतें होने लगीं थी... कोई भी ज्ञात दवाई इस बीमारी के खिलाफ काम नहीं कर रही थीं...
* २०३१ में यह खबर आई कि पाकिस्तान के एक आतंकी-जनरल ने अपने नियंत्रण के तीन नाभिकीय हथियार एक बहुत बड़ी रकम के बदले एक मुल्क को बेच दिये थे...
* २०३१ में ही एक 'मुल्क विशेष' का कट्टरपंथी शासक अपने करीबियों को यह कहते सुना गया कि दुनिया शायद जल्द ही खत्म होने वाली है, ऐसा उसने सपने में देखा है...

मुझे भी उसी 'मुल्क विशेष' में ही भेजा गया था... मेरे टास्क दो थे, पहला यह पता लगाना कि क्या वह 'तीन बम' उसी देश ने खरीदे थे, दूसरा यह कि उनका क्या प्रयोग होना था... मेरा काम मुख्य रूप से 'एजेंसी' के उस देश में मौजूद अनेकों इन्फॉर्मर्स से सूचना संकलित कर उनका विश्लेषण कर अपनी राय अल्फा को देना था...

मैं जाते ही अपने काम में जुट गया... धीरे-धीरे सूचनायें मुझ तक आने लगीं... पर निश्चितता से किसी नतीजे पर पहुँचने लायक सूचना मेरे से अभी बहुत दूर थी...

तभी वह फोन आया... वह भी उसके ऑफिशियल नंबर से... उसका नाम कुछ और था पर मैं उसको जूलू (Zulu) कहूँगा... मैं फोन उठाते ही बोला '"ठीक है, मैं अपनी एम्बेसी जा रहा हूँ, और पहली फ्लाइट से ही वापस चला जाउंगा "... बहुत जोर से ठहाका लगाकर हंसा वह " प्रोफेसर, (उसे मेरा नाम पता था) अगर मुझे तुमसे यही कहना होता तो क्या मैं खुद फोन करता, मेरे आदमी तुम्हें सड़क से उठा सीधा फ्लाईट में बैठा देते"... मैं झेंप सा गया... मुँह जब भी खोलो, समझदारी की ही बात बोलो, खास तौर पर अपने हमपेशा से, वरना तुमको ही शर्मिन्दा होना होगा, यह मेरे लिये बड़ा सबक था... " सॉरी" बस इतना ही मेरे मुँह से निकल पाया... " कोई बात नहीं बेटा, आओ साथ लंच करेंगे" वह अचानक मेरे पिता समान हो गया...

एक मैक्सिकन रेस्त्रां में हम मिले... खूब जमकर खाया-पिया... खूब सारी बातें की... उसने अपनी बेटी के बारे में बताया... बोला कि मेरे जैसा वर खोज रहा है उसके लिये... खाना खाते खाते अचानक उसने प्लेट में थोड़ा ज्यादा सॉस डाल दिया, मैंने सामान्य रूप से बातों के क्रम को बनाये रखा पर अब मेरी नजरें उसके हाथ के चम्मच काँटे पर थीं... खाना खाते खाते अचानक उसने काँटे की नोक से सॉस पर दो आकार बनाये  '+ α' ... मेरे होंठो पर हल्की मुस्कुराहट उभरी... उसने चम्मच से जल्दी जल्दी सारी प्लेट साफ कर दी...

वह अल्फा से मिलना चाहता था।

यह एक इमरजेंसी थी... उसी शाम मैं अपने देश के लिये फ्लाईट पर सवार हो गया... १२ घंटे बाद मैं एजेंसी के आफिस में था, मैंने 'कनेक्शन' को खबर दी कि जुलू अल्फा से मिलना चाहता है... और कनेक्शन मुस्कुराने लगा... शायद मैंने कोई बड़ा काम कर दिखाया था...

अल्फा और जुलू आपस में कैसे मिले, यह बताना यहाँ जरूरी नहीं... पर 'अल्फा' को 'अल्फा' क्यों कहते थे यह बताना अब जरूरी हो गया है... तब दुनिया का लगभग हर मुल्क अपनी एक जासूसी एजेंसी रखता था... मुल्कों में सत्ता परिवर्तन होते रहते थे, कभी कभी सरफिरे, जनूनी यहाँ तक कि पागल भी शासक बन जाते थे... पर जासूसी एजेंसियाँ हमेशा ही समझदारों के ही हाथ में रहती थीं... दुनिया की सारी जासूसी एजेंसियों के प्रमुखों का एक अनौपचारिक क्लब सा होता था, यह दुनिया का सबसे रहस्यमयी और एक्सक्लुसिव क्लब था... ' अल्फा' इस क्लब के सरगना को कहा जाता था... मुल्क एक दूसरे के खिलाफ आतंक फैलाते थे, रहस्यों को खरीदते थे, एक दूसरे के जासूसों को बेनकाब करते थे, कभी कभी इस काम में जानें भी ली जाती थीं... पर यह झगड़े, राजनीति व नफरत कभी पूरी मानवता को ही न निगल बैठे, इसीलिये यह क्लब बना था... एक तरह से 'अल्फा' केवल अपने देश का ही नहीं पूरी मानवता का रक्षक था...

जुलू अल्फा से मिलना चाहता था क्योंकि जुलू की निगाह में दुनिया खतरे में थी...

वो दोनों मिले, कहाँ मिले कैसे मिले, यह मैं नहीं बताना चाहता, पर जुलू ने अल्फा को बताया कि उसके 'मुल्क विशेष' के हुक्मरान ने ही वह तीनों बम खरीदे हैं, और बहुत जल्द ही उसकी उन्हें भारत व इजरायल के खिलाफ इस्तेमाल करने की योजना है... उसका ख्याल था, जो सही भी था कि ऐसा होते ही अपने खुले ऐलान के मुताबिक दोनों देश अपने सारे नाभिकीय हथियार, जो हजारों की संख्या में थे, अपने अपने दुश्मनों की ओर रवाना कर देंगे और महज एक दो दिनों में ही पूरी दुनिया नष्ट हो जायेगी...

पर अल्फा को हर हाल में इसे रोकना था...

और उसने यह किया भी...

और वह भिडंत

अचानक घटनायें तेजी से घटित हुई और तीन दिन के भीतर ही हमारे राष्ट्रपति उस 'मुल्क विशेष' के प्रधान मंत्री से 'तेल के दामों के उतारचढ़ाव व विश्व की अर्थव्यवस्था पर इसके कुप्रभाव' को रोकने के लिये शिखरवार्ता के लिये उस 'मुल्क विशेष' की राजधानी को रवाना हो गये... यह अभूतपूर्व था... और राष्ट्रपति की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये हमारी वायुसेना के लड़ाकू विमान, हैलीकॉप्टर व एक बहुत बड़ा सुरक्षा दल भी साथ गये... अल्फा भी दल का हिस्सा था और पूरे घटनाचक्र के दौरान मैं उसके साथ रहा...

एयरपोर्ट पर स्वागत के तुरंत बाद दोनों नेता शिखरवार्ता के लिये निर्धारित जगह पहुँचे... मीडिया के लिये मुस्कुराने व फोटो खिंचाने के बाद घोषणा हुई कि अब वे दोनों बंद कमरे में एक दूसरे से वार्ता करेंगे व केवल अनुवादक व निजी सचिव ही उनके साथ रहेंगे... बहरहाल अब राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री दोनों एक कमरे में थे जिसे 'एजेंसी' व 'मुल्क विशेष' के खुफिया विभाग ने पहले से ही सैनिटाइज किया हुआ था... हमारी ओर से अल्फा, मैं और राष्ट्रपति थे और उनकी तरफ से प्रधानमंत्री, जुलू और उनकी फौज का एक बंदा... वार्ता शुरू होते ही राष्ट्रपति ने इशारा किया... अल्फा उठा और प्रधानमंत्री के पास गया, अपने टेबलेट पीसी पर उसने प्रधानमंत्री को एक वीडियो दिखाया... अचानक प्रधानमंत्री के चेहरे का रंग उतर सा गया... फिर अल्फा ने एक दूसरा वीडियो प्रधानमंत्री को दिखाया... प्रधानमंत्री को उस एयरकंडीशन्ड रूम में ही पसीना सा आ गया... जुलू की ओर देख वह चिल्लाया " हरामी, तूने हमारे महान देश को धोखा दिया है "... जुलू चेहरे पर कोई भाव लाये बिना बैठा रहा... अब अल्फा ने राष्ट्रपति की ओर इशारा किया... और पहली बार राष्ट्रपति ने मुँह खोला "मिस्टर प्राइम मिनिस्टर आपको अगले पाँच मिनट के भीतर ही कुछ जरूरी फोन कॉल करनी होंगी"... निस्तेज, सर झुकाये बैठे प्रधान मंत्री ने फौजी बंदे को इशारा किया, पर जुलू ने अपना फोन आगे बढ़ा दिया... कुल तीन मिनट तक बातें हुई...

'मुल्क विशेष' की राजधानी के हवाई अड्डे पर अचानक गतिविधियाँ बढ़ गयीं... मुल्क विशेष की सेना के तीन भारी भरकम हैलीकॉप्टर उतरे व उनमें से तीन काफी भारी बड़े बक्से क्रेन द्वारा उतारे गये... हरेक हैलीकॉप्टर से चार चार वैज्ञानिक से दिखते आदमी भी उतरे... बड़ी ही शीघ्रता से यह सारा सामान व आदमी हमारे कार्गो प्लेन में चढ़ाये गये... और प्लेन रनवे पर दौड़ता उड़ान भर आँखों से ओझल हो गया...

उधर मीटिंग रूम में राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के साथ बड़ी तल्लीनता से वीडियो गेम खेल रहे थे... मैं, अल्फा, जुलू और फौजी मेज पर लगे खाने पीने के सामान का सफाया करने में जुट गये... तकरीबन सवा घंटे के बाद अल्फा के फोन पर कॉल आई, वह खुश नजर आया... " मेरा ख्याल है अब हम मीटिंग खत्म कर सकते हैं सर, पंछी उड़ कर सरहद से पार निकल गया है "...

अब राष्ट्रपति को अपना काम करना था... मुस्कुराते हुऐ राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री के गले में हाथ डाला और बाहर चलने को कहा... बाहर पूरी दुनिया के मीडिया के कैमरे लगे थे... " हमारे दोनों महान देशों ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को तेल की कीमत के उतारचढ़ाव के नुकसान से बचाने के लिये एक रणनीति तैयार की है, सभी स्टेकहोल्डर्स से बात करने के बाद यह दुनिया के सामने होगी " कहा राष्ट्रपति ने...

तय यह हुआ कि यहीं से दोनों नेता रात के खाने पर जायेंगे और रात का खाना खाने के बाद राष्ट्रपति अपने देश रवाना हो जायेंगे... बहुत शानदार रात्रिभोज था, और उतना ही लजीज खाना भी... जुलू लगातार चिंतित लग रहा था... वह अल्फा के पास आया... अल्फा ने उसका हाथ दबाया और बोला "चिंता मत करो, पागल कुत्ता जिंदा नहीं छोड़ा जायेगा"... ठीक डेढ़ घंटे में रात्रिभोज खत्म हुआ और विदाई के बाद राष्ट्रपति का प्लेन रनवे की ओर बढ़ा... अल्फा और मैं पीछे की सीट पर बैठे थे... अल्फा ने अपनी जेब से फोन निकाल एक मैसेज किया... और रेडियो खोल न्यूज चैनल लगा दिया... पाँच मिनट के बाद खबर आने लगी... ' दिमाग की रक्त वाहिनियों में रक्तस्राव के कारण 'मुल्क विशेष' के प्रधानमंत्री को कोमा की अवस्था में अस्पताल ले जाया गया है, सूत्र बताते हैं कि पिछले एक दिन की अतिव्यस्तता व तनाव के चलते ऐसा हुआ होगा' रेडियो कह रहा था... "पागल कुत्ता अपने अंजाम तक पहुँच गया है" मुस्कुरा कर कहा अल्फा ने और अगले ही पल खर्राटे भरने लगा... अस्पताल में जाने के कुछ घंटे बाद ही प्रधानमंत्री की मृत्यु की घोषणा कर दी गयी...

(जारी)...

अगली किश्त में पढ़ियेगा 'मिशन-सर्वाइवल ऑफ द रेस'...

पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को यथासंभव शीघ्रता से आपको नई किस्त मिले... आपकी प्रतिक्रियायें अहम हैं क्योंकि वही इस कहानी की भविष्य की दिशा तय करेंगी...अगर आप टिप्पणी कर रहे हैं तो थोड़ा कल्पना को जोर दे यह भी बतायें कि अगर आप इसे लिख रहे होते तो अगली किस्त में क्या होता... तथ्यों को सही रखने के लिये हो सकता है कि मैं पहले के लिखे में कुछ बदलाव भी करूँ, जब भी ऐसा होगा, आपको बताया जायेगा... मुझे पाठकों से फीडबैक की आशा थी, है और भविष्य में भी रहेगी... फीडबैक इस कहानी को बेहतर बना सकता है ऐसा मैं मानता हूँ...






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शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

करवाचौथ पर...

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वो
थे
दो
आजाद
परिंदे

जो
अगर
उड़ते
रहते
साथ साथ
देते
एक दूसरे
के
परों को
ताकत

तो
शायद
नाप देते
आसमान

देख लेते
दुनिया को
इस छोर से
उस
छोर तक

पर
उन्होंने
बाँधा
एक दूजे को
इक
रिश्ते की
डोर से

मिल
बनाया
खुद ही
एक नीड़
जिसे
घर कहते हैं
और
वे
खुद
कहलाये
पति-पत्नी

उड़ते
अब भी
हैं
वे
पर
यह
उड़ान
होती है
नीड़ के
इर्द गिर्द
ही

आज
उनमें से
एक
रहेगा
भूखा
निर्जल
पूरे
दिन भर

मन्नत
माँगते
कि
जब भी
साथ छूटे
तो
वही जाये
पहले

रहते
हुऐ
अखंड-सुहागन

मुझे
अच्छा
नहीं लगता
यह
पर्व

मैं
नहीं चाहता
कि
कोई
सोचे तक
भी
मुझे
छोड़
पहले जाने की



जाने क्यों
क्या करूँ
मैं कुछ
ऐसा ही हूँ.... 






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आज मेरी पत्नी श्री से बहुत बहस हुई... हमारे यहाँ करवा चौथ मनाने की परंपरा नहीं है... परंतु पिछले वर्ष मेरे मना करने पर भी उन्होंने यह व्रत रख लिया... इस बार मेरी ओर से पक्की मनाही है... इसी बहस के बाद उपजे अपने मनोभावों को यहाँ लिख दिया है... बस...



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