रविवार, 28 अक्तूबर 2012

ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....

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भाग- १ { ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा ' } से आगे...


 इंटरव्यू

इंटरव्यू के दिन मैं सुबह सुबह तैयार हो समय से पाँच मिनट पहले बताई गयी जगह पहुँच गया... जिस होटल में इंटरव्यू था वहाँ लॉबी में एक बोर्ड पर नोटिस लगा था... एक हॉल में जाने को कहा गया था नोटिस में... मैं उस हॉल में पहुंचा... वेटर से दिखने वाले एक आदमी ने मुझे चाय कॉफी के लिये पूछा... मैंने उसे एक कप ब्लैक कॉफी, बिना चीनी के लाने को कहा और खिड़की के पास खड़ा हो बाहर का जायजा लेने लगा... हॉल में मुझी जैसे दो उम्मीदवार और थे... एक लड़का और एक बहुत सुन्दर लड़की भी... बहरहाल उस समय मैं किसी से कोई बात करने के मूड में नहीं था, मैं स्थिति का आकलन कर रहा था... मैंने अनुमान लगाया कि हमें कहीं और ले जाया जायेगा...

मेरा अनुमान सही निकला, मैं अभी कॉफी खत्म भी नहीं कर पाया था कि एक शख्स ने, जो अपनी चाल ढाल व हेयरकट से फौजी सा लग रहा था, हॉल में प्रवेश किया... बिना किसी प्रस्तावना के उसने हम तीनों को नाम से पुकारा और कहा " चलिये हमें दूसरी जगह चलना है, गाड़ी बाहर खड़ी है "...

होटल के पोर्श में एक वैन खड़ी थी... हम तीनों उस पर चढ़े... हमारे चढ़ने के बाद वही आदमी ड्राइविंग सीट पर बैठा और इंजन स्टार्ट किया... फिर न जाने उसने कौन से बटन दबाये कि हमारे और ड्राइवर के बीच एक पार्टिशन गाड़ी के फर्श से ऊपर उठ सरक गया और सारी खिड़कियों पर एक और काला शीशा चढ़ गया... यह राहत की बात थी कि लाइट जल रही थी... अंदर एक छोटी सी डिस्प्ले स्क्रीन पर वह फिर हमें दिखा और बोला " सॉरी, पर मुझे ऐसे ही निर्देश हैं "...

तकरीबन एक घंटे तक गाड़ी दौड़ती रही... मैं गाड़ी के मूवमेंट व इंजन के एक्सलरेशन व ब्रेक आदि लेने से अंदाजा सा लगाता रहा कि आखिर हमें कहाँ ले जाया जा रहा है... आखिर मुझे केवल इतना ही समझ में आ पाया कि गाड़ी शहर से बाहर किसी हाइवे में दौड़ रही है...

आखिरकार गाड़ी रूकी... वह एक बहुत बड़े गैराज के अंदर जाकर रूकी थी... हम तीनों बाहर निकले... उसने हमें सीढ़ी चढ़ने का इशारा किया... अब हम एक बहुत बड़ी इमारत की लॉबी  में थे... एक सख्त सी दिखने वाली अधेड़ महिला हमारे पास आई... " उस तरफ लाइन से काफी सारे बाथरूम हैं... जाओ... बाथरूम में रखे साबुन से नहाओ... और बाथरूम में रखे टीशर्ट-पाजामा व स्लिपर पहन लो... याद रहे अपने सारे कपड़े, घड़ी, अंगूठी, ब्रेसलेट, ताबीज वगैरह सब के सब तुमने बाथरूम में ही उतार देने हैं... मैंने वैसा ही किया, बाहर निकला तो मुझे एक बंदा बाहर अपना इंतजार करता मिला... उसने फिर भी मेरी तलाशी ली... " पार्टनर, अंडरवियर तक तो उतरवा लिये, अब क्या बच्चे की जान लोगे " मजाक किया मैंने... पर वह भावशून्य चेहरा बनाये रहा... "जल्दी चलो, बड़ी देर लगाते हो नहाने में, हमें देर हो रही है " कह वह लगभग दौड़ाता सा हुआ मुझे एक कमरे के बाहर छोड़ गया...

" तुम अंदर आ सकते हो "... एक आवाज गूँजी और मैं कमरे के अंदर था... एक बड़ी सी गोल मेज के चारों ओर वह सातों बैठे थे... मैंने सातों को देख जायजा लिया और मेरी नजर उनमें से एक पर जाकर अटक गयी... वह एक विशालकाय आदमी था, सुपरहैवीवेट बॉक्सर जैसी डील डौल वाला... मोटी और छोटी गर्दन और उसके ऊपर बड़ा सा सिर... बाल खिचड़ी काले-सफेद थे, पर उसने उन्हें बहुत छोटा कटाया हुआ था... पर सबसे विशिष्ट थी उसकी आँखें... ऐसा लगता था कि वह उनसे आपके अंदर ही नहीं आपके आर-पार भी झाँक सकता हो... उन आँखों ने बहुत कुछ देखा था... और उनसे ताकत व जिम्मेदारी दोनों झलक रही थीं...

इंटरव्यू शुरू हुआ... उन लोगों ने मेरा पूरा बैकग्राउंड चैक किया था... प्राइमरी में मेरे साथ पढ़े दोस्तों तक से पूछा गया था मेरे बारे में... कुछ छोटे मोटे सवाल किये गये मुझ से... उस के बाद उनमें से एक बोला " अल्फा, अब तुम पूछो जो भी पूछना है "...  तो वह विशालकाय आदमी 'अल्फा' है...

" माई सन "... उसकी आवाज पूरे कमरे में गूंज रही थी... " तुम्हें कुछ समझ में आ रहा है कि तुम किस दुनिया और धंधे में एंट्री ले रहे हो ? "...
" इतना बेवकूफ समझते हो अगर मुझे, तो बुलाया क्यों यहाँ " झुंझला कर कहा मैंने...
बहुत देर तक उसके हंसने की आवाज गूँजती रही... " यू हैव ए प्वायंट, सन्नी "... मुझे अपने इंजीनियरिंग के प्रिय प्रोफेसर सा लगा वह यह कहता हुआ...
" अच्छा यह बताओ कि एक कठिन टास्क है, जिसमें तुम्हारे असफल होने की संभावना सफल होने से कहीं ज्यादा है, क्या चुनौती के तौर पर तुम उसे लोगे ? और असफल होने पर तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया होगी ? " पूछा अल्फा ने...
अब हंसने की बारी मेरी थी... " जिस धंधे में तुम हो, क्या उसमें 'टास्क' चुनने की आजादी है ? "...
फिर थोड़ा गंभीर होते हुऐ मैं बोला " टास्क में असफल होने का कोई विकल्प मैं नहीं रखना चाहता, और शायद इसीलिये मुझे तुम लोगों का धंधा पसंद है।"
काफी देर तक चुप रहा अल्फा... फिर बोला " तुम काम के आदमी हो"... उसने हाथ आगे बढ़ाया " हमारी दुनिया में स्वागत है सन्नी "
मैंने उसका हाथ अपने हाथों में थामा " अच्छी कटेगी तुम्हारे साथ, पॉप "

मेरे और उसके कई सालों के साथ के दौरान मैं हमेशा उसके लिये 'सन्नी' रहा और वह मेरे लिये 'पॉप'...


' अल्फा केवल एक ही होता है '


तीन दिन बाद ट्रेनिंग का बुलावा आया...  नौ महीने की ट्रेनिंग... सख्त कहना भी एक तरह का अन्डरस्टेटमेंट होगा उस ट्रेनिंग के लिये... हम में से कोई नहीं जानता था कि शरीर और दिमाग की कष्ट सह पाने की कोई सीमा नहीं होती... आप जब तक जिंदा रहते हैं झेलते ही रहते हैं... और सबसे बड़ी बात यह है कि झेलने के बाद भी मौत को ख्याल में भी नहीं लाते, जिंदा ही रहना चाहते हैं...

फिर छह महीने का अगला हिस्सा था... 'सॉफ्ट स्किल्स' के लिये... यहाँ इन्सान की कमजोरियों-मजबूतियों को पहचानना व उनको अपने मिशन की सफलता के लिये इस्तेमाल करना सिखाया गया... हमें यह भी सिखाया गया कि दिये गये टास्क को पूरा करना है हर हाल में... जिसकी भी वजह से वह पूरा नहीं हो पाता, वह 'रूकावट' है... और रूकावट हटनी ही चाहिये हर हाल में...

मैंने टॉप  किया दोनों कोर्सों में... महज एक हफ्ते का आराम मिला... और ठीक एक हफ्ते के बाद मैं 'एजेन्सी' के दफ्तर में था...

रिसेप्शन पर कार्यरत लड़की को मेरे आने का पहले से ही पता था... बिना मेरे कुछ पूछे " कमरा नं० १८८ ए " बोला उसने और फिर से काम में लग गयी... शायद लैपटॉप पर कुछ गेम खेल रही थी...

कमरे के बाहर पहुँचते ही अंदर से आवाज आई " प्लीज कम इन "... मैं अंदर गया... एक बुजुर्ग सा आदमी था वह, चेहरे से लग रहा था कि बहुत कुछ देखा व झेला है उसने... मैंने मुस्कुराकर उसका अभिवादन किया... पर वह पूर्ववत चेहरा बनाये रहा...  कुछ दिनों में मुझे पता चला कि पूरी एजेंसी उसे 'कनेक्शन' कहती है... और 'कनेक्शन' आपके लिये मुस्कराये, ऐसा तभी होगा जब कोई बहुत बड़ी सफलता पाई हो आपने...

"एजेंसी में तुम्हें ' प्रोफेसर' के नाम से जाना जायेगा" कहा उसने... "अल्फा ने तुमको मध्य एशिया की पेट्रो इकॉनॉमी वाले एक मुल्क में भेजने को कहा है'... कमरा नं० १८९ में तुमको तुम्हारी पहचान से संबंधित सब ब्रीफिंग कर दी जायेगी, एक ऑयल कम्पनी के सीनियर मार्केटिंग मैनेजर बन कर जा रहे हो तुम वहाँ"

"बाकी सब ठीक है पर यह बताओ कि कितने 'अल्फा' हैं एजेंसी में ?" मैंने पूछा...
" अल्फा केवल एक ही होता है, एजेंसी में ही नहीं, हमारी पूरी दुनिया में केवल एक ही अल्फा है " कुछ खीझ कर बोला वह...

मेरी ब्रीफिंग पूरे १५ दिन चली और सोलहवें दिन मैंने अपनी पोस्टिंग वाले देश को फ्लाईट पकड़ ली...



(जारी...)







पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को आपको नई किस्त मिले... आपकी प्रतिक्रियायें अहम हैं क्योंकि वही इस कहानी की भविष्य की दिशा तय करेंगी...अगर आप टिप्पणी कर रहे हैं तो थोड़ा कल्पना को जोर दे यह भी बतायें कि अगर आप इसे लिख रहे होते तो अगली किस्त में क्या होता... तथ्यों को सही रखने के लिये हो सकता है कि मैं पहले के लिखे में कुछ बदलाव भी करूँ, जब भी ऐसा होगा, आपको बताया जायेगा...

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी कहानी ध्यान से पढ़ रहे है

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  2. कहानी बढियां चल रही है -अभी तो परिवेश पर ज्यादा जोर है ....थोडा पात्रों की विशेषताओं -चरित्र चित्रण को और उभारना होगा -यद्यपि आपने यह भी प्रयास बढियां किया है ....बहरहाल कहानी को अपनी गति में बहने दीजिये .....

    "उसने हमें सीढ़ी चढ़ने का इशारा किया" ----सीढी तो बीते जमाने की बात हुयी -कुछ और करिए लिफ्ट के आगे -एलीवेटर टाईप वगैरा
    "तुमने बाथरूम में ही उतार देने हैं-तो महराज दिल्ली वासी हैं/रहे हैं :-)" तुमने को तुम्हे कीजिये ....

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