सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '

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पृथ्वीवासी मेरी मानव संतानों,

मैं कमांडर 'अल्फा'  यह संदेश आप सभी के लिये लिख रहा हूँ... मिशन 'ईश्वर की खोज में' अपने अंजाम को पाने में कामयाब रहा... और आज हमारे मिशन पर निकलने के १८५४६ साल बाद हम ईश्वर को पाने में कामयाब रहे...

एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है अब मेरे ऊपर, कि तुम सबको बताऊँ कि क्या क्या और कैसे हुआ इस मिशन के दौरान... कैसे हम ईश्वर तक पहुँचे और हमें वहाँ क्या मिला, क्या दिखा...

यह मेरा ही आइडिया था कि हम ईश्वर तक पहुँचने का एक प्रयास जरूर करें... मुझे अपार खुशी है कि हम कामयाब हुऐ... चलिये अब इस कहानी को शुरूआत से शुरू करते हैं...


अल्फा

'अल्फा' ,  हाँ १८५४६ साल पहले जब हम इस खोज में निकले थे तो हमारी दुनिया मुझे इसी नाम से जानती थी... ६० साल का था तब मैं... मैं आज भी ६० साल का ही हूँ... सही कहूँ तो मैं सन् २०७० से ६० ही साल का हूँ... ऐसा क्यों है इसे समझने के लिये तुमको मेरी पूरी कहानी पढ़नी पड़ेगी...

आज सन् २०७९० चल रहा होगा पृथ्वी में... और पूरी दुनिया में कोई भौगोलिक सीमायें नहीं हैं... ऐसे में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं तुमको यह न बताऊँ कि मैं किस देश में पैदा हुआ था... बस इतना जानना तुम्हारे लिये काफी है कि मेरी पैदाइश सन २०१० की है...

यह सारा किस्सा शुरू हुआ सन २०३१ की गर्मियों में... तब की दुनिया के सर्वश्रेष्ठ इंजीनियरिंग कॉलेज से डिग्री लेने के बाद मैंने कोई नौकरी करने की बजाय समाज शास्त्र की पढ़ाई करने के लिये एक दूसरे विश्वविद्मालय में दाखिला ले लिया... मेरे पिता उस समय के अमीरों में माने जाते थे इसलिये मुझ पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं था... उस समय के और विद्मार्थियों की तरह ही मेरा समय भी पढ़ाई, फुटबॉल-बास्केटबॉल के मैदान और विश्वविद्मालय की कैंटीन के बीच बीतता था... हाँ एक गर्लफ्रेन्ड भी थी मेरी...

कुल मिलाकर मेरी जिंदगी चल रही थी बड़े सुकून से... फिर अचानक वह हुआ जिसने मेरी पूरी दुनिया और दुनिया को देखने का नजरिया ही बदल दिया... 

वह जुलाई का महीना था... हमारे नोटिस बोर्ड पर एक नोटिस लगा देखा मैंने... मेरे देश के 'वाह्य सुरक्षा विभाग' का नोटिस था वह... कैंपस प्लेसमेंट के लिये आने वाली थी उनकी टीम... एक अलग सा अनुभव लेने के लिये मैंने भी अप्लाई कर दिया... 

तीन दिन के बाद इम्तहान हुआ... मुझे आज भी याद है कि मैंने सारे सवाल सही हल किये थे... उसके बाद हमें फिटनेस टेस्ट के लिये बुलाया गया... जिस जगह बुलाया गया वहाँ मेरे देश की सेना के विशिष्ट कमांडो की भी ट्रेनिंग होती थी... पूरे एक सप्ताह तक चला यह टेस्ट... भूख, प्यास, थकान, नींद का अभाव आदि झेलने की हमारे शरीर की क्षमताओं को उनकी पूरी सीमा जाँचा गया वहाँ,,, फिर शुरू हुआ मेडिकल जाँचों का दौर... इसके बाद मनोवैज्ञानिकों की एक पूरी टीम ने हम सबके व्यवहार का आकलन किया पूरे एक महीने तक... आज जब सोचता हूँ तो हंसी आती है कि कैसे उस समय हमारे साथ ही रहते हुऐ कुछ उम्मीदवार असलियत में अपने क्षेत्र के प्रतिष्ठित मनोवैज्ञानिक थे... जो हमारे मन को भांपने के लिये ही हमारे साथ रह रहे थे...

और आखिर वह दिन आया जब मेरा फाइनल इंटरव्यू था... यह इंटरव्यू मेरे जीवन की पूरी दिशा बदल देने वाला था....


(जारी..)





पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को आपको नई किस्त मिले... आपकी प्रतिक्रियायें अहम हैं क्योंकि वही इस कहानी की भविष्य की दिशा तय करेंगी...अगर आप टिप्पणी कर रहे हैं तो थोड़ा कल्पना को जोर दे यह भी बतायें कि अगर आप इसे लिख रहे होते तो अगली किस्त में क्या होता... तथ्यों को सही रखने के लिये हो सकता है कि मैं पहले के लिखे में कुछ बदलाव भी करूँ, जब भी ऐसा होगा, आपको बताया जायेगा...





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22 टिप्‍पणियां:

  1. badhiya..........blog-pathak intzar me rahega....

    sundar bhumika....

    pranam.

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  2. उत्तर
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      धन्यवाद ऐना, प्रयत्न यही रहेगा कि बच्चों को भी यह रोचक लगे... ज्यादा क्लिष्ट न हो पाये...



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  3. प्रवीण जी, आपकी इस रचना को बड़े ध्यान से पड़ने की कोशिश की है। इस कहानी में शुरूआत तो बड़ी जोरदार लगी। लेकिन कॉलेज और ट्रेनिंग वाली बात को पहले वाली लाइनों से कैसे जोड़ूँ यह समझ न पाया।
    फिर भी इतना तो कहना चाहूँगा ही कि आपने लिखा है तो कुछ तो बात होगी ही। अब इंतज़ार है आगे की स्टोरी की

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    उत्तर
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      @ कॉलेज और ट्रेनिंग वाली बात को पहले वाली लाइनों से कैसे जोड़ूँ यह समझ न पाया।

      यह सब जुड़ेगा मित्र, थोड़ा धैर्य रखिये... :)



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  4. अरे वाह तो जनाब यह शगल भी रखते हैं -विज्ञान गल्प लेखन का ....
    लिखते जाईये -इतना सुदूर भविष्य में काहें ले गए हैं-क्या ईश्वर को पाने के लिए इतना सुदूर का समय पाठकों को ज्यादा संतुष्ट करने के लिए है !
    स्वागत है विज्ञान कथा लेखकों के छोटे और खूबसूरत से संसार में -अब ना नुकर करके और लोगों की तरह भाव मत लेने लगिएगा :-)
    हम तो दरवज्जा खोल दिए हैं -
    बाकी तो कहानी बतायेगी कि यह एक निकृष्ट विज्ञान कथा साबित हुयी या उत्कृष्ट या बीच की -वैसे बहुत आशा तो आप से नहीं की जा सकती मगर हम
    कोई पूर्वाग्रह भी नहीं रखते -मस्त होकर बहिये!

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      नहीं सर जी, हम शगल तो नहीं रखते थे पर क्या करें, आप ही हमका उकसाय रहे... इसीलिये सर डाल दियें हैं ओखल में... इसलिये इस कहानी का बीज एक तरह से आप ही बोये रहे... अऊर, यह 'बहुत आशा' आप काहे हम से करेंगे... हमें पता है कि यह 'आशा' आप किस से रखते हैं... पर बतायेंगे नहीं... :)

      मस्त बहने में आप साथ रहियेगा...



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    2. सोमवार आ गया है सर पर

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  5. रोचक लगा..उत्सुकता से आगे की प्रतीक्षा रहेगी। देर सबेर लेकिन पढ़ेंगे जरूर..लिखते रहिए। ढेर सारी शुभकामनाएँ...

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  6. वाह ! बढ़िया है !
    किशोरावस्था में मैं विज्ञान प्रगति नामक एक पत्रिका पढ़ा करता था उसी का स्मरण हो आया

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    1. अरे ये कैसा भौचक रहस्योद्घाटन कर दिया आपने -हम तो आपको अभी भी किशोर ही मानते रहे हैं इसलिए ही स्न्हेल भाव के साथ ज्यादा भाव भी नहीं दिए हैं :-)

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  7. बहुत बढ़िया रोचक प्रस्तुति ..आभार

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  8. मैंने एक दिन अख़बार में तस्वीर देखि तस्वीर में हाथ की सफाई दिखने वाला सत्य साईं बाबा बैठा हुआ था उसके साइड में हमारे पूर्व महामहिम आदरणीय ए पी जे अब्दुल कलम बेठे हुए थे उनकी मुद्रा बताती थी के वह उनसे प्रभावित है और उनके चेहरे पर उस हाथ की सफाई दिखाकर लोगो को अपने आप को भगवन बताने वाला सत्य साईं बाबा के प्रति सम्मान है. यह तस्वीर देख कर मेरा मन विचलित हुआ . और पूर्व महामहिम के प्रति सम्मान कम हुआ . आपकी टिपण्णी चाहता हू.

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    उत्तर
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      प्रिय दीप,

      आपके ही जैसी अपनी स्थिति थी तब...:(
      और कुछ बातें अनकही ही रहें तो बेहतर है सभी के लिये ... :)
      हाँ सत्य साईं पर मेरी पोस्ट द साईं फिनोमिना : चमत्कार को नमस्कार को पढ़ आप शायद मेरा रूख जान सकें...


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