रविवार, 28 अक्तूबर 2012

ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....

.
.
.




भाग- १ { ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा ' } से आगे...


 इंटरव्यू

इंटरव्यू के दिन मैं सुबह सुबह तैयार हो समय से पाँच मिनट पहले बताई गयी जगह पहुँच गया... जिस होटल में इंटरव्यू था वहाँ लॉबी में एक बोर्ड पर नोटिस लगा था... एक हॉल में जाने को कहा गया था नोटिस में... मैं उस हॉल में पहुंचा... वेटर से दिखने वाले एक आदमी ने मुझे चाय कॉफी के लिये पूछा... मैंने उसे एक कप ब्लैक कॉफी, बिना चीनी के लाने को कहा और खिड़की के पास खड़ा हो बाहर का जायजा लेने लगा... हॉल में मुझी जैसे दो उम्मीदवार और थे... एक लड़का और एक बहुत सुन्दर लड़की भी... बहरहाल उस समय मैं किसी से कोई बात करने के मूड में नहीं था, मैं स्थिति का आकलन कर रहा था... मैंने अनुमान लगाया कि हमें कहीं और ले जाया जायेगा...

मेरा अनुमान सही निकला, मैं अभी कॉफी खत्म भी नहीं कर पाया था कि एक शख्स ने, जो अपनी चाल ढाल व हेयरकट से फौजी सा लग रहा था, हॉल में प्रवेश किया... बिना किसी प्रस्तावना के उसने हम तीनों को नाम से पुकारा और कहा " चलिये हमें दूसरी जगह चलना है, गाड़ी बाहर खड़ी है "...

होटल के पोर्श में एक वैन खड़ी थी... हम तीनों उस पर चढ़े... हमारे चढ़ने के बाद वही आदमी ड्राइविंग सीट पर बैठा और इंजन स्टार्ट किया... फिर न जाने उसने कौन से बटन दबाये कि हमारे और ड्राइवर के बीच एक पार्टिशन गाड़ी के फर्श से ऊपर उठ सरक गया और सारी खिड़कियों पर एक और काला शीशा चढ़ गया... यह राहत की बात थी कि लाइट जल रही थी... अंदर एक छोटी सी डिस्प्ले स्क्रीन पर वह फिर हमें दिखा और बोला " सॉरी, पर मुझे ऐसे ही निर्देश हैं "...

तकरीबन एक घंटे तक गाड़ी दौड़ती रही... मैं गाड़ी के मूवमेंट व इंजन के एक्सलरेशन व ब्रेक आदि लेने से अंदाजा सा लगाता रहा कि आखिर हमें कहाँ ले जाया जा रहा है... आखिर मुझे केवल इतना ही समझ में आ पाया कि गाड़ी शहर से बाहर किसी हाइवे में दौड़ रही है...

आखिरकार गाड़ी रूकी... वह एक बहुत बड़े गैराज के अंदर जाकर रूकी थी... हम तीनों बाहर निकले... उसने हमें सीढ़ी चढ़ने का इशारा किया... अब हम एक बहुत बड़ी इमारत की लॉबी  में थे... एक सख्त सी दिखने वाली अधेड़ महिला हमारे पास आई... " उस तरफ लाइन से काफी सारे बाथरूम हैं... जाओ... बाथरूम में रखे साबुन से नहाओ... और बाथरूम में रखे टीशर्ट-पाजामा व स्लिपर पहन लो... याद रहे अपने सारे कपड़े, घड़ी, अंगूठी, ब्रेसलेट, ताबीज वगैरह सब के सब तुमने बाथरूम में ही उतार देने हैं... मैंने वैसा ही किया, बाहर निकला तो मुझे एक बंदा बाहर अपना इंतजार करता मिला... उसने फिर भी मेरी तलाशी ली... " पार्टनर, अंडरवियर तक तो उतरवा लिये, अब क्या बच्चे की जान लोगे " मजाक किया मैंने... पर वह भावशून्य चेहरा बनाये रहा... "जल्दी चलो, बड़ी देर लगाते हो नहाने में, हमें देर हो रही है " कह वह लगभग दौड़ाता सा हुआ मुझे एक कमरे के बाहर छोड़ गया...

" तुम अंदर आ सकते हो "... एक आवाज गूँजी और मैं कमरे के अंदर था... एक बड़ी सी गोल मेज के चारों ओर वह सातों बैठे थे... मैंने सातों को देख जायजा लिया और मेरी नजर उनमें से एक पर जाकर अटक गयी... वह एक विशालकाय आदमी था, सुपरहैवीवेट बॉक्सर जैसी डील डौल वाला... मोटी और छोटी गर्दन और उसके ऊपर बड़ा सा सिर... बाल खिचड़ी काले-सफेद थे, पर उसने उन्हें बहुत छोटा कटाया हुआ था... पर सबसे विशिष्ट थी उसकी आँखें... ऐसा लगता था कि वह उनसे आपके अंदर ही नहीं आपके आर-पार भी झाँक सकता हो... उन आँखों ने बहुत कुछ देखा था... और उनसे ताकत व जिम्मेदारी दोनों झलक रही थीं...

इंटरव्यू शुरू हुआ... उन लोगों ने मेरा पूरा बैकग्राउंड चैक किया था... प्राइमरी में मेरे साथ पढ़े दोस्तों तक से पूछा गया था मेरे बारे में... कुछ छोटे मोटे सवाल किये गये मुझ से... उस के बाद उनमें से एक बोला " अल्फा, अब तुम पूछो जो भी पूछना है "...  तो वह विशालकाय आदमी 'अल्फा' है...

" माई सन "... उसकी आवाज पूरे कमरे में गूंज रही थी... " तुम्हें कुछ समझ में आ रहा है कि तुम किस दुनिया और धंधे में एंट्री ले रहे हो ? "...
" इतना बेवकूफ समझते हो अगर मुझे, तो बुलाया क्यों यहाँ " झुंझला कर कहा मैंने...
बहुत देर तक उसके हंसने की आवाज गूँजती रही... " यू हैव ए प्वायंट, सन्नी "... मुझे अपने इंजीनियरिंग के प्रिय प्रोफेसर सा लगा वह यह कहता हुआ...
" अच्छा यह बताओ कि एक कठिन टास्क है, जिसमें तुम्हारे असफल होने की संभावना सफल होने से कहीं ज्यादा है, क्या चुनौती के तौर पर तुम उसे लोगे ? और असफल होने पर तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया होगी ? " पूछा अल्फा ने...
अब हंसने की बारी मेरी थी... " जिस धंधे में तुम हो, क्या उसमें 'टास्क' चुनने की आजादी है ? "...
फिर थोड़ा गंभीर होते हुऐ मैं बोला " टास्क में असफल होने का कोई विकल्प मैं नहीं रखना चाहता, और शायद इसीलिये मुझे तुम लोगों का धंधा पसंद है।"
काफी देर तक चुप रहा अल्फा... फिर बोला " तुम काम के आदमी हो"... उसने हाथ आगे बढ़ाया " हमारी दुनिया में स्वागत है सन्नी "
मैंने उसका हाथ अपने हाथों में थामा " अच्छी कटेगी तुम्हारे साथ, पॉप "

मेरे और उसके कई सालों के साथ के दौरान मैं हमेशा उसके लिये 'सन्नी' रहा और वह मेरे लिये 'पॉप'...


' अल्फा केवल एक ही होता है '


तीन दिन बाद ट्रेनिंग का बुलावा आया...  नौ महीने की ट्रेनिंग... सख्त कहना भी एक तरह का अन्डरस्टेटमेंट होगा उस ट्रेनिंग के लिये... हम में से कोई नहीं जानता था कि शरीर और दिमाग की कष्ट सह पाने की कोई सीमा नहीं होती... आप जब तक जिंदा रहते हैं झेलते ही रहते हैं... और सबसे बड़ी बात यह है कि झेलने के बाद भी मौत को ख्याल में भी नहीं लाते, जिंदा ही रहना चाहते हैं...

फिर छह महीने का अगला हिस्सा था... 'सॉफ्ट स्किल्स' के लिये... यहाँ इन्सान की कमजोरियों-मजबूतियों को पहचानना व उनको अपने मिशन की सफलता के लिये इस्तेमाल करना सिखाया गया... हमें यह भी सिखाया गया कि दिये गये टास्क को पूरा करना है हर हाल में... जिसकी भी वजह से वह पूरा नहीं हो पाता, वह 'रूकावट' है... और रूकावट हटनी ही चाहिये हर हाल में...

मैंने टॉप  किया दोनों कोर्सों में... महज एक हफ्ते का आराम मिला... और ठीक एक हफ्ते के बाद मैं 'एजेन्सी' के दफ्तर में था...

रिसेप्शन पर कार्यरत लड़की को मेरे आने का पहले से ही पता था... बिना मेरे कुछ पूछे " कमरा नं० १८८ ए " बोला उसने और फिर से काम में लग गयी... शायद लैपटॉप पर कुछ गेम खेल रही थी...

कमरे के बाहर पहुँचते ही अंदर से आवाज आई " प्लीज कम इन "... मैं अंदर गया... एक बुजुर्ग सा आदमी था वह, चेहरे से लग रहा था कि बहुत कुछ देखा व झेला है उसने... मैंने मुस्कुराकर उसका अभिवादन किया... पर वह पूर्ववत चेहरा बनाये रहा...  कुछ दिनों में मुझे पता चला कि पूरी एजेंसी उसे 'कनेक्शन' कहती है... और 'कनेक्शन' आपके लिये मुस्कराये, ऐसा तभी होगा जब कोई बहुत बड़ी सफलता पाई हो आपने...

"एजेंसी में तुम्हें ' प्रोफेसर' के नाम से जाना जायेगा" कहा उसने... "अल्फा ने तुमको मध्य एशिया की पेट्रो इकॉनॉमी वाले एक मुल्क में भेजने को कहा है'... कमरा नं० १८९ में तुमको तुम्हारी पहचान से संबंधित सब ब्रीफिंग कर दी जायेगी, एक ऑयल कम्पनी के सीनियर मार्केटिंग मैनेजर बन कर जा रहे हो तुम वहाँ"

"बाकी सब ठीक है पर यह बताओ कि कितने 'अल्फा' हैं एजेंसी में ?" मैंने पूछा...
" अल्फा केवल एक ही होता है, एजेंसी में ही नहीं, हमारी पूरी दुनिया में केवल एक ही अल्फा है " कुछ खीझ कर बोला वह...

मेरी ब्रीफिंग पूरे १५ दिन चली और सोलहवें दिन मैंने अपनी पोस्टिंग वाले देश को फ्लाईट पकड़ ली...



(जारी...)







पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को आपको नई किस्त मिले... आपकी प्रतिक्रियायें अहम हैं क्योंकि वही इस कहानी की भविष्य की दिशा तय करेंगी...अगर आप टिप्पणी कर रहे हैं तो थोड़ा कल्पना को जोर दे यह भी बतायें कि अगर आप इसे लिख रहे होते तो अगली किस्त में क्या होता... तथ्यों को सही रखने के लिये हो सकता है कि मैं पहले के लिखे में कुछ बदलाव भी करूँ, जब भी ऐसा होगा, आपको बताया जायेगा...

सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '

.
.
.






पृथ्वीवासी मेरी मानव संतानों,

मैं कमांडर 'अल्फा'  यह संदेश आप सभी के लिये लिख रहा हूँ... मिशन 'ईश्वर की खोज में' अपने अंजाम को पाने में कामयाब रहा... और आज हमारे मिशन पर निकलने के १८५४६ साल बाद हम ईश्वर को पाने में कामयाब रहे...

एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है अब मेरे ऊपर, कि तुम सबको बताऊँ कि क्या क्या और कैसे हुआ इस मिशन के दौरान... कैसे हम ईश्वर तक पहुँचे और हमें वहाँ क्या मिला, क्या दिखा...

यह मेरा ही आइडिया था कि हम ईश्वर तक पहुँचने का एक प्रयास जरूर करें... मुझे अपार खुशी है कि हम कामयाब हुऐ... चलिये अब इस कहानी को शुरूआत से शुरू करते हैं...


अल्फा

'अल्फा' ,  हाँ १८५४६ साल पहले जब हम इस खोज में निकले थे तो हमारी दुनिया मुझे इसी नाम से जानती थी... ६० साल का था तब मैं... मैं आज भी ६० साल का ही हूँ... सही कहूँ तो मैं सन् २०७० से ६० ही साल का हूँ... ऐसा क्यों है इसे समझने के लिये तुमको मेरी पूरी कहानी पढ़नी पड़ेगी...

आज सन् २०७९० चल रहा होगा पृथ्वी में... और पूरी दुनिया में कोई भौगोलिक सीमायें नहीं हैं... ऐसे में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं तुमको यह न बताऊँ कि मैं किस देश में पैदा हुआ था... बस इतना जानना तुम्हारे लिये काफी है कि मेरी पैदाइश सन २०१० की है...

यह सारा किस्सा शुरू हुआ सन २०३१ की गर्मियों में... तब की दुनिया के सर्वश्रेष्ठ इंजीनियरिंग कॉलेज से डिग्री लेने के बाद मैंने कोई नौकरी करने की बजाय समाज शास्त्र की पढ़ाई करने के लिये एक दूसरे विश्वविद्मालय में दाखिला ले लिया... मेरे पिता उस समय के अमीरों में माने जाते थे इसलिये मुझ पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं था... उस समय के और विद्मार्थियों की तरह ही मेरा समय भी पढ़ाई, फुटबॉल-बास्केटबॉल के मैदान और विश्वविद्मालय की कैंटीन के बीच बीतता था... हाँ एक गर्लफ्रेन्ड भी थी मेरी...

कुल मिलाकर मेरी जिंदगी चल रही थी बड़े सुकून से... फिर अचानक वह हुआ जिसने मेरी पूरी दुनिया और दुनिया को देखने का नजरिया ही बदल दिया... 

वह जुलाई का महीना था... हमारे नोटिस बोर्ड पर एक नोटिस लगा देखा मैंने... मेरे देश के 'वाह्य सुरक्षा विभाग' का नोटिस था वह... कैंपस प्लेसमेंट के लिये आने वाली थी उनकी टीम... एक अलग सा अनुभव लेने के लिये मैंने भी अप्लाई कर दिया... 

तीन दिन के बाद इम्तहान हुआ... मुझे आज भी याद है कि मैंने सारे सवाल सही हल किये थे... उसके बाद हमें फिटनेस टेस्ट के लिये बुलाया गया... जिस जगह बुलाया गया वहाँ मेरे देश की सेना के विशिष्ट कमांडो की भी ट्रेनिंग होती थी... पूरे एक सप्ताह तक चला यह टेस्ट... भूख, प्यास, थकान, नींद का अभाव आदि झेलने की हमारे शरीर की क्षमताओं को उनकी पूरी सीमा जाँचा गया वहाँ,,, फिर शुरू हुआ मेडिकल जाँचों का दौर... इसके बाद मनोवैज्ञानिकों की एक पूरी टीम ने हम सबके व्यवहार का आकलन किया पूरे एक महीने तक... आज जब सोचता हूँ तो हंसी आती है कि कैसे उस समय हमारे साथ ही रहते हुऐ कुछ उम्मीदवार असलियत में अपने क्षेत्र के प्रतिष्ठित मनोवैज्ञानिक थे... जो हमारे मन को भांपने के लिये ही हमारे साथ रह रहे थे...

और आखिर वह दिन आया जब मेरा फाइनल इंटरव्यू था... यह इंटरव्यू मेरे जीवन की पूरी दिशा बदल देने वाला था....


(जारी..)





पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को आपको नई किस्त मिले... आपकी प्रतिक्रियायें अहम हैं क्योंकि वही इस कहानी की भविष्य की दिशा तय करेंगी...अगर आप टिप्पणी कर रहे हैं तो थोड़ा कल्पना को जोर दे यह भी बतायें कि अगर आप इसे लिख रहे होते तो अगली किस्त में क्या होता... तथ्यों को सही रखने के लिये हो सकता है कि मैं पहले के लिखे में कुछ बदलाव भी करूँ, जब भी ऐसा होगा, आपको बताया जायेगा...





...

मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

काश, तुम्हारे जैसी ही बेटी, दुनिया के हर बाप के नसीब में होती... तुम्हें सलाम !

.
.
.





वह भी तो
अपने आस पड़ोस की
आम बच्चियों की तरह ही है
कभी किसी बात पर
तो कभी बिना बात के
चहकती-मुस्कराती हुई सी

और हर बच्ची की तरह ही
उसकी भी चाहत है
अपने आस-पास की दुनिया को
जानने और समझने की
अपनी जिंदगी को जीने की

वह अपने इस जीवन पर
अपना अधिकार मानती है
वह पढ़ना भी चाहती है

और इसीलिये नहीं मानती
जाहिल 'रेडियो मुल्ला' का
अंधेरों की ओर धकेलता
हर औरत-बच्ची को
घर में बंद रहने का
मध्य युगीन फरमान

वह उठाती है आवाज
लिख कर, बोल कर
और बहस कर के भी
बताती है वह दुनिया को
हर उपलब्ध मंच पर
पढ़ना चाहती हैं लड़कियाँ
जायज हक है यह उनका

वह जारी रखती है
अपने स्कूल को जाना

और उजाले की इस डोर से
पड़ जाती है खतरे में
हुकूमत अंधेरों की

रवाना कर दिये जाते हैं
दो नामर्द वहशी दरिंदे
छोटी सी उस बुलबुल को
खामोश करने की खातिर







 
 कामयाब रहते हैं वो
उसे नुकसान पहुँचाने में
आज जूझ रही है बुलबुल
अपनी जिंदगी के लिये
लेती है साँस मशीन से
पर उजाले की जीत पर
उसका भरोसा डिगा नहीं

हम सबकी रोशन दुनिया को
निगलने की कोशिशें तो
करते ही रहते हैं अंधेरे
जाने कितनी सदियों से
है उजाला फिर भी बना हुआ
और उम्मीदें हैं कायम भी

क्योंकि अंधेरों के बीचोंबीच
हौसला दिखाता है कोई
जलाने का एक छोटा सा चिराग
मानने से कर इन्कार
अंधेरों-आँधियों के हुक्म को







मलाला युसुफजाई !

काश तुम्हारे जैसी एक बेटी
होती नसीब में
दुनिया के हर बाप के
उस 'रेडियो मुल्ला' के भी


तुम्हें मेरा सलाम !








...



जानिये मलाला यसुफजाई के बारे में...

 यहाँ पर   

पढ़िेये उसकी डायरी भी
 
मलाला की डायरी



...

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012

मुझे अपना भाई बनाओगे, डॉक्टर ?

.
.
.




मोबाईल की घंटी ने मुझे जगाया... दीवाली का अगला दिन था वह... "हलो" ... बॉस थे दूसरी तरफ... " यह केस तुमको दे रहा हूँ शुरूआत से, हाई प्रोफाइल मामला है, साल्व करने के बाद ही कुछ कहना, कोई 'मैस अप' नहीं होना चाहिये।"

मैं जल्दी से तैयार हुआ, फ्रीज से निकाल ठंडा नाश्ता किया... वह अभी तक सो ही रही थी... कल बहुत मस्ती की थी हम दोनों ने, सारे महानगर की आतिशबाजी देखी, फिर देर रात उसका बनाकर लाया खाना खाया... पता नहीं क्यों वह कमिट नहीं होना चाहती अभी जबकि मेरी उम्र निकली जा रही है...

चुपके से दरवाजा खोल मैं बाहर निकल गया।




मरने वाला हॉट शॉट कॉरपोरेट इंजीनियरिंग फर्म का अधिकारी था... जिस बिल्डिंग में वह अकेला रहता था उसी के दूसरे माले पर उसका बड़ा भाई, जो कार्डियोलोजिस्ट था अपनी बीबी और दो बच्चों के साथ रहता था... सुबह दरवाजा न खुलने पर कामवाली ने बड़े भाई के घर से चाबी ले दरवाजा खोला था... लाश बेड पर पसरी हुई थी, केवल एक गोली सीने पर, पिस्टल पास ही पड़ा था... फारेंसिक टीम ने फिंगर प्रिंट उठाये और मैंने फ्लैट का फर्नीचर और घरेलू सामान छोड़ बाकी सभी चीजों को गत्ते के डब्बों में पैक कर आफिस ले जाने को कहा।




मैं पूरे एक हफ्ते उसके सामान व लैपटॉप को खंगालता रहा... फिंगर प्रिंट्स की भी रिपोर्ट आ गयी थी... पूरे घर में या तो उसके फिंगर प्रिंट्स थे या कामवाली के या भाई के परिवार के... पिस्टल पर भी उसी के फिंगर प्रिन्ट्स थे पर ट्रिगर पर कोई प्रिन्ट नहीं था।




वह क्लीनिक में मरीज देख रहा था... " कैसे आये आफिसर ?"... " आपको कातिल का कुछ अंदाजा है?"... "यह अंदाजा लगाना तो तुम्हारा काम है"... कंधे उचकाये उसने... मैं एक फीकी हंसी हंसा और बाहर आ गया।




इस बार मैंने उसकी कार के आगे अपनी कार अड़ा दी... " डॉक्टर, मुझे लगता है कि तुमने ही अपने भाई को मारा है... मेरे पास आज सबूत नहीं है पर याद रखना कातिल कभी बच नहीं सकता कानून से "... उसका चेहरा उतर सा गया... " अपना कार्ड दो, मैं शाम को तुमसे मिलने आउंगा, आफिसर!"




मैं अकेले बैठा था टीवी के सामने, हाथ में जिन का गिलास, गिलास की तली में पड़े ' आनियन इन ब्राईन' से उठते छोटे छोटे बुलबुलों को देखता... तभी बैल बजी... वही था...

"लोगे कुछ डॉक्टर ?"... "शुक्रिया, मैं पीना छोड़ चुका हूँ"... मैंने एक ग्लास में आरेंज जूस डाल उसे पकड़ाया...

"आफिसर, तुम मुझे काबिल आदमी लगते हो, उसके पास से कुछ बरामद हुआ क्या ?, क्या जानते हो उसके बारे में ?"

अब वह मुद्दे पर आ गया था, मैंने एक गहरी साँस ली... " बम फोड़ने वाला था तुम्हारा भाई, सादे सामानों से बने पर बेहद खूबसूरत डिजाईन के बम होते वो, तभी फटते जब वह चाहता, जगहें भी उसने तलाश लीं थी"

उसके चेहरे से मानो खून सा उतर गया... वह उठा, तकरीबन आधा गिलास ब्रान्डी से भरा और हलक से नीचे उतार लिया...

" एक डील करोगे आफिसर, मैं तुमको कातिल दे दूंगा पर तुम यह बम वाली बात किसी पर भी जाहिर न करना "

अब वह मेरी टेरीटरी में था... ऐसे सैकड़ों डील हम करते और फिर उनसे मुकर जाते हैं... क्या करें, काम ही ऐसा है... मैंने हाथ बढ़ाया " डील !"

" तुम्हारी नेम प्लेट से जाहिर होता है तुम फौज में थे ना आफिसर... बब्बा भी फौज में थे... सिपाही... एक गश्त के दौरान पहाड़ से गिरे, दाहिने पैर की दो हड्डियाँ ऐसी टूटी कि कभी सीधी नहीं जुड़ पायी... साढ़े चार साल की नौकरी के बाद ही चौथायी पेंशन के साथ घर आना पड़ा उनको... फिर चाय का होटल खोला उन्होंने... सुबह चार बजे से माई कोयले सुलगा भट्टी जलाती और बब्बा गाँव निकल पड़ते ताजा दूध लेने... खुद को मिटा कर हम दोनों को बनाया उन्होंने... मैं डॉक्टर बना और वह ईंजीनियर... वह मुझे 'टैबलेट' कहता और मैं उसे 'नटबोल्ट'... उसने शादी नहीं की तमाम कहने पर भी... कुछ समय से बदल गया था वह... हर समय प्रार्थना में लगा रहता, ऊपर वाले को याद करता रहता... बदले की बातें भी करने लगा था वह... मुझे अच्छा नहीं लगता था यह... मुझे बब्बा की याद आती थी, पंद्रह अगस्त-छब्बीस जनवरी को झंडे को सीना तान नम आंखों से सलामी देने वाले बब्बा... उन दोनों दिन हमारी दुकान में हर किसी को एक कप चाय और दो बूंदी के लड्डू खिलाये जाते थे सारा दिन बिना पैसा लिये... बब्बा इसे अपना सबसे बड़ा त्यौहार मानते थे... दीवाली के दिन फिर हममें बहस हुई पर वह नहीं माना... मैंने फैसला कर लिया, शाम वह घर आया खाना खाने तो मैंने उस से कहा कि मैं भी उसके साथ हूँ... चारों तरफ पटाखे छूट रहे थे... मैं उसके फ्लैट पर पहुंचा, दस्ताने पहने था मैं... वह टीवी देख रहा था..."क्या बात, टैबलेट, ठन्ड इतनी तो नहीं है।"... "मुझे हल्का बुखार सा है"... "डाक्टर को बुखार"... उसने मजाक उड़ाया..." 'नटबोल्ट' अब तो मैं तेरे साथ हूँ, कुछ हो गया तो अपनी हिफाजत का भी सोचना होगा, वह पिस्टल तो दिखा जो तूने पिछले महीने खरीदी है"... वह उठा, दराज से पिस्टल निकाली, मैगजीन लगायी और बड़ी शान से बताने लगा उसके बारे मैं... मैंने पिस्टल हाथ में ली, अनलाक किया और निशाना ले एक गोली दाग दी, ठीक दिल के ऊपर... धड़कता दिल धीरे धीरे खाली हुआ... उसकी आँखें खुली की खुली रह गयीं... मैंने उसके माथे को चूमा... आँखों को बन्द किया... " मुझे माफ करना 'नटबोल्ट'... पर मैं बब्बा को इस उम्र में तिल तिल कर मरते नहीं देख सकता"... और मैं चाबी लगा बाहर निकल गया"...

एक गहरी साँस ले वह रूक गया... काफी देर सिर झुकाये न जाने क्या सोचता सा रहा... फिर मेरी आँखों में आँखें डाल बोला बेहद धीमी आवाज में... 

"मुझे अरेस्ट कर लो आफिसर... कह देना मैंने ईर्ष्यावश उसे मारा... यह बम वाला एंगल निकाल दो... नहीं तो बब्बा फिर भी जीते जी मर जायेंगे ।"

मुझे अचानक जाम में मजा आना बन्द हो गया...

"मैं आता हूँ डॉक्टर, एक घंटे तक मेरा यहीं इंतजार करना...  मुझे कुछ बहुत जरूरी काम निपटाना है ।"





मैं आफिस गया, फाइल निकाली... आखिरी पेज पर लिखा...  

No headway made, There are no viable clues to proceed any further, Recommended closure of the case. ...

फिर मैंने केस से संबंधित बरामद सामान का गत्ते का कार्टन उठाया और उसे कार की डिक्की में लाद लिया...




ईंट भट्ठे में कार घुसते ही शमशाद भाई दौड़ कर पास आये... पहले भी कई बार वहाँ जा चुका था मैं... वह मेरा मकसद जानते थे...मैंने कार्टन उठाया... वह आगे आगे चले... हम भट्ठी के ऊपर चढ़े... लड़के ने दहकती भट्टी का ढक्कन सरिये से उठाया... मैंने कार्टन अन्दर डाल दिया और उसके जलकर राख होने तक वहीं खड़ा रहा...





वह सोफा पर बैठा हुआ था... पस्त सा... मेरे घुसते ही उसने दोनों हाथ आगे बढ़ाये... "हथकड़ी लगा दो आफिसर" ...

मैंने आगे बढ़ उसे सीने में भींच लिया...

बड़ी हिम्मत लगी यह कहने में... " मुझे अपना भाई बनाओगे, डॉक्टर ?...

वह बच्चों की तरह सुबक सुबक कर रो रहा था, मेरे सीने से चिपटकर...  

मेरी आँखें भी भर आई थीं...

ऐसा मेरी जिंदगी में पहली बार हो रहा था...









...


सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

किया जा रहा है एक धोखा, नाम 'वास्तु' है !...

.
.
.

इंसान सभ्य हुआ तो उसने वर्षा, धूप व तेज रोशनी से बचने के लिये आसरे बनाना भी सीखा... खाना भी घरों में बनने लगा और नहाने व नित्य क्रिया से निवृत्ति के स्थान भी बनने लगे... धीरे धीरे संपत्ति भी होने लगी उसके पास तो इन आसरों में अनिश्चित भविष्य के लिये धन-धान्य भी रखे जाने लगे... इन्हीं आसरों को आज हम घर कहते हैं... हर सभ्यता ने इन घरों के निर्माण के लिये कुछ नियम भी बनाये... यह सारे नियम कॉमन-सेन्स यानी सहज बुद्धि पर आधारित थे... एक ही उद्देश्य था इनका कि घर में रहने वालों को रोशनी व हवा की कमी न रहे तथा बारिश व सीलन से वे बचे रहें, तापमान के चरम से वे भरसक बचे रहें, उनका सामान सुरक्षित रहे, भवन निर्माण में कम से कम साधन लगें व स्थानीय तौर पर उपलब्ध साधनों से ही उनका काम चल जाये...

आजकल एक खेप सी खड़ी हो गयी है तथाकथित वास्तु शास्त्र के स्वयंभू जानकारों की... ये हर जगह हैं... टी.वी. पर, नेट पर, आपके शहर या कस्बे में और ब्लॉगवुड में भी...




इन लोगों के मुताबिक हरेक घर में वास्तु पुरूष की स्थिति कुछ ऐसी होती है... कभी कभी यह स्थिति बदलता भी है...इस व्याख्या के मुताबिक हर घर में बाथरूम-किचन-बेडरूम-स्टोर-डाइनिंग रूम की पोजीशन यह होनी चाहिये...

  • North – treasury
  • Northeast – prayer room
  • East – bathroom
  • Southeast – kitchen
  • South – bedroom
  • Southwest – armoury
  • West – dining room
  • Northwest – cowshed.

अगर किसी घर में ऐसा नहीं है तो यह तोड़फोड़ करने की राय देते हैं... इनकी राय के मुताबिक कई बेचारे अपना अच्छा भला शयन कक्ष छोड़ बाथरूम में सोने को मजबूर हैं... कभी कभी यही विशेषज्ञ कुछ अजीब से उपाय भी बताते हैं जिनमें आइने लगाना, लाल-पीले बल्ब लगाना, तांबे या प्लास्टिक के पिरामिड लगाना, फर्श-दीवार दरवाजों पर ताबें की पत्तियां ठोकना आदि आदि शामिल हैं... यदि यजमान कुछ न करने को राजी हो तो यह विशेष पूजा या हवन बता वास्तु दोष का शमन करने का दावा भी करते हैं...

अब आप आज की आधुनिक ईमारतों के कुछ नक्शे देखिये...








आप स्वयं देख सकते हैं कि शयन कक्ष, रसोई, बाथरूम, डाइनिंग रूम व लिविंग रूम आदि आदि अलग अलग फ्लैटों में अलग अलग हर संभव दिशाओं में हैं... इसी तरह बड़े संस्थानों के होस्टलों व नियोजित कालोनियों में बने मकानों में भी यह सभी कक्ष हर संभव दिशाओं में होते हैं... यह जमीन व जगह की उपलब्धता पर निर्भर होता है... ऐसी कोई शोध नहीं हुई कि एक विशेष दिशा के फ्लैटों-मकानों में रहने वाले दुखी व असफल हैं व अन्य विशेष दिशा में रहने वाले सुखी व सफल...


आपके घर में रोशनी आये, हवा का आना जाना न रूके, बारिश व सीलन से घर बचा रहे व कीमती सामान सुरक्षित रहे... यदि आपका घर यह सब कर रहा है तो उसमें कोई वास्तु दोष नहीं... बेफिकर उसमें रहिये... जीवन की अपनी सफलताओं व विफलताओं व अपने आसपास के लोगों से अपने अच्छे-बुरे संबंधों के कारण अपने अंदर ढूंढिये... और कोई स्वयंभू वास्तु विशेषज्ञ यदि आपको फिर भी  घर के वास्तुदोष गिना रहा है तो आप सीना तान के उस से कहिये...


बंधु, 

कर रहे हो एक धोखा, तुम सबसे, नाम वास्तु है !










...