सोमवार, 24 सितंबर 2012

देखते ही देखते तब्दील हो जाना एक झील का गंधाते जोहड़ में.... गुनहगार कौन ?


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एक भरी-पूरी सदानीरा
नीले नीले पानी की
झील होती थी कभी वहाँ
जिसमें सारे दिन भर
तैरते और गोता लगाते
रहते थे तैराक-बच्चे
चलती थी पालदार नावें
लहरों से करते अठखेलियाँ
किनारों पर जिसके
तेज तेज कदमों से
सुबह शाम करते थे सैर
उम्र-अनुभव की सफेदी लिये
तरतीब से बनाये केश रखे
दादा जी और नानियाँ भी
अपने मूल के सूद का
नन्हा सा हाथ हाथ में थामे
उसके किनारों पर अक्सर
चाँदनी रातों में
दुनिया-जहान को भूलते
अपने आप में खोये
नवजवान प्रेमी युगल
करते थे अनेकों वादे
मिलकर देखते थे सपने
अपने सुनहरे कल के

लेकिन फिर एक दिन
कुछ अजब सा घट गया
ताजे पानी का वह सोता
जिसकी वजह से झील थी
मुँह मोड़ गया उस से
सूख गया वह जल स्रोत
न जाने क्यों और कैसे

और उसी दिन से ही
बुरे दिन शुरू से हो गये
झील पहले जैसी न रही
पूरे शहर की नालियाँ ही
अब केवल गिरती थीं वहाँ
किनारों पर उगने लगी
जलकुम्भी, काई, गाद भी
मौका ताड़ मौकापरस्त
पाटने लगे किनारों को
जैसा हमेशा से होता आया है
सबसे पहले धर्म स्थल बना
मुफ्त की उस जमीन पर
फिर कार्यालय बनने लगे
राजनीतिक दलों के भी
जमीन घेरने वालों की
एक नयी बस्ती उग आयी
एक बात सभी ने समान की
अपनी नालियों का मुंह
खोला झील की तरफ ही
एक कोने पर डलाव भी बना
साफ सुथरे चमकते शहर के 
कूड़े के निस्तारण के लिये

आज उस का पानी गंधाता है
चारों तरफ उग आई झाड़ियां
भांग के अनचाहे पौधों की
जिनके बीच छुपे हुऐ अक्सर
हथेलियों में पत्ते मलते नशेड़ी
दिन भर करते रहते हैं जुगाड़
अगले चंद घंटो के नशे का
शहर से दुत्कार भगाये गये
मरणासन्न खुजियल कुत्ते भी
रहते हैं उन्ही किनारों पर
हर आते जाते हुऐ शहरी पर
भौंकना कर्तव्य मानते हैं जो
किनारों की कीचड़ के बीच
लोटतें है सुअर भी छपाछप
कभी कभी कुछ भैंसे भी
उतराती दिखती हैं पानी में 
आम शहरी तो आजकल
नहीं ही जाता है उस तरफ
कभी कभी मजबूर गर्जमंद
हो आते हैं फारिग किनारों पर

मैंने अपनी आंखों से देखा है
धीरे धीरे तब्दील हो जाना
नीले पानी की उस सदानीरा
लबालब भरी रहती झील का
एक गंधाते हुऐ जोहड़ में

दिल में मेरे एक हूक सी है
नहीं कुछ कर पाया उसके लिये
मानता हूँ गुनाहगार मैं खुद को


पर यह बताओ मुझे आप भी
क्या शहर के बाकी बाशिंदे भी


गुनाहगार नहीं हैं बराबरी के ?





...
 

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी पोस्ट पढ़कर खुशवंत जी की याद हो आई. कभी उनकी क़लम में भी साफ़ शफ्फाफ़ झील जैसी ताज़गी होती थी लेकिन अब उनकी ज़िंदगी भी आपकी कविता की झील जैसी हो कर गयी है .
    देखें-
    अब मैं अपनी जिंदगी से आजिज आ गया हूं
    खुशवंत सिंह, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार
    http://vedkuran.blogspot.in/2012/09/nastik.html

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  2. शान्ति और सौन्दर्य पर न जाने किसकी कुदृष्टि पड़ गयी।

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  3. झील, नदियाँ, तालाब जिसे जो मिला वही निगलता जा रहा है। हम सभी गुनहगार हैं।

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  4. गुनाहगार कौन ?? आश्चर्य कि अभी कुछ दिनों पहले ही मैंने भी की इसकी पड़ताल यहाँ--http://teremeregeet.blogspot.in/2012/08/blog-post_6.html

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  5. कुछ दिनों पहले वाणी शर्मा ने भी यही पीड़ा व्यक्त की थी .....
    मगर अभी भी गनीमत है कि अभी भी सभी झीलों का यह हाल नहीं हुआ है !

    उत्तर देंहटाएं

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