बुधवार, 12 सितंबर 2012

कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी, यकीनन तुम देशद्रोही नहीं, पर मैं तुम्हें देशभक्त कतई नहीं कहूँगा... इतना जरूर कहूँगा कि तुम्हारी शिक्षा सही तरीके से नहीं हुई है !

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This cartoon depicts the Indian Parliament building as a toilet. At the right end of the cartoon, a little above the halfway line, there is a roller with toilet paper. To the left, there is a pink flush, attached to a commode below with three flies hovering over it. The commode looks like the Indian Parliament. ‘National Toilet,’ says the cartoon’s title, with this line beneath the sketch: ‘Isme istamal hone wale toilet paper ko ballot paper bhi kehte hain’ (the toilet paper used here is also called Ballot paper). 





Another offending cartoon redraws India’s national emblem of the four Sarnath lions of King Asoka that sit above the motto “Satyameva Jayate” (truth alone shall triumph) as bloodthirsty wolves underscored with the motto “Bhrashtamev Jayate” (long live corruption).






And yet another features the “Mother India,” wearing a tri-color sari, about to be raped by a character labeled “Corruption." The title of the cartoon is "Gang Rape of Mother India." 






और सबसे ज्यादा दुखी करता यह कार्टून देखिये जहाँ भारत के संविधान पर कसाब नाम का चौपाया पेशाब करता दिखाया जा रहा है।




मैंने सेना में काम किया है, और अपनी आँखों से अपने साथियों को भारत देश के झन्डे, निशान व संविधानिक मूल्यों के लिये वालंटीयर कर हंसते-हंसते शहीद होते, रक्त बहाते देखा है...


कार्टून बनाने के नाम पर इस तरह की घटिया-बेतुकी गंदगी परोसने से मैं आहत हूँ...


पर असीम त्रिवेदी का इस तरह गुणगान होता देख मुझे अपने आप पर और अपने जीवन मूल्यों पर ही शक होने लगा है... आज तक मैं यही सोचता था कि मेरे देश में मुझ जैसे ही बहुतायत में हैं... पर लगता है कि मैं गलत हूँ...


इसलिये बेहद भरे मन से असीम त्रिवेदी से यह कहना चाहूँगा कि...



कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी, यकीनन तुम देशद्रोही नहीं, पर मैं तुम्हें देशभक्त कतई नहीं कहूँगा... इतना जरूर कहूँगा कि तुम्हारी शिक्षा सही तरीके से नहीं हुई है ! तुम्हें अभी और अनुभवों व बेहतर तथा सही शिक्षा की जरूरत है...



क्या आप मेरे साथ हैं ?



आभार !







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60 टिप्‍पणियां:

  1. कल रचना जी की पोस्ट पर ये टिप्पणी दी थी वही यहाँ भी दे रही हूं मुझे लगता है की ये समझ समझ का फेर है अब उन्ही कार्टून को मेरी नजर से देखीये | एक कार्टून में वो दिखाते है संविधान के ऊपर कसाब रूपी कुत्ता पेशाब कर रहा है और लिखा है की इसका जिम्मेदार कौन है , आप को कहा से ये दिखता है की इसमे संविधान का अपमान है असीम तो खुद ये पूछ रहे है की कसाब जैसा व्यक्ति देश में घुस कर हम पर ( हमारे संविधान ) हमला कर देता है उसका जिम्मेदार कौन है , ये सविधान का अपमान नहीं है बल्कि उसके अपमान के जिम्मेदार लोगों से किया गया सवाल है | दूसरे में अशोक स्तंभ के रूप को बदला गया है तीन भेड़िया है और नीचे लिखा है भ्रष्टमेव जयते ! इसमे भी साफ है की वो व्यंग्य ही कर रहे है देश की हालत पर, जिसमे वो बताने का प्रयास कर रहे है की भ्रष्ट लोगों ने देश के चिन्हों को बदल दिया है , उसके वाक्य को बदल दिया है | एक और है जिसमे संसद को टायलेट की तरह दिखाया गया है यहाँ संसद का अपमान नहीं है बल्कि ये दिखाया जा रहा है की समाज की सारी गन्दगी आज संसद में जा कर बैठी है सांसद के रूप में, संसद नहीं सांसदों पर व्यंग्य है | ये भी जान ले की जिस वकील साहब ने केस किया है वो महाराष्ट्र में दलित राजनिती करने वाले पार्टी से जुड़े है जो अपनी सारी राजनीति अम्बेडकर और संविधान के नाम पर करती है उसे तब कोई आपत्ति नहीं होती है जब सांसद में बैठ कर लोग अपनी मन मर्जी से अपने स्वार्थो के लिए जब चाहे जो चाहे उसमे बदलाव कर देते है |

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  2. भारत माता वाला कार्टून तो मुझे भी पहली बार में अच्छा नहीं लगा किन्तु थोडा सोच फिर याद आया की हम जैसे लोग जो कार्टून नहीं बनाते है और बस लिखना जानते है वो सारे लोग ना जाने कितनी बार यही बात अपने शब्दों में कहते रहे है , याद कीजिये हम में से कितने ये शब्द बार बार प्रयोग करते है की नेताओ नौकरशाहो ने मिल कर देश को लुट रहे है या देश को बेच खाया , अब इसी शब्द को कार्टून में या चित्रों में ढालिए तो यही उभर के आयेगा जो असीम दिखा रहे है | हा ये ठीक है की समाज की कुछ गन्दी बुराइयों को इस तरह खुल कर नहीं दिखा देना चाहिए, सच है तो क्या हुआ गन्दा लगता है बुरा लगता है | रही बात शिक्षा की तो प्रवीण जी इस बात को याद रखिये की असीम आप के और हमारे ज़माने के नहीं है वो जिस समाज देश के देखते हुए बड़े हुए है वहा सीवा भ्रष्टाचार ( ये तो हमेसा ही होता था तब हमें पता नहीं चलता था अब सभी को पता चल जाता है ) चोरी देश की बर्बादी को देखते हुए बड़े हुए है उनमे ऐसा ही आक्रोश रहेगा और उनके पास इस आक्रोश को खुल कर सामने लाने की जगह भी है | अनुभव वाली बात से सहमत हूं अनुभव के साथ वो सीख जायेंगे की कैसे कुछ गंदगियो की तरफ मुँह फेर कर हम जैसो की तरह चुपचाप जिया जाता है कुछ करने के बजाये बस बोल बचन किया जाता है |

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    1. अंशुमाला जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ बस नज़रिये का फ़र्क है ।

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  3. अपने देश को 'डायन' और आतंकवादियों के लिए 'सम्मानजनक' शब्दों का प्रयोग करने वालों को सर पर बिठाने वाले लोगो के बीच इन 'कार्टूनिस्ट महाशय' के लिए सजा की बात सोचना भी मुर्खता है...

    भारत वर्ष के सम्मान में अपने शीश गंवाने वालों को 'ज़ीरो' और देश के संविधान और मान-सम्मान को पेशाब में भीगते हुए दिखाने वालों को 'हीरो' बनते हुए देखना वाकई दुखद है!







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  4. praveen ji
    i agree to your post
    none has the right to express themselfs and dishonor our country , our flag , our constitution , our parliament , our law
    we cant abuse everything and say we are creative

    I AM WITH YOU

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    1. Rachna ji ; Till yesterday, Mr. A Raja was the minister of telecom on DoT web site. Was that not a disrespect to the constitution ? Our politicians and ministers take the oath of office " I pledge my loyalty to the............." and how much loyalty they show is an open secret. Is that not a case of sedition ? Why don't our law enforcement agencies slap a case of sedition on those ministers instead of going for our so called lengthy judiciary procedures? They are dishonoring our country, our flag our constitution, our law each and every day.

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    2. right sir i agree but does that mean that we also need to show disrespect to the flag / constitution

      why doesnt a common man start usi RTI in every day life . why we are so afraid that we never want to become a whistle blower

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    3. रचना से सहमत हूँ ...

      लोगों को देश और राजनैतिक पार्टियों में फर्क करना आना चाहिए , राजनैतिक पार्टियों कि हरकतों के कारण देश के सम्मान के साथ जोड़कर देखने वालों के कारण विश्व में हम लोगों कि जो छीछालेदर हुई है वह बेमिसाल है...

      घर की कमियों के कारण अपनी माँ को गाली नहीं दिया करते...
      अगली बार वोट प्रयोग करें तभ स्वस्थ परम्परा कहलाएगी !

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  5. शाह जी , बस इतना ही कहूँगा कि आपको कार्टून पढ़ने की समझ नहीं है!

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      आदरणीय गोदियाल जी,

      मेरी कार्टून पढ़ने की समझ पर आपकी इस बेबाक राय का बहुत बहुत शुक्रिया... कोशिश करूंगा कि यह 'समझ' विकसित हो... :)



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  6. शाहनवाज जी वैसे तो समझ आ रहा है आप क्या कहना चाहते है लेकिन जरा मुझे ये भी समझाइये कि भारत माता को डायन कहने वाले या आतंकी के लिए सम्माजनक शब्दो का प्रयोग करनेवालों का काम किस तरह से किसी सुधारवादी का काम है?क्या उनसे देश की समस्या की तरफ ध्यान खींचा जा सकता है या कोई ढंग की वैचारिक बहस खड़ी की जा सकती है?आप किस तरह असीम के काम को उन घटिया राजनेताऔं के केवल अपने राजनैतिक स्वार्थपूर्ति के लिए दिए बयानो के समकक्ष रख रहे है।अंशुमाला जी की व्याख्या से सहमत हूँ ।और इस गलतफहमी से बाहर आईये कि उन दोनों नेताओं को किसी ने सर पर बैठाया हुआ है कानून को देखे तो इन नेताओं का काम भी देशद्रोह तो नहीं माना जाएगा पर हाँ आलोचना लायक तो हैं ही जो लोगों ने की भी हैं।भारत माता के चित्र से मेरी भी असहमति है पर इसके पीछे भी असीम की कोई दुर्भावना नहीं थी।

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    1. पहली बात तो यह राजन जी कि मैंने किसी भी राजनेता से असीम की कोई तुलना की ही नहीं है... वैसे भी तुलना करने के लिए दोनों पक्षों के बारे में कम से कम किसी एक विषय पर तो जानकारी होनी ही चाहिए... और इस मामले में मैं असीम नाम के इस प्राणी और इसके कार्टून्स से पहली बार रूबरू हुआ... और इसमें भी उपरोक्त कार्टून्स में से कम से कम दो-कार्टून्स तो ऐसे हैं जिन्हें दुबारा देखने की हिम्मत भी मुश्किल से कर पाया...

      मेरे द्वारा राजनेताओं का ज़िक्र करने से अभिप्राय केवल इतना ही था कि जिस देश के लोग / सरकारें ऐसे राजनेताओं के उल-जलूल बयानों को हज़म कर लेते हैं और यहाँ तक कि सर का ताज बना कर रखते हैं.... वहां पर ऐसे घटिया कार्टून बनाने वालों को सज़ा होने की बात सोचना भी मूर्खता है... और मेरे इस वाक्य से भी साफ़ ज़ाहिर होता है कि मेरा रोष उपरोक्त राजनेताओं से अधिक है...

      जहाँ तक इन कार्टूनिस्ट महाशय की मंशा की बात है तो मैंने इनकी मंशा पर कभी शक नहीं किया, वैसे इनकी मंशा इन कार्टून्स में बिलकुल साफ़ है भी नहीं. एक तरफ भ्रष्टाचार से लड़ाई की कोशिश और दुसरी तरफ अपने आप को दुनिया में चमकाने के घटिया तौर-तरीकों का प्रयोग... अब इन दोनों बातों में से केवल एक ही ठीक हो सकती है...

      लेकिन मैंने सवाल इनकी मंशा पर नहीं इनकी कार्य पर उठाया है... मेरी नज़रों में कोई भी नेक कार्य इस बात की आड़ नहीं हो सकता कि अपने वतन के रिप्रेजेंट करने वालों चिन्हों का मज़ाक बनाया जाए....

      अभी तो यह कुप्रयास इन महाशय ने किया है, कल को अगर ऐसी हरकत कोई विदेशी करेगा तो हमारा खून खौलना स्वाभाविक ही होगा...

      बात यहाँ देशद्रोही होने या ना होने की है ही नहीं... बात केवल इतनी सी है कि क्या अपने किसी भी अच्छे या बुरे मकसद के लिए देश की आन-बान-शान के प्रति ऐसी ओछी हरकतें बर्दाश्त की जानी चाहिए.... ज़रा सोचिये जो देश की आन के लिए जान कुर्बान करने का जज़्बा रखते हैं और जो कुर्बान कर रहे हैं, उनके दिल पर क्या बीती होगी यह कार्टून्स देखकर?

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    2. यहाँ से मेरा कमेन्ट कहाँ गया? :-(

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    3. शाहनवाज जी का कमेट मेल में दिख रहा है पर यहाँ नहीं ।प्रवीण जी कृप्या उसे वापस लाएँ तभी मैं जवाब दे पाऊँगा।

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    4. शाहनवाज जी मैने ये कहा है कि दोनों को एक समान ही मान लिया है।और भाई मैने कब कहा कि आपमें दिग्विजय सिंह और आजम खान के लिए कुछ कम गुस्सा है?आप क्यों इतने रक्षात्मक हो रहे हैं?असीम ने वही किया है जो हम लोग अपनी टिप्पणी या पोस्ट में आए दिन करते रहते है जाहिर है उपलब्ध माध्यम द्वारा अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए न कि मशहूर होने के लिए पर कुछ तो बात है कार्टून विधा में कि यह कहीं ज्यादा मारक होती है (तभी आजकल कार्टूनिस्ट्स की शामत आई हुई है) वर्ना ये बात तो यहाँ कितनी बार कही गई है कि आज के माहौल को देखते हुए भ्रष्टमेव जयते कहना ज्यादा सही है।संसद के बारे में मैं खुद कहता हूँ कि वह भ्रष्ट और स्वार्थी तत्वों का अड्डा बन चुकी है।लोकतंत्र के मंदिर के उलट जो तस्वीर इसकी बना दी गई है उसे असीम ने सही दिखाया है।संसद केवल एक इमारत नहीं होती है।कसाब के मामले में भी कानून बिल्कुल लाचार नजर आ रहा है जबकि उसे आतंक मचाते टीवी पर पूरी दुनिया ने देखा।मुंबई हमले के पीड़ितों की नजर से भी देखिए।फिर भी मानता हूँ कि तरीके से असहमति हो सकती है पर उनकी मंशा देश को बदनाम करने की बिल्कुल नहीं थी।

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    5. देखिये राजन भाई, मेरा गुस्सा केवल किसी खास राजनेता से नहीं है, बल्कि हर एक उस नेता से है जो केवल अपने वोटो के फायदे के लिए देश को ना केवल भूल जाते हैं बल्कि अपनी हरकतों के कारण जाने या अनजाने देश का नुक्सान करते हैं.... ऐसे लोग दूसरों के दिल में भी वतन की मुहब्बत को कम से कमतर करते जा रहे हैं... हालाँकि जानता हूँ कि ऐसा नहीं हो सकता, लेकिन फिर भी इन हरकतों को देखकर इससे डरना चाहिए कि अगर देश पर अपनी जान कुर्बान करने वाला जज्बा ख़त्म हो गया तो अपना वतन ही समाप्त हो जाएगा. क्योंकि रूह के बिना बदन बेकार हो जाता है.

      दूसरी बात, भ्रष्ठ नेताओं के कारण लोकतंत्र कभी भी कमज़ोर नहीं हो सकता है बल्कि इसकी कमजोरी केवल और केवल हमारी इच्छा शक्ति है... जिस दिन अवाम जाग गयी उस दिन राजनेता या तो दुनिया में सुधर जाएंगे या दुनिया से सिधार जाएंगे...

      तीसरी बात यह कि मैं नहीं मानता कि कसाब के मामले में देर हुई है... बल्कि यह एक बहुत ही बेहतरीन बात है कि इतने कम समय में उसे सुप्रीम कोर्ट तक से सज़ा-ए-मौत का निर्णय हो गया... यह अवश्य मानता हूँ कि देश के खिलाफ युद्ध जैसे अपराध का मुकदमा फास्ट ट्रेक कोर्ट में चलना चाहिए और ऐसे केस में सज़ा-ए-मौत मिले मुजरिमों को राष्ट्रपति के पास दया याचिका के लिए जाने का अधिकार नहीं होना चाहिए और हो भी क्यों? जबकि उन्होंने उसी देश के खिलाफ युद्ध जैसा अपराध किया हो जिसके सदर के पास वोह दया याचिका लेकर जाना चाहते हैं?

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    6. शाहनवाज जी,आपका मतलब यदि कुछ खास राजनेताओं से नहीं था तो असीम ने भी कसाब के मामले को केवल एक उदाहरण के तौर पर ही प्रयोग किया होगा।जब राजनेता किसी आतंकी क घटना के बाद बचाव में ये कहते हैं कि हमले तो अमेरिका में भी होते रहते हैं तो उन्हें ये भी देखना चाहिए कि आतंकियो के प्रति अमेरिका की क्या नीति है।वो न सबूत जुटाने की परवाह करता है न दूसरे देशों की प्रतिक्रिया की।मैं ये नहीं करता की हमें पूरी तरह अमेरिका का ही अनुसरण करना चाहिए लेकिन आतंकवाद मसले पर राजनीति से तो जरूर ऊपर उठना चाहिए।रही बात जनता की तो मुझे नहीं लगता की उसमें जागरूकता की कोई कमी है।और अगर कमी है भी तो वो इतनी कोई गंभीर नहीं है कि उसे जगाया नहीं जा सके बल्कि सच तो ये है कि उसके हाथ में कुछ है ही नहीं कहीं उसकी तरफ से कोई आवाज उठती है तो उसे बलपूर्वक दबा दिया जाता है।कश्मीर,पूर्वोत्तर,रावला घडसाना,नंदीग्राम सिगूर कई उदाहरण है।लंदन में इतने दंगे भी हुए तब भी एक गोली नहीं चली हमारे यहाँ लोग जायज हक के लिए भी विरोध करते है तो लाशे बिछ जाती हैं।

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  7. यहाँ कुछ सज्जानो को एक और बात मैं पूछना चाहूँगा कि ११ अगस्त को मुंबई में कुछ मुस्लिम संघठनो ने कैमरे के सामने लात मारकर अमर जवान ज्योति यानी हमारे अमर शहीदों का खुल्लमखुल्ला अपमान किया ! जानना चाहूँगा कि मुंबई पुलिस ने उनमे से कितनो पर देशद्रोह की धारा लगाईं है ?

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    1. aap yahaan kyu puchh rahae haen
      mumbai pulis ki website par bhi yae baat keh saktae haen

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    2. Madam;
      Main kisee vaad-vivaad me nahee padnaa chaahtaa, bas itnaa kahungaa ki One cannot have it both ways. Freedom of expression is the hall mark of a mature society.
      Regards,

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    3. अवश्य लगानी चाहिए देशद्रोह की धारा... और फिर कानून के मुताबिक कार्यवाही होनी चाहिए.... क्या किसी मुस्लिम संगठन ने उनकी गिरफ्तारी का विरोध किया? क्या किसी ने उनको हीरो बनाने की कोशिश की?

      और अगर ऐसा हुआ है तो उनका भी बहिष्कार होना चाहिए... देश से प्रेम तो ईमान का हिस्सा है...

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    सभी से,

    १- दो चार घोटाले और उन घोटालों का हल्ला... पर क्या इसका अर्थ यह है कि हमारी संसद में कोई अच्छा सांसद नहीं या संसद ने कोई अच्छा कानून नहीं बनाया या पारित किया... लोकतंत्र के चार पायों में से एक है यह... यह कोई न भूले कि तमाम कमियों के बावजूद भी यदि हम आज दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं, जहाँ रक्तहीन सत्ता परिवर्तन होता है तो इसमें हमारी संसद व सांसदों का कम योगदान नहीं...

    अपने अपने घर बैठ अपने, अपनी जाति या धर्म के स्वार्थ साधना तो हर कोई कर सकता है पर यह संसद ही है जहाँ सामाजिक न्याय को लेकर सभी सांसद, एकाध अपवाद छोड़ एकमत हैं...

    २- चंद भ्रष्ट लोग या उनकी करतूतें क्या किसी राष्ट्र का प्रतीक चिन्ह व ध्येय वाक्य बदल सकते हैं... यह हमें सोचना है...

    ३- कुछ चोर, कुछ घोटालेबाज, कुछ बेईमान अफसरान यह तो हो सकता है कि देशहित को नुकसान पहुँचाने में कामयाब हो जायें... पर क्या इसे भारतमाता का गैंगरेप कहेंगे ?


    ४- हमारे ही नहीं अधिकतर लोकतंत्र के संविधानों का आदर्श है कि जब तक किसी का भी अपराध पूरी तरह साबित न हो जाये व वह कानून के अंतर्गत उपलब्ध सभी मंचों का उपयोग न कर ले उसे सजा नहीं दी जा सकती... कसाब के साथ यही किया जा रहा है व सुप्रीम कोर्ट में उसे राजू रामाकृष्णन सा काबिल वकील भी इसलिये दिया गया... क्या न्याय होने की प्रक्रिया में लगे वक्त के कारण संविधान को अपमानित करना उचित है... क्या लोकतंत्र में कंगारू कोर्ट होनी चाहियें ?



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  9. आश्चर्य की बात है कि इन्डिया अगेंस्ट करप्शन जिससे असीम त्रिवेदी जुड़े हैं खुद राजनीतिक विकल्प देने की बात कर रहा है, मतलब यह लोग भी टोयलेट पेपर बटोर कर कमोड में डुबकी मारेंगे और इनके वहाँ डुबकी मारते ही वहाँ कमल खिलने लगेंगे।

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  10. मेरी समझ से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता शर्तों के अधीन स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। गुलाम भारत में बना वह काला कानून समाप्त किया जाना चाहिए।

    मेरी समझ से सच्चा व्यंग्यकार वही है जिसके व्यंग्य को पढ़कर लोग तिलमिला जांय। उसे मारने के लिए दौड़ पड़ें। वही हाल कार्टूनिस्ट का भी है। वह अपने तीखों व्यंग्य से वही कहलाना चाहता है जो दूसरे देशभक्त उसका विरोध करते हुए कहते हैं। वह यही सब बातें याद दिलाना चाहता है। वो नींद में सो रही जनता को कड़वी गोली के माध्यम से झंझोड़ना चाहता है। पहले कम पावर की एंटी बैक्टिरिया से भी मर्ज ठीक हो जाता था। अब डाक्टर कहता है इससे नहीं चलेगा ये 500 वाली टैबलेट खरीदो तभी बुखार उतरेगा। मुझे लगता है इन मुद्दों को उठाकर असीम त्रिवेदी ने अपनी देशभक्ति ही सिद्ध की है। असीम त्रिवेदी गद्दार तभी हो सकते हैं जब ऐसा करने के पीछे उनका उद्देश्य मात्र सस्ती लोकप्रियता हासिल करना या दुश्मन राष्ट्र से मिलकर देश को अपमानित करने की भावना का होना सिद्ध हो जाय। बिना इसके उनकी नीयत पर संदेह करना ठीक नहीं लगता।

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    1. देवेन्द्र पांडे जी विरोध केवल उनका होना चाहिए जिसने कोई गलत कार्य किया हो... यह क्या बात हुई की कीड़े तो किसी फल में पड़ें और नुक्सान पेड़ को पहुँचाया जाए???

      जहाँ तक किसी कानून की बात है तो उसको लेकर अवश्य ही विरोध दर्ज कराया जा सकता है लेकिन उसके लिए भी संविधान को दुश्मनों के पेशाब में डूबा हुआ नहीं दिखाया जाता? ज़रा सोचिये तो सही कि हम किस राह पर जा रहे हैं?

      और बात केवल इतनी नहीं है कि दुश्मन राष्ट्र के साथ मिलकर देश को अपमानित करना ही गलत है... बल्कि अपनी नासमझी या नाकाबिलियत के कारण घर का ही नुक्सान करने वालों को उसकी गलती पर समझाया जाता है ना कि उसको हीरो बनाया जाता है...

      जिनको हीरो बनाया जाना चाहिए उनकी सुध तो ना सरकार लेती है और ना जनता...

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  11. कार्टूनिस्ट ने कड़वी हकीकत पेश की है फिर भी उसे अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त करते समय थोड़ा सतर्क रहना चाहिए था|

    कैसे बचे ईमानदारी ?

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    अंशुमाला जी कहती हैं:-
    "एक कार्टून में वो दिखाते है संविधान के ऊपर कसाब रूपी कुत्ता पेशाब कर रहा है और लिखा है की इसका जिम्मेदार कौन है , आप को कहा से ये दिखता है की इसमे संविधान का अपमान है असीम तो खुद ये पूछ रहे है की कसाब जैसा व्यक्ति देश में घुस कर हम पर ( हमारे संविधान ) हमला कर देता है उसका जिम्मेदार कौन है , ये सविधान का अपमान नहीं है बल्कि उसके अपमान के जिम्मेदार लोगों से किया गया सवाल है |"

    पहली बात तो यह है कि कार्टून इस संदर्भ में नहीं बनाया गया है यह कार्टून कार्टूनिस्ट की कसाब को सजा मिलने में लग रही तथाकथित देरी पर बनाया गया है। अगर अंशुमाला जी की ही बात को मान लिया जाये तो आतंकवाद का शिकार दुनिया के अधिकाँश लोकतंत्र हैं, कौन सा ऐसा देश है जिसे इस तरह के हमलों का सामना नहीं करना पड़ा, 9/11 जैसे बड़े हमले के बाद अमेरिका जैसे मुखर लोकतंत्र, जहाँ कार्टून बनाने की बहुत पुरानी परंपरा है, में क्या आपने कोई ऐसा कार्टून किसी को बनाते देखा है जिसमें ओसामा बिन लादेन अमेरिका के संविधान या प्रतीकों को इस कदर अपमानित करता दिखाया गया हो ?



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  13. देश भर में युवाओं में बढ़ रहे आक्रोश का प्रतीक है असीम , मगर मैं भी यह मानती हूँ कि विरोध प्रदर्शन में शालीनता होनी चाहिए .

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    १- यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि असीम त्रिवेदी को देशद्रोही, राष्ट्रद्रोही या गद्दार इस पोस्ट में नहीं कहा जा रहा, यह शीर्षक से भी स्पष्ट है... यहाँ मेरी आपत्ति केवल और केवल एक अपरिपक्व, सनसनी चाहने वाले व घटिया-बेतुके कार्टूनिस्ट को जयजयकार कर हीरो के तौर पर पेश करने को लेकर है...

    २- आदरणीय सतीश सक्सेना जी ने बहुत सही बात की है कि 'घर के किसी सदस्य की कमी के चलते घर की माँ को गाली तो नहीं दी जाती'...
    लोकतंत्र को भी एक बड़ा परिवार मानिये, अब इस परिवार के चंद भ्रष्ट, बिगड़ैल या बहके बच्चों के चलते लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर को कमोड बना दिखाया जायेगा, तिरंगे में लिपटी भारत माता को लाचार गैंगरेप का शिकार दिखाया जायेगा, राष्ट्र चिन्ह का मखौल उड़ाया जायेगा, और कसाब को संविधान पर पेशाब करते दिखाया जायेगा... यह कोई कार्टून अभिव्यक्ति नहीं, 'गटर की सोच' को कला कह परोसने का प्रयास है, वह भी उसी लोकतंत्र व संविधान की सद्भावना का सहारा ले, जिसे बेहद घटिया तरीके से अपमानित कर रहा है यह कार्टूनिस्ट...



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  15. हां-हा-हा...........इसे कहते हैं कि वक्त बलवान होता है ! जिस वक्त को कभी आप ठोकर मारकर निकल जाते है क्या पता वह कब लौट कर आ जाए और आपको भी हकीकत से रूबरू करवा दे ! यह सभी पर लागू होता है (including me also) . करीब ४-५ साल से इस ब्लॉग जगत को बहुत करीब से जानता हूँ ! औरबहुत से सज्जन ब्लोगर मित्रो जिन्होंने यहाँ अपने विचार रखे ( Including Shri Praveen Shah ji) को तभी से ब्लॉग पर बहुत करीब से जानता हूँ ! (उस ज़माने में ब्लोग्बाणी हमारी तमाम ब्लोगरो की) सक्रीयता में एक महत्वपूर्ण रोल अदा कर रही थी ) ये जो उत्तम बिचार इन्होने आज यहाँ रखे , इन्हें पढ़कर मुझे एम्. ऍफ़ हुसैन का प्रसंग ( हिन्दू देवताओं की नग्न मूर्तियाँ ) याद आ रहा है ......................और नीड़ लेस टु मेंशन हियर कि तब क्यों नहीं इन सज्जनों को इतने उत्तम बिचार इनके दिमाग में आये थे, जब ये हुसैन की उन कृतियों को कला का नाम दे रहे थे ? खैर, खरा बोलने की बुरी आदत है, किसी को ठेस पहुँची हो तो क्षमा !

    और अंत में एक बात श्री शाहनवाज जी को : सारा झगडा तो यही है भाईजान कि कार्यवाही की उम्मीद किससे करें ! वोट पिपासे इन टुच्चे भ्रष्ट राजनेताओं से ? या इनके उस वोट बैंक से जो आग सुलगाने में तो माहिर है, लेकिन फिर एक बाल्टी पानी की अपने हाथ में उठाये उस आग की तरफ पानी फेंकने का नाटक करते हुए अपने को दुनिया की नजरों में निर्दोष साबित करना चाहता है ? जिस तरह अयोध्या और पोस्ट गोधरा (गुजरात साम्प्रदायिक दंगे ) प्रकरण में ये हिंसा भड़काने के लिए बीजेपी के नेतावों के खिलाफ कार्यवाही की पुरजोर वकालात करते है, कितने मुस्लिम संघठनो ने मुंबई के आयोजकों के खिलाफ भी वैसी ही कार्यवाही की मांग की ? असं में इस १५ अगस्त को पाकिस्तान का झंडा फहराते हुए टीवी पर तो आपने भी देखा होगा, कितने देशभक्त मुस्लिम संघठन गाये आकर ये बोले की उनके खिलाफ भी देशद्रोह का मामला दायर करो ? भाईजान, दूसरे को सीख देना सबसे आसान काम है, इस दुनिया में ! ९/११ के बाद तमाम दुनिया के वाद-विवाद के इंटरनेट पोर्टलों पर आप देख सकते है मुस्लिमों की यह दलील कि ९/११ के हमले में अफगानिस्तान के उन निर्दोष मुसलमानों का क्या कसूर था जिन्हें अलकायदा और अमेरिका के युद्ध के बीच बली का बकरा बनाया गया ! मैं भी मानता हूँ कि एकदम सही दलील है यह ! लेकिन जब अभी अमरीका में जो भी तथाकथित फिल्म बनी, पैगम्बर से सम्बंधित, उसमे लीबिया में अमेरिकी राजदूत और तीन राजनयिकों का क्या कसूर था ? उस समय कहाँ गयी इनकी अक्ल ? आज तमाम फोरमों पर आप पढ़ लीजिये की किस तरह मुस्लिम बुद्धिजिबियों द्वारा उसे उचित ठहराया जा रहा है !

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    उत्तर
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      आदरणीय गोदियाल जी,

      आप शौक से खरा खरा बोलें... पर आपको यह याद जरूर दिलाउंगा कि हुसैन वाले मसले पर मेरी पोस्ट यह थी...

      http://praveenshah.blogspot.com/2010/01/artistic-freedom.html

      फिर दोहराउंगा, हुसैन की भी गटर की सोच थी, और असीम त्रिवेदी की भी गटर की सोच है... दोनों के नाम व धर्म अलग अलग होने के कारण आप जैसे बहुतों के स्टैंड दोनों मामलों में अलग अलग हैं, पर मेरा मत दोनों में एक सा रहा है जिस पर मुझे गर्व भी है !


      ...

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    2. अमेरिका चीन और पाकिस्तान
      का कोई शख्स
      ऐसा करेगा तो भारत से चिढकर
      या उसे अपमानित करने के इरादे
      से करेगा न कि उसका ये काम
      किसी सुधारवादी का काम होगा।
      असीम ने ये काम देश की हालत
      बयान करने के लिए किया है।
      बात तो यहाँ नीयत की ही है।
      हुसैन का विरोध इसलिए
      किया गया कि वह अपने धर्म पर
      भी कलात्मक होकर दिखाए।
      उनका काम भी कोई
      सुधारवादी कदम
      नही था बल्कि एक
      कट्टरपंथी मानसिकता के
      व्यक्ति की घृणित सोच
      ही इसके पीछे थी।ऐसे ही उन्होने
      अपने चित्रो की असीम की तरह
      कोई व्याख्या नही की थी और
      मुकदमे के डर से भाग खडे हुए थे
      ये कमेट मैंने मेहल्ला लाईव पर किया था जिसमे यह पूछा गया था कि हुसैन का विरोध करने वाले असीम का समर्थन कैसे कर रहे है और यदि कोई विदेशी असीम जैसा काम करेगा तो तो हम क्या करेगे।

      हटाएं
    3. आदरणीय शाह जी ! चलिए आपको उस लिस्ट से अलग कर देता हूँ जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया ! लेकिन फिर आपसे पूछता हूँ कि जिस तरह प्रखर होकर आपने यहाँ असीम की आलोचना की, क्या आप बताएँगे कि आपने ऐसी ही आलोचना एम्-ऍफ़ हुसैन की भी की थी ! सिर्फ एक लिंक लगाकर माइक्रो पोस्ट में यह कह देना की मैं दुखी हूँ , एक जिम्मेदार नागरिक के कर्तव्यों की इतिश्री नहीं कहे जा सकती ! मैं नोट कर रहा था की जब वही चित्र और लेख बाद में अदा जी ने अपने ब्लॉग पर भी दरसाए तो आपने वहाँ भी एक अच्छे कूटनीतिज्ञ का रोल अदा कर सिर्फ अदा जी को यह कहा कि मैं सोच रहा था की आपने मेरे ब्लॉग के लेख की टिपण्णी को क्यों डिलीट किया ! लेकिन आपने खुले शब्दों में हुसैन की वहाँ भी निंदा नहीं की !

      कुछ गलत कह गया हूँ तो एक बार पुनह : क्षमा !

      हाँ , राजन जी को भी एक नेक सलाह है की अपनी टिपण्णी के सवालों का उत्तर कृपया मेरी इस टिपण्णी में तलाशे !

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    4. गोदियाल साहब माना कि आप मुझे भी अपनी नेक सलाह देने का लोभ संवरण नही कर पा रहे है।पर ये तो बताइये कि मेरी किस बात से आपको असहमति है।मैंने तो प्रवीण जी के इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की है कि मुझ जैसे हुसैन के विरोधी यदि असीम का समर्थन कर रहे हैं तो उसके पीछे आधार क्या रहा होगा।कम से कम मैं तो दोगला नहीं हूँ। असीम और हुसैन की मानसिकता को एक जैसा बताना तो और भी गलत है।और ये बात आप भी समझते होंगे कि दो व्यक्ति किसी एक बात पर सहमत या असहमत हैं तो भी उनकी सोच में फर्क हो सकता है।

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    5. राजन जी , शायद आप मेरी बात को नेगेटिव वे में ले गए ! मैं ही ठीक से एक्सप्लेन नहीं कर पाया ! कृपया मेरी बात को इस तरह लीजिये कि आप जो सवाल इनसे कर रहे है उसका जबाब भी मेरी टिपण्णी में मौजूद है ! नेक सलाह से मेरा आशय सिर्फ यही था ! थोड़ा और खुल के बोलू तो यह कहूँगा की जो लोग हुसैन के केस में कह रहे थे की यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है वे यह क्यों भूल रहे है की यह भी ( असीम के केस में) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की परिभाषा के अन्दर ही आता है !

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    6. .
      .
      .
      आदरणीय गोदियाल जी,

      मैं कूटनीति नहीं जानता... मेरी समझ से हुसैन के मसले पर मेरा रूख साफ साफ था... फिर भी अपनी समझ व सुविधा के हिसाब से निष्कर्ष निकालने के लिये आप स्वतंत्र हैं...


      ...

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    7. गोदियाल जी कम से कम मैंने तो भारत में पाकिस्तानी झंडा फैराने वाली ना देखी और ना ही सुनी... और अगर वाकई ऐसा हुआ है तो यह निहायत ही गलत है और अगर मुस्लिम तंजीमों ने जानते-बूझते हुए भी उनके खिलाफ नहीं बोला है तो साथ में वह भी उतने ही ज़िम्मेदार हैं... अगर ऐसी हरकतों को अगर मैं देखता और प्रोटेस्ट नहीं करता तो मैं खुद भी अपने आप को उतना ही ज़िम्मेदार मानता....

      लीबिया हो, अमेरिका हो या मेरा देश जहाँ भी जिसने भी मासूमों का क़त्ल किया वोह क़ातिल हैं... और इसमें मेरा मानना है कि सज़ा केवल उसको होनी चाहिए जिसने गुनाह किया है... ऐसे लोगों का साथ देना तो दूर, समर्थन करने वाले भी उतने ही गुनाहगार हैं...

      इस पर एक बात याद आ गई, मुहम्मद (स.) ने एक बार काबा करीम को देखकर फ़रमाया (जिसका मतलब है) - कितना इज्ज़त-अज़मत वाला है यह घर (काबा), लेकिन एक दिल को दुखाना इसको तोड़ने से बड़ा गुनाह है.... जहाँ दिल को दुखाना काबा को तोड़ने से बड़ा गुनाह है तो क़त्ल करना कितना बड़ा गुनाह होगा हैं... जिसके लिए कहा गया है कि "जिसने भी एक इंसान को क़त्ल किया उसने सारी इंसानियत को क़त्ल किया"... मगर हकीक़त है यह है कि जिनको धर्म का मतलब तक पता नहीं वही आज धार्मिक बने हुए हैं...

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    8. जहाँ तक एम. एफ़. हुसैन की बात है, तो जो भी किसी दुसरे के धर्म / मान्यताओं का मखौल उडाता है उसका विरोध किया जाना चाहिए... लोग अपने गुनाहगार को तो गुनाहगार और दूसरों के गुनाहगारों को सही समझते हैं... यह बेइन्तहा गलत है... अभी कोरिया में मेरी बात किसी से चल रही थी, तो किसी ने कहा कि मुस्लिम बैंकों से ब्याज लेना गलत है लेकिन गैर-मुस्लिम बैंकों से ब्याज लेना सही है.... इस पर मेरा जवाब यही था कि यह तो यह बात तो कुछ ऐसी हुई कि मुस्लिम के घर चोरी करना गुनाह है गैर-मुस्लिम के घर चोरी करना गुनाह नहीं है... और जब मैंने अपने एक भारतीय दोस्त (जो कि एक मुफ्ती हैं) से चर्चा की तो उन्होंने भी यही कहा... कि गुनाह चाहे मुस्लिम के साथ हो या गैर-मुस्लिम के एक बराबर है... गुनाह का कोई धर्म नहीं होता, वह तो केवल गुनाह ही होता है...

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    9. ऊपर मैंने अमेरिका चीन और पाकिस्तान का ही नाम इसलिए लिया क्योंकि जहाँ मैंने ये टिप्पणी की वहाँ इनका नाम लेकर ही सवाल पूछा गया था।वैसे किसी भी देश का नाम होता मेरा जवाब यही रहता।
      @गोदियाल साहब,
      मैं पहले ही स्पष्ट कर चुका हूँ कि मेरे अनुसार दोनों मामलों में क्या अंतर है।

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  18. समझ में नहीं आता लोग हुसैन के सभी विरोधियो को एक ही पलडे में रखकर क्यों देखते हैं? हुसैन का विरोध मुझ जैसे नास्तिक ने भी किया क्योकि उनकी मानसिकता दोगली थी।लेकिन आप हमें उन दक्षिणपंथी कट्टरपँथियो की तरह कैसे मान लेते है जो ये चाहते थे कि हुसैन को फाँसी ही होनी चाहिए?हम तो बस ये चाहते थे कि जैसे हुसैन एक दूरे धर्म के कट्टरपंथियो की परवाह न करते हुए अपनी कला का प्रदर्शन कर सकते है वैसा ही कुछ इस्लाम के भी बारे में करें,पेंटिग के जरिये न सही अपनी फिल्म के जरिये ही।लेकिन अपनी एक फिल्म में नबी शब्द के इस्तेमाल पर ही वह मुसलमानों से माफी माँग लेते है पर हिन्दुओं से नही।सभी को उनके सभी चित्रो से आपत्ति नहीं थी सवाल तो उनकी दोगली नियत का था वर्ना हिंदू धर्म के बारे में तस्लीमा ने भी बहुत कुछ कहा है पर उन्होंने अपने धर्म को सबसे पहले निशाने पर लिया।

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  19. अमेरिका में क्यों नहीं बना कार्टून ये कोई भी सवाल नहीं है, क्या हम हर बात में इंतजार करे की कोई बात अमेरिका में हो तब वो सही है जो वहा नहीं हो वो गलत हो गया , हा अमेरिका में भी बार बार आतंकवादी हमला होता रहता और देशद्रोह में दोषी आतंकवादी भी दूसरे उससे छोटे अपराधियों के बाद अपनी बारी आने का इंतजार दशक भर से कर रहा होता , आतंकवादी को फांसी देने से पहले उसका धर्म राज्य वोट बैंक की राजनीति देखी जाती तो ये कार्टून वहा भी जरुर बनाता बल्कि इससे भी ख़राब बनता , बनता क्या आज भी वहा पर अपने प्रतिको को लेकर लोग इतने संवेदनशील नहीं होते है तभी लोग बड़े आराम से अपने झंडे की बिकनी से लेकर पैजामा तक बना कर पहनते है , अब उठा दीजिये उनकी भी देशभक्ति पर उँगली | आप ने बड़ी चालाकी से मेरे बस एक ही कार्टून पर बात कही ( वो भी सीधे मुझे संबोधन दे कर नहीं कहा , क्यों ये बात भी समझ नहीं आई ) उस बात का जवाब नहीं दिया क्या आप ने कभी कही भी ये नहीं लिखा है की नेता नौकरशाह देश को लुट रहे है देश को बेच खा रहे है , यदि लिखा हो तो आप को उन कार्टून को गलत कहने का हक़ कभी नहीं है जबकि आप खुस वही काम शब्दों में कर चुके है , पहले खुद को गलत कहिये उसके बाद किसी और को |

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  20. प्रवीण जी
    मै याद करने का प्रयास कर रही हूं की जब आप ने स्पर्म में आत्माओ को खोजते हुए उन आत्माओ को फ्लश करने की बात कही थी तब उन प्रतिको में आस्था रखने वाले ने क्या आप की शिक्षा परवरिश पर ऐसे ही उँगली उठाई थी जैसे आज आप उठा रहे है , देख कर आश्चर्य होता है की जिस व्यक्ति ने सदा प्रतिको आडम्बरो का विरोध किया आज वो खुद दूसरो के पीछे प्रतिको के लिए अपनी मर्जी की आस्था करने के लिए डंडा लेकर खड़ा है , ये तो बिल्कुल वैसा ही लग रहा है जैसे एक पार्टी ने नारा दिया था की " हिन्दुस्थान में रहना है तो वन्दे मारतम कहना होगा " बस अब ये मत कहा दीजियेगा की वन्दे मातरम देश भक्ति का कोई प्रतिक नहीं है | ये दोहरी नीति है आप की आस्था का जो रूप है वही सभी के लिए हो ये जरुरी नहीं है | लोकतंत्र का मतलब ये कतई नहीं है की कोई भी चीज आलोचनाओ से परे हो जाता है कम से कम आप तो ये बात नहीं कहा सकते है जो सदा दूसरो के लिए आस्था के सबसे बड़े केंद्र भगवान की आलोचना करने से भी पीछे नहीं होता है | समाज से हर तरह के मवाद को बह जाने के लिए कहने वाले को युवाओ का बहता आक्रोश देख कर गुस्सा क्यों आ रहा है , खुद भ्रष्टाचार से आहत हो कर आक्रोश में भ्रष्टाचार की निशानी "आदर्श" को गिरा देने की बात कहने वाले को दूसरे के भ्रष्टाचार पर कुछ बोलने को सिमित क्यों करना चाहता है | फिर भी असीम ने भारत की संप्रभुता लोकतंत्र के खिलाफ कुछ भी नहीं बनाया है मात्र उसके प्रतिको का प्रयोग किया है | जहा तक बात उनके हीरो बनाने की है तो ये काम सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर देशद्रोह का केस लगा कर किया है वरना मै खुद मुंबई में जब उन्होंने ये कार्टून लगाये थे तो देखा था किन्तु आज तक उन्हें ना तो पहचानती थी और ना ही उनका नाम जानती थी ( होरो जैसा तो मै उन्हें नहीं मान रही हूं अभी वो बहुत युवा है और जैसा की आप ने कहा की उनमे अनुभव की कमी है ) और मेरी तरह ही ये कार्टून देखने वाले शायद ही कोई उनका नाम जनता हो, हा अब सरकार की कारस्तानी ने उन्हें हीरो जरुर बना दिया | यहाँ बात बस नजरिये के फर्क का है जिन लोगों को भी भ्रष्टाचार को लेकर किये गये अन्ना टीम का आन्दोलन पसंद नहीं था उन्हें असीम के कार्टून में बस खराबी ही नजर आ रही है जो उसे ठीक समझते थे उन्हें कार्टून में कोई बुराई नहीं लगती है |

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  21. जब हम किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होते है तो हम सदा सामने वाले की कमिया ही खोजते है और उनकी अच्छी बात को भी हर संभव तरीके से बुरा बना कर ही पेश करते है |
    "पर मैं तुम्हें देशभक्त कतई नहीं कहूँगा."
    सोच रही हूं की क्या हम ( आप और मै दोनों ) इस काबिल है की ये शब्द किसी अन्य के लिए प्रयोग करे ?

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  22. .
    .
    .
    अंशुमाला जी,

    (लीजिये सीधा संबोधन है इसलिये आपकी शिकायत दूर मानूँ... :) )

    १- कसाब को सजा देने में देरी नहीं की जा रही, यहाँ मामला अंतर्राष्ट्रीय स्तर का है और पूरे विश्व की नजरें हम पर हैं, न्याय होना ही नहीं चाहिये अपितु 'होते हुऐ दिखना' भी चाहिये दुनिया को... बड़ा मुकदमा है हजारों पेज की तो चार्जशीट ही है, समय लगता है... जब आप कहती हैं कि "धर्म राज्य वोट बैंक की राजनीति देखी जाती" तो कहीं न कहीं आप अपने हमवतनों को कटघरे में खड़ा कर रही हैं... मुझे नहीं लगता कि कसाब किसी भी भारतीय का हीरो है या कोई उसे बचाना चाहता है... तमाम कमियों व मतभिन्नताओं के बाद भी हिन्दुस्तान का हर आदमी जानता है कि कब साथ खड़ा होना है...

    २- अब आपके ही वाक्य में कुछ बदलाव कर पेश करूँगा:-

    जब हम किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होते है तो हम सदा सामने वाले की अच्छाइयाँ ही खोजते है और उनकी गलत-नावाजिब बात को भी हर संभव तरीके से अच्छा-अनुकरणीय बना कर ही पेश करते है |

    पूर्वाग्रह किसमें है, मुझमें या आपमें ? यह बहस का विषय है... और किनारे खड़ा पाठक ही इसका सही निर्णायक हो सकता है।

    ३- देश मात्र जमीन का एक टुकड़ा नहीं होता, कुछ हदों से बंधा सा... वह बनता है संस्थाओं से... मुझे कुछ व्यक्तियों के कर्मों के चलते संस्थाओं पर प्रहार अनुचित लगता है... हो सकता है कि मैं गलत होऊँ... पर क्या करूँ, मैं अपने दिल का गुलाम हूँ यहाँ पर...

    ४- मेरा मानना है कि आप और मैं दोनों ही देशभक्त हैं, देशभक्त होने की एक ही काबिलियत होती है वह है अपने देश के लिये सम्मान और कृतज्ञता रखना व उसका नागरिक होने पर गर्व करना... मुझे इस बात में कोई शक नहीं और न ही आपको होना चाहिये...

    ५- ईश्वर, धर्म और आध्यात्म मेरे विचार से अवधारणायें हैं... जिनका साबित होना अभी पेंडिंग है... मेरे इस विषय पर लिखने पर आस्तिकों ने बहुत आपत्ति उठाई, अभी भी उठाते हैं... कई पोस्ट भी आई हैं... केवल उदाहरण के लिये ही एक लिंक... यह देखियेगा, यदि समय हो तो...


    आभार!


    ...

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  23. १-कसाब वाला कार्टून सिर्फ कसाब की सजा के कारण नहीं उपजा है उसमे अफजल को भी जोडीये, ९३ मुंबई धमाको में आज तक सजा नहीं हो पाई है , कसाब के साथ भी रोज सुनवाई करके ये सारी कार्यवाही कब की ख़त्म की जा सकती थी किन्तु उसका हाल भी अफजल की तरह ही राष्ट्रपति के पास अटक गया तो ( नीजि रूप से कहु तो मै नहीं चाहती की कसाब को जल्द फांसी हो क्योकि जिंदाल की तरह भविष्य में और कितने उधर से पकडे जायेंगे उस समय कसाब ही असली गवाह बनेगा, किन्तु बाकि सब इस श्रेणी में नहीं आते है )
    २-जब मै हम लिखती हूं तो उसमे आप और मै दोनों ही आ जाते है नीचे एक जगह मैंने इसे साफ लिखा भी है | ये भी लिखा है की नजरिये का फर्क है आन्दोलन के खिलाफ और उसके पक्ष में रहने वाले के |
    ३- नेहरू जी ने एक बार कहाह था की राष्ट्र जमीन पेड़ पौधे नहीं है राष्ट्र का अर्थ है सिर्फ इस देश की जनता है | कोई भी देश वहा के नागरिको से बनता है नागरिक पहले होता है राष्ट्र उसमे से ही निकालता है, प्रतिक सिर्फ प्रतिक होते है वो अपने आप में राष्ट्र नहीं होते है और वो किसी राष्ट्र के नागरिक से तो कभी भी बड़े नहीं होते है |
    ४-यहाँ हमारी बात नहीं हो रही है मैंने सिर्फ इतना कहा है की हमें किसी के लिए ये शब्द प्रयोग नहीं करना चाहिए की "पर मैं तुम्हें देशभक्त कतई नहीं कहूँगा." क्या हमारे किसी काम पर कोई हमें ये शब्द कहे तो हम साफ कहेंगे की हमें ( आप मै और बाकि सब भी ) देशभक्ति का प्रमाण किसी से लेने की जरुरत नहीं है या कोई मुझे ये ना बताये की मै देश भक्त हूं या नहीं |
    ५-आपत्ति, असहमति, आलोचना , में कोई बुराई नहीं है आप को असीम के कार्टून नहीं पसंद आये कोई बात नहीं, किन्तु ये कहना की उन्हें शिक्षा ठीक नहीं मिली है , इस तरह हम बात के व्यक्ति के परिवार माँ बाप तक ले जा रहे है जिन्होंने शिक्षा संस्कार आदि आदि ठीक नहीं दिये , मुझे नहीं लगता है की आप के बारे में किसी ने ये शब्द कहे होंगे , मै इस बात का विरोध कर रही हूं |
    हम ( मै आप और सब ) दूसरो को कहते है की खूब सोच समझ कर कोई बात कहो किन्तु खुद शब्दों का चयन कई बार गलत करते है , जिसके कई दूसरे अर्थ भी निकलते है वैसे ही जैसे असीम के कार्टून को हर लोगों ने अपने नजरिये से देखा और किसी को गलत तो किसी को सही दिख रहा है |

    उत्तर देंहटाएं
  24. .
    .
    .
    अंशुमाला जी,

    आप की तमाम असहमतियाँ सिर माथे पर... आखिर असहमतियाँ ही विमर्श को बढ़ाती हैं और हमें एक दूसरे नजरिये से रूबरू भी...

    बाकी मैं हमेशा कहता हूँ कि इंसान और कुछ नहीं ढेर सारी गल्तियों का एक जीता-जागता, चलता-फिरता पुलिंदा ही तो है... जो जब जब ठोकर खाता है कुछ नया ही सीखता है... शिक्षा के साथ आप या कोई और परिवार-माँ बाप-परवरिश-संस्कार आदि को जोड़ कर देख सकता है मुझे यह अनुमान नहीं था... मेरे लिखे से ऐसा कोई अर्थ जा रहा हो तो क्षमा चाहता हूँ...


    आभार!



    ...

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  25. हम लोगों में देश प्रेम, राष्ट्रवाद की अत्यंत कमी है इसलिए असीम त्रिवेदी के कार्टूनों में हम में से बहुतों को कुछ गलत नज़र नहीं आता. जरा सोचें ऐसे ही कार्टून किसी ने किसी भी धर्म पर बनाये होते तो क्या होता? किसी धार्मिक प्रतीक को बिगाड़ा जाता तो क्या होता? कहीं किसी धर्म के पण्डे पुजारियों के कुकृत्यों का विरोध धार्मिक प्रतीक चिन्हों को बिगाड़ कर किया जाता तो क्या लोग उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सह जाते. काश हम लोग अपने देश से इतना प्यार करते की देश ही नहीं उसके प्रतीक चिन्हों के साथ भी जरा सी छेड़ छड होने पर उसे बरदाश्त ना कर पाते.

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  26. अंशुमाला जी,बाकी बातों से सहमति। लेकिन मेरे ख्याल से ये विषय अलग है कि प्रतीकों का कितना महत्तव है और कितना नहीं या देश का मतलब क्या है।यहाँ महत्तवपूर्ण बात ये है कि अगर असीम ने यदि किसी राष्ट्रीय प्रतीक का प्रयोग किया तो इसके पीछे उनका मकसद और नीयत क्या थी (जो कि सही है यानी व्यवस्था के प्रति रोष प्रदर्शित करना )।लेकिन यदि कोई व्यक्ति किसी गलत उद्देश्य के लिए गलत मानसिकता के साथ प्रतीकों का प्रयोग करता है तो यह निश्चित रूप से गलत ही होगा वहाँ हम ये नहीं कह सकते कि प्रतीक का मतलब राष्ट्र नहीं होता।
    क्योंकि किसीको देश का अपमान करना होगा तो वह भी तो किसी प्रतीक का ही इस्तेमाल करेगा इसी तरह देश को सम्मान देने के लिए भी किसी न किसी प्रतीक का ही प्रयोग होगा।हमेशा नहीं पर ज्यादातर यही होगा।

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    1. आप की नियत वाली बात से बिल्कुल सहमत हूं कई बार आप की नियत ही आप के काम को सही और गलत बनाती है |

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  27. प्रवीण जी ,
    सम्मान मात्र प्रतिको के ही सम्मान का मोहताज़ नहीं होता........
    मनुष्य व विचार सम्माननीय होते है, वस्तुएं नहीं, जनता से देश बनता है. स्वाभिमान जन का होता है जमीन का नहीं, जमीन तो उसी जन के उपयोगार्थ मात्र है. संविधान में सम्मान उसमे लिखित विधानों का है मात्र काले किए हुए कागजो का क्या महत्व है? वे कागज़ तो गल कर रिसाइकल होकर पता नहीं कहाँ जाते है. सम्मान व्यक्ति को दिया जाना चाहिए उसके घर या उसके कार्यालय को नहीं, किसी राष्ट्र समर्पित सांसद का सम्मान हो सकता है उनके कार्य स्थल में क्या है? गंदे व अच्छे जो भी निर्माण है इसी धरती पर टिके होते है. संस्थाएं भी क्या है ये सभी लोगो से बनती है, बिना लोगों के उनका क्या औचित्य है? उत्तम लोगों के समूह से उत्तम संस्थाएं तो बुरे लोगों के समूह से बुरी संस्थाएं द्रृष्टिगोचार होगी . इसलिए प्रतीक जड़ संकेत मात्र है सम्मान का हकदार तो सज्जन मानव ही होता है.

    @५- ईश्वर, धर्म और आध्यात्म मेरे विचार से अवधारणायें हैं... जिनका साबित होना अभी पेंडिंग है...

    प्रतीक चित्र जमीन आदि के सम्मान से राष्ट्र के जनसामान्य का सम्मान हो जाता है यह भी मात्र अवधारणायें ही है. मात्र इनमे ही सम्मान देखना अतिश्योक्ति है. वास्तविक सम्मान का हेतु तो मनुष्य है. यह वस्तुए नहीं. वस्तुओ के प्रति सम्मान से उसके वासिंदो का सम्मान साबित होना तो पेंडिंग क्या भ्रम ही है...

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  28. जिन राष्ट्र प्रतीकों के प्रयोग खास तौर से निजी प्रयोग पर भी कुछ पाबंदिया लगी है उसका इतना भोंडा व भद्दा प्रदर्शन तथा उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम देना कहा की आजादी है आपको नेताओं से चिढ हो सकती है आप उसकी आलोचना में व्यक्तिगत रूप से कुछ भी कह सकते है लेकिन कार्टूनों में संविधान के प्रतीकों का इस प्रकार तिरस्कार व उपहास मुझे तो आक्रोशित करता है एक तरफ आप संसद को टायलट व अशोक चिन्ह को भेड़िये के रूप में दिखाते है दूसरी ओर विरोध के लिए राष्ट्रीय झन्डे व वन्दे मातरम का नारा लगते है कुछ दिन बाद ऐसे ही कार्टूनिस्ट झंडे को किसी नेता के घर डायपर के रूप में सूखता हुआ दिखा सकते है यह कौन सी देशभक्ति है याद करे की जिस संवैधानिक आजादी की दुहाई दे कर आप आजादी की मांग कर रहे है उसी के प्रतीकों का आप इतना असम्मान कर रहे है तथा सरकार से सहनशीलता का रूख की अपेक्षा करते है
    यदि यही कार्टून पाकिस्तानी बनाते या मकबूल फ़िदा हुसैन बनाते तो क्या हम ऐसे ही छोड़ देते आखिर कौन सी भारत माता का जीवित पात्र हमारे मन में है जिसे अपमानित करने की इतनी आलोचना हुई थी
    असीम व ऐसे सिरफिरे कुंठित मानसिकता वाले लोगो को इलाज कराना चाहिए आपको नेताओं से निराशा हो सकती है लेकिन ये प्रतीक नेताओं के नही है इतनी मर्यादा तो होनी चाहिए

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  29. praveen ji, meri lambi tippani gayab hai - please check spam folder

    shilpa m

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  30. यह टिपण्णी सिर्फ शाहनवाज जी की जानकारी के लिए है ! नीचे एक लिंक दे रहा हूँ, भाईजान उसे देखिएगा जरूर 1 और साथ ही यह कहूंगा की यह खबर उस दिन अनेक राष्ट्रीय चैनलों ने दिखाई थी ! उसके बाद क्या हुआ ? क्या किसी राष्ट्रीय अखबार ने इसे उछाला ? नहीं !
    इसीलिये कहता हूँ कि होता तो यहाँ बहुत कुछ है लेकिन निशाने कुछ चुनिन्दा ही बनाए जाते है, अपनी सुविधा के हिसाब से ! अब कल पश्चमी उत्तरप्रदेश के मसूरी क्षेत्र में ही देख लीजिये कि एक धार्मिक गरंथ के कुछ पन्ने रेलवे ट्रैक पर क्या मिले एक की जान चली गई हजारों मुसाफिरों की जान मुस्किल में डाल दी गई उंहें रात खेतों में छुपकर बितानी पड़ी ! करोड़ों की राष्ट्रीय सम्पति फूक दी , सिर्फ चंद कागज़ के पन्नो को माध्यम बनाकर ! मकसद सिर्फ इतना कि माहौल बिगाड़ना है ! इंसान की कीमत उन पन्नो से कमतर ! और मै यह बात किसी एक धर्म या जाती को टार्गेट बनाकर नहीं अपितु सबके लिए कह रहा हूँ !
    http://www.flixya.com/video/4814644/Hidden-truth-Pakistani-Flag-Hosting-Assam-in-India-

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  31. @प्रवीण जी -
    यह केवल प्रतीकात्मक विरोध है -आप आहत न हों - कार्टूनिस्ट ने संविधान की पोथी या मदर इण्डिया या राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न को कलंकित करने की मंशा से यह सब नहीं किया है -उसने तो केवल ध्यानाकर्षण किया है कि इन पवित्र स्मारकों /चिह्नों को दरिंदों ने क्या से क्या कर दिया .....

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