शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

हाँ, अब सही है ! और स्वागत भी है, आपका अन्ना, 'पहाड़' के नीचे....

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कल आखिरकार देश के २३ प्रसिद्ध व्यक्तियों के अनुरोध पर अन्ना ने ३ अगस्त की शाम पाँच बजे से अनशन तोड़ने व एक स्वच्छ राजनीतिक विकल्प बनाने की दिशा में काम करने के बारे में कहा... 'टीम अन्ना' की अन्य कई बातों की तरह ही यह बात भी शायद ही किसी की समझ में आये कि मधुमेह से पीढ़ित श्री अरविन्द केजरीवाल व श्री गोपाल राय की २५ अगस्त से जारी अनशन के कारण खराब सेहत व उनकी जाँचों में कीटोन बॉडीज् की उपस्थिति के बावजूद क्यों अन्ना अपने और उनके अनशन को एक दिन और ज्यादा क्यों खींच रहे हैं... 'टीम अन्ना' खुद मान रही है कि सरकार पर अनशन का दबाव नहीं बन पा रहा, ऐसे में एक और दिन अनशन को खींचने के पीछे मात्र यही कारण नजर आता है कि इसी बहाने इलेक्ट्रानिक मीडिया की लाइमलाइट एक दिन और मिलेगी, कुछ लाख एसएमएस, अनेकों ट्वीट और फेसबुक पर एक्टिविटी होगी और आखिर में मीडिया के कैमरों के सामने नींबूपानी या फलों के रस का गिलास ले अनशन तुड़वाने व अपना समर्थन जताने व फोटो खिंचवाने का मौका मिलेगा कईयों को...

अपनी शुरूआत से ही यह आंदोलन हाल में हुऐ कुछ बड़े घोटालों के कारण उपजे जन आक्रोश को दुहने का कार्य कर रहा था, और जो तरीका टीम ने अपनाया, वह था जनता को ' जन लोकपाल' के रूप में एक ऐसे अवतार का सपना दिखाने का, संसद में जिसके लिये कानून पास होने के बाद जिसका अवतरण होते ही मुल्क से भ्रष्टाचार काफूर हो जायेगा... पर एक ऐसा लोकपाल, जो प्रधानमंत्री से भी ऊपर हो, तंत्र की सारी शक्तियाँ जिसमें निहित हो, सारी जाँच एजेंसियाँ जिसके नीचे हों, जो खुद ही रिपोर्ट दर्ज करे, खुद ही जाँच करे व खुद ही फैसला सुना दे... स्वाभाविक ही था कि कोई भी राजनीतिक दल 'टीम अन्ना' द्वारा प्रस्तावित ऐसे लोकपाल के लिये तैयार नहीं होता... संसद ने अपने विवेक से 'लोकपाल बिल' ड्राफ्ट किया और देर सबेर वह पास भी हो ही जायेगा...

अब पिछले कुछ समय से कुछ कयासों, लीक हुई तथाकथित रिपोर्टों आदि आदि के आधार पर 'टीम अन्ना' ने एक नया मोर्चा खोल दिया, वह यह कि प्रधानमंत्री व वर्तमान राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी सहित १५ केन्द्रीय मंत्रियों की रिटायर जजों की एसआईटी जाँच करे... हमारे तंत्र में एक कायदा है, वह यह कि जिस किसी की भी जाँच चल रही हो वह अपने पद से जाँच अवधि तक हटा दिया जाता है... तो एक तरह से यह टीम माँग कर रही थी कि मुल्क की संसद को नेतृत्व विहीन कर दिया जाये इनके हठ के चलते... कोई आश्चर्य नहीं कि सरकार ने अनशन को नजरअंदाज किया, मीडिया और जनता ने भी... टीम इतनी हताश हो गयी कि एक वरिष्ठ सदस्य को मीडिया के विरूद्ध भड़काऊ बयान देना पड़ा...

बहरहाल पाँचवे दिन से अनशन पर अन्ना के बैठने के बाद कुछ स्थितियाँ बदली व टोपी-टीशर्ट-ट्वीट-तिरंगा-एसएमएस-फेसबुक-बैनर-पोस्टर-मोमबत्ती ब्रिगेड थोड़ी बहुत 'टीम अन्ना' के साथ खड़ी दिखी... पर यह तय था कि सरकार इस बार न झुकेगी न लल्लो-चप्पो करेगी... और अनशनकारियों की सेहत भी बिगड़ती जा रही थी...  ऐसे में यह अनशन खत्म करने का ऐलान व राजनीतिक विकल्प की तलाश करने की घोषणा करना बीच का व किसी अप्रिय स्थिति को पैदा होने से रोकता सम्मानजनक रास्ता है...

पर अन्ना व उनकी टीम की असल चुनौती अब शुरू होती है... हमें ईमानदार नेता इस लिये नहीं मिलते क्योंकि हम एक ईमानदार जनता नहीं हैं... लोकतंत्र की सबसे पहली सीढ़ी यानी ग्राम पंचायत को ही अगर आप लें, तो पंचायत चुनाव में ही अधिकतर प्रत्याशी की ईमानदारी को देख वोट नहीं डालते... देखा जाता है उसकी जात को व मजहब को... यह भी देखा जाता है कि जब मैं अपने मकान के कमरे को बड़ा करने के चक्कर में खड़ंजे को अपने मकान में मिलाऊंगा या खेत बड़ा करने के लिये चकरोड को जोत दूंगा तो यह प्रधान काम आयेगा कि नहीं... नरेगा में बिना काम धाम किये यह प्रधान मजदूरी देगा कि नहीं, व मानक के अनुसार बीपीएल न होते हुऐ भी लिस्ट में नाम लिखायेगा कि नहीं... प्राइमरी स्कूल के वजीफे से लेकर खाद की बोरियों तक के आवंटन में वह आपका ख्याल रखेगा कि नहीं... थाना-पुलिस के हर मामले में उसे बिना दूसरे का पक्ष जाने आपका साथ देना होगा... यही नहीं चुनाव की घोषणा से लेकर पोलिंग के दिन तक प्रधानी लड़ रहे उम्मीदवार के खर्चे पर दारू-मुर्गा जीमने का हक तो वोटर का है ही...

लगभग गाँव जैसा ही यही हाल हमारे शहरी मध्यवर्ग का भी है... यह वर्ग पानी पी पी कर भ्रष्टाचार को कोसता है पर मौका मिलते ही सरकार व देश को चूना लगाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देता... अपनी कॉलोनी में ही देखियेगा कि कितने अन्ना समर्थकों की कारें घरेलू एलपीजी सिलेंडरों से चलती है कितने व्यापारियों के होटल रेस्टोरेंटों में घरेलू एलपीजी जलती है... नाली और फुटपाथों को कितनों ने अपने बंगलों-दुकानों में शामिल कर लिया है... कितनों के बिजली मीटर फिक्स हैं... कितने अपनी सही आय आयकर भरते हुऐ बताते हैं... कितने उन धर्मस्थलों की प्रबंधन कमेटी में शामिल हैं जो साफ तौर पर सरकारी सार्वजनिक उपयोग की जमीन,सड़क या पार्क आदि पर अवैद्म कब्जा कर बने हैं... कितने अपने बच्चे को अच्छे नंबर दिलवाने के लिये जरूरत न होने पर भी क्लास टीचर से टुईशन पढ़ाते हैं... कितने कमाई वाली कुर्सी के लिये व्रत-उपवास करते हैं...

कुल मिलाकर ईमानदारी कम से कम आज तो फैशन में नहीं है मुल्क में... इसलिये टीम अन्ना का काम और चुनौतीपूर्ण हो जाता है... सबसे पहले तो उन्हें एक एसआईटी तो अपने संभावित उम्मीदवारों की जाँच करने के लिये ही बनानी पड़ेगी क्योंकि राजनीति में उतरने पर उन पर भी आरोप लगेंगे ही... और कोई उन को केवल इसलिये खारिज नहीं कर पायेगा कि वह अन्ना समर्थक है... क्या उनके दल को ६५० पूरी तरह से ईमानदार जिला अध्यक्ष मिल पायेंगे?... राजनैतिक दल बनाने के निर्णय के बाद अब आगे टीम अन्ना और अन्ना समर्थक तिरंगे को भी लहरा-लहरा झूम नहीं पायेंगे... एक आम नागरिक तिरंगे को सम्मान देता है पर क्या यही सम्मान उनकी पार्टी के झंडे को मिल पायेगा, आप अनुमान लगाइये...

आपको ईमानदारी को वापस फैशन में लाना होगा अन्ना... कार्य मुश्किल है पर असंभव नहीं... रही बात चुनाव की तो मान्यवर कांशीराम कहा करते थे कि पहला चुनाव हारने के लिये, दूसरा हराने के लिये लड़ा जाता है, तीसरे चुनाव में ही आप सही तरीके से दौड़ में आ पातें हैं... इसलिये लंबे समय तक संघर्ष करने, धैर्य न खोने व आशा को कायम रखने के लिये भी तैयार रहिये अन्ना... आप संसद में जाइये, संसद को कब्जाइये व अपने लोकपाल को ही सारी सत्ता दे दीजिये, यकीन मानिये कोई भी आपका विरोध नहीं करेगा... आखिर एक लोकतंत्र हैं हम और संसद को सर्वोपरि मानते हैं...


तहे दिल से स्वागत है आपका अन्ना, 'पहाड़' के नीचे... :)


चढ़ पायेंगे क्या अन्ना ? अपनी 'टीम' के साथ... शुभकामनायें...











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10 टिप्‍पणियां:

  1. 'हमें ईमानदार नेता इस लिये नहीं मिलते क्योंकि हम एक ईमानदार जनता नहीं हैं'
    ~~सौ बातों की एक बात कह दी आप ने!

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  2. 'हमें ईमानदार नेता इस लिये नहीं मिलते क्योंकि हम एक ईमानदार जनता नहीं हैं' यही बात तो अन्ना नही समझते आखिर सरकार मे बैठे लोग भी तो जनता हैं। जब तक जनता नही सुधरती सरकार नही सुधरेगी।

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  3. यही बात तो आज के नव क्रांतिकारियों को समझनी है !
    सुन्दर सार्थक पोस्ट
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    आभार

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  4. कभी -कभी युद्ध जीतने और लम्बी लडाइयों में सफलता के लिए कदम पीछे खीचने पड़ते है.भगवान कृष्ण का नाम ऐसे ही रणछोड़दास नहीं पड़ा(देखें डा,लोहिया की पुस्तक "कृष्ण") आपसे इस बात पर पूरी सहमति है कि भ्रष्टाचार हर स्तर पर ख़त्म होना चाहिए पर एक बनिए के कम तौलने और बिना टिकट यात्रा करने वाले और ३ जी घोटाले को एक चश्मे नहीं देखा जा सकता जैसे खाद बीज का क़र्ज़ न चूका पाने वाले किसान और किंगफिशर के ७५०० करोड़ के क़र्ज़ को ,

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  5. कभी -कभी युद्ध जीतने और लम्बी लडाइयों में सफलता के लिए कदम पीछे खीचने पड़ते है.भगवान कृष्ण का नाम ऐसे ही रणछोड़दास नहीं पड़ा(देखें डा,लोहिया की पुस्तक "कृष्ण") आपसे इस बात पर पूरी सहमति है कि भ्रष्टाचार हर स्तर पर ख़त्म होना चाहिए पर एक बनिए के कम तौलने और बिना टिकट यात्रा करने वाले और ३ जी घोटाले को एक चश्मे नहीं देखा जा सकता जैसे खाद बीज का क़र्ज़ न चूका पाने वाले किसान और किंगफिशर के ७५०० करोड़ के क़र्ज़ को ,

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  6. मैं भी स्वागत करता हूँ टीम अन्ना के राजनीती में आने का... सद्परिणाम हो या दुष्परिणाम, कम से कम ज़िम्मेदारी तो होगी... अभी तो जो मन में आया कर दिया, जो दिल ने चाह कह दिया.... लेकिन अब बात की गंभीरता का अहसास होगा, क्योंकि जो बोला जाएगा उसे कर दिखाने का मौका भी मिल सकता है... इसलिए हवा-हवाई की जगह तौल-मौल के बोलना पड़ेगा...



    किसी भी बात पर अड़ने के मैं पहले भी खिलाफ था... हमारा काम प्रदर्शन करना, लोगो को जागरूक करना, सरकार को अपने मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने के लिए विवश करना होना चाहिए... सरकार जो भी कार्य करती है उसके अच्छे या बुरे परिणामों पर उसकी ज़िम्मेदारी होती है, इसलिए संविधानी मर्यादाओं के अंतर्गत उसे किसी भी फैसले को करने या करने का हक़ होना चाहिए... साथ ही साथ जनता में जागरूक होकर अपने खिलाफ फैसले करने वाली सरकार को उखाड फैकने का माद्दा उसमें होना चाहिए... राजनैतिक सिस्टम को सुधारने का यही एकमात्र तरीका है...

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  7. जागा हुआ इंसान सोने का बहाना करे तो उसे जगाया नही जा सकता...
    कमजोर आदमी मजबूरी में बईमानी करता है...
    और ताकतवर आदमी जान बूझ कर...
    लेकिन फँसता पहले कमजोर आदमी है...
    ताकतवर हाथ ही नही आता..
    ऐसे में क्या करे कोई...??

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  8. सही है! अब अन्ना की पार्टी भी चुनाव लड़ेगी। क्या पता कभी उसकी सरकार भी बने और कोई उनके मंत्रियों के खिलाफ़ कभी जांच की मांग करे।

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  9. ऊँट एक विचार है जो कभी सर चढ़ कर बोलता है कभी पहाड़ के नीचे आया सा दिखता है।

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