सोमवार, 27 अगस्त 2012

सचमुच बहुत मुश्किल है न, 'ईश्वर' होना भी...

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मुझसे
यह सवाल तो
अक्सर होता है


कि
कहाँ सोया हुआ था मैं
किस पर लुटा रहा था
अपना बेपनाह प्यार
और कृपायें अपरंपार
माफ कर रहा था
किसके सारे गुनाह
सिखला रहा था
रास्ता किस किस को
मेरे पास पहुँचने का


जब
किया गया था खून खराबा
जलाये गये थे मकान
उजाड़ी जा रही थी फसलें
लूटी जा रही थी अस्मत
मेरे मानने वालों द्वारा
मेरे ही नाम पर


जब
काली अंधेरी रात में
जान बचाने छुपी माँ की
गोद में बिना दूध के
सिसकारी भर सोया बच्चा
इजाजत तक नहीं थी जिसे
जोर जोर से रोने की भी


जब
तोड़ दिये थे सारे रिश्ते
गाँव, पड़ोस और रोटी के
हर शख्स हो गया था केवल
या अपनी, या दूसरी साइड का
जब मेरे ही मानने वाले
लड़े थे मेरे ही मानने वालों से


तब
कर क्या रहा था मैं जो
नहीं आया किसी को बचाने
उजाले का रास्ता दिखाने
किसी के दिल में क्यों नही जागी
तब मेरे लिये मुहब्बत भी
उस कत्लोगारत के दौर में
कोई क्यों नहीं डरा गुनाहों से


मेरा 
जवाब बहुत सीधा सादा है
मैं तुम से अलग नहीं हूँ कहीं
नहीं है मेरा कोई आजाद वजूद
मैं रहता हूँ तुम्हारे दिमागों में
मुझे ताकत तभी मिलती है
जब दिल से मुझे तुम चाहते हो


उस
घृणित काले-सियाह दौर में
कैसे दे पाता मैं कोई दखल
जब हथियार हाथ में लिये
दूसरों को मारने को तत्पर
दोनों पक्ष के मेरे मानने वाले
बंद कर दिये थे अपने दिमाग को
और दिल को घर छोड़ गये थे



मानते हो न
था बहुत बहुत मजबूर
और कमजोर भी
मैं उस काले दिन
शर्मिंदा भी हूँ मैं
पर क्या मुझे तुम
शर्मिंदा होने भी दोगे
शायद कभी नहीं...




सचमुच
बहुत मुश्किल है न
ईश्वर होना भी !






...

19 टिप्‍पणियां:

  1. आसान है अपने में मशगूल रहना.

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  2. जब तक आदमी अपनी ख्वाहिशों को न समझेगा तब तक न सुनहरा दिन आएगा और न ही पूनम की रात.
    नफरत, लालच, ग़ुस्सा और कामनाएं हमारे वश में कैसे हों ?
    यह एक सवाल इंसानियत के सामने सदा से खडा है.
    एक जवाब यहाँ भी है, कृपया देखें-

    जन्नत की हक़ीक़त और उसकी ज़रूरत पार्ट 1 Jannat

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  3. दिन ब दिन उसके लिये कठिन होता जा रहा है, लोग उसे होने भी नहीं देंगे।

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  4. ईश्‍वर तो दूर की बात इंसान इंसान ही हो ले तो भी बहुत ईश्‍वर की तो वही जाने

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  5. खरगोश का संगीत राग रागेश्री पर आधारित है जो कि खमाज
    थाट का सांध्यकालीन राग है,
    स्वरों में कोमल निशाद और बाकी स्वर शुद्ध
    लगते हैं, पंचम इसमें वर्जित है, पर हमने इसमें अंत में पंचम का प्रयोग भी किया है, जिससे इसमें राग बागेश्री भी
    झलकता है...

    हमारी फिल्म का संगीत वेद नायेर ने दिया है.
    .. वेद जी को अपने संगीत कि प्रेरणा जंगल में चिड़ियों कि चहचाहट
    से मिलती है...
    Feel free to visit my webpage ... खरगोश

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  6. ईश्वर
    तुम क्या सोचते हो
    मै नहीं जानती
    बस यही जानती हूँ
    तुम कितनी भी मुश्किल में रह कर
    अगर मुश्किले मेरे लिये बढाते हो
    तो
    तुम मुझे और मजबूत बनाना चाहते हो
    क्युकी भविष्य बस तुम ही देख पाते हो
    मुश्किल क्षणों में मै भी घबराकर
    चीतकार करती हूँ
    अनगिनत अपशब्द तुम्हे ही कहती हूँ
    पर
    फिर समझती हूँ मेरी ख़ुशी का ध्यान
    तुम कभी नहीं रखते हो
    बस मेरी भलाई की मंशा
    तुम्हारी होती हैं

    उत्तर देंहटाएं
  7. मुझे लगता है ईश्वर यह सब नहीं सोचता। उसके पास इतनी फुर्सत नहीं है। मनुष्य उसके बहाने अपना-अपना स्वभाव अभिव्यक्त करते हैं। वह उतना ही मनुष्यों का है जितना कीट पतंगों का। उनका जिनके पास नहीं होता कोई धर्म, उनका जिनके पास नहीं होती कोई बुद्धि और उनका भी जो बहुत दिमाग वाले हैं। हमारे कर्मों की सजा केवल हमी नहीं भोगते, वे भी भोगते हैं जो हमसे जुड़े हैं। हमसे जुड़े निर्दोष भी हो सकते हैं। हमसे जुड़े मासूम भी हो सकते हैं। लम्हों के गलतियों की सजा सदियों को भुगतनी पड़ती है। सदियों के पुन्य का लाभ कुछ लम्हें उठा पाते हैं। मुझे लगता है ईश्वर जीव को बना कर भूल जाता है। सुख का मार्ग है पर भोगता वही है जो उस मार्ग पर चल पाता है। ईश्वर ने सबको उसकी मर्जी पर छोड़ दिया है।

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  8. करें हम डाल दें ईश्वर पर -यह भी कोई बात हई?

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  14. हाँ, सचमुच बहुत मुश्किल है ईश्वर होना, ईश्वर का होना, या उसका न होना.
    घुघूतीबासूती

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  15. प्रवीण जी ,
    (१)
    यह कि मैं ही क़त्ल करता हूं और मैं ही क़त्ल होता हूं ! यह कि मैं ही रोता हूं और खुद को रुलाता हूं ! हंसता और हंसाता हूं ! कष्ट भोगता और भुगताता हूं ! सारा प्रेम , सारी घृणा ,सारी हिंसा और अहिंसा केवल मुझसे है और मुझमें है !

    जो भी है केवल मैं हूं !

    (२)
    वो है ही नहीं !

    (३)
    काजल जी की टिप्पणी के प्रथम अर्ध भाग से पूर्ण सहमति ! शेष अंश में तनिक संशोधन करके कहूँगा , यदि ईश्वर हो तो उसकी वो ही जाने !

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