शनिवार, 25 अगस्त 2012

जीता जागता विरोध...

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मैं
मानता हूँ कुछ जीवन मूल्यों को
अटल है मेरा उन पर विश्वास 
लड़ता हूँ हमेशा उन ही के लिये

मैं
खड़ा होता हूँ विरोध में तनकर
जहाँ कहीं भी करता है कोई
मेरे मूल्यों पर कुठाराघात

मैं
रखता हूँ हमेशा तीखी नजर
कहीं किसी जगह पर कोई
कह तो नहीं रहा गलत बात

मैं
करता हूँ हर शब्द की चीड़फाड़
बारीक सी मानो सुई सी लेकर
उधेड़ता हूँ कहा-अनकहा अर्थ

मैं
याद रखता हूँ हरदम हमेशा
कब किस मौके पर किस ने
किया था मेरे मूल्यों पर प्रहार

मैं
नहीं करता कभी विरोधी को माफ
हर क्षण रहती है मौके की तलाश
जब कर सकूँ सशक्त प्रतिघात 

मैं
कुछ अजीब सा होता जा रहा हूँ
हरदम चाहता हूँ हर विरोधी का
अपमान, उपहास, निर्णायक विनाश

मैं
देखता हूँ आइने के सामने खड़े खुद को
मेरी गर्दन के ऊपर चेहरा नहीं है
एक भिंची,तनी मुठ्ठी उग आई है वहाँ

मैं
आज वाकई बहुत बहुत खुश हूँ
नहीं रहा मैं अदना आम इन्सान
मैं जीता जागता विरोध बन गया हूँ



पर

क्या यह भी एक त्रासदी नहीं है ?







...

14 टिप्‍पणियां:

  1. मूल्यों का क़ोई चेहरा होता हैं क्या
    फिर विरोध का चेहरे कैसे आईना दिखता
    त्रासदी , ना मुझे तो ये नयी सुबह लगती हैं

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  2. हमारे एक्शन हमारी सोच और हमारी प्राथमिकताओं को ही प्रतिबिंबित करते हैं|
    पूर्व प्रधानमंत्री श्री बाजपेयी जी ने एक बार कहा था कि हर पापी के पास एक भविष्य हो सकता है और हर संत के पास एक अतीत, मुझे सकारात्मक बात लगी थी|
    कविता की समझ न के बराबर ही है लेकिन यह प्रस्तुति पसंद आई, प्रवीण भाई|

    चित्र देखकर एक सीमेंट उत्पाद का विज्ञापन सा कुछ याद आ रहा है :)

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  3. हाँ यह त्रासदी ही है।

    क्योंकि
    भिंची,तनी मुठ्ठी पर
    मुस्कराहटें नहीं होती
    न देती है खुद को आनन्द
    न दूसरों को आनन्दित करती है
    जोश तो लगती है पर
    होता है मात्र आक्रोश
    भड़की रहती अधीरता
    परिणामों के प्रति
    लापरवाह मुठ्ठी
    अन्ततः विषाद से
    बोझिल कर जाती है।

    जबकि
    जीवन-मूल्य
    सजते है चहरे पर
    हालांकि भोंहे
    होती है टैढ़ी
    किन्तु नयनों का
    करूणा रस बढ़ाकर
    बनाया जा सकता है
    संतुलन
    मुस्काने प्रसार करती है
    खुशी, आशा, उमंग
    हो सकता है कुटिलता
    भी उग आए मुस्कानों में
    किन्तु कपोलो का स्पंदन
    बना देता है
    संतुलन

    इसलिए,
    जीवन-मूल्यों का
    चहरा है तो
    सम्भावनाएं
    शेष है
    अन्यथा
    बंद मुठ्ठी तो
    जकड़न का
    अवशेष है।

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  4. आपकी कविता पढ़कर राजगुरु याद आ गए.

    आज राजगुरु जी की 104वी जयंती है ...

    राजगुरु मराठी थे . उन्होंने हिन्दू धर्म-ग्रंन्थों तथा वेदों का अध्ययन तो किया ही लघु सिद्धान्त कौमुदी जैसे क्लिष्ट ग्रन्थ को भी बहुत कम आयु में ही कण्ठस्थ कर लिया था। वह छत्रपति शिवाजी की छापामार युद्ध-शैली के बड़े प्रशंसक थे.

    इसके बावजूद वह क्षेत्रवाद और सांप्रदायिकता की भावना से ऊपर थे . अपने मन की संकीर्णता से मुक्ति पाना अंग्रेजों से मुक्ति पाने से भी ज़्यादा कठिन काम है. यह काम उन्होंने किया और हमारे लिए एक अच्छी मिसाल क़ायम की.
    उनका जन्म 24 अगस्त 1908 को हुआ था. आज उनके जन्मदिन पर हम सब अपने मन को संकीर्णताओं से मुक्त करने का संकल्प लें.
    उन्हें 23 मार्च 1931 को फाँसी पर लटका दिया गया था ।

    जिन्हें फाँसी पर नहीं लटकाया गया, उनके काल के दूसरे सब भी मर चुके हैं. उन्हें फांसी देने वाला जल्लाद, जज और अंग्रेज़ सब मर गए हैं.

    मौत सबको आनी है. उन्हें आई है तो हमें भी आएगी.
    हम अपने मन को निर्मल बनाकर जियें और बुराई से पवित्र हो कर मर जाएँ, तो हम सफल रहे.
    यह एक लड़ाई हरेक आदमी अपने आप से लड़ ले तो हमारे देश की हर समस्या हल हो जायेगी.
    Please See
    http://blogkikhabren.blogspot.in/2012/08/104.html

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  5. अपनी बात रखने की शक्ति ईश्वर सदा देता रहे, बस यही प्रार्थना है।

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  6. बिलकुल त्रासदी है -ये मैं कहाँ से आया बार बार ?

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  7. अपने को व्यक्त करती अच्छी रचना

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  8. त्रासदी हो भी सकता है ...
    मगर कुछ बंधी ही मुट्ठियाँ ही परिवर्तन का आगाज़ होती है !

    उत्तर देंहटाएं
  9. इतिहास गवाह है कि व्यक्तिगत त्रासदियाँ झेलकर, अपमान सहकर ही मुठ्ठी वालों ने राष्ट्र का दिनमान चमकाया है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. http://vivesoft.blogspot.in/2012/08/blog-post_8348.html

    प्रवीण शाह साहब ये लिंक आपको देख लेना चाहिए !

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. .
      .
      .
      अली सैयद साहब,

      शुक्रिया, मैंने विवेक पान्डेय जी को सही सलाह दे दी है।


      ...

      हटाएं
  11. http://vivesoft.blogspot.in/2012/08/blog-post_20.html

    एक लिंक और भी है उन्हें मैंने बताया भी है !

    उत्तर देंहटाएं
  12. प्रवीण जी, इस विषय पर एक लेख कुछ दिन से मन में कुनमुना रहा है. बार बार लिखना चाहती हूँ किन्तु अन्य बातों में उलझ जाती हूँ. सच में विरोध करते करते हम ही विरोध बन एक त्रासदी को झेलते हैं. किन्तु विरोध न करना तो उससे भी बड़ी त्रासदी होगी.
    आपकी कविता पहले से ही झकझोरित मन को और अधिक झकझोर रही है.
    घुघूतीबासूती

    उत्तर देंहटाएं

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