बुधवार, 22 अगस्त 2012

बिटिया की खिड़की...

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एक साल आठ महीने की वह
टीवी पर विज्ञापन देखने में मग्न
हो जाती है चौकन्नी

मेरे नहाकर बाहर निकलते ही
बहुत धैर्य से करती है इंतजार
पापा के नाश्ता करने का

करती है वह ईशारा फिर
प्रेस करी कमीज की ओर
हुक्म सा देती है पहनने का
 
जब पहनने लगता हूँ मैं उसे
लगते हुऐ हर बटन के साथ
चौड़ी होती जाती है उसकी मुस्कान

फिर वह बैल्ट देती है मुझे
ढूंढ-ढांढ कर लाती है जूते
जो होते हैं पड़े कहीं-किसी कोने में

जब हो जाती है तसल्ली उसे
अब पूरी तरह हैं तैयार पापा
अपने ऑफिस निकलने के लिये

चिपट जाती है वह मेरे पैरों से
यह ईशारा होता है उसका
कि अब उठा लूँ उसे गोद में

और ले जाऊँ बाहर घुमाने को
कभी कॉलोनी के चौराहे तक
तो कभी पार्क की ओर ही

कभी उसे जाना होता है रोड तक
अनजान चेहरों को ताकती वह
देखना चाहती है कभी बाजार

रोज का नियम बन गया है यह
बन गया हूँ मैं अपनी बिटिया की
दुनिया को देखने की खिड़की सा

कितना अच्छा लगता है न
अपनी छोटी सी बिटिया की
खिड़की बन जाना एक बाप को






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23 टिप्‍पणियां:

  1. सच में बहुत ही बढ़िया लगता है.....

    कुँवर जी,

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  2. उत्तम विचार।
    आभार।

    Please see
    http://vedquran.blogspot.com/2012/08/blog-post.html

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  3. बिटिया की दुनिया को देखने की खिड़की सा बन जाना भी असीम आनंद देता है .
    बच्चों की दुनिया निराली यूँ ही नहीं कही जाती.
    अच्छी लगी कविता.

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  4. अद्भूत विलक्षण अहसास!!
    भाता है बच्चों के अनुभव की खिड़की बन जाना।
    अच्छा लगा उनके क्रियाक्लापों का कैमरा बन जाना!!

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  5. सच में बहुत अच्छा लगता है जब बच्चों के सूक्ष्म अवलोकनों को देखता हूँ।

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  6. बड़ी ही मासूम सी कविता ...प्यार भरे एहसास...

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  7. कई दिनों से आपके ब्लॉग पर एक पोस्ट का इंतज़ार कर रहा हूँ... लक्ष्मण के संन्यास लेने की प्रतिक्रिया का इंतज़ार... क्यूंकि आप क्रिकेट के बारे में लिखते हैं और मेरी नज़र में वर्ल्ड कप जीतने के बाद द्रविड़ और लक्ष्मण के संन्यास से बड़ी खबर और कुछ भी नहीं है भारतीय क्रिकेट के लिए... और जिन परिस्थितियों में संन्यास लिया गया है वो तो ज़रूर चर्चा का विषय है...

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    उत्तर
    1. .
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      .
      प्रिय शेखर,
      वीवीएस बेहतरीन और संघर्ष करने का जज्बा रखने वाले खिलाड़ी थे... घास को छीलते केवल कलाइयों की कारीगरी से लगाये उनके स्ट्रोक्स मुझे अजहरूद्दीन की कारीगरी की याद दिलाते थे... पर हर अच्छी चीज का भी कभी न कभी अन्त होता ही है... चयन कर्ताओं ने उन्हें न्यूजीलैंड दौरे के लिये चुना जिस से वह हैदराबाद के दर्शकों के सामने सन्यास ले सकें... पर लक्ष्मण की इगो उन पर भारी पड़ी... सन्यास के बाद की पार्टी में अपने गृहनगर में मैच खेलने आये कप्तान को न बुला उन्होंने बहुतों का सम्मान खो दिया है, छोटे दिखने लगे हैं वह... कुछ चारित्रिक कमजोरी तो है ही, अधिकतर भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी तभी जाते हैं जब लोग उन्हें धकेलने पर उतारू हो जाते हैं, ग्रेसफुली कोई जाता नहीं...



      ...

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    2. सहमत.
      घुघूतीबासूती

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  8. यूँ तो हर घर में रहती हैं कई खिड़कियाँ। पिता, माता, चाचा, चाची, बड़े भाई, बड़ी बहन... लेकिन इस खिड़की को आपकी नज़र से देखना अच्छा लगा।
    ...बेहतरीन कविता।

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  9. सबसे खूबसूरत लम्हे यही होते हैं ,जब बच्चे गोद में हों तब वे तो आपकी नज़र से दुनिया देखते ही हैं आप भी बच्चों की नज़र से दुनिया देखने लगते हैं | उनके लिए आप खिड़की और आपके लिए बच्चे खिड़की | एक तिलिस्म सा बन जाता है , खिड़की में खिड़की |

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  10. शाह साब,
    नमस्ते!
    भाव प्रधान आपकी रचना दिल को छू गयी. किसी को भी सही मार्ग पर प्रशस्त करना, एक बेजोड़ अहसास होता है! लेकिन हकीक़त का एक दूसरा पहलू भी है.... थोड़ा बड़ा और स्वतंत्र होने पर, क्या ये खिड़की बेहद छोटी नहीं रह जाएगी जबकि तमाम बड़े जानकारी के दरवाज़े खुल जायेंगे.... जो ज़ाहिर है एक पिता की दृष्टि से नहीं छान-छान का दिखायेंगे इस दुनिया को!
    मेरी शुभकामनाएँ!
    आशीष ढ़पोरशंख
    --
    द टूरिस्ट!!!

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  11. परिवार में सबसे अच्छी यही हो इसकी पकड़ ढीली ना हो पाए यह ध्यान रखना है प्रवीण जी ...

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  12. आपकी पोस्ट कल 23/8/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें

    चर्चा - 980 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  13. भावमय करते शब्‍द ... मन को छूती मासूम सी अभिव्‍यक्ति

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  14. क्या कोई करोडो लुटाकर भी इन लम्हों को खरीद सकता है ......... अनुपम भावाभिव्यक्ति

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  15. बिटिया कि दुनिया देखने के लिए खुद को खिड़की सा बना लेना .... बहुत भावप्रवण रचना ...

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  16. बहुत सुन्दर मासूमियतभरी अभिव्यक्ति...
    :-) :-)

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  17. इन्ही लम्हों की यादे और मासूमियत ही दिल को सकून देती है,,,,,लाजबाब अभिव्यक्ति,,,,

    RECENT POST ...: जिला अनूपपुर अपना,,,

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  18. प्यारी सी बिटिया और आह्लादित वात्सल्य

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  19. आपकी इस कविता ने अपनी बेटियों का बचपन याद दिला दिया. पति बहुत ही कम पल बिताते थे उनके साथ किन्तु वे भी यादगार होते थे.
    मैं कल्पना में आपको व आपकी बिटिया को देख पा रही हूँ. दृश्य बहुत मोहक है.
    घुघूतीबासूती

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