मंगलवार, 21 अगस्त 2012

ऐसे में आखिर लिखे अब क्यों कोई, क्या आप बतलाओगे मुझे ?

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शब्द
शायद
अब खुद ही भूल गये हैं
कि आपस में जुड़ कर
किसी खास क्रम में 
देते एक दूसरे को सहारा
और विस्तार भी
कभी हो जाते थे
वह बहुत प्रभावी
और ताकतवर भी
रखने लगते थे हैसियत
बदल देने की
दुनिया के निजाम को


शब्द
भले ही महज दो या चार हों
बन जाते थे वह नारा
जो जिंदा कर देता था
मरी हुई कौमों को
पलट देता था तख्तो-ताज
बहाता था बदलाव की बयार


शब्द 
किसी खास की वाणी से
उच्चारित होकर
फैल जाते थे हर तरफ
बन जाते थे उम्मीदें
दिखाने लगते थे सपने
और जीने का मकसद भी


शब्द
जो दिलाते थे भरोसा
और दिलोदिमाग को सुकून
भले ही आज सब कुछ
हो रहा हो गलत-अनैतिक
पर हो जायेगा ठीक यह
बस कुछ दिनों की बात है


शब्द
जो देते थे आश्वासन सा
भले ही दिख रहा हो
हर तरफ हर कोई स्याह सा
पर निराश नहीं होना दोस्त
फिर रोशन होगा जहाँ
सच्चाई अभी जिंदा है


शब्द 
महज शब्द हो गये हैं
कौड़ियों के मोल मिलते
ईमान के बदले बिकते
किसी भी क्रम में लगाओ
अलंकार उपमायें जुटाओ
अब वे कोई अर्थ नहीं रखते


शब्द
खो चुके हैं ताकत अपनी
नहीं ला पाते हैं बदलाव
अब नहीं दिलाते उम्मीद
आश्वस्त तक नहीं करते
नहीं कहते कि सुबह आयेगी
बिकते हैं चौराहों-फुटपाथों पर


शब्द
अब हो गये हैं अर्थहीन
और नपुंसक भी
ऐसे में क्या लिखना
किसके लिये लिखना
आखिर लिखे क्यों अब कोई
क्या तुम बतलाओगे मुझे ?









...

8 टिप्‍पणियां:

  1. शब्द
    अब हो गये हैं अर्थहीन
    और नपुंसक भी

    true

    उत्तर देंहटाएं
  2. शब्द
    नशे की तरह पतनगामी हो गए
    और दमदार और दमदार के चक्कर में
    अब भावहीन हो गए
    भारी नशा भी अब किक नहीं देता
    शब्द अर्थों को ढो कर भी निर्थक हो गए

    शब्द
    कुछ बो दिए बंजर भूमि में
    और कुछ उलझे पडे
    घनघोर बियावानों में
    कुछ बिसूर रहे
    अजायबघर के कागजो पर
    बाकी बिछड़ गए
    मनोरंजन के मेलो में

    शब्द
    आज अर्थों का अकाल झेल रहे है
    और जो मुट्ठी भर
    बचे है सार्थक
    उनसे अब नवसाहित्यकारों
    के बच्चे खेल रहे है

    उत्तर देंहटाएं
  3. या कहें तो शब्द अपने अर्थ खो चुके हैं..

    उत्तर देंहटाएं
  4. क्या लिखना ?
    किसके लिए लिखना ?
    अक्सर ऐसे सवाल झिंझोड़ते हैं मन को
    सही है , मगर
    हर शै वक्फ़ है
    अपने मक़सद के लिए
    दिमाग़ सोचने के लिए
    दिल मानने के लिए
    ज़ुबां बोलने के लिए
    और क़लम लिखने के लिए
    न लिखा जाएगा तो
    मर जाएगा क़लम
    मर जाएगा दिल ओ दिमाग़
    और मर जाएगी ज़ुबां भी
    मर जाएगी सोच और
    मर जाएगी इंसानियत भी
    इंसानियत को बचाना है तो
    बचाना होगा ख़ुद को
    बचाना होगा अपने क़लम को
    किसी के लिए न सही
    अपने लिए लिखो
    अपने क़लम के लिए लिखो
    लिखोगे तो पढेंगे पढ़ने वाले
    जो पढ़कर बोलते नहीं हैं
    बल्कि सोचते हैं
    असल क़द्रदान यही हैं
    हौसला कभी कम न हो
    कभी बेकार ग़म न हो
    दुआ हमारी यही है

    कविता अच्छी लगी.
    ईद मुबारक .

    आपकी कविता और उसका जवाब यहाँ है.
    जवाब से संतुष्टि अथवा असंतुष्टि की सूचना अवश्य दें-
    http://mushayera.blogspot.com/2012/08/nice-hindi-poem.html

    उत्तर देंहटाएं
  5. अच्छी कविता -अर्थ खोते शब्द!

    उत्तर देंहटाएं
  6. अर्थहीन शब्द या महत्त्व खोते शब्द .
    अच्छी कविता .

    उत्तर देंहटाएं
  7. बेहतरीन रचना के लिये आभार.

    उत्तर देंहटाएं

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