बुधवार, 1 अगस्त 2012

आइये इस जलेबी का छोर ढूंढें : साबित करो कि वह नहीं है !!!

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पहले ही साफ कर दूँ कि धर्म, आध्यात्म और ईश्वर की तिकड़ी द्वारा बनाई चाशनीदार जलेबी का छोर ढूंढती यह 'जलेबी सीरिज' विशुद्ध रूप से प्रतिक्रियात्मक है... वजह यह है कि चारों तरफ से धर्म, आध्यात्म और धार्मिकता की सिखलाई का बोम्बार्डमेन्ट सा हो रहा है मुझ पर... अब ऐसे में अपने को भी यह लगता है कि कुछ कह ही दिया जाये अपनी ओर से भी...

अब सवाल यह भी उठना लाजिमी है कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ, तो मित्रों, AGNOSTIC (संशयवादी या अज्ञेयवादी) दॄष्टिकोण से यह सब लिखने का मेरा एक मात्र मकसद है...

* खुद के और आपके मस्तिष्क को विचार मंथन के लिये थोड़ी और खुराक देना...
** धर्म और ईश्वर से संबंधित एक और नजरिये से आपको रूबरू कराना...
*** सत्य की खोज पर जाते अपने पाठक को एक और साफ सुथरा, सीधा परंतु कम प्रचलित (Less traveled) रास्ता दिखाना...

स्पष्ट कर दूँ कि स्थापित धर्म और सुस्थापित 'वर्तमान ईश्वरों' से मेरा कोई विरोध न कभी था और न कभी होगा... अभिव्यक्ति और अपने मत या विचार के प्रचार की आजादी एक सर्वोपरि मानवीय मूल्य है... मुझे इसकी समझ है, और मैं प्रार्थना करता हूँ कि मेरे धार्मिक आलोचक भी इस बात को समझेंगे...


आईये पहले प्वायंट पर चर्चा करते हैं...


अविश्वास, शक या संशय करने वाले से सबसे पहले आस्तिक यही कहता है कि मैं तो मानता हूँ वह है, तुम नहीं मानते-पर साबित करके दिखाओ कि वह नहीं है...


अब जरा सोचिये इस पर क्या इतनी बड़ी दुनिया में किसी चीज का न होना पूर्णता व विश्वास के साथ साबित किया जा सकता है... अगर आपका जवाब हाँ में है...


तो कृपया इस बात को ही साबित कर दीजिये कि...


पूरी दुनिया में कहीं पर भी गुलाबी रंग का एक ऐसा हिरन नहीं है जिसके कान आसमानी और पूँछ नारंगी रंग के हैं,  जब वह उड़ना चाहता है तो उसके अगले पैर सफेद रंग के पंखों में बदल जाते हैं...


जब तक आप इस अनोखे हिरन का अस्तित्व न होने को मुकम्मल तरीके से साबित करते हैं तब तक मैं अगला सवाल लेकर आता हूँ... :)






आभार !












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11 टिप्‍पणियां:

  1. @स्पष्ट कर दूँ कि स्थापित धर्म और सुस्थापित 'वर्तमान ईश्वरों' से मेरा कोई विरोध न कभी था और न कभी होगा... \

    प्रवीण शाह साहब,

    पहले यह तो बताईए जिनसे आपका विरोध नहीं है वे "स्थापित धर्म" कौनसे है और "सुस्थापित वर्तमान ईश्वर" कौन कौन से है?……

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    1. मेरा मानना की हैं
      आप का मानना नहीं हैं
      क्या दो समान्तर रेखा हैं या
      एक की रेखा के दो सिरे हैं
      यदि समान्तर रेखा हैं तो हम कभी मिल नहीं सकते
      यदि एक ही रेखा के दो सिरे हैं तो दोनों एक दूसरे को स्वीकार कर सकते हैं
      हर धर्म से मानवीय मूल्य बड़ा हैं मै यही मानती हूँ
      मेरे लिये ईश्वर का होना , ना होना दोनों साबित करना समय व्यर्थ करने जैसा हैं अगर हम आस्था की बात करे तो और अगर साइंस की करे तो हिग्ग्स बोसन से पहले भी दुनिया थी और उनके आगे भी क़ोई ना क़ोई कुछ ना कुछ सिद्ध करता रहेगा
      कल हम हो ना हो क्या फरक पड़ेगा

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  3. यदि यह दुनिया अनंत है तो अनंत में कुछ भी संभव है. अतः मैं मानता हूँ की आपकी कल्पना वाले हिरन का अस्तित्व संभव है.

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  4. Interesting .
    गुलाबी रंग का हिरण भी होगा और न भी हो तब भी कोई बात नहीं है . जैव वैगयानिक आपका order मिलते ही तैयार कर देंगे.

    खोज भी जारी रहे और अमल भी . अमल ऐसा हो कि समूह का कल्याण हो .
    सामजिक रूप से कमज़ोर लोगों का काम अपनी खोज के कारण रोकना नहीं चाहिए.

    रहिमन उजली प्रकृति को, नहीं नीच को संग ।
    करिया वासन कर गहे, कालिख लागत अंग ॥

    '‘ज़कात जो हक़ है वह हक़ है फ़ुक़रा (मुफ़लिसों) का और मसाकीन (मुहताजों) का और आमिलीन (ज़कात के काम में जाने वालों) का और मौल्लिफ़तुल क़ुलूब (ऐसे ग़ैर मुस्लिम जिनकी दिलजोई की ज़रूरत हो) का और रिक़ाब (गर्दन छुड़ाने में) का आज़िमीन (क़र्ज़दार) का और सबीलिल्लाह (अल्लाह की राह में जानतोड़ संघर्ष करने वालों) का और इब्नुस्सबील (मुसाफ़िर जो सफ़र में ज़रूरतमंद हो)‘‘

    मिस्कीन की तारीफ़ हदीस शरीफ़ में यह है कि हुज़ून नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि दरअसल मिस्कीन तो वह है कि जिसके पास इतना माल न हो जो उसे किफ़ायत कर जाए और कोई उसका हाल भी न जानता हो कि उसे ख़ैरात दे दे और न लोगों से ख़ुद सवाल करे। (सही बुख़ारी किताबुज़्जकात)
    दरअसल ज़कात का मक़सद ही यह है कि ग़रीब और नादार लोगों और ज़रूरतमंदों की ज़रूरत पूरी की जाए और अपने आस पास के लोगों, रिश्तेदारों पड़ोसियों, यतीमों, विधवाओं, ग़रीब विद्यार्थियों, ज़रूरतमंद मुसाफ़िरों, क़र्ज़दारों की ख़बरगीरी की जाए और ज़कात के मुस्तहिक़ीन की तहक़ीक़ करके उन्हें ज़कात दी जाए।

    And see :
    इंसानी दिमाग स्त्री और पुरुषों को अलग-अलग तरीके से देखता है. स्त्रियों का दिमाग भी यह भेदभाव करता है.
    http://auratkihaqiqat.blogspot.com/2012/07/blog-post.html

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  5. हमारी इन्द्रियों द्वारा यदि किसी वस्तु को आभास करना संभव न हो तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं होगा कि वह वस्तु मौजूद ही नहीं है या यह कि उसका होना कठिन है।

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  6. आपका यह वक्तव्य तो थिअरी आफ फाल्सिफियेबिलिटी पर खरा ही नहीं उतरता -इसका क्या प्रतिवाद किया जाय? क्या चुनौती दी जाय ?

    ईश्वर का मामला भी कुछ ऐसा ही है ! मगर आप तो ईश्वर के पीछे हाथ धो के पड़ गए हैं जनाब!

    जरुरी भी है पोंगापंथियों के भरमार हो गयी है अब तो यहाँ .....

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  7. प्रवीण जी, आपके पहले प्वायंट पर यह कहना है कि वैसे तो मैं ये दावा नहीं करता कि मैंने ब्लोग्स पर या इधर उधर बहुत कुछ पढ़ा है लेकिन जो थोड़ा बहुत देखा-पढ़ा है उसमें खुद को नास्तिक कहने वाले ही यह चैलेज करते दीखते हैं कि साबित करके दिखाओ कि वह है| सोचने की बात है कि जो आस्तिक है, वो क्यों अपने से तर्क करेगा?

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  8. जो मानता है माने, जो नहीं मानता है, नहीं माने। समस्या तो तब आती है जब दूसरे को अपनी घुट्टी पिलाने का प्रयास होता है।

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