शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

बार-बार बवाल पर बवाल, आखिर क्यों... हमें ब्लॉगिंग के चरित्र को ठीक से समझना होगा !

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ऑक्सफोर्ड एडवान्स्ड लर्नर्स डिक्शनरी
blog noun
(also weblog) a website where a person writes regularly about recent events or topics that interest them, usually with photos and links to other websites that they find interesting

डिक्शनरी.कॉम
blog
[blawg, blog] Show IPA noun, verb, blogged, blog·ging. noun
1.a Web site containing the writer's or group of writers' own experiences, observations, opinions, etc., and often having images and links to other Web sites.

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी
Definition of blog noun
a personal website or web page on which an individual records opinions, links to other sites, etc. on a regular basis.



ब्लॉग आखिर है क्या ? ऊपर मैंने तीन विभिन्न स्रोतों से ली गयी शब्द 'ब्लॉग' की परिभाषायें दी हैं... Weblog के संक्षिप्तीकरण से बना यह शब्द एक सीधा सरल अर्थ रखता है वह यह कि यह ब्लॉगलेखक (या समूह ब्लॉग लेखकों की भी) की एक तरह की ऑनलाइन डायरी है जिसमें वह अपने अनुभव, प्रेक्षण व विचार आदि के बारे में लिखता है व उनको और विस्तार देने के लिये नेट पर उपलब्ध अन्य स्रोतों से लिंक भी करता है...


स्पष्ट है कि जिस तरह डायरी लेखन हर कोई कर सकता है उसी तरह ब्लॉगिंग भी पूरी तरह लोकतान्त्रिक है... हर कोई ब्लॉगिंग कर सकता है... सामान्य डायरी लेखन व ब्लॉगिंग में फर्क सिर्फ इतना है कि ब्लॉगिंग में यदि ब्लॉगलेखक चाहे तो वह पाठक के लिये टिप्पणी देने का विकल्प खुला रख सकता है... ब्लॉग लिखने के लिये और कोई शर्त नहीं है... ईमानदार-भ्रष्टाचारी, सद्विचारी-लंपट, आस्तिक-नास्तिक, वैज्ञानिक-रूढ़िवादी, वैज्ञानिक-पुरातनज्ञानवादी, आधुनिक-परंपरावादी, नारीवादी-नारीद्वेषी misogynist, शाकाहारी-माँसाहारी, धर्मस्नेही-धर्मविरोधी, अमीर-गरीब, विद्वान-जाहिल, गुरू-चेले, एकलिंगी-उभयलिंगी, धर्म मंडक-धर्म खंडक, पाखंड मंडक-पाखंड खंडक, मठाधीश-महंत... हर किस्म का इंसान ब्लॉग लिख सकता है... यह भी जरूरी नहीं कि यहाँ हर कोई किसी अच्छे मंतव्य के साथ ही आये... कोई धर्म प्रचार के लिये आयेगा तो कोई किसी दूसरे का धर्म परिवर्तन करने के लिये ब्लॉग लिखेगा... किसी को अपनी पत्नि या पति के अतिरिक्त भी एक दो और के साथ संबंध बनाने की चाह होगी... तो कोई अपना कुछ माल भी बेचने का प्रयत्न करेगा... किसी को अपनी छपास की भूख मिटानी होगी... तो कोई अपना पांडित्य बघारना चाहेगा... कोई सरकारी अनुदान पाने व उनको हजम करने का उद्देश्य ले ब्लॉगिंग में उतरेगा... तो कोई अपने लिये किसी कुर्सी या पीठ का जुगाड़ कर भविष्य सुरक्षित करने का यत्न करेगा.. कोई खाली टाइमपास करेगा... तो कोई वाकई कुछ कालजयी भी लिख जायेगा...कोई छद्म विचारधारा का प्रसार करेगा... तो कोई केवल भ्रांतियों व अफवाहों को अपने स्वार्थ के लिये पोषित करने आयेगा... किसी को सम्मान की चाह होगी तो किसी को थोड़ी सी पहचान की भी... कोई केवल इनाम बाँटने आयेगा तो कोई उन ईनामों को बटोरने भी... सीमा पर तैनात सैनिक भी ब्लॉग लिखेंगे तो जेल से हाल ही में छूटे कैदी भी... कुल मिलाकर समाज का हर रंग, हर अच्छाई, हर बुराई, हर विद्रूप, हर त्रासदी, हर न्याय, हर अन्याय, हर सौन्दर्य, हर कुरूपता, हर खुशी,हर गम.... जो कुछ भी है समाज में... आपको दिखेगा ब्लॉगिंग में भी... यही ब्लॉगिंग की असल ताकत भी है...


हर ब्लॉगर अपनी मर्जी का मालिक है यहाँ... आप उसको किसी खास तरह से सोचने या किसी खास तरह से बर्ताव करने को बाध्य नहीं कर सकते... आप को उसका कथ्य या कृत्य उचित नहीं लगता तो आप उसके ब्लॉग पर न जायें... इससे अधिक कुछ करना न उचित है और न ही इसकी जरूरत है...


तो ऐसे में किसी के ईनाम बाँटने या ईनाम बाँटने के बहाने कुछ ईनाम खुद ले लेने को लेकर यह सब बवाल क्यों भाई... और हाँ, लंपट कहे जाने पर भी इतना बवाल करने की आवश्यकता नहीं है... लंपट के अर्थ इस प्रकार बताये गये हैं...

लंपट 

कामुक (lecherous)
गुंडा (hooligan)
छलकर्ता (deceiver)
परगामी (पुरुष) (adulterous(male))

लीजिये मैं यहाँ पर खुल्लम खुल्ला खम ठोक कर कह रहा हूँ कि हिन्दी ब्लॉगिंग में लंपटों की संख्या किसी भी मायने में आज के हमारे समाज की तुलना में कम नहीं है...


लो अब बन पड़े तो कर लो बवाल...


मेरे (यानी एक ब्लॉगर के)  ठेंगे से... 




... :)









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सोमवार, 27 अगस्त 2012

सचमुच बहुत मुश्किल है न, 'ईश्वर' होना भी...

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मुझसे
यह सवाल तो
अक्सर होता है


कि
कहाँ सोया हुआ था मैं
किस पर लुटा रहा था
अपना बेपनाह प्यार
और कृपायें अपरंपार
माफ कर रहा था
किसके सारे गुनाह
सिखला रहा था
रास्ता किस किस को
मेरे पास पहुँचने का


जब
किया गया था खून खराबा
जलाये गये थे मकान
उजाड़ी जा रही थी फसलें
लूटी जा रही थी अस्मत
मेरे मानने वालों द्वारा
मेरे ही नाम पर


जब
काली अंधेरी रात में
जान बचाने छुपी माँ की
गोद में बिना दूध के
सिसकारी भर सोया बच्चा
इजाजत तक नहीं थी जिसे
जोर जोर से रोने की भी


जब
तोड़ दिये थे सारे रिश्ते
गाँव, पड़ोस और रोटी के
हर शख्स हो गया था केवल
या अपनी, या दूसरी साइड का
जब मेरे ही मानने वाले
लड़े थे मेरे ही मानने वालों से


तब
कर क्या रहा था मैं जो
नहीं आया किसी को बचाने
उजाले का रास्ता दिखाने
किसी के दिल में क्यों नही जागी
तब मेरे लिये मुहब्बत भी
उस कत्लोगारत के दौर में
कोई क्यों नहीं डरा गुनाहों से


मेरा 
जवाब बहुत सीधा सादा है
मैं तुम से अलग नहीं हूँ कहीं
नहीं है मेरा कोई आजाद वजूद
मैं रहता हूँ तुम्हारे दिमागों में
मुझे ताकत तभी मिलती है
जब दिल से मुझे तुम चाहते हो


उस
घृणित काले-सियाह दौर में
कैसे दे पाता मैं कोई दखल
जब हथियार हाथ में लिये
दूसरों को मारने को तत्पर
दोनों पक्ष के मेरे मानने वाले
बंद कर दिये थे अपने दिमाग को
और दिल को घर छोड़ गये थे



मानते हो न
था बहुत बहुत मजबूर
और कमजोर भी
मैं उस काले दिन
शर्मिंदा भी हूँ मैं
पर क्या मुझे तुम
शर्मिंदा होने भी दोगे
शायद कभी नहीं...




सचमुच
बहुत मुश्किल है न
ईश्वर होना भी !






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शनिवार, 25 अगस्त 2012

जीता जागता विरोध...

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मैं
मानता हूँ कुछ जीवन मूल्यों को
अटल है मेरा उन पर विश्वास 
लड़ता हूँ हमेशा उन ही के लिये

मैं
खड़ा होता हूँ विरोध में तनकर
जहाँ कहीं भी करता है कोई
मेरे मूल्यों पर कुठाराघात

मैं
रखता हूँ हमेशा तीखी नजर
कहीं किसी जगह पर कोई
कह तो नहीं रहा गलत बात

मैं
करता हूँ हर शब्द की चीड़फाड़
बारीक सी मानो सुई सी लेकर
उधेड़ता हूँ कहा-अनकहा अर्थ

मैं
याद रखता हूँ हरदम हमेशा
कब किस मौके पर किस ने
किया था मेरे मूल्यों पर प्रहार

मैं
नहीं करता कभी विरोधी को माफ
हर क्षण रहती है मौके की तलाश
जब कर सकूँ सशक्त प्रतिघात 

मैं
कुछ अजीब सा होता जा रहा हूँ
हरदम चाहता हूँ हर विरोधी का
अपमान, उपहास, निर्णायक विनाश

मैं
देखता हूँ आइने के सामने खड़े खुद को
मेरी गर्दन के ऊपर चेहरा नहीं है
एक भिंची,तनी मुठ्ठी उग आई है वहाँ

मैं
आज वाकई बहुत बहुत खुश हूँ
नहीं रहा मैं अदना आम इन्सान
मैं जीता जागता विरोध बन गया हूँ



पर

क्या यह भी एक त्रासदी नहीं है ?







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बुधवार, 22 अगस्त 2012

बिटिया की खिड़की...

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एक साल आठ महीने की वह
टीवी पर विज्ञापन देखने में मग्न
हो जाती है चौकन्नी

मेरे नहाकर बाहर निकलते ही
बहुत धैर्य से करती है इंतजार
पापा के नाश्ता करने का

करती है वह ईशारा फिर
प्रेस करी कमीज की ओर
हुक्म सा देती है पहनने का
 
जब पहनने लगता हूँ मैं उसे
लगते हुऐ हर बटन के साथ
चौड़ी होती जाती है उसकी मुस्कान

फिर वह बैल्ट देती है मुझे
ढूंढ-ढांढ कर लाती है जूते
जो होते हैं पड़े कहीं-किसी कोने में

जब हो जाती है तसल्ली उसे
अब पूरी तरह हैं तैयार पापा
अपने ऑफिस निकलने के लिये

चिपट जाती है वह मेरे पैरों से
यह ईशारा होता है उसका
कि अब उठा लूँ उसे गोद में

और ले जाऊँ बाहर घुमाने को
कभी कॉलोनी के चौराहे तक
तो कभी पार्क की ओर ही

कभी उसे जाना होता है रोड तक
अनजान चेहरों को ताकती वह
देखना चाहती है कभी बाजार

रोज का नियम बन गया है यह
बन गया हूँ मैं अपनी बिटिया की
दुनिया को देखने की खिड़की सा

कितना अच्छा लगता है न
अपनी छोटी सी बिटिया की
खिड़की बन जाना एक बाप को






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मंगलवार, 21 अगस्त 2012

ऐसे में आखिर लिखे अब क्यों कोई, क्या आप बतलाओगे मुझे ?

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शब्द
शायद
अब खुद ही भूल गये हैं
कि आपस में जुड़ कर
किसी खास क्रम में 
देते एक दूसरे को सहारा
और विस्तार भी
कभी हो जाते थे
वह बहुत प्रभावी
और ताकतवर भी
रखने लगते थे हैसियत
बदल देने की
दुनिया के निजाम को


शब्द
भले ही महज दो या चार हों
बन जाते थे वह नारा
जो जिंदा कर देता था
मरी हुई कौमों को
पलट देता था तख्तो-ताज
बहाता था बदलाव की बयार


शब्द 
किसी खास की वाणी से
उच्चारित होकर
फैल जाते थे हर तरफ
बन जाते थे उम्मीदें
दिखाने लगते थे सपने
और जीने का मकसद भी


शब्द
जो दिलाते थे भरोसा
और दिलोदिमाग को सुकून
भले ही आज सब कुछ
हो रहा हो गलत-अनैतिक
पर हो जायेगा ठीक यह
बस कुछ दिनों की बात है


शब्द
जो देते थे आश्वासन सा
भले ही दिख रहा हो
हर तरफ हर कोई स्याह सा
पर निराश नहीं होना दोस्त
फिर रोशन होगा जहाँ
सच्चाई अभी जिंदा है


शब्द 
महज शब्द हो गये हैं
कौड़ियों के मोल मिलते
ईमान के बदले बिकते
किसी भी क्रम में लगाओ
अलंकार उपमायें जुटाओ
अब वे कोई अर्थ नहीं रखते


शब्द
खो चुके हैं ताकत अपनी
नहीं ला पाते हैं बदलाव
अब नहीं दिलाते उम्मीद
आश्वस्त तक नहीं करते
नहीं कहते कि सुबह आयेगी
बिकते हैं चौराहों-फुटपाथों पर


शब्द
अब हो गये हैं अर्थहीन
और नपुंसक भी
ऐसे में क्या लिखना
किसके लिये लिखना
आखिर लिखे क्यों अब कोई
क्या तुम बतलाओगे मुझे ?









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शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

हाँ, अब सही है ! और स्वागत भी है, आपका अन्ना, 'पहाड़' के नीचे....

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कल आखिरकार देश के २३ प्रसिद्ध व्यक्तियों के अनुरोध पर अन्ना ने ३ अगस्त की शाम पाँच बजे से अनशन तोड़ने व एक स्वच्छ राजनीतिक विकल्प बनाने की दिशा में काम करने के बारे में कहा... 'टीम अन्ना' की अन्य कई बातों की तरह ही यह बात भी शायद ही किसी की समझ में आये कि मधुमेह से पीढ़ित श्री अरविन्द केजरीवाल व श्री गोपाल राय की २५ अगस्त से जारी अनशन के कारण खराब सेहत व उनकी जाँचों में कीटोन बॉडीज् की उपस्थिति के बावजूद क्यों अन्ना अपने और उनके अनशन को एक दिन और ज्यादा क्यों खींच रहे हैं... 'टीम अन्ना' खुद मान रही है कि सरकार पर अनशन का दबाव नहीं बन पा रहा, ऐसे में एक और दिन अनशन को खींचने के पीछे मात्र यही कारण नजर आता है कि इसी बहाने इलेक्ट्रानिक मीडिया की लाइमलाइट एक दिन और मिलेगी, कुछ लाख एसएमएस, अनेकों ट्वीट और फेसबुक पर एक्टिविटी होगी और आखिर में मीडिया के कैमरों के सामने नींबूपानी या फलों के रस का गिलास ले अनशन तुड़वाने व अपना समर्थन जताने व फोटो खिंचवाने का मौका मिलेगा कईयों को...

अपनी शुरूआत से ही यह आंदोलन हाल में हुऐ कुछ बड़े घोटालों के कारण उपजे जन आक्रोश को दुहने का कार्य कर रहा था, और जो तरीका टीम ने अपनाया, वह था जनता को ' जन लोकपाल' के रूप में एक ऐसे अवतार का सपना दिखाने का, संसद में जिसके लिये कानून पास होने के बाद जिसका अवतरण होते ही मुल्क से भ्रष्टाचार काफूर हो जायेगा... पर एक ऐसा लोकपाल, जो प्रधानमंत्री से भी ऊपर हो, तंत्र की सारी शक्तियाँ जिसमें निहित हो, सारी जाँच एजेंसियाँ जिसके नीचे हों, जो खुद ही रिपोर्ट दर्ज करे, खुद ही जाँच करे व खुद ही फैसला सुना दे... स्वाभाविक ही था कि कोई भी राजनीतिक दल 'टीम अन्ना' द्वारा प्रस्तावित ऐसे लोकपाल के लिये तैयार नहीं होता... संसद ने अपने विवेक से 'लोकपाल बिल' ड्राफ्ट किया और देर सबेर वह पास भी हो ही जायेगा...

अब पिछले कुछ समय से कुछ कयासों, लीक हुई तथाकथित रिपोर्टों आदि आदि के आधार पर 'टीम अन्ना' ने एक नया मोर्चा खोल दिया, वह यह कि प्रधानमंत्री व वर्तमान राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी सहित १५ केन्द्रीय मंत्रियों की रिटायर जजों की एसआईटी जाँच करे... हमारे तंत्र में एक कायदा है, वह यह कि जिस किसी की भी जाँच चल रही हो वह अपने पद से जाँच अवधि तक हटा दिया जाता है... तो एक तरह से यह टीम माँग कर रही थी कि मुल्क की संसद को नेतृत्व विहीन कर दिया जाये इनके हठ के चलते... कोई आश्चर्य नहीं कि सरकार ने अनशन को नजरअंदाज किया, मीडिया और जनता ने भी... टीम इतनी हताश हो गयी कि एक वरिष्ठ सदस्य को मीडिया के विरूद्ध भड़काऊ बयान देना पड़ा...

बहरहाल पाँचवे दिन से अनशन पर अन्ना के बैठने के बाद कुछ स्थितियाँ बदली व टोपी-टीशर्ट-ट्वीट-तिरंगा-एसएमएस-फेसबुक-बैनर-पोस्टर-मोमबत्ती ब्रिगेड थोड़ी बहुत 'टीम अन्ना' के साथ खड़ी दिखी... पर यह तय था कि सरकार इस बार न झुकेगी न लल्लो-चप्पो करेगी... और अनशनकारियों की सेहत भी बिगड़ती जा रही थी...  ऐसे में यह अनशन खत्म करने का ऐलान व राजनीतिक विकल्प की तलाश करने की घोषणा करना बीच का व किसी अप्रिय स्थिति को पैदा होने से रोकता सम्मानजनक रास्ता है...

पर अन्ना व उनकी टीम की असल चुनौती अब शुरू होती है... हमें ईमानदार नेता इस लिये नहीं मिलते क्योंकि हम एक ईमानदार जनता नहीं हैं... लोकतंत्र की सबसे पहली सीढ़ी यानी ग्राम पंचायत को ही अगर आप लें, तो पंचायत चुनाव में ही अधिकतर प्रत्याशी की ईमानदारी को देख वोट नहीं डालते... देखा जाता है उसकी जात को व मजहब को... यह भी देखा जाता है कि जब मैं अपने मकान के कमरे को बड़ा करने के चक्कर में खड़ंजे को अपने मकान में मिलाऊंगा या खेत बड़ा करने के लिये चकरोड को जोत दूंगा तो यह प्रधान काम आयेगा कि नहीं... नरेगा में बिना काम धाम किये यह प्रधान मजदूरी देगा कि नहीं, व मानक के अनुसार बीपीएल न होते हुऐ भी लिस्ट में नाम लिखायेगा कि नहीं... प्राइमरी स्कूल के वजीफे से लेकर खाद की बोरियों तक के आवंटन में वह आपका ख्याल रखेगा कि नहीं... थाना-पुलिस के हर मामले में उसे बिना दूसरे का पक्ष जाने आपका साथ देना होगा... यही नहीं चुनाव की घोषणा से लेकर पोलिंग के दिन तक प्रधानी लड़ रहे उम्मीदवार के खर्चे पर दारू-मुर्गा जीमने का हक तो वोटर का है ही...

लगभग गाँव जैसा ही यही हाल हमारे शहरी मध्यवर्ग का भी है... यह वर्ग पानी पी पी कर भ्रष्टाचार को कोसता है पर मौका मिलते ही सरकार व देश को चूना लगाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देता... अपनी कॉलोनी में ही देखियेगा कि कितने अन्ना समर्थकों की कारें घरेलू एलपीजी सिलेंडरों से चलती है कितने व्यापारियों के होटल रेस्टोरेंटों में घरेलू एलपीजी जलती है... नाली और फुटपाथों को कितनों ने अपने बंगलों-दुकानों में शामिल कर लिया है... कितनों के बिजली मीटर फिक्स हैं... कितने अपनी सही आय आयकर भरते हुऐ बताते हैं... कितने उन धर्मस्थलों की प्रबंधन कमेटी में शामिल हैं जो साफ तौर पर सरकारी सार्वजनिक उपयोग की जमीन,सड़क या पार्क आदि पर अवैद्म कब्जा कर बने हैं... कितने अपने बच्चे को अच्छे नंबर दिलवाने के लिये जरूरत न होने पर भी क्लास टीचर से टुईशन पढ़ाते हैं... कितने कमाई वाली कुर्सी के लिये व्रत-उपवास करते हैं...

कुल मिलाकर ईमानदारी कम से कम आज तो फैशन में नहीं है मुल्क में... इसलिये टीम अन्ना का काम और चुनौतीपूर्ण हो जाता है... सबसे पहले तो उन्हें एक एसआईटी तो अपने संभावित उम्मीदवारों की जाँच करने के लिये ही बनानी पड़ेगी क्योंकि राजनीति में उतरने पर उन पर भी आरोप लगेंगे ही... और कोई उन को केवल इसलिये खारिज नहीं कर पायेगा कि वह अन्ना समर्थक है... क्या उनके दल को ६५० पूरी तरह से ईमानदार जिला अध्यक्ष मिल पायेंगे?... राजनैतिक दल बनाने के निर्णय के बाद अब आगे टीम अन्ना और अन्ना समर्थक तिरंगे को भी लहरा-लहरा झूम नहीं पायेंगे... एक आम नागरिक तिरंगे को सम्मान देता है पर क्या यही सम्मान उनकी पार्टी के झंडे को मिल पायेगा, आप अनुमान लगाइये...

आपको ईमानदारी को वापस फैशन में लाना होगा अन्ना... कार्य मुश्किल है पर असंभव नहीं... रही बात चुनाव की तो मान्यवर कांशीराम कहा करते थे कि पहला चुनाव हारने के लिये, दूसरा हराने के लिये लड़ा जाता है, तीसरे चुनाव में ही आप सही तरीके से दौड़ में आ पातें हैं... इसलिये लंबे समय तक संघर्ष करने, धैर्य न खोने व आशा को कायम रखने के लिये भी तैयार रहिये अन्ना... आप संसद में जाइये, संसद को कब्जाइये व अपने लोकपाल को ही सारी सत्ता दे दीजिये, यकीन मानिये कोई भी आपका विरोध नहीं करेगा... आखिर एक लोकतंत्र हैं हम और संसद को सर्वोपरि मानते हैं...


तहे दिल से स्वागत है आपका अन्ना, 'पहाड़' के नीचे... :)


चढ़ पायेंगे क्या अन्ना ? अपनी 'टीम' के साथ... शुभकामनायें...











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बुधवार, 1 अगस्त 2012

आइये इस जलेबी का छोर ढूंढें : साबित करो कि वह नहीं है !!!

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पहले ही साफ कर दूँ कि धर्म, आध्यात्म और ईश्वर की तिकड़ी द्वारा बनाई चाशनीदार जलेबी का छोर ढूंढती यह 'जलेबी सीरिज' विशुद्ध रूप से प्रतिक्रियात्मक है... वजह यह है कि चारों तरफ से धर्म, आध्यात्म और धार्मिकता की सिखलाई का बोम्बार्डमेन्ट सा हो रहा है मुझ पर... अब ऐसे में अपने को भी यह लगता है कि कुछ कह ही दिया जाये अपनी ओर से भी...

अब सवाल यह भी उठना लाजिमी है कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ, तो मित्रों, AGNOSTIC (संशयवादी या अज्ञेयवादी) दॄष्टिकोण से यह सब लिखने का मेरा एक मात्र मकसद है...

* खुद के और आपके मस्तिष्क को विचार मंथन के लिये थोड़ी और खुराक देना...
** धर्म और ईश्वर से संबंधित एक और नजरिये से आपको रूबरू कराना...
*** सत्य की खोज पर जाते अपने पाठक को एक और साफ सुथरा, सीधा परंतु कम प्रचलित (Less traveled) रास्ता दिखाना...

स्पष्ट कर दूँ कि स्थापित धर्म और सुस्थापित 'वर्तमान ईश्वरों' से मेरा कोई विरोध न कभी था और न कभी होगा... अभिव्यक्ति और अपने मत या विचार के प्रचार की आजादी एक सर्वोपरि मानवीय मूल्य है... मुझे इसकी समझ है, और मैं प्रार्थना करता हूँ कि मेरे धार्मिक आलोचक भी इस बात को समझेंगे...


आईये पहले प्वायंट पर चर्चा करते हैं...


अविश्वास, शक या संशय करने वाले से सबसे पहले आस्तिक यही कहता है कि मैं तो मानता हूँ वह है, तुम नहीं मानते-पर साबित करके दिखाओ कि वह नहीं है...


अब जरा सोचिये इस पर क्या इतनी बड़ी दुनिया में किसी चीज का न होना पूर्णता व विश्वास के साथ साबित किया जा सकता है... अगर आपका जवाब हाँ में है...


तो कृपया इस बात को ही साबित कर दीजिये कि...


पूरी दुनिया में कहीं पर भी गुलाबी रंग का एक ऐसा हिरन नहीं है जिसके कान आसमानी और पूँछ नारंगी रंग के हैं,  जब वह उड़ना चाहता है तो उसके अगले पैर सफेद रंग के पंखों में बदल जाते हैं...


जब तक आप इस अनोखे हिरन का अस्तित्व न होने को मुकम्मल तरीके से साबित करते हैं तब तक मैं अगला सवाल लेकर आता हूँ... :)






आभार !












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