मंगलवार, 17 जुलाई 2012

अधिकाँश गलों से दोगली बातें करने वाले किसी भी समाज में यह सब तो होता ही रहेगा... नियमित रूप से होती हैं और होंगी यह घटनायें... इसमें कैसा आश्चर्य ?

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गुवाहाटी की घटना ने देश के मानस को मानो झकझोर सा दिया है... प्राइमटाइम टेलीविजन पर वीडियो आने का यह कमाल है... पर महिलाओं के साथ इस तरह का सलूक क्या केवल गुवाहाटी में ही हुआ, बाकी जगह नहीं होता ?... नंगी हकीकत तो यह है कि इस तरह के तमाम वाकये होते रहते हैं देश भर में... बस इनके वीडियो नहीं बन पाते... और फिर पीढ़िता को उसकी इज्जत का हवाला दे या समझौता आदि कर निपटा दिये जाते हैं...

जिस समय गुवाहाटी की यह घटना चर्चित होती है ठीक उसी समय बागपत के असारा गाँव की एक खाप पंचायत ऐलान कर देती है कि चालीस साल से कम उम्र की कोई औरत अकेले बाजार नहीं जायेगी, शाम को घर से बाहर घूमने नहीं निकलेगी, मोबाईल नहीं रखेगी, चेहरा ढकेगी... और प्रेम विवाह को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा... पंचायत ने यह नहीं बताया कि जो लड़की यह सब नहीं मानेगी उसके साथ क्या होगा... पर आप कल्पना कर सकते हैं कि इन फरमानों को जो भी लड़की अनसुना करने की हिम्मत करेगी, खाप पंचायत के फैसले की आड़ में लंपटों की भीड़ उसके साथ जो कुछ सलूक करेगी वह कुछ-कुछ गुवाहाटी जैसा ही होगा...
आखिर गुवाहाटी के वह लंपट भी तो पीढ़िता को उसके नाइट क्लब जाने, पाश्चात्य परिधान पहने व कथित रूप से शराब पीने के ' महान अपराध ' के लिये ही तो अपनी नजर में 'सबक' सा सिखा रहे हैं...

प्रतिक्रियायें बड़ी रोचक हैं इन दोनों मामलों पर... गुवाहाटी के मामले की निंदा हो रही है चहुंओर, और जल्दी से जल्दी ' डर्टी डजन '  को पकड़ने के लिये दबाव बनाया जा रहा है... लेकिन कहीं न कहीं इस सब चर्चा के बीच आंचल, घूंघट व पर्दे वाली महान भारतीय संस्कृति को भी याद किया जा रहा है... यह भी पूछा जा रहा है कि क्या जरूरत थी उन्नीस बरस की पीढ़िता को उस समय पर उस जगह जाने की... ठीक उसी तरह असारा गाँव की खाप पंचायत के फरमान को परिवार के बड़ों द्वारा अपने परिवार के अंदरूनी मामलों को संभालने की एक कोशिश, जो कि उनका जायज हक भी है, के रूप में देख-दिखा रहे हैं कुछ लोग...

एक सालाना कार्यक्रम भी आप देखते ही होंगे खास तौर पर १४ फरवरी के आस पास... रेस्टोरेंट्स, होटलों व बाजारों व पार्कों में घूमते युवा जोड़ों को घेर लेते हैं भारतीय संस्कृति के स्वयंभू पहरेदार... कहीं उनसे कान पकड़वाये जाते हैं, कहीं मुर्गा बनाया जाता है, कहीं कालिख पोती जाती है, कहीं लड़की के घरवालों को मोबाइल से बुलाकर लड़की उनके सुपुर्द की जाती है... हद तो तब हो जाती है कि कहीं कहीं पर पुलिस भी इस सब में सक्रिय भागीदारी दिखाती दिखती है...

कुल मिलाकर मतलब यही है कि हममें से अधिकाँश एक साँस में तो गुवाहाटी जैसे मामलों की निंदा करते हैं... पर दूसरी साँस में यह भी नसीहत दे डालते हैं कि महिलायें ऐसा कुछ करने से बचें, ऐसी स्थितियों में आने से बचें जहाँ उनके साथ ऐसा कुछ हो सकता है... हमारे प्राचीन भारत में ऐसा नहीं होता था... ठीक इसी तरह एक साँस में हम असारा जैसे फरमानों की निंदा करते हैं और दूसरी साँस में यह भी कह डालते हैं कि वह गाँव वाले जिस तरह रहना चाहें यह उनकी मर्जी, बुजुर्गों को बच्चों की भलाई के लिये इस तरह की सलाहें देने का हक है और उनकी बात में भी कुछ वजन है, पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में नयी पीढ़ी बिगड़ रही है आदि आदि ब्ला ब्ला ...

क्या आपने कभी भी स्पष्ट तौर पर हमारे नीति निर्धारकों को, हमारे नेताओं को, पुलिस प्रशासन के अधिकारियों को यह कहते सुना है कि...

" भारत का हर नागरिक, चाहे पुरूष हो या महिला, उसे हर वह कपड़ा पहनने का हक है जिसे हमारा कानून अश्लील नहीं मानता, उसे हर उस जगह पर जाने का हक है जो कानूनन खुली है, उसे उस समय तक इन जगहों पर जाने की इजाजत है जिस समय तक इन जगहों के खुलने की इजाजत कानून देता है, इन जगहों पर जा उसे हर वह चीज खाने या पीने की आजादी है जो कानूनन कोई खा-पी सकता है, उसे मोबाइल फोन रखने की आजादी है क्योंकि मुल्क का कानून इसके खिलाफ नहीं है, बालिग होने के बाद यह उसकी मर्जी है कि किसके साथ रहे, किससे प्रेम करे या किससे विवाह करे, मुल्क का कानून उसे यह आजादी देता है...


और जो कोई भी, किसी भी भारतीय नागरिक के ऊपर लिखे अधिकारों को नहीं मानता... जबरदस्ती उसमें दखल देता है... चाहे यह दखल संस्कृति रक्षा के नाम पर ही हो... एक सभ्य लोकतांत्रिक समाज में उसकी एक ही जगह है और वह है जेल की सलाखों के पीछे ! "



तो मित्रों, जिस दिन से हमारा हर गला दोगलापन छोड़ यह सब कहेगा, स्थितियाँ बदल जायेंगी...

मगर वह दिन अभी तो काफी दूर है... : (


आज के दिन तो हमारे अधिकाँश गले दोगली बातें ही करते रहते हैं...

और, अधिकाँश गलों से दोगली बातें करने वाले किसी भी समाज में यह सब तो होता ही रहेगा...


नियमित रूप से होती हैं और होंगी यह घटनायें...

इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये किसी को भी...






आभार !












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गुरुवार, 5 जुलाई 2012

युवाओं के सपने छीनता, हौसले तोड़ता एक मूर्खतापूर्ण कदम है यह....


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एजुकेशन यानी शिक्षा आज का नया 'सन राइज' उद्मोग है... यह सचमुच बड़ी हैरत में डालता है कि किस तरह खामोशी से चाहे पक्ष हो या विपक्ष सभी सरकारों ने शिक्षा देने की अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ लिया है और निजी क्षेत्र को मनमानी करने की खुली छूट दे दी है... नतीजा है कि कुकुरमुत्तों की तरह निजी विश्वविद्मालय उग आये हैं परिदॄश्य पर... और खुल गयें हैं सेन्ट्रल एसी युक्त वाई-फाई सुविधाओं वाले जीपीएस व एसी युक्त बसों वाले स्कूल भी... पर शिक्षा का यह माफिया अभी इस सब से संतुष्ट नहीं... यह माफिया ऐसी स्थितियाँ पैदा कर देना चाहता है कि हर नागरिक के लिये अपने बच्चे को इनके स्कूलों में पढ़ाना उसकी मजबूरी बन जाये, चाहे इसके लिये उसे अपना घर-जमीन व जमीर भी बेचना पड़ जाये...

कोचिंग क्लासों पर लगाम लगाने व स्कूलों के बोर्ड एक्जाम को महत्ता देने के नाम पर उठाया गया यह यह कदम (लिंक). भी कुछ ऐसा ही है... कहा जा रहा है कि अब IIT's में प्रवेश सभी वर्गों के वही विद्मार्थी ले पायेंगे जो अपने अपने वर्ग में अपने बोर्डों के टॉप २० पर्सेन्टाइल में आते हों यानी उनके वर्ग के अस्सी फीसदी बच्चे इम्तहान में उनसे कम अंक पायें हों... अब सोचिये क्या इससे कोचिंग क्लासों पर लगाम लगेगी क्या... उल्टा प्रभाव यह होगा कि ग्यारहवीं और बारहवीं के इम्तहान के लिये भी बच्चे को टॉप की कोचिंग दिलाना और अच्छा रिजल्ट निकालने वाले स्कूल में येन-केन प्रकारेण भर्ती कराना माँ-बाप की मजबूरी हो जायेगी... दूरस्थ इलाकों के व साधनहीन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे जिनके पास न काबिल शिक्षक हैं, न साधन, न बिजली, न अत्याधुनिक एजुकेशनल मैटीरियल... न तो कभी टॉप २०% में आ पायेंगे और न ही कभी IIT का सपना देख पायेंगे...

मुल्क के कुछ सबसे बेहतरीन दिमाग IIT's से जुड़े हैं... उनको यह भी पता है कि संस्थान के विद्मार्थी के भीतर सही में क्या काबलियत होनी चाहिये... यह लोग थोड़े से प्रयास से एक ऐसा इन्ट्रेन्स टेस्ट डिजायन कर सकते हैं जिसके लिये कोचिंग कोई भी कोचिंग क्लास न दे सके... जो तोतारटंतों की समझ में ही न आये... जो विद्मार्थी की समझ, चीजों को एनालाइज करने की क्षमता, तार्किकता व उस समझ के सही एप्लीकेशन की परख करता हो... इस टेस्ट के लिये तो १२ साल की स्कूली शिक्षा की कोई बाध्यता भी नहीं होनी चाहिये... जो भी समझे कि उसमें यह योग्यता है उसे यह टेस्ट देने का हक होना चाहिये... आखिर अपने काम की गणित, भौतिकी और रसायन तो संस्थान खुद पढ़ाता ही है बाद में...

पर अपेक्षा के अनुसार ही सरकार और कर्ताधर्ताओं ने ऐसा कुछ नहीं सोचा... और देश के एक बहुत बड़े साधनहीन युवा वर्ग के सपने छीन लिये एक झटके में... माँ-बापों को मजबूर कर दिया कि बच्चे के सपने अगर जिन्दा रखने हैं तो चाहे खुद को बेचो, पर उसे पढ़ाओ शिक्षा की दुकानों में ही... ग्यारहवीं और बारहवीं में भी ट्यूशन-कोचिंग कराओ...

डूब मरो सरकार... पर मुझे यह दूर से कुछ आहटें सी क्यों सुनाई दे रही हैं... यह मेरा भ्रम है क्या... या यह मूर्खतापूर्ण कदम वाकई आमूलचूल परिवर्तन की बुनियाद रखने जा रहा है... और हलचल शुरू हो गई है...








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