रविवार, 6 मई 2012

आइये, देह का उत्सव मनायें !

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देह अगर सब कुछ नहीं है तो भी बहुत कुछ तो देह है ही... हमारी भारतीय मान्यता के अनुसार देह ही वह आधार है जिसके समर्थ व मजबूत होने पर ही काम, अर्थ, धर्म व मोक्ष की बाकी सीढ़ियाँ चढ़ी जा सकती हैं...

अब अगर देह है तो देहासक्ति भी... ज्ञान, बुद्धिमता, बौद्धिकता व आध्यात्म के तमाम बड़े-बड़े दावों और आवरण के बीच इंसान आज भी वही है, जो वह पहले था, यानी अन्यों से थोड़ा ज्यादा दिमाग रखने वाल पशु... इसलिये कोई आश्चर्य नहीं कि देह के प्रति अपनी आसक्ति में आज भी वह आदिम युग के इंसान सा ही है... आज भी उसकी सबसे बड़ी चाहत वही आदिम चाहत है और वह है उपलब्ध विपरीत लिंगियों में से सबसे आकर्षक देहयष्टि वाले योग्यतम सहचर की अनवरत, जीवन पर्यंत खोज...

इस आदिम चाहत को धर्म ने बखूबी समझा और भुनाया है... धर्म ने सपना दिखाया है स्वर्ग की अप्सराओं व जन्नत की हूरों का... इस मामले में धर्म एकमत है कि यदि ईश्वर को खुश कर दिया तो स्वर्ग जायेगा इंसान... जहाँ यह चिरयौवना, सर्वांगसुंदरी अप्सरायें या हूरें उसके लिये हर समय उपलब्ध होंगी, सेवा में तत्पर... ध्यान दीजिये यह अप्सरायें स्वर्ग के निवासी का कोई आध्यात्मिक या बौद्धिक उन्नयन नहीं करेंगी, यह केवल और केवल उसकी दैहिक वासनाओं की पूर्ति के लिेये ईश्वर का उपहार होंगी... फिर, क्या आश्चर्य इस बात का कि मानवता का एक बड़ा तबका जीवन ईश्वर के गुणगान करने में ही बिता देता है... ईनाम भी तो इतना बड़ा है दोस्तों... :)

आजकल एक प्रवृत्ति और देख रहा हूँ कुछ लोगों की कि किसी भी विमर्श को मोड़ कर माँओं और बहनों पर उतर आने की... इस आलेख पर भी कोई ऐसा कुछ करे इससे पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि कोई पुरूष किसी भी वय का क्यों न हो, दुनिया की सारी महिलायें उसकी माँ व बहन समान कभी नहीं हो सकतीं... उसके समकक्ष महिलाओं का एक ऐसा समूह हमेशा ही होगा ही जो उसका अभीष्ट होगा, जिनकी वह चाहत रखेगा, जो उसे आकर्षित करने का यत्न करेंगी, जो उस पुरूष के लिये कमनीय-रमणीय होंगी... ठीक इसी तरह किसी महिला के लिये भी दुनिया के सारे पुरूष पिता-भाई समान नहीं हो सकते...

पहली नजर में प्यार जैसी कोई चीज अगर है तो वह है दैहिक आकर्षण ही... क्योंकि पहली नजर में तो कोई किसी के बौद्धिक, मानसिक, आध्यात्मिक या नैतिक धरातल को तो परख नहीं सकता...

इस सब के मद्देनजर यह तमाम होहल्ला, हंगामा और आपत्तियाँ समझ नहीं आतीं, जब कोई महिला या पुरूष अपनी देह के किसी अनाकर्षक पक्ष को बेहतर बनाने के लिये शल्य क्रिया का सहारा लेता है और कोई पत्रिका इस पर कवर स्टोरी छाप देती है...

देह के मामले में आज के दौर में एक ही नियम लागू होता है... If You have it, flaunt it !... लंबा शरीर, चौड़ा सीना, चौड़े कन्धे, बलिष्ठ भुजायें, सपाट पेट व सशक्त जाँघें जहाँ पुरूष के देह सौंदर्य का पर्याय हैं ... जिसके पास यह सब कुछ है वह इनको प्रदर्शित करने का कोई मौका नहीं छोड़ता... और पुरूष की इस देह की ओर आकर्षित होने वाली स्त्रियों की भी कमी नहीं है... आखिर बॉलीवुड का निर्विवाद सुपर स्टार सलमान खान अपनी हर फिल्म में अपनी कमीज क्यों उतारता है... पब्लिक डिमाँड, माफ कीजिये अपनी महिला प्रशंसिकाओं की डिमांड व उनको टिकट खिड़की तक खींच लाने के लिये ही तो...

ठीक इसी तरह स्त्रियों के चेहरे के अतिरिक्त देह के सौंदर्य का पैमाना है लंबी गर्दन, उन्नत सुडौल वक्ष, आकर्षक पीठ, पतली कमर, मोहक कटि प्रदेश व लंबी सुडौल टाँगें... पूरा का पूरा महिला फैशन उद्मोग स्त्री के इस देह सौंदर्य को कैसे उभारना है, किस अंग को कितना छिपाना व किसे कितना दिखाना है, किसे हाईलाइट करना है किसे अन्डरस्टेटेड रहने देना है, पर ही टिका है... फैशन की इस होड़ में सभी बराबर के भागीदार हैं... चाहे वह नूडल स्ट्रैप वाली पीठ वाली चोली पहने गाँव की गोरी हो, शहर की स्किन टाइट जीन्स पहने नवयुवतियाँ या स्लीवलेस व कल्पना के लिये कुछ भी न छोड़ते गहरे गले का ब्लाउज पहने शहरी प्रौढ़ायें ही...

यदि गंभीरता से सोचें तो स्वयं को विपरीत लिंगी के लिये अधिक आकर्षक बनाने, उसे प्रभावित करने की क्षमता अपने में पैदा करने का यही खेल ही तो है जो दुनिया को चलाता है... पैसा, पद, यश और ताकत या आध्यात्मिक उत्थान ही... चाहे जिसके भी पीछे भागे इंसान... मूल भाव हमेशा ही वही होता है... यह बात और है कि इसे आसानी से कई स्वीकारते नहीं...

इस आकर्षण का एक बड़ा हिस्सा है देह... एक जमाना था जब हममें से अधिकाँश केवल रोजी-रोटी के जुगाड़ में ही बेहाल थे... आज बहुतों के पास स्पेयर समय भी है और पैसा भी... ऐसे में यदि अपनी देह को प्राकृतिक या कृत्रिम तरीके से और आकर्षक बनाने का चलन उभरा है या इस तरह के परिधान पहने जा रहे हैं जिनमें पहनने वाले की देह दूसरों को दिखाई दे... जंगल में मोर नाचा किसने देखा की तर्ज पर ढंकी-छिपी न रहे, तो मेरे या आपके कुछ भी कहने या करने से यह चलन नहीं रूकने वाला...

हर दौर की नैतिकतायें, मापदंड व प्रचलन अलग होते हैं... किसी पुराने दौर के मापदंड या नैतिकता नये दौर पर चाहकर भी लादे नहीं जा सकते... एक गर्म मुल्क होने के बावजूद हम लोग काफी अधिक कपड़े पहनते हैं... नये दौर की नयी पीढ़ी कम कपड़े पहनेगी और यदि उनके पास दिखाने लायक देह होगी तो उसका बेझिझक व खुला प्रदर्शन भी करेगी... न यकीन आता हो इस बात पर तो हर कस्बे तक में होने वाली सौंदर्य प्रतियोगितायें व अगली मिस इंडिया या मिस्टर इंडिया बनने का सपना पाले प्रतिभागियों व उनके माता-पिताओं की लंबी कतारों पर नजर मारिये...

हमको ही देह के साथ सहज होना होगा... देह के प्रदर्शन या दर्शन मात्र से ही किसी को या स्वयं को अशुद्ध हो गया समझने की मानसिकता बदलनी ही होगी... यही नया दौर है...

आइये, देह का उत्सव मनायें... 

तो तैयार हैं आप ?







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आलेख जो मेरे इस आलेख की प्रेरणा बने...

उम्मतें:  स्त्री देह से भयभीत सुधिजन !

क्वचिदन्यतोअपि: वक्ष सुदर्शनाएँ!

बैसवारी: उभार की सनक या बिकने की ललक !

नारी : ब्रेस्ट इम्प्लांट , इंडिया टुडे का कवर गैर जरुरी





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64 टिप्‍पणियां:

  1. प्रवीण
    "देह " पर विमर्श जरुरी और गैर जरुरी , मुद्दा अगर ये हो तो ठीक हैं . ब्लॉग जगत के जो लोग पिंक चड्ढी अभियान और सलट वाल्क पर नारी को रडार पर रख कर उनको "छिनाल " कह चुके हो वही जब ब्रेस्ट इम्प्लांट के बिकिनी इंडिया टुडे के कवर का समर्थन करते दिखते हैं तो बात देह पर हो ही नहीं रही हैं .
    इसी ब्लॉग जगत में महिला ब्लॉगर को चिकनी चमेली , और चेली कहा गया हैं , इसी ब्लॉग जगत में मॉडल को प्रोडक्ट बेचने की खातिर अपना शरीर बेचने के "गैर जिम्मेदाराना " हरकत के लिये ना जाने कितनी बार सूली पर लटकाया गया हैं .
    अगर किसी का विरोध नारी के शरीर के खुले प्रदर्शन से हैं तो सबसे पहले उसको अपने अन्दर झाँक कर देखना चाहिये की वो मोरल पुलिसिंग किसी की कर रहा हैं . अपनी " माँ बहिन बेटी पत्नी प्रेमिका " की मोरल पुलिसिंग करने में "अक्षम " ब्लॉग जगत की महिला की मोरल पुलिसिंग करते हैं और समाज के "पतन " के लिये महिला को दोषी मानते हैं .
    मोरल पुलिसिंग अगर उनकी कर दी जाये तो बिलबिलाहट वाजिब हैं .
    मुझे ब्लॉग पर नारी के चित्रों / नग्न चित्रों को डालने से सख्त आपत्ति हैं जब तक उस पर उस महिला की परमिशन ना हो जिसका चित्र हैं और मै अपनी बात पर २००७ से कायम हूँ . मै नारी को मिले दोयम के दर्जे पर आपत्ति करती हूँ .
    विपरीत लिंग का आकर्षण
    अगर दुनिया की सारी महिला किसी की माँ - बहिन नहीं हो सकती हैं तो हर स्त्री पुरुष भी एक दूसरे के पूरक नहीं हो सकते हैं . विपरीत लिंग का अहसास किसी महिला को बार बार कराना आज के कानून में शायद " सेक्सुअल हेरास्मेंट " गिना जाता हैं .

    मुद्दे पर बहस लिंग से हट कर क्यूँ नहीं होती हैं ?? देह पर स्त्री बात करे जैसे वंदना की कविता थी तो वंदना के चरित्र पर लाछन लगाए जाते हैं और जो लाछन लगाते हैं वो बुद्धिजीवी बन जाते हैं . पहले बराबरी मन में लाये तब विमर्श करे . देह पर विमर्श से किसे आपत्ति हैं ?? पोर्न देखना आम बात हो सकती हैं पर क्या पोर्न लोग अपनी बेटी / बेटे के साथ सहजता से देख पाते हैं मेरा प्रश्न महज इतना हैं

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  2. शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम्

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  3. पहली नजर में प्यार जैसी कोई चीज अगर है तो वह है दैहिक आकर्षण ही...
    या फिर 'पहली नज़र में प्यार' जैसा कुछ है भी कि नहीं. नज़र पहली हो या दूसरी या ... पर दैहिक आकर्षण अपना महत्व रखता ही है

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  4. देह महत्वपूर्ण हैं किन्तु जब देह मस्तिष्क पर हावी जाती है, देश दुनिया के लिए खतरनाक स्थिति बनती है. और सभ्यता के विकास के क्रम बहुत से नियम बने थे समाज में रहने के लिए... देह के लिए कुछ बने...सामाजिक बन्धनों से परे जाना मनुष्य की नियति रही है... देह का उत्सव सड़क पर मनाया जाए यह कभी भी नहीं कहा गया...आज जब भौतिकवाद चरम पर है...देह भरमाती है... प्रथम आकर्षण बनती है... देह और मन का यह द्वन्द शाश्वत है. नारी के जितने रूप हैं उसमे देह का आकर्षण इतना महत्वपूर्ण नहीं है... माँ की देह नहीं देखी जाती... बहिन की देह विषय नहीं जगाता... पत्नी अपने गुणों के कारण आकर्षित करती है... विचारो की शुद्धता आवश्यक है जीवन में.

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  5. कृपया यह कमेंट शीर्षक और चस्पा तश्वीर पर हल्का-फुल्का हंसी-मजाक ही माना जाय; आलेख पर नहीं।

    दूसरे पहलवान की तो देह दिखाएँ
    मगर अपनी तश्वीर खुद ना लगाएँ
    भला उनके कहने पर सोचिए तो
    कैसे खुशी से देह उत्सव मनाएँ!:)

    तश्वीर में इस पहलवान ने तो
    जिस्म अपना जलाया बहुत है
    बड़े पेट वाले, थुलथुल ब्लॉगरों का
    देखिये न मजाक उड़ाया बहुत है।

    इसे देख कर नींद अपनी उड़ी है
    कैसे भला देह उत्सव मनाएँ!:)

    नहीं नेट में, नहीं पत्रिका में
    अजी घर के किसी बेड रूम में
    चलो देह उत्सव मनाएं जम के
    मगर घर के बच्चे जब सो जाएँ।

    फिर देखिए खिड़की खुली ना हो कोई
    पहले सभी बत्तियाँ तो बुझाएँ।:)

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  6. हमको ही देह के साथ सहज होना होगा... देह के प्रदर्शन या दर्शन मात्र से ही किसी को या स्वयं को अशुद्ध हो गया समझने की मानसिकता बदलनी ही होगी... यही नया दौर है...
    blog par naya hun kintu ek sabase anurodh blog ko shuddh
    achchhe wicharon ke len den ka madhyam banaye na ki chhitakasin ka. anyatha is yuddha men bhag lena kathin ho jayega .kise doshiaur kise nirdosh kahen purwa ka pata hi nahin aur na hi kisi sandarbha ka .

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  7. शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम्

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    1. सतीश भाई ,
      लिख दिया ! अब ज़रा सोचिये भी कि आपने क्या लिखा :)

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  8. समाज का दोहरापन ही है कि कोई स्त्री नहीं स्वीकारती कि सौदर्य प्रसाधन का इस्तेमाल क्यों? माँ बेटी को सज धज कर जाने को कहेगी भी लेकिन लड़कों से या विपरीतलिंगी से दूर रहने का परामर्श भी देगी... स्वयं वह भी सारे शृंगार, सारा प्रदर्शन ( आखिर कम वस्त्र या पारदर्शी होते वस्त्र प्रदर्शन ही कहलाएंगे ) सब इसी के लिए, लेकिन स्वीकारोक्ति नहीं!

    यही हाल पुरुषों का है, लेकिन स्त्रियों के मुकाबले बहुत कम माना जाएगा उसे!

    वैसे देह का उत्सव मनाने का अपना कोई इरादा नहीं।

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  9. देह के माध्यम से ही देहातीत अवस्था पाने का मर्म आप क्या जानो प्रवीण बाबु!!
    स्वर्ग की अवधारणा में शारिरिक सुख ही लक्षित है, स्वर्ग में मात्र दैहिक ऐश्वर्य का ही इंगित नहीं,सांसारिक आधारभूत सुखों मुख्यतः उत्तमआहार, उत्तम वस्त्राभूषण, और उत्तम आवासों का प्रमुखता से वर्णन हुआ है। आपने आध्यात्म के नाम पर कोई कामावेग आधारित किताब पढ़ ली है। और शाश्वत लक्ष्य स्वर्ग नहीं स्वर्गातीत 'मोक्ष'होता है। वहाँ तो देह भी नहीं और देह आधारित विषय वासना भी नहीं।
    दुनियाँ तृष्णाओं और विकृतियों की प्रतिपूर्ति से नहीं चलती। दुर्गुणों दोषों और विकृतियों के चलन में होने का आशय यह नहीं है कि इसी से दुनिया चलती है। दुनिया में तो व्याभिचार भी चलन में है, तो क्या सभी सुसंस्कृति जो युगों के श्रम से पाई है त्याग कर आदिम इच्छाओं में लुब्ध होकर पुनः आदिमानव बन जाय? व्याभिचार को आम जरूरत कहकर प्राकृतिक आवेगों के वश हो जाय?
    सज्जनता क्या है और कैसे रह सकती है जब हम मनोवेगों के गुलाम बनने को इतने आतुर है?
    अगर कोई बलिष्ट या सुदर्शना अच्छी देहयष्टि का प्रदर्शन करे तो कोई बुराई नहीं? तो कोई धनी अगर अपने धन का प्रदर्शन करे तो एतराज क्यों उठने लगता है? कोई आत्मज्ञानी आध्यात्म का प्रवचन करे तो पेट में चुक क्यों उठती है? कोई अपने नैतृत्व गुण का मात्र प्रदर्शन कर के सत्ता हासिल करले तो निंदा क्यों की जाती है?
    मनाईए अवश्य आप मनाईए देह का उत्सव। प्राचीन भारत में भी देहोत्सव मनाए जाते थे पर किसी खास वर्ग तक सीमित। सबके अपने अपने उत्साह होते है। एक छोटे से वर्ग का कृत्य सर्वभोग्य नहीं हो जाता। ग्लैमर दुनिया देहजीवी है, आज के युग में उसका प्रसार भी अधिक है। प्रचार प्रसार के कारण उसका अनुकरण भी अधिक होने लगा है। शो-बिजनस तक तो ठीक है पर उसे हमारे घर परिवार में आम-फहम कैसे बनाया या स्वीकारा जा सकता है? और अगर ऐसे तनतोड परिश्रम से यह आम हो भी गया तो शीघ्र ही वितृष्णा हो जाएगी। क्योंकि निजि जीवन की एक आवश्यकता होते हुए भी यह जीवन नहीं है,सबकुछ नहीं है। मनचलेपन का भी चरम आ जाने के बाद मोहभंग होता ही है।
    देह दिखावे में कितना ही नारी-पुरूष साम्यता का भ्रमित करने वाला आलेखन कर लें, प्रदर्शन के शोषण की भोग्या नारी ही रहती है,प्रायः पुरूष ही मनचले पन से नज़रें सेकने का उपक्रम करते है। स्वार्थ-सिद्धि के लिए पुरूष ही मुख्यतः दैहिक उछ्रंखलता का बचाव संरक्षण व प्रसार करते दृष्टिगोचर होते है। इस मामले में नारी निर्दोष ही होती है, कभी मजबूरी तो कभी सफलता के बनाए मापदंड तो अधिकांश तो पुरूषों द्वारा छद्म वाणीविलास की शिकार बनती है, 'आजादी', 'नारी किसी से कम नहीं' 'आधुनिकता' 'इसमें क्या बुराई है'? आदि आदि

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    1. सुहाग रात है ढपली बजा रह हूं मैं7 मई 2012 को 8:15 am

      बोलो बाबा सुज्ञ दरबार की जय :)

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    2. ढपली जी, सही कहा प्रवचन कुछ सुज्ञ दरबार जैसा ही हो गया है। जब दरबार सज ही गया है तो क्यों न 'किरपा'कर दी जाय,आप तो अमर सुहाग परिवार से है ढपली बजाते हुए भी आपके परिवार में सुहाग की परम्परा अखण्ड़ रहे और यह किरपा आप पर बनी रहे।

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    3. सुज्ञ जी से सहमत हूँ |

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  10. पहली नजर में प्यार जैसी कोई चीज अगर है तो वह है दैहिक आकर्षण ही....और शायद इसलिए हीऐसे प्रेम अगली सीढ़ी पर ही ठोकर खा जाते हैं . प्रेम देह से शुरू नहीं हो सकता , वह सिर्फ आकर्षण हो सकता है , जो समय के साथ कम ज्यादा या समाप्त हो जाता है , प्रेम स्थायी है , मन की अवस्था है , तन की नहीं !

    देह प्रदर्शन नारी और पुरुष के लिए एक- सा नहीं हो सकता , सुज्ञ जी से सहमत !

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    1. देह प्रदर्शन के विरोध में जब भी ये कहा जाएगा की वो नारी पुरुष के लिये एक सी नहीं होती अपने आप में गलत तर्क हैं . किसी भी बात के विरोध के लिये नारी - पुरुष से ऊपर उठ कर बात करे . हमेशा न्याय और संविधान की बात करे ताकि बराबरी की बात हो गलत का प्रतिकार करने के लिये नैतिकता को नारी और पुरुष के लिये जब तक अलग अलग रखा जाएगा कभी गलत का प्रतिकार नहीं हो सकता हैं . जैसे जैसे नारी सबल होगी , साक्षर होगी , सशक्त होगी अपने संवैधानिक और क़ानूनी अधिकारों के प्रति सजग होगी वो बराबरी की बात करेगी इस लिये जागरूक हो कर विरोध करे और उसको नारी पुरुष में न विभाजित करे . देह का प्रदर्शन किसी के लिये सही हैं या गलत उसका फैसला , हमे नहीं अच्छा लगा हमारी आपत्ति बस इतना ही हैं इस मे लिंग विभेद क्यूँ ?
      अगर राखी सावंत / मल्लिका शेरावत के देह प्रदर्शन पर आपत्ति करनी हैं तो जॉन अब्राहिम और सलमान खान पर भी करे

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    2. लिंग विभेद पर आपकी आपत्ति जायज़ है किन्तु सोचिए इस देह प्रदर्शन से सर्वाधिक प्रभावित पक्ष को कैसे नज़र अंदाज़ किया जा सकता है? निश्चित ही नैतिकता नारी-पुरूष दोनो उभय पक्षों से समान रूप से अभिप्रेत है किन्तु प्रवर्तमान व्यवस्था की विडम्बना है नैतिकता का दारोमदार असंतुलित है। उस असंतुलन के लिए भी जिक्र आना अवश्यंभावी है। देखिए, देह प्रदर्शन नारी करे तब भी छली नारी जाती है और देह प्रदर्शन पुरूष करे तब भी छली नारी जाती है। यह महज तर्क नहीं कडवी सच्चाई है। किसी मनचले को सबक की गाली देने पर भी उसकी माँ बहन पर दी जाती है, गुनाह करे पुरूष और गाली सहे परिवार की महिलाएँ,क्यों? जिनका ऐसे विवाद से दूर दूर तक नाता नहीं होता।
      @अगर राखी सावंत / मल्लिका शेरावत के देह प्रदर्शन पर आपत्ति करनी हैं तो जॉन अब्राहिम और सलमान खान पर भी करे....
      -तुलना के लिए ऐसा कर देना ठीक हो सकता है। किन्तु क्या प्रतिचोट से समानता व संतुलन स्थापित हो जाता है? नारी के सबल और सुशिक्षित बनने से मात्र एक पक्ष, नारी पक्ष सशक्त हो सकता है। पर सबसे गम्भीर प्रयास तो पुरूष मानसिकता बदलने का है। पु्रूष का ईगो जब यह स्वीकार कर लेगा कि नारी सबल और समान उँचाई पर है, तभी विभेद की बेडियाँ टूटेगी।

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    3. मेरा उत्तर वाणी के लिये था क्युकी आप ने उसका प्रतिउत्तर दिया इस लिये ये जवाब हैं
      "पु्रूष का ईगो जब यह स्वीकार कर लेगा कि नारी सबल और समान उँचाई पर है, तभी विभेद की बेडियाँ टूटेगी।"
      नारी को पुरुष के इगो की इतनी चिंता ही क्यूँ करनी चाहिये , अपने से ऊँचे पायदान पर नारी ने ही पुरुष को स्थापित किया हैं क्युकी अपनी सुरक्षा का जिम्मा नारी ने उसको दिया हैं , नारी को अपनी सुरक्षा के लिये खुद जिम्मेदार बनना होगा . अपने ऊपर हो रही मोरल पुलिसिंग का जवाब प्रतिउत्तर में मोरल पुलिसिंग करके देना होगा .

      बदलना नारी को हैं , लिंग विभेद नारी की कंडिशनिंग में हैं जैसे वाणी के कमेन्ट में मुजे महसूस हुआ , बदलना इस मानसिकता को हैं , तोडना इस कंडिशनिंग को हैं .
      आज की नारी पुरुष को अपने से ऊपर का दर्जा देती ही नहीं हैं इस लिये वो पुरुष इगो की चिंता करती ही नहीं हैं .
      आज मलाइका अरोरा खान एक १० मिनट के डांस का १ करोरो रुपया लेती हैं क्या वो पुरुष इगो / मानसिकता की चिंता करती हैं ?
      लिंग विभेद नारी के बदलने से ख़तम होगा , नारी के विद्रोह से ख़तम होगा अगर उसकी सहनशीलता से ख़तम होता तो देश को आजाद हुए ६० साल से ज्यादा होगये हैं अब तक हो गया होता .
      पुनह कह रही हूँ मेरा पहला जवाब वाणी के लिये था

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  11. प्रवीण शाह जी आपकी इसी विचार स्पष्टता ने ,बौद्धिक विवेचन की क्षमता ने आपके प्रति मेरे मन में एक विशेष स्थान सुरक्षित कर रखा है -कोई एक भी शब्द ऐसा नहीं है लगा जिसे अनावश्यक कहा जा सका -एक बेहतरीन विचार प्रस्तुति ....
    यहाँ आधी आबादी तो ख़ास तौर पर संभ्रमित है -अपना जीवन नारकीय बनाया है -जीवन को मिथ्या मूल्यों में गँवा दिया :(

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  12. सुज्ञजी से सहमत बाकी अपनी पोस्ट में कह दिया है .यहाँ बात मूल्यों की है और सबकी अपनी मर्ज़ी है ,वह कैसे मूल्यों को प्राथमिकता दे !

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  13. अब तक इस विषय पर पढे गए आलेखों में बेहतरीन ..संतुलित , सारगर्भित विश्लेषण । आपने सारी स्थिति यकीनन ही स्पष्ट कर दी प्रवीण जी

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  14. टिपण्णी पुरे मुद्दे पर दे रही हूँ बस आप की पोस्ट पर नहीं । पहला सवाल ये है की आप के पोस्ट का शीर्षक इतना नीरस क्यों है ( वैसे अली जी का भी निरस है ) सोचिये की पोस्ट का शीर्षक में यदि वक्ष , उभार जैसा कुछ शब्द होता तो कितना ध्यान खीचने वाला और टी आर पी बढाने वाला होता ( जैसे की कुछ दूसरो का है और कुछ का था, पता नहीं किस डर से पोस्ट हटा दी गई ) पाठक और टिप्पणियों की संख्या बढ़ जाती ज्यादा लोग विमर्श करते इसमे कोई परेशानी थी । फोटो किसी पुरुष की क्यों है बाकियों की तरह आप भी किसी महिला के वक्ष की फोटो लगा सकते थे नहीं तो पत्रिका के कवर को भी लगा सकते थे । आप और अली जी दोनों की बात का समर्थन कर रहे है किन्तु अपने ब्लॉग पर उस फोटो को लगाने से परहेज क्यों कर रहे है कुछ ख़ास वजह है या मै ये मानु की आप दोनों ही किसी मुद्दे पर गंभीर बहस करना चाहते थे जिसके लिए उस फोटो या शब्दों की आवश्यकता ही नहीं थी , आप पाठको की संख्या नहीं बढ़ना चाहते थे बस उस विषय पर गंभीर पाठक चाहते थे शायद यही वजह है की दोनों ब्लोगों पर इतने विमर्श के बाद ही ना तो कोई आपत्तिजनक टिप्पणी की गई और ना ही बेमतलब के शब्द कहे गये और सभी ने खुल कर अपनी बात भी कही | यही फर्क है आप के अली जी के ब्लॉग की और किसी अन्य के ब्लॉग की | जहा तक मुझे समझ आया संतोष जी और रचना जी ने पत्रिका के विषय का विरोध नहीं किया उन्होंने पत्रिका के खुद को बेचने के लिए कवर पर जिस तरह की फोटो दी गई है उसका विरोध किया है | ये सही है की कई अन्य पत्रिकाये है जो इससे भी ख़राब तस्वीरे अपने कवर पर देती है किन्तु वो पत्रिकाए हर किसी के घर नहीं आती और ना उसे लोग अपने ड्राइंग रूम की मेज पर रखते है ( हा कुछ लोग उन्हें भी रखते है पर यहाँ आम भारतीय मध्यम वर्ग की हो रही है ) फिर इण्डिया टुडे उन पत्रिकाओ की श्रेणी में नहीं आती है और ना ही हम सभी उससे इस तरह की उम्मीदे करते है | ये सही है की कोई पत्रिका पैसे कमाने के लिए प्रकाशित होती है किन्तु फिर भी हर पत्रिका का एक स्तर होता है उसके एक खास पाठक होते है जिन्हें पत्रिका की जगह नेत्र भोजन , मसाला चटपटी खबर आदि आदि के लिए चाहिए वो उस तरह की पत्रिका खरीदते है किन्तु हम इण्डिया टुडे इस सोच के साथ नहीं खरीदते है , जैसे की पाठक प्रवीण शाह या अली जे के ब्लॉग पर किसी मुद्दे पर बात करने आते है कोई मसालेदार पोस्ट के लिए नहीं और आप दोनों ने पाठको के उस विश्वास को बनाये रखा और यही उम्मीद इण्डिया टुडे के पाठक भी उससे करते है | आप दोनों भी कोई बेमतलब की तस्वीर लगा देते या शीर्षक दे देते तो आप का कुछ जाने वाला नहीं था फिर भी नहीं लगाया एक बार इस बारे में सोचियेगा क्यों |

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  15. अब बात इण्डिया टुडे की करते है ये काम उसने पहली बार नहीं किया है यदि मेरी यादास्त सही है तो आज से १२- १४ साल पहले भी उसने ऐसा ही कुछ किया था विषय शायद ब्रेस्ट कैंसर था और कवर तस्वीर में सिर्फ उंगलियों से छुपाये स्त्री वक्ष थे नतीजा हमरे घर अख़बार वाले द्वरा डाले जाने वाली ये पत्रिका का वो अंक आते ही माता पिता द्वारा छुपा दिया गया घर में तीन बेटियों के अलावा किशोर हो रहा एक पुत्र भी था विषय कितना ही अच्छा क्यों ना था पर तस्वीर छुपाने लायक थी | कुछ अंक के बाद पत्रिका ने पोर्न सईटो के बारे में स्टोरी दी और उस ज़माने में अपनी पत्रिका में १२-१५ पोर्न सईटो का पता दे दिया खुले आम नतीजा पत्रिका को ही घर पर नियमित रूप से मांगना बंद कर दिया गया फिर कभी कदार ही पापा खरीद कर लाते थे | नुकशान मेरा जो राजनिती शास्त्र की विद्यार्थी थी और राजनितिक और सामजिक मुद्दो पर लिखने वाली एक अच्छी पत्रिका को पढ़ने से वंचित रह गई | पत्रिका और ब्लॉग को खुद तय करना है की वो किस तरह के पाठक चाहती है बिना किसी तस्वीर के बिना किसी अश्लील शब्दों के हम हर उस मुद्दे पर बात कर सकते है जिसके बारे में समाज में खुले आम चर्चा नहीं की जाती है या समाज उन्हें वर्जित मानता है सबूत तो आप के सामने ही है |

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  16. स्त्री देह की स्वतंत्रता का बात सही है किन्तु स्त्री देह कितनी और कैसे स्वतंत्र हो ये कौन तय करेगा | कभी लड़कियों के जींस पहनने पर पाबन्दी की बात की जाती है तो कही बुर्का ना पहनने पर तेजाब डाल देने की धमकी दी जाती है | स्त्री बच्चे को कब जन्म दे कितने बच्चे को जन्म दे , दे या ना दे , वो किसके साथ अपने सम्बन्ध बनाये वो क्या पहने क्या ना पहने ये सब उसे तय करने दे उसका शरीर है ये देह की स्वतंत्रता है ना की बाजारवाद के नाम पर अपने फायदे के लिए पुरुषो द्वारा नारी स्वतंत्रता आदि के नाम पर उसके देह का प्रयोग अपने फायदे के लिए किया जाना, और ये भी याद रखियेगा की हर स्त्री हर पुरुष हर स्त्री या पुरुष के प्रति आकर्षित नहीं होता है, क्यों ? देह का आकर्षण तो है पर कही ना कही बात देह से उठ कर भी कुछ है | कुछ को तो छोटी बच्चिय भी बस स्त्री देह दिखती है किन्तु बहुतो को नहीं इस बारे में क्या कहेंगे क्या ये प्राकृतिक है यदि नहीं तो बात बस देह की नहीं है उससे भी आगे कुछ है |
    आप की इस बात से सहमत हूं की हर जगह बात को घर की माँ बहनों पत्नियों पर नहीं लाना चाहिए ये गलत है, बहुत सारे मुद्दे है जो पति पत्नी के बीच होता है किन्तु उसे हम अपनी माँ बहन के साथ बात नहीं सकते है इसका मतलब ये नहीं होता है की वो सब गलत है या हर विषय पर हम हर किसी स्त्री पुरुष के साथ बात कर सके | मुद्दे बहुत अलग अलग होते है और उस पर बात करने वाले लोग भी और उनका नजरिया भी | बहुत सारे विषयों पर मै नैतिकता की बात करती हूं पर वो बस मेरे लिया है दूसरो यदि उसको नहीं मानते है तो ना माने मै उनका विरोध नहीं करती वो उनकी निजी राय है और मै उसका समर्थन करती हूं पर इसका मतलब ये नहीं की लोग कहे ही मै दोहरा रवैया अपना रही हूं अपने लिए कुछ और और दूसरो के लिए कुछ और |

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    1. गहन चिंतनयुक्त विचार रखे हैं, अंशुमाला जी,
      प्राकृतिक आवेशों को निरानुशासन ग्राह्य मानने पर मेरा भी कुछ ऐसा ही मंतव्य था।
      "और ये भी याद रखियेगा की हर स्त्री हर पुरुष हर स्त्री या पुरुष के प्रति आकर्षित नहीं होता है, क्यों ? देह का आकर्षण तो है पर कही ना कही बात देह से उठ कर भी कुछ है | कुछ को तो छोटी बच्चिय भी बस स्त्री देह दिखती है किन्तु बहुतो को नहीं इस बारे में क्या कहेंगे क्या ये प्राकृतिक है यदि नहीं तो बात बस देह की नहीं है उससे भी आगे कुछ है |"

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    2. anshumaala ji - aapki kahi har baat me saar hai - saty hai | aabhaar

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  17. "ध्यान दीजिये यह अप्सरायें स्वर्ग के निवासी का कोई आध्यात्मिक या बौद्धिक उन्नयन नहीं करेंगी, यह केवल और केवल उसकी दैहिक वासनाओं की पूर्ति के लिेये ईश्वर का उपहार होंगी..."

    आपसे यह किसने कह दिया, या फिर आपने यह कहाँ पढ़ लिया? पहली बात तो यह कि हूर कोई स्त्रीलिंग ही हो ऐसा नहीं है... दूसरी बात यह कि वहां का निजाम यहाँ जैसा ही हो ऐसा भी नहीं है... आप इस पर मेरा लेख "शोभायमान आँखों वाली हूर!" भी पढ़ सकते हैं.

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  18. रचनाMay 6, 2012 08:57 PM
    देह प्रदर्शन के विरोध में जब भी ये कहा जाएगा की वो नारी पुरुष के लिये एक सी नहीं होती अपने आप में गलत तर्क हैं . किसी भी बात के विरोध के लिये नारी - पुरुष से ऊपर उठ कर बात करे . हमेशा न्याय और संविधान की बात करे ताकि बराबरी की बात हो गलत का प्रतिकार करने के लिये नैतिकता को नारी और पुरुष के लिये जब तक अलग अलग रखा जाएगा कभी गलत का प्रतिकार नहीं हो सकता हैं . जैसे जैसे नारी सबल होगी , साक्षर होगी , सशक्त होगी अपने संवैधानिक और क़ानूनी अधिकारों के प्रति सजग होगी वो बराबरी की बात करेगी इस लिये जागरूक हो कर विरोध करे और उसको नारी पुरुष में न विभाजित करे . देह का प्रदर्शन किसी के लिये सही हैं या गलत उसका फैसला , हमे नहीं अच्छा लगा हमारी आपत्ति बस इतना ही हैं इस मे लिंग विभेद क्यूँ ?
    अगर राखी सावंत / मल्लिका शेरावत के देह प्रदर्शन पर आपत्ति करनी हैं तो जॉन अब्राहिम और सलमान खान पर भी करे




    रचना जी से पूर्णत: सहमत हूँ!

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  19. मान भी लें कि अंग प्रदर्शन में लिंग भेद नहीं होना चाहिए , हमारे भारतीय माईंड सेट के अनुसार यह सिर्फ एक तार्किक दृष्टिकोण है , वास्तविक या व्याहारिक नहीं! आप इसे हमारे समाज की दोगली मानसिकता ही मान लें क्योंकि शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना स्त्रियों को ही झेलनी पड़ती है , हालाँकि मैं मानती हूँ कि यह स्थिति बदलनी चाहिए ! क्या आपने कभी सुना कि अश्लील चित्र ,बलात्कार , धोखे से बनाई गयी सीडी या ब्लू फिल्मों के कारण किसी पुरुष ने आत्महत्या की ??

    मेरा इरादा किसी भी पुरुष इगो / मानसिकता की चिंता करने का बिलकुल नहीं रहा है , ना मैं ऐसा करती हूँ . हाँ , मैं अपने से बड़ों (पुरुष /स्त्रियों ) का बिना लिंग भेद के आदर करती हूँ और कोशिश करती हूँ कि उन्हें जवाब दूं तो वह संयत और सभ्य हो. किसी भी पुरुष की करनी के लिए उसकी माँ- बहन को घसीटना भी तो इस कंडिशनिंग का ही नतीजा है , जिसका इलज़ाम आप मुझ पर लगा रही है .
    हर व्यक्ति के लिए नैतिकता और मूल्यों के अपने मापदंड होते हैं और वह उसी प्रकार व्यवहार करता है , यह किसी की इगो को पोषित करने का मामला हरगिज़ नहीं है.

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    1. वाणी जी, हाँ हाल ही में समाचार आ रहा था कि एक अमेरिकन छात्र ने अपने रूममेट द्वारा उसे अपने पुरुष मित्र से सम्बन्ध रखते देखने अ अन्य को दिखने के कारण आत्महत्या की.रूममेट को दस साल की सजा मिली है.
      घुघूतीबासूती

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  20. अभी मैं अजय झा जी से सहमत हूँ.पाठकों ने बहुत कुछ सोचने को मजबूर किया है लेकिन मुझे लगता हैं सभी लेखों पर बहस में सबसे तार्किक सवाल मुक्ति जी ने उठाया हैं पर मैं इन सबके बारे में बाद में समय मिलने पर कमेंट करुँगा.अभी कुछ और प्रतिक्रियाएँ आ जाएँगी.शायद मुझे मेहनत कुछ कम करनी पडे.

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  21. बेशक , देह के आकर्षण से सभी प्रभावित होते हैं .
    लेकिन ज्यादा खुले से थोडा ढका ज्यादा सुन्दर होता है . बाकि तो जितना मर्ज़ी तर्क वितर्क कर लें , रहेंगे वही ढाक के तीन पात .

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  22. main ajay jha ji aur rajan ji se sahmat hoon . post aut comment dono achchhe lage !

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  23. vani's comment has come in my email as under
    वाणी गीत ने आपकी पोस्ट "आइये, देह का उत्सव मनायें !" पर एक नई टिप्पणी छोड़ी है:

    मान भी लें कि अंग प्रदर्शन में लिंग भेद नहीं होना चाहिए , हमारे भारतीय माईंड सेट के अनुसार यह सिर्फ एक तार्किक दृष्टिकोण है , वास्तविक या व्याहारिक नहीं! आप इसे हमारे समाज की दोगली मानसिकता ही मान लें क्योंकि शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना स्त्रियों को ही झेलनी पड़ती है , हालाँकि मैं मानती हूँ कि यह स्थिति बदलनी चाहिए ! क्या आपने कभी सुना कि अश्लील चित्र ,बलात्कार , धोखे से बनाई गयी सीडी या ब्लू फिल्मों के कारण किसी पुरुष ने आत्महत्या की ??

    मेरा इरादा किसी भी पुरुष इगो / मानसिकता की चिंता करने का बिलकुल नहीं रहा है , ना मैं ऐसा करती हूँ . हाँ , मैं अपने से बड़ों (पुरुष /स्त्रियों ) का बिना लिंग भेद के आदर करती हूँ और कोशिश करती हूँ कि उन्हें जवाब दूं तो वह संयत और सभ्य हो. किसी भी पुरुष की करनी के लिए उसकी माँ- बहन को घसीटना भी तो इस कंडिशनिंग का ही नतीजा है , जिसका इलज़ाम आप मुझ पर लगा रही है .
    हर व्यक्ति के लिए नैतिकता और मूल्यों के अपने मापदंड होते हैं और वह उसी प्रकार व्यवहार करता है , यह किसी की इगो को पोषित करने का मामला हरगिज़ नहीं है.

    my reply



    वाणी
    मैने अपनी पोस्ट मात्र इतना कहा हैं की जो लोग दूसरी स्त्री के देह सन्दर्भ ब्रेस्ट इम्प्लांट / प्रोनो पर चित्र डाल कर चर्चा करना चाहते हैं वो पहले अपने घर की स्त्रियों के साथ खुल कर इस विषय मे चर्चा करे .

    क़ोई भी नारी जब किसी को ये कहती हैं
    तुम्हारे घर में माँ बहिन नहीं हैं क्या तो महज उस पुरुष से उस आदर की कामना करती हैं जो वो अपने घर की स्त्रियों को देता हैं
    पलट कर जवाब मिलता हैं पत्नी नहीं हैं , माँ बहिन हैं तब क्या हर स्त्री जो सड़क पर चल रही हैं किसी की भी पत्नी बनने को तैयार हो सकती हैं
    माँ बहिन तो शायद सबकी बना जा सकता हैं पत्नी नहीं

    क्या आपने कभी सुना कि अश्लील चित्र ,बलात्कार , धोखे से बनाई गयी सीडी या ब्लू फिल्मों के कारण किसी पुरुष ने आत्महत्या की ??
    किसी पुरुष मॉडल से पूछ कर देखे कास्टिंग काउच वहाँ भी हैं , शोषण वहाँ भी हैं , बालको का सोदोमिज़ेशन नयी बात नहीं हैं
    शोषण का लिंग विभेद नहीं लिंग विभेद नहीं हैं , दोनों लिंगो का होता हैं . जब तक देह से ऊपर उठ कर बात नहीं होगी ये जारी रहेगा

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    @ सभी पाठकगण व सम्मानित टिप्पणीकर्ता,

    क्षमाप्रार्थी हूँ कि विमर्श में सक्रिय भागीदारी नहीं निभा सका... दरअसल कुछ कामों में ऐसा फंसा हूँ कि चंद मिनट भी ब्लॉगिंग के लिये निकाल पाना तक दुश्वार हो गया है... उम्मीद है कि दो महीने बाद सब पहले सा सामान्य हो जायेगा... :)

    फिर भी विमर्श को आगे बढ़ाते कुछ बातें जरूर करना चाहूँगा...

    १- आश्चर्यचकित हूँ कि एक पुरूष की अधनंगी देह का चित्र लगाने के बावजूद भी किसी पुरूष ने आहत हो इसे हटाने को नहीं कहा... क्या यह महिलाओं व पुरूष के सोचने के तरीके की भिन्नता को दर्शाता है... :)... मेरे विचार में इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि हम सब पुरूष की अर्धनग्न देह को देखने के आदी हैं, एक सहजता है हमारे पास इसके लिये... धार्मिक-आध्यात्मिक चैनल या योग के कार्यक्रम में भी अर्धनग्न पुरूष देह को देखना हमें विचलित या पतनमुखी नहीं करता... स्त्री देह के साथ भी यही सहजता हमें उपजानी होगी... हम प्रयास नहीं भी करेंगे तो भी बदलते जमाने के साथ यह सहजता हममें आ ही जायेगी... यही आलेख का सार भी है...

    २- @ "स्वर्ग में मात्र दैहिक ऐश्वर्य का ही इंगित नहीं,सांसारिक आधारभूत सुखों मुख्यतः उत्तमआहार, उत्तम वस्त्राभूषण, और उत्तम आवासों का प्रमुखता से वर्णन हुआ है।"

    देव, यह कैसा झाँसा है कि अनदेखे, अनजाने, अवास्तविक स्वर्ग में एक अनदेखी अनजानी और अवास्तविक ताकत द्वारा इन चीजों का वादा किया जा रहा है... बशर्ते इंसान अपने वास्तविक स्वर्ग (धरा) में इन चीजों से दूर रह त्याग भरा, रूखा सूखा जीवन बिताये... इस वादे पर वारी जाने के बजाय यह सही नहीं होगा कि इन सब उत्तम चीजों का जीवनकाल में ही भरपूर आनंद उठाया जाये... सहज बुद्धि तो यही कहेगी कि... One Bird in the hand is always better than two in the bush !... :)

    ३- मैं यहाँ यह भी कहना चाह रहा हूँ कि करोड़ों को ( जिनमें मैं भी शामिल हूँ ही ) को मलाइका-कैटरीना-बिपाशा के नृत्य व देह को देखना अच्छा लगता है... और करोड़ों सलमान-अक्षय-जॉन के तराशे बदन पर भी मरती हैं... यह नैसर्गिक है... इस दैहिक आकर्षण का आधार जैवीय है हमारी नस्ल के अस्तित्व से जुड़ा है... कुदरत ने स्त्री-पुरूष दोनों के शरीर में इस ड्राइव को लाने वाली ऐंडोक्राइन ग्लैंड्स व हारमोन भी बनाये हैं... तो इस चाहत को लेकर हम असहज क्यों हों व अपने में अपराधबोध क्यों पालें... असहज तो उसे होना चाहिये जिसको विपरीतलिंगी की देह को देख भी कुछ नहीं होता... कहीं न कहीं हारमोनों में कुछ गड़बड़ी होगी उसके... मैं जब यह कह रहा हूँ तो मैं सामाजिक मर्यादा तोड़ने की बात नहीं कर रहा... फिल्म देखने हम अपने जीवनसाथी के साथ ही जाते हैं... पति बिपाशा को देखता है और पत्नी सलमान पर ध्यान लगाती है, यही सच है व सहज भी...



    ...

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    1. 1-अनावृत देह को सहजता से लेने का हम भी समर्थन करते है बशर्ते वह देह कोमल भावनाएँ भडकाने की मंशा से अनावृत न हुई हो। यदि अनावरण का आशय ही आवेगोत्पाद होगा तो भला कैसे सहज रह पाएंगे?
      जहां तक जानता हूँ आप प्रकृतिवादी है प्राकृतिक आवेगों के निश्चल बहाव और उसके उपभोग में विश्वास करते है। स्वनियंत्रण आपकी डिक्सनरी में नहीं है। मन के घोडों पर लगाम को सबसे बड़ा अवरोध मानते है। हमारा मात्र इतना ही कहना है कि 'सहज' गतिमान घोडों को विचलित ही क्यों किया जाय? अनपेक्षित विचलित हो भी जाय तो लगाम आवश्यक है।

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    2. 2-स्वर्ग के सुखों की अवधारणा और आकांशा बहुत विस्तार वाला विषय है। जिसका न्याय दो-चार पंक्ति में सम्भव नहीं, फिर भी आपकी बात में दम है यह झांसा ही है उसी सुख को त्याग कर उसी सुख की कामना। लेकिन आपकी जानकारी में आई यह त्रृटिपूर्ण अवधारणा बाहरी धर्म दर्शनों की है। भारतीय धर्म-दर्शनों में स्वर्गीय सुख दिलाने के अन्तिम लक्ष्य नहीं है। यहाँ इसे उपादेय शाश्वत सुख नहीं कहा जाता और न परलोक में सुख पाने के प्रलोभन से व्रत-तप आदि करने के आदेश है। स्वर्ग अन्तिम महत्वाकांक्षा नहीं है। खैर यह हमारा आज का विषय नहीं है। मेरे कहने का मर्म मात्र इतना था कि स्वर्ग मात्र देहभोग केन्द्रित नहीं है। इसलिए देहलालसा सर्वोच्छ सुख नहीं है। सुख अभी और भी बहुत है शाश्वत, अक्षर अव्याबाध सुख ही लक्ष्य हो, ऐसा सुख जो आकर फिर न जाए, दुख सुख की अंतरहित श्रंखला खत्म हो उसकी उठापटक का अंत हो ऐसा सुख अभिप्रेत है। और निश्चित ही ऐसा सुख स्वर्ग में भी नहीं है।
      @इस वादे पर वारी जाने के बजाय यह सही नहीं होगा कि इन सब उत्तम चीजों का जीवनकाल में ही भरपूर आनंद उठाया जाये... सहज बुद्धि तो यही कहेगी कि... One Bird in the hand is always better than two in the bush !... :)
      -धर्म-दर्शन भी मनुष्य जीवन या मनुष्य जन्म को अनमोल मानते है उसके श्रेष्ठ उपयोग हेतु ही उपदेश करते है, बडी मुश्किलों से हाथ लगा यह मनुष्य जीवन श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर कर्मों और पुरूषार्थ से सदुपयोगी बनाना चाहिए। भूखे रहकर व्रत से त्याग की शक्ति बढाओ तो अन्य को आहार दान कर उसकी भूख मिटाओ। भूख के दुख का विरोधाभासी परोपकार। क्या इसमें सुख दृष्टिगोचर नहीं होता? जीवन से भरपूर आनन्द उठाने की बात धर्म-दर्शन भी करते है पर 'आनन्द' की उनकी परिभाषाएँ व अनुभूतियाँ सर्वांग भिन्न होती है।

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    3. 3- आपने शरीर के जैवीय रसायनों से उत्प्रेतित आवेगों के निर्बाध बहाव में बहने को सहजता कहा। यदि इस नैसर्गिग बहाव में वैज्ञानिक कारको से निसंकोच बहा जाय तो सामाजिक मर्यादाएं टूटती है, और सामाजिक नीति-नियम नैतिकताओं का ख्याल रखा जाय, अनुशासन में रहा जाय तो स्वैरविहार पर नियंत्रण लादना पडता है। आप ही बताएं शरीर के रसायनो को अपना काम करने दिया जाय या नियंत्रण भावनाएं पैदा कर प्रतिरसायनों (शान्तरस) से उन हार्मोनों को नियंत्रित किया जाय?

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  25. .
    .
    .

    @ राजन जी,

    मुझे आपके कमेंट का इंतजार रहेगा, कुछ इसलिये भी, कि मुझे लगता है कि मेरी-आपकी सोच कई मामलों में एक सी है... :)



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  26. देह का उत्सव...पोस्ट और फिर टिप्पणियों में उत्तम श्रेणी का शब्द-विन्यास...​
    ​​
    जाने क्यों देह को छोड़कर भारत में भुखमरी, स्वास्थ्य, शिक्षा, भ्रष्टाचार जैसे डाउनमार्केट मुद्दों को लेकर इतनी हायतौबा मचाई जाती है...
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    ​जय हिंद...

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    उत्तर
    1. .
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      खुशदीप जी,

      आपके ही वाक्य में कुछ बदलाव कर मैं भी कह सकता हूँ...

      "जाने क्यों बासी चुटकुलों को छोड़कर भारत में भुखमरी, स्वास्थ्य, शिक्षा, भ्रष्टाचार जैसे डाउनमार्केट मुद्दों को लेकर इतनी हायतौबा मचाई जाती है..."

      नॉट जोकिंग... माइन्ड इट सर...



      ...
      ​​

      हटाएं
    2. @ खुशदीप जी
      अपनी फिल्म को बेचने की लालच में कोई भी विवाद खड़ा करने का प्रयास करने वाले और कुछ रीड विहीन केचुओ को अपने ब्लॉग पर प्रचारित और प्रसारित करके उनके लिंक दे उन्हें जहरीला बड़ा सांप बना चर्चा में लाने के काम से अच्छा है की हम अपने आपस में उठे किसी मुद्दे पर बात करे किसी और समाज विरोधी का प्रचार प्रसार का काम तो नहीं ही कर रहे है | और बाकियों की चर्चा के लिए आप लोग तो है ही |

      हटाएं
  27. प्रवीण जी,जो मैं कहना चाहता था वो तो खुद आपने कह दिया.मैंने इस विषय पर सभी पोस्टें पढी लेकिन कहीं कमेंट नहीं किया पर जब आपकी पोस्ट देखी तो लगा कि असली बात आपने ही पकडी हैं जो मैं खुद भी कहना चाहता था.और ये तस्वीर लगाने का कारण भी समझ गया था.मुझे भी इस चित्र में कितनी अश्लीललता हैं या इसके पीछे इंडिया टुडे वालों की मंशा क्या हैं से ज्यादा इस प्रश्न पर ही विचार करना ज्यादा जरूरी लगता हैं कि जब पुरूषों को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं हैं कि उन्हें कैसे चित्रित किया जा रहा हैं तो फिर महिलाओं को ही ऐसा क्यों लगता हैं कि वो बस एक ऑब्जेक्ट होकर रह जाएगी.ज्यादातर पुरूष मॉडल व अभिनेता सब अपने आपको वैसा ही बनाएँ रखना चाहते हैं महिलाएँ या लडकिया उन्हें देखना चाहती हैं वर्ना वो प्रतियोगिता से बाहर हो जाएँगे.पुरुषों के काम न आने वाले शैम्पू तेल साबुन यहाँ तक कि सैनेट्री नेपकिन के विज्ञापनों में भी लडकों को दिखाया जाता हैं लेकिन पुरुष क्यों नहीं कहते कि ऐसा करके वह भी प्रोडेक्ट की तरह पेश किए जा रहे हैं.हमारा ध्यान केवल पुरुष की जरूरत वाले उत्पादों के विज्ञापनों की तरफ ही क्यों जाता हैं जिनमें महिलाओं को दिखाया जाता हैं.सच तो ये हैं कि महिलाओं पर समाज की देह की पवित्रता वाली अवधारणा अभी भी हावी हैं वर्ना उसे भी इन सबकी चिंता ना होती जैसे पुरुष को नहीं होती.मैंने अपने लेख में भी थोडा डरते डयते ही सही पर यही कहने की कोशिश की थी.आज लडकियों की मिनी स्कर्ट,डीप नेक टीशर्ट और लॉ वेस्ट जींस आ जाने से सामान्य स्कर्ट,टीशर्ट और जींस पर उतना हो हल्ला नहीं मचाया जाता.मैं तो अपने आस पास ही देखता हूँ कि दशक भर पहले किसी लडकी को जींस टॉप में देख लेने भर से उसे चालू और पटी पटाई समझने वाले लडकों में अब कमी आई है क्योंकि ये पहनावा अब सामान्य लगने लगा हैं.अब कोई इस बात पर विवाद करने लगे कि लडकियों के लिए लॉ वेस्ट जींस आदि बाजार में उतार देना महिलाओं को वस्तु समझने वाले पुरुषों की कोई साजिश हैं या रही होगी तो ऐसी बहस में मेरी रुचि शून्य हैं.मैं तो बस ये जानता हूँ कि अब ऐसे पहरान से न लडकियाँ असहज होती हैं न लडके.

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    2. @महिलाओं पर समाज की देह की पवित्रता वाली अवधारणा अभी भी हावी हैं
      राजन जी यहाँ महिला के पवित्रता वाली अवधारना की बात नहीं हो रही है ये नहीं कहा जा रहा है की महिला ने अपना शरीर दिखाया तो वो अपवित्र हो जाएगी | बिल्कुल हर महिला को अधिकार है की वो किस तरह के कपडे पहने और कितना अपना शरीर ढके और दिखाए , बात ये है की कब तक पुरुषो को आकर्षित करने के लिए महिलाओ के शरीर को एक उत्पाद बना कर प्रयोग किया जाता रहेगा और उसे नारी देह की स्वतंत्रता का नाम दिया जायेगा | महिलाओ से जुड़े सामानों में पुरुष माडल आते है किन्तु वो पुरुष बन कर आते है महिलाओ का ध्यान खीचने के लिए उत्पाद बन कर नहीं जिस तरह की हर डियो के विज्ञापन में मिनिमम कपड़ो में लड़ियों के झुण्ड को खड़ा कर दिया जाता है , उस फर्क को समझिये |
      @ लेकिन पुरुष क्यों नहीं कहते कि ऐसा करके वह भी प्रोडेक्ट की तरह पेश किए जा रहे हैं.
      शाहरुख़ ने भी जब लक्स और महिलाओ से जुडी कई उत्पाद का विज्ञापन किया था तो उन्होंने अपने शरीर नहीं नाम को एक प्रोडक्ट की तरह प्रयोग किया था ( निश्चित रूप से उनका नाम ही बड़ा और बिकने लायक था ) और उसकी आलोचना भी उन्हें झेलनी पड़ी थी की पैसे कमाने के लिए अब इतना भी क्या अपने आप को बेचना की महिलाओ से जुडी चीजे भी बेचनी शुरू कर दी ऐसा भी नहीं है की विरोध नहीं होता |

      @लॉ वेस्ट जींस आदि बाजार में उतार देना महिलाओं को वस्तु समझने वाले पुरुषों की कोई साजिश हैं या रही होगी तो ऐसी बहस में मेरी रुचि शून्य हैं.
      वही तो कहा जा रहा है की आम लड़कियों को उनकी दैहिक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए जो की नहीं मिल रही है लेकिन कुछ फ़िल्मी माडलिंग जगत से जुडी हस्तिया जम कर नारी के शरीर का प्रयोग अपनी सामान बेचने के लिए प्रयोग करते है उसे आधुनिक बताते है |फिल्म और माडलिंग में रहना है तो ये सब करना होगा, तुम नहीं करोगी तो टिक नहीं सकोगी ,तुम नहीं करोगी तो कोई और करेगा ( लो जी ये बाते तो देश के सेनाध्यक्ष तक से कह दी जाती है अपने देश में ) और फिल्म पानि है तो ये तो करना ही होगा के जुमलो से जो चक्रव्यू बनाया जाता है विरोध उसका है आगे बढ़ने की जी शर्त रखी जाती है विरोध उसका है |

      हटाएं
  28. आम बातों और मुद्दों से कुछ आलग हटकर लिखा है आपने समय मिले आपको तो कभी आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    http://mhare-anubhav.blogspot.co.uk/

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  29. इंडिया टुडे की जहाँ तक बात हैं तो यह पत्रिका सभी जरुरी विषयों राजनीति,धर्म,विज्ञान,तकनीक,खेल,समाज,साहित्य,सेक्स,फैशन,खान-पान,जीवनशैली,आदि पर लेख देती रहती हैं और इन्हीं विषयों पर बदल बदलकर आवरण कथा भी देती हैं और उनसे संबंधित चित्र भी कवर पेज पर छापे जाते हैं.हाँ हर बार इसमें सेक्स पर ही सामग्री नहीं होती लेकिन ये भी सच हैं कि यह पत्रिका इस विषय से अछूती भी नहीं है और इसके नियमित पाठकों को इस बारे में अच्छी तरह पता हैं कि कैसे इसमें साल में दो एक दो बार सेक्स सर्वे भी आते रहते है और उनसे संबंधित चित्र भी अन्दर बाहर दोनों तरफ होते हैं.मुझे समझ नहीं आता कि फिर भी लोग इस स्टोरी पर इस तरह रिएक्ट क्यों कर रहे हैं कि हम इस पत्रिका से ऐसी उम्मीद नहीं करते?हाँ कुछ मध्यमवर्गीय घरों में बच्चों से ऐसे अंक को छुपा दिया जाता हैं लेकिन वहाँ तो लोग तब भी ये ही करेंगे जबकि आवरण पृष्ठ में शीर्षक में सिर्फ 'सेक्स' शब्द ही आ गया हो भले ही कोई चित्र दिया ही न गया हो.तो क्या इसलिए हम माने पत्रिका ने जो लिखा या दिखाया गलत हो गया?लेकिन मुझे नहीं लगता कि आम मध्यमवर्गीय परिवारों में अब ऐसा होता हैं वर्ना घरों में बहुत सी हिंदी और अंग्रेजी की महिलाओं की पत्रिकाएँ भी जाती हैं और उनमें जिस तरह के चित्र छपते हैं उसके सामने ये चित्र तो कुछ भी नहीं है.

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    1. राजन जी
      @ अंग्रेजी की महिलाओं की पत्रिकाएँ भी जाती हैं और उनमें जिस तरह के चित्र छपते हैं उसके सामने ये चित्र तो कुछ भी नहीं है.
      वही तो कहा जा रहा है की इण्डिया टुडे का अपना स्तर और पाठक है उसे किसी ऐसे पत्रिका के बराबर नहीं रख सकते है जहा इस तरह की फोटो प्रकाशित होती रहती है ताकि पत्रिका बिक सके , बात पत्रिका के नियत की ही कर रहे है की क्या इस स्तर की पत्रिका को अपनी पत्रिका को बेचने के लिए इस तरह के तरीको का प्रयोग करना चाहिए , जबकि पत्रिका का शीर्षक खुद "सनक" लिख कर जिस कृत्य को नकरात्मक रूप में देख रही है ( माफ़ कीजियेगा मैंने पत्रिका देखी और पढ़ी नहीं है जो ब्लॉग पर पत्रिका का कवर और शीर्षक लगा है उसके आधार पर कह रही हूं ) उसी का प्रयोग अपनी पत्रिका को बेचने के लिए कर रही है | स्टोरी से जुडी फोटो का विरोध नहीं हो रहा है बल्कि कवर पर "इस तरह" की फोटो का विरोध हो रहा है जहा किसी महिला के उत्पाद बना कर पत्रिका को बेचने का प्रयास किया जा रहा है , पत्रिका अपने विषय से नहीं बल्कि फोटो से पाठको को खीचने का प्रयास कर रही है विरोध उसका हो रहा है वरना तो आप भी जानते है की कई तरह की पत्रिकाओ में इससे भी ख़राब फोटो प्रकाशित होती है उनका कौन विरोध करने जाता है उनका स्तर वही है | प्रतिक्रिया स्टोरी पर नहीं कवर की तस्वीर से है बाकियों ने भी स्टोरी को गलत नहीं कहा है | कल को सेक्स पर स्टोरी देंगे तो क्या उससी जुडी इतनी ही खुली तस्वीर कवर पर इसी तर्क से पत्रिका देगी |

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  30. हाँ बिल्कुल चित्र के बिना भी बात समझाई जा सकती थी.और यदि यूँ हम चित्र की जरूरत की बात करें तो फिर पत्रिका के किसी भी लेख के साथ चित्र की क्या जरूरत हैं बल्कि फिर तो उस पत्रिका की ही क्या जरूरत हैं.यहाँ भी तो हमें अपने विचार ही तो व्यक्त करने हैं फिर इन प्रोफाइल चित्रों की भी क्या जरूरत हैं,वो भी अपनी तरफ से छाँटकर कोई अच्छा सा चित्र.
    इंडिया टुडे ने विषय से संबंधित ही चित्र लगाया है.हाँ इसके पीछे पाठकों को खीँचने की रणनीति भी हो सकती हैं लेकिन हम एक ही डंडे से सबको नहीं हाँक सकते.फिल्म देहली बैली में गालियों का प्रयोग गन्दा लगता हैं लेकिन ओमकारा में नहीं क्योंकि फिल्म में पृष्ठभूमि ही वैसी थी.दोनों फिल्में बिना गालियों के बन सकती थी और दोनों के ही निर्माताओं को सफलता की चाह भी होगी.लेकिन दोनों को ही बनाने वालों के बारे में एक जैसी राय रखना मेरे हिसाब से तो ज्यादती हैं.अभी ऊपर वंदना जी की कविता के बारे में बात की गई लेकिन कहने वालों ने वहाँ भी कह दिया कि इसका उद्देश्य कवियित्री द्वारा स्वयं को चर्चा में लाना और अश्लीलता फैलाना हैं जबकि वंदना जी ने कहा कि मैं तो लोगों को जागरुक करने के लिए लिख रही हूँ.
    अब कैसे निर्णय करें कि कौन सही हैं और कौन गलत?अंत में देखा यही गया न कि कंटेंट क्या हैं और जिन शब्दों पर आपत्ति की जा रही हैं वह बिना संदर्भ के ही तो नहीं डाल दिए गए, मैंने तो उसीके सहारे तय किया कि कविता अच्छी है.अब उद्देश्य हिट्स बटोरना हैं या नहीं इससे मुझे क्या मतलब.

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    1. राजन जी
      @कुछ मध्यमवर्गीय घरों में बच्चों से ऐसे अंक को छुपा दिया जाता हैं लेकिन वहाँ तो लोग तब भी ये ही करेंगे जबकि आवरण पृष्ठ में शीर्षक में सिर्फ 'सेक्स' शब्द ही आ गया
      तस्वीर और शब्दों में बहुत फर्क होता मैंने ये बात बहुत पहले ही मैंने अपने एक पोस्ट में एक ऐसी ही तस्वीर का विरोध करते हुए लिखा था | किसी बात का समर्थन और विरोध करते समय ये भी देखना होता है की कौन कहा खड़ा है | आज से चार साल पहले तक मुझे भी टीवी पर अश्लीलता नहीं दिखती थी हम एकल परिवार में रहते थे , कोई ढाई तीन साल पहले अचानक से टीवी के कई दृश्य असहज करने लगे क्योकि साथ में मात्र ढाई तीन साल की बेटी भी उन दृश्यों को ध्यान से देखती थी जो हमें रिमोट का बटन दबाने के लिए मजबूर कर देता था | बेटी है सब कुछ छुपा कर रखो वाली मानसिकता नहीं है फिर भी एक सीमा के बाद आप को रुकना ही पड़ता है ( शुक्र है साल भर से अच्छी पाबन्दी लगी है चैनलों पर वरना तो बच्चो के चैनल पर भी लोगों को फ्रेंच किस करते देखना पड़ता था किसी हालीवुड में बनी बच्चो की फिल्म में ) और जैसे मैंने कहा की कुछ चीजे हर किसी के साथ ना तो हम देख सकते है ना उस विषय पर बात कर सकते है | तो विरोध और समर्थन करने वालो के बीच इस फर्क को भी ध्यान में रखियेगा | क्या करे हम मध्यमवर्गीय अभी भी इतने भी आधुनिक नहीं हुए है |

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  31. प्रवीण और राजन
    इतनी लम्बी प्रतिक्रया के बाद कुछ प्रश्न हैं
    देह पर निसंदेह चर्चा विस्तृत हुई हैं पर देह पर होता अत्याचार और महिला की देह पर किस कारण ??
    क्या देह का मकसद केवल विपरीत लिंग को लुभाना मात्र हैं ??
    और प्रवीण आप का ये कहना की जो विपरीत लिंग से आकर्षित नहीं होते हैं उनको क़ोई समस्या हैं बिलकुल आउट ऑफ़ कांटेक्स्ट हैं . असहज तो उसे होना चाहिये जिसको विपरीतलिंगी की देह को देख भी कुछ नहीं होता... कहीं न कहीं हारमोनों में कुछ गड़बड़ी होगी उसके...
    मै आप के इस वाक्य पर घोट आपत्ति दर्ज करती हूँ . विपरीत लिंग के आकर्षण को जीत कर ही हम इन्सान कहलाने के हकदार होते हैं .
    ट्रांस जेंडर की देह प्रदर्शन पर उबकाई क्यूँ आ जाती हैं घर के दरवाजे बंद क्यूँ कर लिये जाते हैं
    देह देह हैं पुरुष की हो स्त्री की हो या ट्रांस जेंडर की . उसका नगन प्रदर्शन किसी काम का नहीं होता जो करते हैं अगर वो कानून संगत हैं तो किसी को
    क्या आपत्ति होगी { लिंग विभेद से ऊपर } अगर कानून के अन्दर नहीं हैं तो उस पर रोक लगेगी जैसे
    डर्टी पिक्चर टी वी पर नहीं दिखाई जा सकी .

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  32. प्रवीण, देह का उत्सव मनाना कितना गलत कितना सही यह तो सब अपने आप निर्धारित करते हैं। किन्तु जो देह को जितना अधिक ढकना, ढकवाना चाहते हैं देह उत्सव के परिणाम उनके ही आँगन में सबसे अधिक खिले मिलते हैं।
    खैर, मैं तो इतना जानती हूँ चालीस वर्ष पहले घुघूत के चेहरे को ही देखा था या कहूँ उनकी चश्मे में से आँखें। उन्होंने भी मेरे चश्मे में से मेरी आँखें ही या अधिक से अधिक चेहरा ही। न मैंने उनके मस्तिष्क का एम आर आइ देखा, न एक्स रे, न किडनी या हृदय के चित्र ! सहज आकर्षण हुआ। न वे संसार के सुन्दरतम थे न मैं।
    बाद में जान पहचान हुई, विचारों का आदान प्रदान हुआ, विचार भी भाए किन्तु वह पहली नजर में भा जाना ही प्रेम का कारण बना। विचारों का आदान प्रदान तो मैं नित नेट पर करती हूँ, पहले कक्षा में, खेल क्षेत्र में, अपने अभ्यास की बारी या अपने मैच की प्रतीक्षा मुंह सिलकर तो नहीं करते थे। न जाने कितनों से विचारों का आदान प्रदान किया।
    देह उत्सव ही शायद भारत को मधुमेह, हृदयरोग के प्रकोप से बचा सके। आकर्षक दिखने के लिए ही सही यदि हम अपनी देह की संभाल करें उसे घी का कनस्टर जिसमें अनन्त चर्बी समा सकती है, मानकर न चलें तो शायद देश व देश की जनता का कल्याण हो। यदि हम अपने साथी से कह सकें कि आकर्षक बनो, सुमो रेसलर नहीं, यह नहीं कि सारा का सारा देह ध्यान केवल तबतक जबतक विवाह न हो जाए। शायद न्युट्रिशन की छात्रा रहने के कारण, शायद आसपास व स्वयं पर भी छाए मोटापे से भयभीत मैं, देह या देह उत्सव से भयभीत नहीं हूँ। भयग्रस्त होने को बहुत विषय हैं जैसे अन्य की ढकी या अनढकी देह पर अत्याचार, बलात्कार, अपनी देह पर अत्याचार, उसका ध्यान न रखना, उसे कनस्टर बना देना आदि।
    यह बिना सोची सी टिप्पणी है, हो सकता है और सोचने व अन्य लेख पढ़कर फिर आऊँ।
    घुघूती बासूती

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  33. राजन जी, पता नहीं आप कहाँ की बात कर रहे हैं, मैं चन्डीगढ़ की कर रही हूँ।। चार दशक पहले भी मेरे व मेरी अधिकतर सहपाठियों के पास जीन्स, ट्राउज़र्स, बैल बॉटम ही थे। एकमात्र सलवार कमीज रैगिंग की आवश्यकता के कारण थी। सच कहूँ तो तब कॉलेज हमारे वस्त्र से उतने त्रस्त न थे जितने आज हैं।(पंजाब में तब केवल टाँगों के दिखने से समस्या थी! ) शायद तब समाज स्त्री से डरा हुआ न था। लगता है स्त्रियों के वस्त्रों में समाज की अधिकाधिक रुचि एक नया रोग है।
    घुघूती बासूती

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    रचना जी,

    १- महिलाओं के विरूद्ध हो रहे अपराध कानून व्यवस्था का प्रश्न हैं... ऐसी कोई मिसाल हमारे सामने नहीं है कि अगर महिलायें कपड़ों से ढंक कर रहें या रखी जायें तो यह अपराध रूक जायेंगे... जबकि यह सत्य है कि दुनिया के बहुत से मुल्कों में, जहाँ पहनावे व व्यवहार में काफी खुलापन है, महिलाओं के विरूद्ध अपराध अपेक्षाकृत कम होते हैं...

    २- मानव देह का मकसद वही है जो किसी भी जीव की देह का होता है वह है देहधारी के जीवन का पोषण व उसकी नस्ल को आगे बढ़ाना... नस्ल आगे तभी बढ़ेगी जब विपरीतलिंगी से संबंध होगा... इसलिये विपरीतलिंगी की देह सभी प्राणियों को लुभाती है... मानव के भी प्राणी होने के नाते यह स्वाभाविक है...

    ३- असहज तो उसे होना चाहिये जिसको विपरीतलिंगी की देह को देख भी कुछ नहीं होता... कहीं न कहीं हारमोनों में कुछ गड़बड़ी होगी उसके...

    आपकी आपत्ति सिरमाथे पर... पर मैं अपनी बात पर कायम हूँ... न जाने कितने विश्वामित्र हार गये, इस आकर्षण पर जीत नहीं पा सके... इंसान कहलाने का हकदार होने के लिये इंसान होना जरूरी है... और जैविक व्यवहार को नकार कर, उसके विरूद्ध जा हम क्या इंसान बने रह सकते हैं... यह नकार ही हम पर हावी हो जायेगा... एक सहज इंसान तब नहीं रह पायेंगे हम... :(

    ४- जहाँ तक मेरी जानकारी है, डर्टी पिक्वर को सेंसर से A या U/A प्रमाण पत्र मिला था... इस प्रमाणपत्र वाली फिल्म केवल और केवल रात ११ बजे के बाद वाले टाइमस्लॉट पर दिखाई जा सकती है... यही होगा भी...



    ...

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    1. सहज इंसान = mother Teresa lata mangeshkar , atal bihari vajpayee


      न जाने कितने विश्वामित्र हार गये, some one who does not believe in god wants to believe in mythological characters WHY

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    2. ४- जहाँ तक मेरी जानकारी है, डर्टी पिक्वर को सेंसर से A या U/A प्रमाण पत्र मिला था... इस प्रमाणपत्र वाली फिल्म केवल और केवल रात ११ बजे के बाद वाले टाइमस्लॉट पर दिखाई जा सकती है... यही होगा भी...

      SIMILARLY THE BODY SHOULD BE FLAUNTED AT THE APPROPRIATE TIME AND PLACE AND NOT EVERY WHERE

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  35. अंशुमाला जी,चलिए आपके एक एक कमेंट का उत्तर बारी बारी से देता हूँ.पहली बात तो आप शब्त पर मत जाइए आप ये नहीं कह रही कि स्त्री कपडे उघाडते ही अपवित्र हो जाएगी लेकिन ये तो कह रही हैं कि वह एक उत्पाद बन जाएगी यानी स्त्री देह से जुडी कुछ तो बात हैं जो उसे उघाडते ही नहीं रहेगी.वह क्या हैं गरिमा?सम्मान?मर्यादा?या कुछ और? इसका खुलासा कीजिए जबकि पुरुषों को कपडे उतारने में ऐसी कोई दिक्कत नहीं,क्यों?
    महिलाओं के साबुन के विज्ञापन में दिखाया जाता हैं कि इससे नहाने के बाद इसकी खुशबू से प्रभावित हो पुरूष उसकी औय खिँचा चला आता हैं और डिओ या या शेविंग क्रीम के विज्ञापन में इनको प्रयोग करने वाले पुरुष की तरफ लडकी खिँची चली आती हैं लेकिन दोनों ही मामलों में ये कैसे माना जाता हैं कि इस्तेमाल महिला का ही हो रहा हैं.और आप एक की जगह दस लडकों को भी महिलाओं की तरफ खिँचते हुए दिखाएँगे जैसा कि एक साबुन के विज्ञापन में दिखाया भी गया था तब भी कहा ये ही जाता हैं कि प्रोडेक्ट महिला ही बन रही है जबकि पुरुषों को तब भी कोई आपत्ति नहीं होती.
    मॉडलिंग के दौरान महिलाओं को ऐसा क्या करने के लिए कहा जाता हैं जो फिल्मों में पुरूष नहीं करते?छोटे कपडे पहनने के लिए?पुरुष भी पहनते हैं,कई बार तो उनसे भी छोटे.बारिश में भीगने के लिए?पुरुष भी भीगते है.चुंबन दृश्य के लिए?कोई न कोई पुरुष भी तो इसमें शामिल होगा?फिर अपराध बोध केवल महिला में क्यों और प्रोडेक्ट केवल वह क्यों कहलाई?
    बैलेंस बनाने के लिए शाहरुख वाला उदाहरण अच्छा हैं.शाहरुख का केवल नाम ही बिकने वाला क्यों हैं शरीर क्यों नहीं?जबकि प्रिति जिंटा या कोई और छोटी मोटी हिरोईन इस तरह विज्ञापन करें कहा ये ही जाएगा कि कब तक पुरुषों को आकर्षित करने के लिए...

    और इस विज्ञापन को खुद शाहरुख की इमेज के साथ जोडा गया था न कि पुरुषों के मान सम्मान आदि से.और तब भी इसका कोई खास विरोध नहीं हुआ था बल्कि व्यंग्य में लोग कहते थे कि आप महिलाओं के पेट पर लात क्यों मार रहे है.हाँ थोडा बहुत विरोध पुरुषों भी होता हैं लेकिन थोडा अलग किस्म से.उदाहरण के लिए शाहरुख के सार्वजनिक धूम्रपान पर यदि कोई आपत्ति करता हैं तो हम ये निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि समाज धूम्रपान को लेकर पुरुष और महिला पर एक समान आपत्ति करता हैं और इसके लिए पुरुषों को भी उतनी ही शर्म आती हैं जितनी महिलाओं को.उदाहरण चाहे उतना सटीक न हों पर आप आश्य समझ गई होंगी.

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  36. जब आप ये ही कहती रहेंगी और इसी बात की चिंता करती रहेंगी कि इस तरह छोटे कपडे पहनने या पहने हुए दिखाने से महिला उत्पाद बन जाती हैं या सिर्फ शरीर रह जाती हैं तो सचमुच दैहिक स्वतंत्रता महिला को नहीं मिल पाएगी.पुरुष चाहे ऐसे कपडे पहनी महिला को देख कुछ भी सोचे या महिला कुछ भी सोचकर इसे पहने ये विवाद का विषय बनना ही नहीं चाहिए.वैसे मैं इसे दैहिक स्वतंत्रता की बजाए सहजता ही कहूँगा.

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  37. अंशुमाला जी,
    बिल्कुल मैं समझ रहा हूँ कि आप स्टोरी या उससे जुडी फोटो का विरोध नहीं कर रही हैं बस 'इस तरह' के फोटो का विरोध कर रही हैं.लेकिन जैसा कि आपने कहा कि बहुत सी पत्रिकाएँ इससे भी खराब फोटो छापती हैं तो इसका मतलब हैं कि इंडिया टुडे ने अभी भी एक लकीर तो खींच रखी हैं और उसने 'उस तरह' के चित्र तो नहीं ही छापे हैं.तो फिर इंडिया टुडे को भी तभी इल्जाम दिया जाएँ जब वो वैसे चित्र छापे.वैसे ये बहुत व्यक्ति व्यक्ति के सोचने पर भी निर्भर करता हैं आपको लगा रहा हैं कि वह चित्र बडा उत्तेजक है जबकि मुझे तो लगता है यह बडा ही साधारण सा चित्र है हाँ यदि इसमें महिला का चेहरा दिखा दिया जाता तो यह सचमुच बहुत उत्तेजक हो जाता लेकिन इसीलिए पत्रिका ने यह नहीं किया.ये तो आप कह रही हैं कि इंडिया टुडे का स्तर बहुत ऊँचा हैं जबकि मैं तो खुद कह रहा हूँ कि यदि आप इस चित्र को देखकर ही इंडिया टुडे के गिरते स्तर की बात कर रही हैं तो ये कोई नई बात नहीं हैं खासकर मुझ जैसे नियमित पाठकों के लिए.दूसरी पत्रिकाओं की बात इसलिए की क्योंकि आप कह रही थी कि घरों में आने वाली पत्रिकाओं में ऐसे चित्र नहीं आने चाहिए.और हाँ ऐसा नहीं हैं कि इन पत्रिकाओं का स्तर इंडिया टुडे की तुलना में कुछ कम है और वो केवल ऐसी तस्वीरें ही नहीं छापती बल्कि इनमें तमाम अच्छी सामग्री होती हैं.लेकिन जब मध्यमवर्गीय परिवार उनमें हर तरह के लेखों और चित्रों के अभ्यस्त हैं तो फिर आपत्ति सिर्फ इंडिया टुडे पर ही क्यों? वह भी कोई बच्चों की पत्रिका नहीं हैं.

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  38. अंशुमाला जी,जैसा कि मैंने कहा कि इस पत्रिका के पाठकों को इसमें कुछ नई बात नहीं लगती तो आपको बता दूँ कि इस चित्र का विरोध इसलिए नहीं हो रहा कि ये कोई अश्लील चित्र हैं बल्कि इसके सह संपादक दिलीप मंडल जी जो मोहल्ला लाईव नामक साईट से जुडे रहे हैं और अपने अतिदलितवादी रवैये के चलते अपने विरोधियों के निशाने पर रहे हैं उनका विरोध करने के लिए इस साईट पर इस मौके को उनके विरोधियों द्वारा भुना लिया गया.और एक के बाद एक पोस्ट और टिप्पणियाँ आने लगी.बस देखा देखी ही हमारे ब्लॉगर बंधू भी इसमें कूद पडे.वर्ना जिनके घर में भी इंडिया टुडे आता हैं वो मुझे नहीं लगता कि कोई भी इसके विरोध में पोस्ट लगाता और लगाता भी तो उसे इतना महत्तव न मिलता.क्योंकि सबको पता हैं कि इंडिया टुडे का क्या स्तर हैं और वो क्या छाप सकता हैं.
    और आपने किसी ब्लॉग पर देखा वो चित्र?
    ये तो बहुत अच्छा काम हो गया.इसीलिए मेरा तो मानना हैं कि प्रवीण जी भी उस चित्र को लगा देते तो कोई खास बात नहीं थी क्योंकि पहली बात तो वो इस चित्र के विरोध में नहीं हैं और दूसरा इससे कम से कम उन लोगों को जिन्होने ये चित्र देखा नहीं हैं ये तो पता पडे कि किस चित्र की बात हो रही हैं.इसीलिए मैंने कहा था कि सभी को एक ही लाठी से हाँकना सही नहीं है.
    लेकिन क्या करें महिलाएँ पहले ही माँ बहन,माँ बहन करने लगती है :(

    दूसरों जैसा समझकर ये ही कह देती हैं कि टिप्पणियों के लालची हो क्या? :(

    महिलाओं को वस्तु समझते हो क्या? :(

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  39. अंशुमाला जी,मैं कहना चाह रहा था कि वहाँ कुछ जिम्मेदारी आपकी भी हैं क्योंकि यदि इंडिया टुडे वाले ये सोचने लगे कि मध्यमवर्गीय परिवारों में क्या वर्जित हैं और क्या नहीं तो मेरे ख्याल से वो लोग सेक्स जैसे टैबू विषय पर कोई आवरण कथा दे ही नहीं पाएँगें भले ही उसमें कोई चित्र न हों (क्या करे हम मध्यमवर्गीय अभी भी इतने भी आधुनिक नहीं हुए है ).क्योंकि वहाँ आमतौर पर बच्चों को ऐसे विषयों से दूर ही रखा जाता हैं बडे भी ऐसी आवरण कथा वाली मेग्जीन को बच्चों के सामने नहीं पढेंगे यदि उसमें चित्र न होकर केवल सेक्स एड्स अश्लीलता जैसे विषय हों.
    आप जिस पोस्ट की बात कर रही हैं वो अपने आपमें सबसे अलग मामला था.मैंने वो चित्र तो नहीं देखा लेकिन जिस कविता के साथ चित्र दिया गया था ऐसी कविता के साथ आप किसी भी महिला की सामान्य तस्वीर भी लगा दोगे तब भी वो उसका अपमान कहलाएगा.और उन्होने खुद ही माफी भी माँग ली थी.हालाँकि बाद में उनका दोहरा चरित्र सबके सामने आ ही गया.
    खैर...आपकी बच्ची अभी छोटी हैं लेकिन थोडी और बडी होने पर जब वो आपके साथ बैठकर टीवी देखेगी तो केवल दृश्य ही नहीं बल्कि सीरियल्स में नायक नायिका की बातें भी उसे और आपको असहज करने लगेंगी.अब यहाँ आपकी ही भूमिका शुरू हो जाती हैं कि आप बच्चों के साथ क्या देखें और क्या नहीं.हाँ सीरियल्स भी एक सीमा तक तो इस बात का ध्यान रखेंगे वैसे ही जैसे इंडिया टुडे भी प्लेब्वाय जैसे चित्र नहीं छापेगा.लेकिन उसके बाद जिम्मेदारी आपकी ही हैं.मध्यमवर्ग ज्यादा नहीं बदला तो कोई दिक्कत नहीं है पर बदलाव की प्रक्रीया में तो हैं,ये भी कम बडी बात नहीं.

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  40. घुघुती जी,इसमें ऐसी कोई खास बात नहीं हैं.भारत में ही कई तरह के भारत बसते हैं यकीनन देश में हर जगह की लडकियाँ चंडीगढ की लडकियों की तरह खुशनसीब नहीं रही होंगी जहाँ पर समाज स्त्रियों से न डरता हो(थोडा उनकी टाँगों से जरूर डरता था पर वो अलग बात हैं).मैंने भी ये नहीं कहा कि अब बस मेरा शहर लडकियों के लिए स्वर्ग बन गया हैं और अब कोई समस्या हैं ही नहीं.हाँ इतना जरूर हैं कि लडकियों के कुछ खास कपडों को लेकर टोका टाकी अब कुछ कम हुई हैं वैसे ही जैसे अब लडकी के लिए रिशेप्सनिस्ट का काम अब बुरा नहीं समझा जाता जबकि पहले ये बडी बदनामी का काम माना जाता था.और ये बदलाव धीरे धीरे हर क्षेत्र में आया हैं.सुना हैं कुछ दशक पहले यहाँ भीड भरे बाजारों में बिना घूँघट में चलती महिला की ओर लोग घूरते थे जबकि आज घूँघट में आई कोई महिला ही विचित्र लगती हैं.महिलाओं का नौकरी करना भी कोई बहुत अनोखी बात नहीं रह गई हैं.
    लोग एक दूसरे को देख देखकर उन परिवर्तनो को सहजता से अपनाने लगते हैं जिनके नाम पर पहले बिदकते थे.कभी स्व. चौधरी चरण सिँह जी ने कहा था कि महिलाएँ डागदर बनें या अध्यापक मुझे कोई एतराज नहीं हैं लेकिन मैं नहीं चाहता हूँ कि हमारी बहन बेटियाँ ट्रेफिक पुलिस में भर्ती हों और चौराहे पर खडी होकर ड्राईवरों के सामने इशारेबाजी करें.बहुत से लोग तब बल्कि बहुत बाद तक भी ऐसे ही सोचते होंगे लेकिन आज कौन इसे गलत मानता हैं.
    और बस कपडों की ही बात करें तो आज सचमुच वो लोग भी अपनी बेटियों को जींस पहनने से नहीं रोकते जो पहले दूसरी लडकियों को जींस पहनी होने की वजह से ही बिगडैल करार दे देते थे.ये अंतर भी बहुत हैं कम से कम लडकियाँ मन का पहन तो सकती है.

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  41. "एक चित्र हजार शब्दों के बराबर होता है"
    साबित हुआ एक बार फिर

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