रविवार, 6 मई 2012

आइये, देह का उत्सव मनायें !

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देह अगर सब कुछ नहीं है तो भी बहुत कुछ तो देह है ही... हमारी भारतीय मान्यता के अनुसार देह ही वह आधार है जिसके समर्थ व मजबूत होने पर ही काम, अर्थ, धर्म व मोक्ष की बाकी सीढ़ियाँ चढ़ी जा सकती हैं...

अब अगर देह है तो देहासक्ति भी... ज्ञान, बुद्धिमता, बौद्धिकता व आध्यात्म के तमाम बड़े-बड़े दावों और आवरण के बीच इंसान आज भी वही है, जो वह पहले था, यानी अन्यों से थोड़ा ज्यादा दिमाग रखने वाल पशु... इसलिये कोई आश्चर्य नहीं कि देह के प्रति अपनी आसक्ति में आज भी वह आदिम युग के इंसान सा ही है... आज भी उसकी सबसे बड़ी चाहत वही आदिम चाहत है और वह है उपलब्ध विपरीत लिंगियों में से सबसे आकर्षक देहयष्टि वाले योग्यतम सहचर की अनवरत, जीवन पर्यंत खोज...

इस आदिम चाहत को धर्म ने बखूबी समझा और भुनाया है... धर्म ने सपना दिखाया है स्वर्ग की अप्सराओं व जन्नत की हूरों का... इस मामले में धर्म एकमत है कि यदि ईश्वर को खुश कर दिया तो स्वर्ग जायेगा इंसान... जहाँ यह चिरयौवना, सर्वांगसुंदरी अप्सरायें या हूरें उसके लिये हर समय उपलब्ध होंगी, सेवा में तत्पर... ध्यान दीजिये यह अप्सरायें स्वर्ग के निवासी का कोई आध्यात्मिक या बौद्धिक उन्नयन नहीं करेंगी, यह केवल और केवल उसकी दैहिक वासनाओं की पूर्ति के लिेये ईश्वर का उपहार होंगी... फिर, क्या आश्चर्य इस बात का कि मानवता का एक बड़ा तबका जीवन ईश्वर के गुणगान करने में ही बिता देता है... ईनाम भी तो इतना बड़ा है दोस्तों... :)

आजकल एक प्रवृत्ति और देख रहा हूँ कुछ लोगों की कि किसी भी विमर्श को मोड़ कर माँओं और बहनों पर उतर आने की... इस आलेख पर भी कोई ऐसा कुछ करे इससे पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि कोई पुरूष किसी भी वय का क्यों न हो, दुनिया की सारी महिलायें उसकी माँ व बहन समान कभी नहीं हो सकतीं... उसके समकक्ष महिलाओं का एक ऐसा समूह हमेशा ही होगा ही जो उसका अभीष्ट होगा, जिनकी वह चाहत रखेगा, जो उसे आकर्षित करने का यत्न करेंगी, जो उस पुरूष के लिये कमनीय-रमणीय होंगी... ठीक इसी तरह किसी महिला के लिये भी दुनिया के सारे पुरूष पिता-भाई समान नहीं हो सकते...

पहली नजर में प्यार जैसी कोई चीज अगर है तो वह है दैहिक आकर्षण ही... क्योंकि पहली नजर में तो कोई किसी के बौद्धिक, मानसिक, आध्यात्मिक या नैतिक धरातल को तो परख नहीं सकता...

इस सब के मद्देनजर यह तमाम होहल्ला, हंगामा और आपत्तियाँ समझ नहीं आतीं, जब कोई महिला या पुरूष अपनी देह के किसी अनाकर्षक पक्ष को बेहतर बनाने के लिये शल्य क्रिया का सहारा लेता है और कोई पत्रिका इस पर कवर स्टोरी छाप देती है...

देह के मामले में आज के दौर में एक ही नियम लागू होता है... If You have it, flaunt it !... लंबा शरीर, चौड़ा सीना, चौड़े कन्धे, बलिष्ठ भुजायें, सपाट पेट व सशक्त जाँघें जहाँ पुरूष के देह सौंदर्य का पर्याय हैं ... जिसके पास यह सब कुछ है वह इनको प्रदर्शित करने का कोई मौका नहीं छोड़ता... और पुरूष की इस देह की ओर आकर्षित होने वाली स्त्रियों की भी कमी नहीं है... आखिर बॉलीवुड का निर्विवाद सुपर स्टार सलमान खान अपनी हर फिल्म में अपनी कमीज क्यों उतारता है... पब्लिक डिमाँड, माफ कीजिये अपनी महिला प्रशंसिकाओं की डिमांड व उनको टिकट खिड़की तक खींच लाने के लिये ही तो...

ठीक इसी तरह स्त्रियों के चेहरे के अतिरिक्त देह के सौंदर्य का पैमाना है लंबी गर्दन, उन्नत सुडौल वक्ष, आकर्षक पीठ, पतली कमर, मोहक कटि प्रदेश व लंबी सुडौल टाँगें... पूरा का पूरा महिला फैशन उद्मोग स्त्री के इस देह सौंदर्य को कैसे उभारना है, किस अंग को कितना छिपाना व किसे कितना दिखाना है, किसे हाईलाइट करना है किसे अन्डरस्टेटेड रहने देना है, पर ही टिका है... फैशन की इस होड़ में सभी बराबर के भागीदार हैं... चाहे वह नूडल स्ट्रैप वाली पीठ वाली चोली पहने गाँव की गोरी हो, शहर की स्किन टाइट जीन्स पहने नवयुवतियाँ या स्लीवलेस व कल्पना के लिये कुछ भी न छोड़ते गहरे गले का ब्लाउज पहने शहरी प्रौढ़ायें ही...

यदि गंभीरता से सोचें तो स्वयं को विपरीत लिंगी के लिये अधिक आकर्षक बनाने, उसे प्रभावित करने की क्षमता अपने में पैदा करने का यही खेल ही तो है जो दुनिया को चलाता है... पैसा, पद, यश और ताकत या आध्यात्मिक उत्थान ही... चाहे जिसके भी पीछे भागे इंसान... मूल भाव हमेशा ही वही होता है... यह बात और है कि इसे आसानी से कई स्वीकारते नहीं...

इस आकर्षण का एक बड़ा हिस्सा है देह... एक जमाना था जब हममें से अधिकाँश केवल रोजी-रोटी के जुगाड़ में ही बेहाल थे... आज बहुतों के पास स्पेयर समय भी है और पैसा भी... ऐसे में यदि अपनी देह को प्राकृतिक या कृत्रिम तरीके से और आकर्षक बनाने का चलन उभरा है या इस तरह के परिधान पहने जा रहे हैं जिनमें पहनने वाले की देह दूसरों को दिखाई दे... जंगल में मोर नाचा किसने देखा की तर्ज पर ढंकी-छिपी न रहे, तो मेरे या आपके कुछ भी कहने या करने से यह चलन नहीं रूकने वाला...

हर दौर की नैतिकतायें, मापदंड व प्रचलन अलग होते हैं... किसी पुराने दौर के मापदंड या नैतिकता नये दौर पर चाहकर भी लादे नहीं जा सकते... एक गर्म मुल्क होने के बावजूद हम लोग काफी अधिक कपड़े पहनते हैं... नये दौर की नयी पीढ़ी कम कपड़े पहनेगी और यदि उनके पास दिखाने लायक देह होगी तो उसका बेझिझक व खुला प्रदर्शन भी करेगी... न यकीन आता हो इस बात पर तो हर कस्बे तक में होने वाली सौंदर्य प्रतियोगितायें व अगली मिस इंडिया या मिस्टर इंडिया बनने का सपना पाले प्रतिभागियों व उनके माता-पिताओं की लंबी कतारों पर नजर मारिये...

हमको ही देह के साथ सहज होना होगा... देह के प्रदर्शन या दर्शन मात्र से ही किसी को या स्वयं को अशुद्ध हो गया समझने की मानसिकता बदलनी ही होगी... यही नया दौर है...

आइये, देह का उत्सव मनायें... 

तो तैयार हैं आप ?







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आलेख जो मेरे इस आलेख की प्रेरणा बने...

उम्मतें:  स्त्री देह से भयभीत सुधिजन !

क्वचिदन्यतोअपि: वक्ष सुदर्शनाएँ!

बैसवारी: उभार की सनक या बिकने की ललक !

नारी : ब्रेस्ट इम्प्लांट , इंडिया टुडे का कवर गैर जरुरी





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