सोमवार, 16 अप्रैल 2012

बड़ी निर्मलता से बेनकाब हो रहा है सदियों से चल रहा 'किरपा' रूपी ढोंग व पाखंड... !

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कृपा या किरपा जो भी आप कहें, के आपके पास आने का रास्ता बताने वाले निर्मल बाबा पर आज चारों तरफ से हमले हो रहे हैं... आज तक को दिये इंटरव्यू में बाबा ने कहा कि यह सब 'शक्तियों' का खेल है... उन पर शक्तियों की किरपा है... और शक्तियों की इसी किरपा को अपने समागम में आने वालो तक पहुंचाने का काम वे कर रहे हैं... उन्होंने यह भी बताया कि उनका यह दरबार पिछले पंद्रह सालों से लग रहा है... कम नहीं, पैंतीस चैनलों पर उनके निर्मल दरबार का विज्ञापन सुबह अथवा शाम को दिखाया जाता है... अगर आप कभी इसे देखेंगे तो उनके समागम में मौजूद लोगों के कपड़ों, शरीर के आकार, मेकअप व उनके द्वारा पहने गहनों, अंगूठियों आदि आदि को देख इस निष्कर्ष पर जरूर पहुंचेंगे कि यह एक खाये-पीये-अघाये वर्ग से आया शख्स है, जिसे शायद किरपा पहले से ही मिल रही है फिर भी वह यहाँ आया है क्योंकि उसे डर है कि आगे कहीं किरपा आना बंद न हो जाये... एक कार्यक्रम जो मैंने देखा उसमें बाबा पहले सबको कुछ सेकेंड तक हाथ जोड़ आँखें बंद कर ध्यान सा करने को कहते हैं और खुद वरदान देने की मुद्रा में हाथ हवा में लहराते हैं ताकि किरपा सभी तक पहुंच जाये... इसके बाद बाबा एक नुस्खा बताते हैं कि एक दस हजार की गड्डी अपनी अलमारी में रख लेना, किरपा बदस्तूर आती रहेगी... अंत में बाबा सबको अपना काले रंग का बटुआ,पर्स या बैग खोलने को कहते हैं फिर वरदान मुद्रा में हाथ लहराते हैं और कहते हैं कि अब किरपा आप पर बनी रहेगी... भक्तों की भीड़ गद्गद् है...

कानून के हिसाब से देखें तो बाबा क्या कुछ गलत कर रहे हैं... वह चैक से या बैंक डिपाजिट से पैसा लेते हैं, बाकायदा टैक्स भरते हैं... उनके समागम के लिये भक्तों द्वारा दिया जाने वाला दान ऐच्छिक है, किसी को मजबूर नहीं किया जाता समागम में जाने या चैनल पर कार्यक्रम देखने के लिये... पंद्रह साल से यह काम चल रहा है... पैंतीस टीवी चैनल भी अभी तक उनके विज्ञापन से मोटी कमाई कर रहे थे... अचानक बाबा निशाने पर आ गये हैं... बाबा के शब्दों में ही कहें तो किरपा के उन तक पहुंचने के रास्ते में कहीं रूकावट आ गयी है... यह जानने की उत्सुकता मुझ समेत सबको है कि वह आजकल हरी चटनी के साथ समोसे खा रहे हैं कि नहीं...

वैसे किरपा का यह गोरखधंधा है बहुत मजेदार... जिंदगी के हर क्षेत्र में सफल होने के लिये दावेदार काफी ज्यादा होते हैं... पर यह भी निश्चित है कि सफल उनमें से कुछ ही होंगे... और जो भी सफल होगा, वह सफल होगा, अपने कुछ खास गुणों के कारण, इसलिये, कि वह चीजों को अपने प्रतिद्वंदियों से बेहतर तरीके से करता है, उसकी रणनीति बेहतर है, उसके वर्क एथिक्स बेहतर हैं, वह सिस्टम को बेहतर तरीके से निचोड़ सकता है, उसके संपर्क दूसरों से ज्यादा हैं, वह ऐसे वर्ग या समूह का है कि काम रोकने वालों पर दबाव डलवा सकता है, उसके पास पैसे की ताकत है आदि आदि... यानि इंसान सफल तो होता है अपने अंदर की काबलियत के कारण... पर एक पूरा का पूरा धंधा पनप गया है सदियों से, जो उस इंसान को बताता है कि यह सब किरपा के कारण है... यही धंधा किरपा देने, दिलाने या बनाये रखने के नाम पर उसका दोहन भी करता है...

अब बाबा को ही लीजिये... हजारों ऐसे कतार में खड़े होंगे जो बाबा जैसा बनना या उनके जैसा दरबार चलाना चाहते होंगे... परंतु टेलीविजन जैसे मीडिया का ऐसा इस्तेमाल योगऋषि रामदेव के अलावा और किसी ने नहीं किया है... योगऋषि के पास तो अपना डेडिकेटेड चैनल है... दो घंटे के सुबह के कार्यक्रम में मुख्य हिस्सा होता था, भक्तों द्वारा माइक पर रामदेव जी के योग करने से उनको मिले चामत्कारिक फायदों के बारे में बताने का... दुनिया की हर बीमारी एकदम ठीक हो जाने के बारे में बताया जाता था... निर्मल बाबा ने योग के रामदेव मॉडल को जैसा का तैसा किरपा बाँटने के काम में उतार दिया... अपना चैनल था नहीं इसलिये किराये पर एयरटाइम खरीदा... पर किरपा मिलने से जिंदगी में आये बदलाव के गुणगान का उनके भक्तों का तरीका वही रामदेव जी वाला ही था... और निर्मल बाबा भी कामयाब हो गये... वह कामयाब हुऐ क्योंकि उन्होंने एक मौके को ताड़ा... किरपा बाँटने का एक नया प्रोडक्ट, एक नया मार्केट तलाशा... एक कामयाब तरीके की कामयाब नकल की... सही रणनीति बनायी... अब यह बात और है कि बाबा इस सब को भी शक्तियों की किरपा ही कहते हैं...

निर्मल बाबा के विरोध के इस दौर में उनको भला बुरा कहना बहुत आसान है... उनको ढोंगी-पाखंडी आदि आदि कहा जा रहा है... परंतु क्या उन्होंने कोई नया काम किया है... किरपा पाने, किरपा लेने, किरपा देने, किरपा दिलाने, किरपा दिलवाने, किरपा आने के रास्ते की अड़चन हटाने, किरपा आने का रास्ता बताने, किरपा बरसाने आदि आदि का यह ढोंग यह पाखंड तो सदियों से सहर्ष अपने कंधों पर ढो रहे हैं हम लोग...

जरा सोचिये...

क्यों हममें से अधिकाँश यह सब करते हैं...

दिन में एक खास समय बस्ती,कॉलोनी, शहर, या घर के किसी एक कोने में जा किसी पुरानी भाषा में लिखे किसी वाक्य या पद्म का नि:शब्द या सस्वर उच्चारण,ध्यान या प्रार्थना...

किसी खास दिन, सप्ताह, पखवाड़े या महीने अपनी भूख-प्यास को दबा निर्जल-निराहार रहना...

गंडे-ताबीज, कलावे, विभिन्न नग-जड़ित अंगूठी या माला आदि का पहनना...

अपनी अपनी सामर्थ्य के हिसाब से अपने अपने स्थलों में दान या चढ़ावा...

अग्नि में खाद्म पदार्थों को भस्म करने से लेकर पशुओं की कुरबानी तक...

अपने धर्म-मजहब को ही जिंदगी जीने का एकमात्र सही तरीका और इसीलिये उसे प्रचारित विस्तारित करना ही अपना जीवन ध्येय मान लेना...


किसी अनदेखे अनजाने की किरपा के लिये ही तो...


जिस दिन हर इंसान यह जान व मान लेगा कि जो कुछ वह है, उसे मिला है, उसने पाया है या वह पायेगा... उसके लिये इंसान का उद्मम ही जिम्मेदार है... जिस दिन वह अपने आप पर, अपनी काबलियत पर भरोसा करना/रखना सीख जायेगा... उसी दिन खतम हो जायेगा यह किरपा का गोरखधंधा व इसके धंधेबाज भी...


पर वह दिन अभी थोड़ा दूर है...



इसलिये निर्मल बाबा जैसे अन्य कई अभी अवतरित होते रहेंगे धरा पर...












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24 टिप्‍पणियां:

  1. प्रवीण जी ,
    आपकी चिंताओं से पूर्णतः सहमत !

    पर मेरे ख्याल से वे एक 'व्यवसाय' करके धनार्जन कर रहे थे / हैं ! इस व्यवसाय में उन्होंने अंधविश्वासी किस्म के ग्राहकों ( बाजार ) को शामिल किया ! अपने व्यवसाय के विज्ञापनों से ग्राहकों को मूर्ख बनाया और पैसा ठोंक बजा कर लिया ! बात ग्राहकों के बेवकूफ साबित होने से लेकर व्यवसाई और उसके व्यवसाय के अनइथिकल होने को लेकर की जाये यह भी उचित है पर ...

    मुझे ऐसा कोई भी व्यवसाय बताइये जिसमें ग्राहकों के साथ ऐसा ही सलूक नहीं किया जाता ? और इतने ही अनइथिकल हथकंडे नहीं अपनाए जाते ? इसी तर्ज पर मुनाफ़ा नहीं कमाया जाता ? मुनाफा कम या ज्यादा हो सकता है पर है तो सही ! और हां ग्राहकों की अज्ञानता का लाभ कौन सा व्यवसाई नहीं उठाता है ? झूठे विज्ञापन किस व्यवसाय में सम्मिलित नहीं होते ?

    मुझे लगता है कि देश की जनता को ऐसी ही झटकों की ज़रूरत है वर्ना खुद से चेत जायें ऐसा लगता तो नहीं !

    बहरहाल आपकी चिंताओं और सदाशयता से पूर्णतः सहमत !

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  2. जिसको जैसा गुरु चाहिये मिल जाता है, बिना श्रम किये लोग सब चाहते हैं, उनको धोखे के अतिरिक्त और क्या मिलेगा।

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  3. हाँ, कल आजतक पर बाबा का साक्षात्कार सुना मैंने भी! पूरे वक़्त यह ’किरपा’ ही केन्द्र में थी..जिसका पता उन्हें भी नहीं..न कोई कुण्डलिनी जागरण(बेकार की चीज कहा उन्होंने इसे), न कोई साधना, न कोई अन्य उपाय....बस किरपा(अयाचित, अदृश्य, अनोखी, अजानी)।

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  4. जब तक बेवकूफ़ लोग है किरपा बंटती रहेगी। लोग जब खुद ही लुटाने तैयार है तो कितना ही ढोल पिटीये, नगाड़े बजायीये, ये नही जागने वाले.... कुम्भकर्णो का देश है ये।

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  5. मुझे तो अच्छे लगते हैं निर्मल बाबा .....कैसे मीडिया और प्रौद्योगिकी का अपने हित में भरपूर इस्तेमाल किया जाय ...लोगों की चिरन्तन चाह का चालाकीभरे शोषण से कैसे व्यवसाय चलाया जाय ..यह बंदा गेरुआ नहीं पहनता ,कोई लबादा नहीं ओढ़ता .....जो कुछ कर रहा है ज्यादातर सबके सामने हैं ----आयी सल्यूट हिम ! धन्य रे जनता !

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  6. ई निर्मलवा तो बहुतों को परेशान कर रखा है!

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  7. आपकी सभी प्रस्तुतियां संग्रहणीय हैं। .बेहतरीन पोस्ट .
    मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए के लिए
    अपना कीमती समय निकाल कर मेरी नई पोस्ट मेरा नसीब जरुर आये
    दिनेश पारीक
    http://dineshpareek19.blogspot.in/2012/04/blog-post.html

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  8. सही कह रहे हैं आप यह कोई नयी बात नहीं है सदियों इस ढोंग को ढोते आरहे हैं हम मगर तब भी तो संभाल नहीं पाये उसी का नतीजा है नित नए बाबा रोज़ ही प्रगट होते रहते है और आगे भी प्रगट होते रहनेगे सार्थक आलेख....समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।
    http://mhare-anubhav.blogspot.co.uk/

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  9. जहां पर विज्ञान की सीमाए समाप्त होती है वहीं से आध्यात्म शुरू होता है. बाबा ने किसका बुरा किया ये मैं नही जानता क्या आप उनमे से एक हो, या मुझे यहां पर कौआ कान ले गया वाली कहावत चरितार्थ होती दिख रही है. बहुत सारा पैसा है जो अंधा बनाये दे रहा है. इतना पैसा अगर आया है तो कितने लोगों के जुडाव से आया होगा. कुछ तो होगा उस बाबा के पास. बाबा का समागम क्रिश्चन चर्च की तरह कार्य कर रहा था, कहीं इसके पीछे डर तो नहीं कि बाबा की लोकप्रियता दूसरों को कष्ट में तो नहीं डाल रही है। बहोत सी पाखंड की दुकाने बंद हो जाती बाबा की वजह से, एकदम से हर ओर सिर्फ बाबा ही बाबा क्यों 15 साल मे अभी ही क्यों कुछ तो गडबड है, इतना पैसा कि नज़र चौंधिया गयी. ओशो याद आ गए इतने साल बाद क्या इस बदनाम करने की शाजिश के पीछे डर है या कुछ ओर ..........

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  10. मज़े की बात तो यह है कि ज्योतिषी लोग भी अंधविश्वास से लड़ने के दावे कर रहे हैं।

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  11. कृपा कोई किसी पर नहीं करता। न कोई ऐसी शक्ति होती है जो किसी पर कृपा करे। यह कृपा शब्द ही फर्जी है। इस तरह की कोई चीज होती ही नहीं है। या यूँ कहें कि भ्रष्टाचार का दूसरा नाम कृपा है। जैसे रेलवे की टिकट खिड़की पर लाइन में पचास लोग लगे हैं। एक बन्दा बुकिंग हॉल में आता है और लाइन को पीछे छोड़ बुकिंग क्लर्क से टिकट पाता है। इसे कृपा कहा जा सकता है। रेल में आप का आरक्षण नहीं है। प्लेटफार्म पर टीटीई से कहा जाता है आप की कृपा हो जाए तो हमें भी बर्थ मिल जाए, दो दिन से नींद नहीं निकली है। टीटीई के इशारे पर बंदा कूपे में चढ़ लेता है, उस पर कृपा होती है पर एक गांधी छाप पकड़ा देने पर। यह एक के लिए कृपा है बाकी सब के लिए तो वह भ्रष्टाचार है।

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  12. ईश्वर को बस कोसने का हाथ लगा यह योग,
    निर्मल मल को चूँथ रहे मलीनवृति के लोग।

    मलीनवृति के लोग बडे हिंसक दो-मुँहे,
    गरीब की रोटी कुतरते ये दोनो ही चुहे।

    एक दुखियों को बस सब्ज़बाग दिखाए,
    दूसरा इनकी प्रतिशोध अग्नी भड़काए।

    श्रद्धा शोषण साधन शोषण लगा के नारे,
    यूं उग्रता के नव-शोषण में फंसे बेचारे॥

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  13. न नेतागिरी मा, न दादागिरी मा, बड़ा मजा है भइया बाबागिरी मा। नेत-धरम गुनाह, कुल्हि करम पइसा, बाबा हो तो आइसा ।

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  14. आस्तिक हो या नास्तिक फ़्रॉड हरेक वर्ग के लोग कर रहे हैं। जनता जहां भी जा रही है फ़्रॉड लोग ही हाथ आ रहे हैं।
    कुछ लोग ख़ुद को नास्तिक बताते हैं लेकिन अपनी बहन को उसी तरह बहन मानते हैं जिस तरह कि आस्तिक लोग धर्मानुसार मानते हैं। जब वह अपनी बहन के लिए लड़का तलाशने निकलता है तो भी वह उन सब परंपराओं का पालन करता है जिनका पालन आस्तिक लोग करते हैं। उनकी शादी में वैदिक मंत्रों का उच्चारण करने के लिए पंडित जी भी आते हैं और उन्हें दक्षिणा आदि देकर ही विदा किया जाता है।
    इस देश के नास्तिकों का हाल भी जब आस्तिकों जैसा है तो फिर धर्म के धंधेबाज़ों को चुनौती कौन देगा और कैसे देगा ?
    जीवन भर चुनौती देने वाला भी समय आने पर इनके ही चरणों में धन अर्पण करता हुआ मिलेगा।
    लिखने और बोलने की छूट यहां है। सो सब लिख रहे हैं।
    आपने भी लिखा और अच्छा लिखा।
    एक अच्छे निबंध के सभी तत्व इसमें विद्यमान हैं।
    बधाई हो ।
    See
    http://commentsgarden.blogspot.in/2012/04/thag.html

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  15. बेहतरीन आलेख। सभी आपकी इस कृपा से लाभान्वित हों। खासकर वे जो इससे सहमत नहीं हैं।

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  16. झुकती है दुनिया , झुकाने वाला चाहिए !
    ज़रा सोचिये यदि १ % भी हों, तो देश में १२२ करोड़ में से कितने बेवकूफ निकल आयेंगे ! फिर दुकानदारी तो चली ही चली .

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  17. किरपा का यह खेल आदिकाल से चल रहा है ! पहले यह ओझा,तांत्रिक ,तंत्र-मंत्र के जानकार कराते थे ,फिर मंदिरों,सिद्ध-पीठों,तीरथों के पांडे-पुजारियों मस्जिदों,दरगाहों के मुल्ला,पीर-फकीरों के हाथ से यह काम होने लगा ! पुराने देवताओं पर से कुछ विश्वास ढीला पड़ा तो नए ,संतोषी माता , साइयों ,सतियों, खाटू-लाटू ,आला-बाला पैदा कर दिये गए ! नए-नए किरपा बाजार खोल दिये गए , वगैरह,वगैरह ! कहाँ तक कहा जाए कोई सीमा नहीं इन शोषण पशुओं के कारनामों की ! एक बात तय है कि यह सब यह साबित करता है कि भारत अभी भी मूर्ख बहुल देश है ! यह देश पढे-लिखे जाहिलों से पटा पड़ा है ! लोग न तो धर्म के सही अर्थ को जानते-पहचानते है और न ही तर्क पर आधारित वैज्ञानिक विचार -पद्धति का ही अनुसरण कराते हैं !

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  18. कुछ लोग तो निर्मल से भी ज्यादा खतरनाक हैं यहाँ... वे इतनी बार समझाये गये लेकिन रहे वही!

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  19. जब जानता कृपा मांगने नहीं जाएगी, कृपा के श्रोत स्वयं सूख जायेंगे...

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  20. मनोज साहा पाखंजोर14 मई 2012 को 11:44 am

    निर्मल बाबा का किरपा वैसा ही है कोई बैध किसी रोगी रोग ठीक होने के लिए इस तरह का दवाई देता है की आप रात को सोने के बाद एक गोली खाना ओर सुबह नींद खुलने से पहले एक गोली खाना आपके सारे रोगों से मुक्ति मिल जाइगी !
    शातिर बाबा बेवकूफ लोग !

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  21. मनोज साहा पाखंजोर14 मई 2012 को 12:09 pm

    प्रवीन जी नमस्कार
    मैंने आपके ब्लॉग में पड़ा था की आप हिन्दू धर्म ग्रंथो ओपरेसन
    करने के वारे में लिखे थे जारा जल्दी करिए ना!कुछ लोगो के हिसाब से पुराने ग्रंथो ओ सब लिखा है जो आज विज्ञानं खोज रहा है ! इस बात पर मेरे दिमाग में एक सवाल खुजली मरने लग जाता है
    तब तो सारे अविष्कार हिन्दुस्थान होना चाहिए था ! यूरोप और अमेरिका की क्या मजाल की कोई नए चीज़ खोजे ?

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  22. MUFT ME TO ESE HI LOG MILEGE LUTNE WALE

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  23. इब बाब्बे की बी सदार्इ जै

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