सोमवार, 19 मार्च 2012

"शिखर पर पहुंच कर संन्यास लेना स्वार्थ" ... नहीं, यहाँ पर तुम सही नहीं हो ' क्रिकेट के भगवान '...

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सौवाँ शतक सचिन का !


सचिन, प्लीज अब चले जाओ!

की आहटें-सुगबुगाहट तो काफी समय से है फिजाओं में... पर सचिन के सौवें शतक का मामला कुछ अलग सा था... तकरीबन एक साल से इसकी राह देख रहा था सारा क्रिकेट विश्व... इस सौवें शतक की राह को आसान बनाने के लिये ही चयनकर्ताओं द्वारा ऐशिया कप के लिये भेजे गये थे सचिन... और आखिरकार ढाका में बाँग्लादेश के साथ खेलते हुऐ  पा ही लिया यह अकल्पनीय-अविश्वसनीय सा मुकाम 'क्रिकेट के भगवान' ने... लगभग सभी को यह उम्मीद सी थी कि इसी शतक के साथ कम से कम एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से अपने सन्यास की घोषणा तो करेंगे ही सचिन... और कुछ इसी आशय के सवालात भी पूछे गये उनसे... परंतु सचिन ने कहा कि "शिखर पर पहुंच कर संन्यास लेना एक स्वार्थपूर्ण सोच है" ...

खबर के मुताबिक उनका मानना है कि शीर्ष पर पहुंचकर संन्यास की बात करना "स्वार्थपूर्ण सोच" है। पिछले दो दशक से अधिक समय से खेल रहे 38 बरस के सचिन ने कहा कि " मेरा मानना है कि जब तक मैं भारतीय टीम को योगदान दे सकता हूं, मुझे खेलते रहना चाहिए। यह काफी स्वार्थी सोच है कि शीर्ष पर पहुंचकर संन्यास ले लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब आप शीर्ष पर हैं, तभी देश को आपकी सेवाओं की जरूरत है। जब मुझे लगेगा कि मैं देश के लिए कुछ नहीं कर पा रहा हूं तो खुद ही संन्यास ले लूंगा, किसी के कहने से नहीं।"

क्या सचिन सही कह रहे हैं... नहीं, नहीं और नहीं... शिखर पर रहते हुऐ सन्यास लेना... खास तौर से खेल जगत के सितारे के लिये... एक निस्वार्थ सोच का परिचायक है... वह यह जतलाता है कि यह खिलाड़ी खेल को अपने से और दुनिया की बाकी चीजों से भी बढ़कर मानता है... वह यह भी जतलाता है कि खिलाड़ी को इस बात का अहसास है कि वह अपने हिस्से का खेल खेल चुका है... वह यह भी जतलाता है कि खेल के हित में खिलाड़ी किसी नये लड़के का रास्ता रोकना नहीं चाहता... वह यह भी दिखाता है कि खिलाड़ी को अपने प्रशंसकों की आँखों में बसी अपनी छवि की भी फिक्र है, मैं तो हमेशा अपनी तेजी के शिखर पर गेंद फेंकते शोऐब अख्तर को कट कर छक्का मारने वाले सचिन की छवि अपने दिल में बसाना चाहूँगा न कि बाँग्लादेश के गुमनाम से गेंदबाजों से जैसे तैसे एक एक रन चुरा ९४ से १०० रन की ओर बढ़ते सचिन की... वह यह भी बतलाता है कि खिलाड़ी के पास यह समझ है कि बल्ला टाँगने का सही वक्त कौन सा है और खेल की ही तरह जिंदगी में भी उसकी टाइमिंग परफेक्ट है...

क्या आपको नहीं लगता कि ग्लेन मैकग्रा, शेन वार्न, एडम गिलक्रिस्ट और स्टीव वॉ आदि भी चाहते तो काफी समय तक और खेल सकते थे... यह सभी अपने शिखर पर गये... और निश्चित तौर पर कोई घोर विरोधी भी इनको स्वार्थी नहीं कह सकता है...


सचिन बड़े खिलाड़ी हैं... उनकी उपलब्धियाँ बहुत-बहुत हैं... लोग उन्हें पूजते तक हैं ...  क्रिकेट बोर्ड में या किसी चयनकर्ता में यह दम नहीं, जो उन्हें कह सके कि २२ साल की क्रिकेट के बाद अब वे सन्यास ले लें... वह जब तक यह सोचते हैं कि वे टीम को योगदान दे सकते हैं, वे खेलते रहेंगे... 

पर इतना तो हम उनसे कह ही सकते हैं:-

"शिखर पर पहुंच कर संन्यास लेना स्वार्थ" ... 

नहीं, यहाँ पर तुम सही नहीं हो, हे ' क्रिकेट के भगवान '... !!!










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8 टिप्‍पणियां:

  1. कल पाकिस्तान के खिलाफ उनकी शानदार बल्लेबाजी देखकर तो मन करता है सचिन और खेलें। एक गेंद चूक गये वरना कल भी शतक निश्चित था।

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    1. ये क्या पांडे जी, मुई एक ही गेंद ही तो है जो कईयों के रिकार्ड सत्यानाश कर देती है ! मसलन खेल शुरू होते ही पहली वाली या फिर उसके बाद वाली कोई सी भी :)

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  2. खेलते रहने दीजिये, एक महान खिलाड़ी के खेलते रहने से कितना कुछ सीखने को मिलता है नये खिलाड़ियों को।

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  3. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    इंडिया दर्पण
    की ओर से नव संवत्सर व नवरात्रि की शुभकामनाए।

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  4. आपसे सौ प्रतिशत सहमत. वैसे सच में सचिन एक महानतम खिलाडी हैं लेकिन ये "क्रिकेट के भगवान्" नाम मीडिया का दिया हुआ है. कभी-२ मैं ये सोचती हूँ कि होकी, फूटबाल, टेबल टेनिस, badminton बाकी खेलों ने क्या बिगाड़ा है, आखिर हमारे मीडिया ने उनके भगवान् क्यों नहीं ढूंढें.

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  5. आप सही कह रहे हैं। जिसने सचिन को यह क्रिकेट के भगवान नाम दिया वह सही नहीं किया। किसी भी व्यक्ति चाहे वह कितना ही महान क्यों न हो यूँ अपरित्याज्य नहीं माना जा सकता। संसार हरेक के बिना चलता रहा है, चलता रहेगा। हर अच्छी चीज का भी अन्त होता ही है।
    घुघूती बासूती

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